Sri Ganapathi Stava (Trideva Krutam) - The Supreme Prayer
Sri Ganapathi Stava

स्तोत्र परिचय (Introduction)
महत्व एवं अर्थ (Significance)
- ➢परब्रह्म-रूप (Parabrahma-Rupa): श्लोक 1, 2, 3 और 4 में बार-बार उन्हें 'परब्रह्म' कहा गया है। अर्थात वे नाम-रूप से परे, 'निराकार' और 'निर्गुण' सत्ता हैं।
- ➢त्रिदेवों का मूल:
- विष्णु रूप: श्लोक 5 में कहा गया है कि वे ही 'सत्वगुण' का आश्रय लेकर जगत का पालन करते हैं।
- रुद्र रूप: श्लोक 6 में कहा गया है कि वे ही 'तमोगुण' को स्वीकार कर 'त्रिनेत्र' शिव के रूप में संहार करते हैं।
- ब्रह्म रूप: श्लोक 7 में कहा गया है कि वे ही वेदों के सार और सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं।
लाभ (Benefits)
- ✓सर्व कामना सिद्धि: "सर्वकामान् लभेत" - भक्त की सभी सात्विक इच्छाएं पूर्ण होती हैं।
- ✓संतान और धन: "सपुत्रान् श्रियं" - यह उत्तम संतान और लक्ष्मी (ऐश्वर्य) प्रदान करने वाला है।
- ✓मोक्ष प्राप्ति: अंतकाल में वह भक्त "परब्रह्मरूपो भवेद" - स्वयं परब्रह्म स्वरूप में लीन हो जाता है।
प्रश्नोत्तरी (FAQ)
इस स्तोत्र की रचना किसने की?
इसकी रचना स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेवों) ने मिलकर गणेश पुराण में की है।
इसका मुख्य भाव क्या है?
इसका मूल भाव यह है कि गणेश जी केवल गजानन नहीं, बल्कि वे ही साक्षात् परब्रह्म हैं, जिनसे त्रिदेवों की उत्पत्ति हुई है।
"निर्गुण" का अर्थ क्या है?
श्लोक 1 में उन्हें 'निर्गुण' कहा गया है, जिसका अर्थ है वे प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से बंधे नहीं हैं, बल्कि उनसे परे हैं।
क्या गणेश जी ही विष्णु और शिव रूप में हैं?
हाँ। श्लोक 5 और 6 में स्पष्ट कहा गया है कि वे ही 'सदा विष्णु रूप' और 'सदा शर्व (शिव) रूप' धारण करते हैं।
"जगत्-कारण" का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है "संसार का कारण"। जैसे मिट्टी घड़े का कारण है, वैसे ही गणेश जी इस संपूर्ण ब्रह्मांड के मूल कारण हैं।
इस स्तोत्र के पाठ का क्या फल है?
फलश्रुति के अनुसार, इससे उत्तम संतान (पुत्र), धन-संपदा, सभी इच्छाओं की पूर्ति और अंत में मोक्ष मिलता है।
"चिदानन्द-रूप" का क्या अर्थ है?
अर्थात वे 'चित्' (चेतना/ज्ञान) और 'आनन्द' (परम सुख) के स्वरूप हैं।
इसका पाठ कब करना श्रेष्ठ है?
प्रातःकाल उठकर और तीनों संध्याओं (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में इसका पाठ करना सर्वश्रेष्ठ बताया गया है।
यह किस पुराण में वर्णित है?
यह गणेश पुराण के उपासना खंड के 13वें अध्याय में वर्णित है।