Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Datta Stavaraja – श्री दत्त स्तवराजः

Sri Datta Stavaraja – श्री दत्त स्तवराजः
॥ श्री दत्त स्तवराजः ॥ (श्रीरुद्रयामले महादेवशुकसंवादे) श्रीशुक उवाच । महादेव महादेव देवदेव महेश्वर । दत्तात्रेयस्तवं दिव्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ १ ॥ तदस्य वद माहात्म्यं देवदेव दयानिधे । दत्तात्परतरं नास्ति पुरा व्यासेन कीर्तितम् ॥ २ ॥ जगद्गुरुर्जगन्नाथो गीयते नारदादिभिः । तत्सर्वं ब्रूहि मे देव करुणाकर शङ्कर ॥ ३ ॥ श्रीमहादेव उवाच । शृणु व्यासात्मजात त्वं गुह्याद्गुह्यतरं महत् । यस्य स्मरणमात्रेण मुच्यते सर्वबन्धनात् ॥ ४ ॥ दत्तं सनातनं ब्रह्म निर्विकारं निरञ्जनम् । आदिदेवं निराकारं व्यक्तं गुणविवर्जितम् ॥ ५ ॥ नामरूपक्रियातीतं निःसङ्गं देववन्दितम् । नारायणं शिवं शुद्धं दृश्यदर्शनवर्जितम् ॥ ६ ॥ परेशं पार्वतीकान्तं रमाधीशं दिगम्बरम् । निर्मलो नित्यतृप्तात्मा नित्यानन्दो महेश्वरः ॥ ७ ॥ ब्रह्मा विष्णुः शिवः साक्षाद्गोविन्दो गतिदायकः । पीताम्बरधरो देवो माधवः सुरसेवितः ॥ ८ ॥ मृत्युञ्जयो महारुद्रः कार्तवीर्यवरप्रदः । ओमित्येकाक्षरं बीजं क्षराक्षरपदं हरिः ॥ ९ ॥ गया काशी कुरुक्षेत्रं प्रयागं बद्रिकाश्रमम् । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ १० ॥ गोमती जाह्नवी भीमा गण्डकी च सरस्वती । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ ११ ॥ सरयूस्तुङ्गभद्रा च यमुना पयवाहिनी । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ १२ ॥ ताम्रपर्णी प्रणीता च गौतमी तापनाशिनी । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ १३ ॥ नर्मदा सिन्धु कावेरी कृष्णवेणी तथैव च । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ १४ ॥ अवन्ती द्वारका माया मल्लिनाथस्य दर्शनम् । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ १५ ॥ द्वादश ज्योतिर्लिङ्गानि वाराहे पुष्करे तथा । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ १६ ॥ ज्वालामुखी हिङ्गुला च सप्तशृङ्गस्तथैव च । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ १७ ॥ अयोध्या मथुरा काञ्ची रेणुका सेतुबन्धनम् । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ १८ ॥ अहोबिलं त्रिपथगां गङ्गा सागरमेव च । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ १९ ॥ करवीरमहास्थानं रङ्गनाथं तथैव च । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ २० ॥ एकादशीव्रतं चैव अष्टाङ्गैर्योगसाधनम् । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ २१ ॥ शाकम्भरी च मूकाम्बा कार्तिकस्वामिदर्शनम् । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ २२ ॥ व्रतं निष्ठा तपो दानं सामगानं तथैव च । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ २३ ॥ मुक्तिक्षेत्रं च कामाक्षी तुलजा सिद्धिदेवता । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ २४ ॥ अन्नहोमादिकं दानं मेदिन्यश्व गजान् वृषान् । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ २५ ॥ माघकार्तिकयोः स्नानं सन्यासं ब्रह्मचर्यकम् । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ २६ ॥ अश्वमेधसहस्राणि मातापितृप्रपोषणम् । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ २७ ॥ अमितं पोषणं पुण्यमुपकारं तथैव च । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ २८ ॥ जगन्नाथं च गोकर्णं पाण्डुरङ्गं तथैव च । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ २९ ॥ सर्वदेवनमस्कारः सर्वे यज्ञाः प्रकीर्तिताः । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ ३० ॥ शास्त्रषट्कं पुराणानि अष्टौ व्याकरणानि च । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ ३१ ॥ सावित्री प्रणवं जप्त्वा चतुर्वेदांश्च पारगाः । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ ३२ ॥ कन्यादानानि पुण्यानि वानप्रस्थस्य पोषणम् । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ ३३ ॥ वापी कूप तटाकानि काननारोपणानि च । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ ३४ ॥ अश्वत्थ तुलसी धात्री सेवते यो नरः सदा । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ ३५ ॥ शिवं विष्णुं गणेशं च शक्तिं सूर्यं च पूजनम् । एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ ३६ ॥ गोहत्यादिसहस्राणि ब्रह्महत्यास्तथैव च । प्रायश्चित्तं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ ३७ ॥ स्वर्णस्तेयं सुरापानं मातुर्गमनकिल्बिषम् । मुच्यते सर्वपापेभ्यो दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ ३८ ॥ स्त्रीहत्यादिकृतं पापं बालहत्यास्तथैव च । मुच्यते सर्वपापेभ्यो दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ ३९ ॥ प्रायश्चित्तं कृतं तेन सर्वपापप्रणाशनम् । ब्रह्मत्वं लभते ज्ञानं दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ ४० ॥ कलिदोषविनाशार्थं जपेदेकाग्रमानसः । श्रीगुरुं परमानन्दं दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ ४१ ॥ दत्त दत्त इदं वाक्यं तारकं सर्वदेहिनाम् । श्रद्धायुक्तो जपेन्नित्यं दत्त इत्यक्षरद्वयम् ॥ ४२ ॥ केशवं माधवं विष्णुं गोविन्दं गोपतिं हरिम् । गुरूणां पठ्यते नित्यं तत्सर्वं च शुभावहम् ॥ ४३ ॥ निरञ्जनं निराकारं देवदेवं जनार्दनम् । मायामुक्तं जपेन्नित्यं पावनं सर्वदेहिनाम् ॥ ४४ ॥ आदिनाथं सुरश्रेष्ठं कृष्णं श्यामं जगद्गुरुम् । सिद्धराजं गुणातीतं रामं राजीवलोचनम् ॥ ४५ ॥ नारायणं परं ब्रह्म लक्ष्मीकान्तं परात्परम् । अप्रमेयं सुरानन्दं नमो दत्तं दिगम्बरम् ॥ ४६ ॥ योगिराजोऽत्रिवरदः सुराध्यक्षो गुणान्तकः । अनसूयात्मजो देवो देवतागतिदायकः ॥ ४७ ॥ गोपनीयं प्रयत्नेन अयं सुरमुनीश्वरैः । समस्तऋषिभिः सर्वैः भक्त्या स्तुत्वा महात्मभिः ॥ ४८ ॥ नारदेन सुरेन्द्रेण सनकाद्यैर्महात्मभिः । गौतमेन च गार्गेण व्यासेन कपिलेन च ॥ ४९ ॥ वामदेवेन दक्षेण अत्रि भार्गव मुद्गलैः । वसिष्ठप्रमुखैः सर्वैः गीयते सर्वदादरात् ॥ ५० ॥ विनायकेन रुद्रेण महासेनेन वै सदा । मार्कण्डेयेन धौम्येन कीर्तितं स्तवमुत्तमम् ॥ ५१ ॥ मरीच्यादिमुनीन्द्रैश्च शुककर्दमसत्तमैः । अङ्गिराकृत पौलस्त्य भृगु कश्यप जैमिनी ॥ ५२ ॥ गुरोः स्तवमधीयानो विजयी सर्वदा भवेत् । गुरोः सायुज्यमाप्नोति गुरोर्नाम पठेद्बुधः ॥ ५३ ॥ गुरोः परतरं नास्ति सत्यं सत्यं न संशयः । गुरोः पादोदकं पीत्वा गुरोर्नाम सदा जपेत् ॥ ५४ ॥ तेऽपि सन्न्यासिनो ज्ञेयाः इतरे वेषधारिणः । गङ्गाद्याः सरितः सर्वे गुरोः पादाम्बुजे सदा ॥ ५५ ॥ गुरुस्तवं न जानाति गुरुनाम मुखे न हि । पशुतुल्यं विजानीयात् सत्यं सत्यं महामुने ॥ ५६ ॥ इदं स्तोत्रं महद्दिव्यं स्तवराजं मनोहरम् । पठनाच्छ्रवणाद्वापि सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ ५७ ॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले श्रीमन्महादेवशुकसंवादे श्री दत्तात्रेय स्तवराजः सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री दत्त स्तवराजः — 'दत्त' नाम की महिमा (Introduction)

श्री दत्त स्तवराजः (Sri Datta Stavaraja) हिंदू धर्म के तंत्र साहित्य के एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ 'रुद्रयामल' (Rudra Yamala) से उद्धृत है। यह स्तोत्र भगवान शिव और महर्षि शुकदेव (महर्षि व्यास के पुत्र) के बीच हुए एक अद्भुत संवाद के रूप में प्रकट हुआ है। श्रीशुकदेव जी, जो स्वयं ब्रह्मज्ञानी थे, भगवान महादेव से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें भगवान दत्तात्रेय का वह दिव्य स्तवन सुनाएं जिसके द्वारा जीव सांसारिक बंधनों से मुक्त हो सके। भगवान दत्तात्रेय, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का एकीकृत अवतार माना जाता है, को इस स्तोत्र में "सनातन ब्रह्म" और "निर्विकार" कहा गया है।

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'सर्व-फल-प्रदायक' होना है। स्तवराज के श्लोक १० से ४० तक एक विशिष्ट आवृत्ति (Refrain) का प्रयोग किया गया है— "एतत्सर्वं कृतं तेन दत्त इत्यक्षरद्वयम्"। इसका अर्थ है कि जिसने 'दत्त' (Datta) इन दो अक्षरों का हृदय से स्मरण कर लिया, उसने गया, काशी, कुरुक्षेत्र जैसे तीर्थों की यात्रा, गंगा-यमुना जैसी नदियों का स्नान, और अश्वमेध जैसे हजारों यज्ञों का फल एक साथ प्राप्त कर लिया। यह स्तोत्र सिद्ध करता है कि कलियुग में 'नाम-स्मरण' से बढ़कर कोई दूसरी साधना नहीं है।

भगवान दत्तात्रेय को 'आदि गुरु' और 'जगद्गुरु' कहा जाता है। इस स्तोत्र में उनकी स्तुति केवल एक देवता के रूप में नहीं, बल्कि उस साक्षात 'गुरु-तत्व' के रूप में की गई है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष प्रदान करता है। रुद्रयामल जैसे तांत्रिक ग्रंथ से लिए जाने के कारण यह पाठ अत्यंत ऊर्जावान माना जाता है, जो साधक के सूक्ष्म शरीर की शुद्धि कर उसे ईश्वर के साथ एकात्म होने में सहायता करता है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व और 'दत्त' नाम का रहस्य (Significance)

दत्त स्तवराज का दार्शनिक आधार 'गुरु-महिमा' पर टिका है। श्लोक ५४ में स्पष्ट घोषणा की गई है— "गुरोः परतरं नास्ति सत्यं सत्यं न संशयः" (गुरु से बढ़कर कुछ भी नहीं है, यह सत्य है)। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि समस्त ब्रह्मांड, सभी देवी-देवता और सभी तीर्थ गुरु के चरणों में ही वास करते हैं। जब हम 'दत्त' कहते हैं, तो हम उस अनन्त सत्ता को पुकारते हैं जिसने स्वयं को सृष्टि के कल्याण के लिए 'अर्पित' (दत्त) कर दिया है।

यह पाठ विशेष रूप से उन लोगों के लिए अमोघ है जो जीवन में जाने-अनजाने हुए बड़े पापों (जैसे गोहत्या, ब्रह्महत्या या मादक द्रव्य सेवन) के प्रायश्चित की खोज में हैं। श्लोक ३७-४० में महादेव स्पष्ट करते हैं कि 'दत्त' नाम का स्मरण इन घोर पापों के प्रायश्चित का सबसे सुलभ और प्रभावी मार्ग है। यह स्तोत्र केवल आध्यात्मिक शांति ही नहीं देता, बल्कि साधक के व्यक्तित्व में 'ब्रह्मत्व' (ईश्वरीय गुण) का संचार करता है। इसमें महर्षि व्यास, नारद, सनकादि और अन्य महान ऋषियों द्वारा प्रभु की स्तुति किए जाने का उल्लेख यह सिद्ध करता है कि यह मार्ग अनादि और शाश्वत है।

फलश्रुति: स्तवराज पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits)

इस दिव्य स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक ५३-५७) के अनुसार, इसका पाठ करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • समस्त तीर्थों का फल: घर बैठे ही भारत के सभी पवित्र तीर्थों (काशी, प्रयाग, रामेश्वरम आदि) की यात्रा का आध्यात्मिक पुण्य मिलता है।
  • घोर पापों से मुक्ति: गोहत्या, ब्रह्महत्या और कलयुग के अन्य दोषों का शमन होता है।
  • सर्व कार्य सिद्धि: "विजयी सर्वदा भवेत्" — इस पाठ से साधक को जीवन के हर क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है।
  • गुरु सायुज्य: साधक को गुरु के दिव्य स्वरूप में विलीन होने (मोक्ष) की पात्रता प्राप्त होती है।
  • मानसिक शांति और अद्वैत ज्ञान: चंचल मन स्थिर होता है और सत्य-असत्य का विवेक जाग्रत होता है।
  • सुरक्षा कवच: 'दत्त' नाम का निरंतर जाप साधक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा चक्र निर्मित करता है।

पाठ विधि एवं विशेष साधना निर्देश (Ritual Method)

दत्तात्रेय साधना में श्रद्धा और निरंतरता का सबसे अधिक महत्व है। दत्त स्तवराज को सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित विधि अनुशंसित है:

साधना के नियम

  • समय: गुरुवार (Thursday) भगवान दत्त का दिन है। पूर्णिमा और दत्त जयंती पर पाठ करना विशेष फलदायी है। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में पाठ सर्वोत्तम है।
  • आसन: कुशा या ऊनी पीले आसन का प्रयोग करें। मुख उत्तर या पूर्व की ओर होना चाहिए।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र (पीले या श्वेत) धारण करें। भस्म या चंदन का तिलक लगाएं।
  • दीप और नैवेद्य: घी का दीपक प्रज्वलित करें। भगवान को गुड़-चना, बेसन के लड्डू या ताजे फलों का भोग लगाएं।
  • गुरु-तत्व ध्यान: पाठ प्रारंभ करने से पहले अपने सद्गुरु या भगवान दत्तात्रेय के त्रिगुण स्वरूप का ध्यान करें।

विशेष अनुष्ठान

यदि किसी विशेष संकट के निवारण के लिए पाठ कर रहे हैं, तो लगातार २१ दिनों तक प्रतिदिन ११ या २१ बार इस स्तोत्र का पाठ करें। पाठ के अंत में 'दत्त' नाम का १०८ बार मानसिक जाप करना इसकी शक्ति को कई गुना बढ़ा देता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10+ FAQs)

1. श्री दत्त स्तवराज किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र प्राचीन तांत्रिक ग्रंथ 'रुद्रयामल' (Rudra Yamala) से लिया गया है।

2. इस स्तोत्र में किनके बीच संवाद हो रहा है?

यह भगवान शिव (महादेव) और महर्षि शुकदेव के बीच का संवाद है।

3. 'दत्त इत्यक्षरद्वयम्' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है— "'दत्त' यह दो अक्षरों वाला नाम।" स्तोत्र के अनुसार इन दो अक्षरों में ही संपूर्ण ब्रह्मांड की तीर्थ यात्रा और यज्ञों का पुण्य समाहित है।

4. क्या इस पाठ से पितृ दोष शांत होता है?

जी हाँ, भगवान दत्तात्रेय को पितरों का अधिपति माना जाता है। इस स्तोत्र का पाठ पूर्वजों को सद्गति प्रदान करता है और पितृ दोषों का निवारण करता है।

5. क्या स्त्रियाँ इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, भगवान दत्त की भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। शुद्ध चित्त और मर्यादा का पालन करते हुए कोई भी श्रद्धालु इसका पाठ कर सकता है।

6. पाठ के लिए सबसे उत्तम माला कौन सी है?

भगवान दत्तात्रेय की साधना के लिए रुद्राक्ष की माला या स्फटिक की माला सर्वश्रेष्ठ मानी गई है।

7. 'एतत्सर्वं कृतं तेन' का क्या तात्पर्य है?

इसका तात्पर्य है कि जिसने 'दत्त' नाम लिया, उसने वे सभी धार्मिक क्रियाएं (तीर्थ, दान, व्रत) पूर्ण कर लीं जिनका उल्लेख उस श्लोक में किया गया है।

8. क्या इस पाठ से कठिन रोगों में लाभ मिलता है?

जी हाँ, भगवान दत्त को 'सर्वाधिव्याधिभेषज' (सभी रोगों की औषधि) माना जाता है। श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।

9. 'स्तवराज' का अर्थ क्या है?

'स्तव' का अर्थ है स्तुति और 'राज' का अर्थ है राजा। अर्थात, यह दत्तात्रेय स्तुतियों में सर्वश्रेष्ठ और राजा के समान शक्तिशाली है।

10. क्या इसके पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

साधारण भक्ति भाव से पाठ करने के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है, लेकिन तांत्रिक प्रयोगों के लिए गुरु का मार्गदर्शन फल की तीव्रता को बढ़ा देता है।