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Sri Ganapathi Stava (Trideva Krutam) - The Supreme Prayer

Sri Ganapathi Stava

Sri Ganapathi Stava (Trideva Krutam) - The Supreme Prayer
॥ श्री गणपति स्तवः ॥ ब्रह्मविष्णुमहेशा ऊचुः । अजं निर्विकल्पं निराकारमेकं निरानन्दमद्वैतमानन्दपूर्णम् । परं निर्गुणं निर्विशेषं निरीहं परब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ १ ॥ गुणातीतमाद्यं चिदानन्दरूपं चिदाभासकं सर्वगं ज्ञानगम्यम् । मुनिध्येयमाकाशरूपं परेशं परब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ २ ॥ जगत्कारणं कारणज्ञानरूपं सुरादिं सुखादिं युगादिं गणेशम् । जगद्व्यापिनं विश्ववन्द्यं सुरेशं परब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ ३ ॥ रजोयोगतो ब्रह्मरूपं श्रुतिज्ञं सदा कार्यसक्तं हृदाचिन्त्यरूपम् । जगत्कारकं सर्वविद्यानिधानं परब्रह्मरूपं गणेशं नतास्मः ॥ ४ ॥ सदा सत्त्वयोगं मुदा क्रीडमानं सुरारीन्हरन्तं जगत्पालयन्तम् । अनेकावतारं निजज्ञानहारं सदा विष्णुरूपं गणेशं नमामः ॥ ५ ॥ तमोयोगिनं रुद्ररूपं त्रिनेत्रं जगद्धारकं तारकं ज्ञानहेतुम् । अनेकागमैः स्वं जनं बोधयन्तं सदा शर्वरूपं गणेशं नमामः ॥ ६ ॥ तमस्तोमहारं जनाज्ञानहारं त्रयीवेदसारं परब्रह्मपारम् । मुनिज्ञानकारं विदूरेविकारं सदा ब्रह्मरूपं गणेशं नमामः ॥ ७ ॥ निजैरोषधीस्तर्पयन्तं करोद्यैः सरौघान्कलाभिः सुधास्राविणीभिः । दिनेशांशु सन्तापहारं द्विजेशं शशाङ्कस्वरूपं गणेशं नमामः ॥ ८ ॥ प्रकाशस्वरूपं नभोवायुरूपं विकारादिहेतुं कलाकालभूतम् । अनेकक्रियानेकशक्तिस्वरूपं सदा शक्तिरूपं गणेशं नमामः ॥ ९ ॥ प्रधानस्वरूपं महत्तत्त्वरूपं धरावारिरूपं दिगीशादिरूपम् । असत्सत्स्वरूपं जगद्धेतुभूतं सदा विश्वरूपं गणेशं नतास्मः ॥ १० ॥ त्वदीये मनः स्थापयेदङ्घ्रियुग्मे जनो विघ्नसङ्घान्न पीडां लभेत । लसत्सूर्यबिम्बे विशाले स्थितोऽयं जनोध्वान्त पीडां कथं वा लभेत ॥ ११ ॥ वयं भ्रामिताः सर्वथाऽज्ञानयोगा- -दलब्धा तवाङ्घ्रिं बहून्वर्षपूगान् । इदानीमवाप्तास्तवैव प्रसादा- -त्प्रपन्नान्सदा पाहि विश्वम्भराद्य ॥ १२ ॥ फलश्रुति गणेश उवाच । इदं यः पठेत्प्रातरुत्थाय धीमान् त्रिसन्ध्यं सदा भक्तियुक्तो विशुद्धः । सपुत्रान् श्रियं सर्वकामान् लभेत परब्रह्मरूपो भवेदन्तकाले ॥ १३ ॥ इति गणेशपुराणे उपासनाखण्डे त्रयोदशोऽध्याये श्रीगणपतिस्तवः ।

स्तोत्र परिचय (Introduction)

श्री गणपति स्तवः केवल एक साधारण स्तुति नहीं, बल्कि गणेश पुराण (उपासना खंड, अध्याय 13) का एक अत्यंत गूढ़ दार्शनिक अंश है।
इसे स्वयं त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) ने गाया है, जब उन्हें यह ज्ञान हुआ कि उनकी उत्पत्ति और शक्तियों का मूल स्रोत कोई और नहीं, बल्कि साक्षात् परब्रह्म गणेश ही हैं।

महत्व एवं अर्थ (Significance)

  • परब्रह्म-रूप (Parabrahma-Rupa): श्लोक 1, 2, 3 और 4 में बार-बार उन्हें 'परब्रह्म' कहा गया है। अर्थात वे नाम-रूप से परे, 'निराकार' और 'निर्गुण' सत्ता हैं।
  • त्रिदेवों का मूल:
    • विष्णु रूप: श्लोक 5 में कहा गया है कि वे ही 'सत्वगुण' का आश्रय लेकर जगत का पालन करते हैं।
    • रुद्र रूप: श्लोक 6 में कहा गया है कि वे ही 'तमोगुण' को स्वीकार कर 'त्रिनेत्र' शिव के रूप में संहार करते हैं।
    • ब्रह्म रूप: श्लोक 7 में कहा गया है कि वे ही वेदों के सार और सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं।

लाभ (Benefits)

स्वयं श्री गणेश ने इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक 13) में कहा है:
  • सर्व कामना सिद्धि: "सर्वकामान् लभेत" - भक्त की सभी सात्विक इच्छाएं पूर्ण होती हैं।
  • संतान और धन: "सपुत्रान् श्रियं" - यह उत्तम संतान और लक्ष्मी (ऐश्वर्य) प्रदान करने वाला है।
  • मोक्ष प्राप्ति: अंतकाल में वह भक्त "परब्रह्मरूपो भवेद" - स्वयं परब्रह्म स्वरूप में लीन हो जाता है।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

इस स्तोत्र की रचना किसने की?

इसकी रचना स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेवों) ने मिलकर गणेश पुराण में की है।

इसका मुख्य भाव क्या है?

इसका मूल भाव यह है कि गणेश जी केवल गजानन नहीं, बल्कि वे ही साक्षात् परब्रह्म हैं, जिनसे त्रिदेवों की उत्पत्ति हुई है।

"निर्गुण" का अर्थ क्या है?

श्लोक 1 में उन्हें 'निर्गुण' कहा गया है, जिसका अर्थ है वे प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से बंधे नहीं हैं, बल्कि उनसे परे हैं।

क्या गणेश जी ही विष्णु और शिव रूप में हैं?

हाँ। श्लोक 5 और 6 में स्पष्ट कहा गया है कि वे ही 'सदा विष्णु रूप' और 'सदा शर्व (शिव) रूप' धारण करते हैं।

"जगत्-कारण" का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "संसार का कारण"। जैसे मिट्टी घड़े का कारण है, वैसे ही गणेश जी इस संपूर्ण ब्रह्मांड के मूल कारण हैं।

इस स्तोत्र के पाठ का क्या फल है?

फलश्रुति के अनुसार, इससे उत्तम संतान (पुत्र), धन-संपदा, सभी इच्छाओं की पूर्ति और अंत में मोक्ष मिलता है।

"चिदानन्द-रूप" का क्या अर्थ है?

अर्थात वे 'चित्' (चेतना/ज्ञान) और 'आनन्द' (परम सुख) के स्वरूप हैं।

इसका पाठ कब करना श्रेष्ठ है?

प्रातःकाल उठकर और तीनों संध्याओं (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में इसका पाठ करना सर्वश्रेष्ठ बताया गया है।

यह किस पुराण में वर्णित है?

यह गणेश पुराण के उपासना खंड के 13वें अध्याय में वर्णित है।