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Sri Dakshinamurthy Stotram 3 (Jaya Ghosha) – श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् – ३ (जय घोष)

Sri Dakshinamurthy Stotram 3 (Jaya Ghosha) – श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् – ३ (जय घोष)
॥ श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् (जय घोष) ॥ मन्दस्मित स्फुरित मुग्धमुखारविन्दं कन्दर्पकोटिशतसुन्दरदिव्यमूर्तिम् । आताम्रकोमल जटाघटितेन्दुलेख- -मालोकये वटतटीनिलयं दयलुम् ॥ १ ॥ कन्दलित बोधमुद्रं कैवल्यानन्द संविदुन्निद्रम् । कलये कञ्चनरुद्रं करुणारसपूरपूरितसमुद्रम् ॥ २ ॥ जय देव महादेव जय कारुण्यविग्रह । जय भूमिरुहावास जय वीरासनस्थित ॥ ३ ॥ जय कुन्देन्दुपाटीरपाण्डुराङ्गाङ्गजापते । जय विज्ञानमुद्राऽक्षमालावीणालसत्कर ॥ ४ ॥ जयेतरकरन्यस्त पुस्तकास्तरजस्तमः । जयापस्मार निक्षिप्त दक्षपाद सरोरुह ॥ ५ ॥ जय शार्दूल चर्मैक परिधान लसत्कटे । जय मन्दस्मितोदार मुखेन्दु स्फुरिताकृते ॥ ६ ॥ जयान्तेवासिनिकरैरावृतानन्दमन्धर । जय लीलाजितानङ्ग जय मङ्गलवैभव ॥ ७ ॥ जय तुङ्गपृथूरस्क जय सङ्गीतलोलुप । जय गङ्गाधरासङ्ग जय शृङ्गारशेखर ॥ ८ ॥ जयोत्सङ्गानुषङ्गार्य जयोत्तुङ्ग नगालय । जयापाङ्गैक निर्दग्ध त्रिपुरामरवल्लभ ॥ ९ ॥ जय पिङ्गजटाजूट घटितेन्दुकरामर । जय जातु प्रपन्नार्ति प्रपाटन पटूत्तम ॥ १० ॥ जय विद्योत्पलोल्लासि निशाकर परावर । जयाऽविद्यान्धतमसध्वंसनोद्भासिभास्कर ॥ ११ ॥ जय संसृतिकान्तारकुठारासुरसूदन । जय संसारसावित्र तापतापित पादप ॥ १२ ॥ जय दोषविषालीढ मृतसञ्जीवनौषध । जय कर्तव्यदावाग्नि दग्धान्तर सुधाम्बुधे ॥ १३ ॥ जयाऽसूयार्णवामग्नजनतारणनाविक । जयाहताक्षि रोगाणामतिलोक सुखाञ्जन ॥ १४ ॥ जयाशाविषवल्लीनां मूलमालानिकृन्तन । जयाघतृणकूटानाममन्द ज्वलितानल ॥ १५ ॥ जय मायामदेभश्री विदारण मृगोत्तम । जय भक्तजनस्वान्त चन्द्रकान्तैकचन्द्रमाः ॥ १६ ॥ जय सन्त्यक्तसर्वाश मुनिकोक दिवाकर । जयाऽचलसुताचारु मुखचन्द्र चकोरक ॥ १७ ॥ जयाऽद्रिकन्यकोत्तुङ्ग कुचाचल विहङ्गम । जय हैमवती मञ्जु मुखपङ्कज बम्भर ॥ १८ ॥ जय कात्यायनी स्निग्ध चित्तोत्पल सुधाकर । जयाऽखिलहृदाकाशलसद्द्युमणिमण्डल ॥ १९ ॥ जयाऽसङ्ग सुखोत्तुङ्ग सौधक्रीडन भूमिप । जय संवित्सभासीम नटनोत्सुक नर्तक ॥ २० ॥ जयाऽनवधि बोधाब्धिकेलिकौतुक भूपते । जय निर्मलचिद्व्योम्नि चारुद्योतित नीरद ॥ २१ ॥ जयाऽनन्द सदुद्यान लीलालोलुप कोकिल । जयाऽगमशिरोरण्यविहार वरकुञ्जर ॥ २२ ॥ जय प्रणव माणिक्य पञ्जरान्तःशुकाग्रणीः । जय सर्वकलावार्धि तुषार करमण्डल ॥ २३ ॥ जयाऽणिमादिभूतीनां शरण्याखिल पुण्यभूः । जय स्वभावभासैव विभासित जगत्त्रय ॥ २४ ॥ जय खादिधरित्र्यन्त जगज्जन्मादिकारण । जयाऽशेष जगज्जाल कलाकलनवर्जित ॥ २५ ॥ जय मुक्तजनप्राप्य सत्यज्ञानसुखाकृते । जय दक्षाध्वरध्वंसिन् जय मोक्षफलप्रद ॥ २६ ॥ जय सूक्ष्म जगद्व्यापिन् जय साक्षिन् चिदात्मक । जय सर्वकुलाकल्प जयानल्प गुणार्णव ॥ २७ ॥ जय कन्दर्पलावण्य दर्पनिर्भेदन प्रभो । जय कर्पूरगौराङ्ग जय कर्मफलाश्रय ॥ २८ ॥ जय कञ्जदलोत्सेकभञ्जनोद्यतलोचन । जय पूर्णेन्दुसौन्दर्य गर्वनिर्वापणानन ॥ २९ ॥ जय हासश्रियोदस्त शरच्चन्द्रमहाप्रभ । जयाधर विनिर्भिन्न बिम्बारुणिम विभ्रम ॥ ३० ॥ जय कम्बुविलासश्री धिक्कारि वरकन्धर । जय मञ्जुलमञ्जीररञ्जित श्रीपदाम्बुज ॥ ३१ ॥ जय वैकुण्ठसम्पूज्य जयाकुण्ठमते हर । जय श्रीकण्ठ सर्वज्ञ जय सर्वकलानिधे ॥ ३२ ॥ जय कोशातिदूरस्थ जयाकाश शिरोरुह । जय पाशुपतध्येय जय पाशविमोचक ॥ ३३ ॥ जय देशिक देवेश जय शम्भो जगन्मय । जय शर्व शिवेशान जय शङ्कर शाश्वत ॥ ३४ ॥ जयोङ्कारैकसंसिद्ध जय किङ्करवत्सल । जय pङ्कजजन्मादि भाविताङ्घ्रियुगाम्बुज ॥ ३५ ॥ जय भर्ग भव स्थाणो जय भस्मावकुण्ठन । जय स्थिमित गम्भीर जय निस्तुलविक्रम ॥ ३६ ॥ जयास्तमितसर्वाश जयोदस्तारिमण्डल । जय मार्ताण्डसोमाग्नि लोचनत्रयमण्डित ॥ ३७ ॥ जय गण्डस्थलादर्शबिम्बितोद्भासिकुण्डल । जय पाषण्डजनतादण्डनैकपरायण ॥ ३८ ॥ जयाऽखण्डितसौभाग्य जय चण्डीशभावित । जयाऽनन्तान्त कान्तैक जय शान्तजनेडित ॥ ३९ ॥ जय त्रय्यन्तसंवेद्य जयाङ्ग त्रितयातिग । जय निर्भेदबोधात्मन् जय निर्भावभावित ॥ ४० ॥ जय निर्द्वन्द्व निर्दोष जयाद्वैतसुखाम्बुधे । जय नित्य निराधार जय निष्कल निर्गुण ॥ ४१ ॥ जय निष्क्रिय निर्माय जय निर्मल निर्भय । जय निःशब्द निःस्पर्श जय नीरूप निर्मल ॥ ४२ ॥ जय नीरस निर्गन्ध जय निस्पृह निश्चल । जय निःसीम भूमात्मन् जय निष्पन्द नीरधे ॥ ४३ ॥ जयाऽच्युत जयाऽतर्क्य जयाऽनन्य जयाऽव्यय । जयाऽमूर्त जयाऽचिन्त्य जयाऽग्राह्य जयाऽद्भुत ॥ ४४ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इति श्रीदेशिकेन्द्रस्य स्तोत्रं परमपावनम् । पुत्रपौत्रायुरारोग्य सर्वसौभाग्यवर्धनम् ॥ ४५ ॥ सर्वविद्याप्रदं सम्यगपवर्गविधायकम् । यः पठेत् प्रयतो भूत्वा ससर्वफलमश्नुते ॥ ४६ ॥ दाक्षायणीपति दयार्द्र निरीक्षणेन साक्षादवैति परतत्वमिहैव धीरः । न स्नान दान जप होम सुरार्चनादि- -धर्मैरशेष निगमान्त निरूपणैर्वा ॥ ४७ ॥ अवचनचिन्मुद्राभ्यामद्वैतं बोधमात्रमात्मानम् । ब्रूते तत्र च मानं पुस्तक भुजगाग्निभिर्महादेवः ॥ ४८ ॥ कटिघटित करटिकृत्तिः कामपि मुद्रां प्रदर्शयन् जटिलः । स्वालोकिनः कपाली हन्त मनोविलयमातनोत्येकः ॥ ४९ ॥ श्रुतिमुखचन्द्रचकोरं नतजनदौरात्म्यदुर्गमकुठारम् । मुनिमानससञ्चारं मनसा प्रणतोऽस्मि देशिकमुदारम् ॥ ५० ॥ ॥ इति श्रीसदाशिव ब्रह्मेन्द्रविरचितं श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् (जय घोष) — विस्तृत परिचय एवं दार्शनिक रहस्य (Introduction)

श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् – ३ (जय घोष) सनातन आध्यात्मिक साहित्य की एक अत्यंत ओजस्वी और ज्ञानपूर्ण रचना है। इस स्तोत्र की रचना १८वीं शताब्दी के महान अवधूत संत और दार्शनिक श्री सदाशिव ब्रह्मेन्द्र सरस्वती (Sri Sadashiva Brahmendra) ने की थी। यह पाठ भगवान शिव के उस 'दक्षिणामूर्ति' स्वरूप को समर्पित है, जो ब्रह्मांड के आदि-गुरु (Primordial Teacher) माने जाते हैं। इस स्तोत्र की अद्वितीय विशेषता इसकी 'जय घोष' शैली है, जहाँ अधिकांश श्लोक भगवान की विजय और उनकी सर्वोच्च सत्ता की उद्घोषणा (जय!) से आरम्भ होते हैं।

रचयिता का परिचय (The Sage Behind the Verses): सदाशिव ब्रह्मेन्द्र एक ब्रह्मज्ञानी संत थे जिन्होंने अपना अधिकांश जीवन मौन और नग्नावस्था (अवधूत) में व्यतीत किया। उनकी रचनाओं में अद्वैत वेदांत की वह गहराई मिलती है जो पाठक को सीधे शिवत्व के प्रकाश से जोड़ देती है। इस स्तोत्र में उन्होंने अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियों को ५० दिव्य श्लोकों में पिरोया है। सदाशिव ब्रह्मेन्द्र का दर्शन यह था कि आत्मा ही एकमात्र सत्य है, और दक्षिणामूर्ति उसी आत्मा के साक्षात गुरु रूप हैं।

जय घोष का आध्यात्मिक अर्थ: 'जय' का अर्थ केवल सांसारिक विजय नहीं है, बल्कि यह अज्ञान के ऊपर ज्ञान की, अंधकार के ऊपर प्रकाश की और मृत्यु के ऊपर अमरत्व की विजय है। श्लोक ३ से ४४ तक लगातार "जय" शब्द का प्रयोग साधक के मन में एक प्रकार का आध्यात्मिक आत्मविश्वास (Spiritual Confidence) जाग्रत करता है। यह घोष करता है कि आदि गुरु दक्षिणामूर्ति उन सभी बाधाओं के विनाशक हैं जो मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप (Self-Realization) से दूर रखती हैं।

दक्षिणामूर्ति स्वरूप और वटवृक्ष: स्तोत्र के आरम्भिक श्लोकों में भगवान का वटवृक्ष (न्यग्रोध) के नीचे बैठने का वर्णन है। वटवृक्ष स्थिरता, ज्ञान की अखंडता और सुरक्षा का प्रतीक है। भगवान का दक्षिण दिशा की ओर मुख (दक्षिणामुख) होना यह दर्शाता है कि वे मृत्यु के देवता यम की दिशा को नियंत्रित करते हैं और अपने शिष्यों को अकाल मृत्यु व संसार रूपी चक्र से मुक्त करते हैं। उनके हाथों में स्थित 'चिन्मुद्रा' जीवात्मा और परमात्मा की एकता का साक्षात प्रतीक है।

अद्वैत का उद्घोष: यह स्तोत्र अद्वैत वेदांत के महावाक्यों का काव्य रूप है। श्लोक ४१-४४ में भगवान को "निर्गुण", "निष्कलं", "निर्मल" और "अच्युत" कहकर संबोधित किया गया है, जो उन्हें निराकार ब्रह्म के रूप में स्थापित करता है। यह पाठ उन सभी साधकों के लिए अनिवार्य है जो केवल भक्ति ही नहीं, बल्कि 'तत्व-ज्ञान' की खोज में हैं। जो इस जय-घोष का श्रवण या पाठ करता है, उसके भीतर की जड़ता समाप्त हो जाती है और प्रज्ञा का सूर्य उदित होता है।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में, जहाँ मनुष्य मानसिक अशांति और भ्रम से घिरा हुआ है, सदाशिव ब्रह्मेन्द्र की यह कृति एक 'मानसिक औषधि' (मृतसञ्जीवनौषध - श्लोक १३) के समान है। यह पाठ हृदय के भीतर के 'कर्तव्य-दावाग्नि' (तनाव और चिंताओं) को शांत कर उसे शांति के समुद्र में परिवर्तित कर देता है। ५० श्लोकों की यह 'जय घोष' माला वास्तव में मोक्ष की सीढ़ी है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance)

भगवान दक्षिणामूर्ति की उपासना में जय घोष का महत्व 'नाद ब्रह्म' (Sound of the Universe) के साथ स्वयं को एकाकार करना है। श्लोक ११ में उन्हें "अविद्यान्धतमसध्वंसनोद्भासिभास्कर" कहा गया है, जिसका अर्थ है—वे अज्ञान के घोर अंधकार को नष्ट करने वाले प्रखर सूर्य हैं।

इस स्तोत्र का दार्शनिक महत्व इसकी तांत्रिक शब्दावली में भी है। 'विज्ञानमुद्रा', 'अक्षमाला', और 'वीणा' (श्लोक ४) का वर्णन यह सिद्ध करता है कि आदि गुरु संगीत, व्याकरण, योग और समस्त ६४ कलाओं के प्रवर्तक हैं। यह पाठ करने वाले की सुषुम्ना नाड़ी को जाग्रत कर उसे एकाग्रता प्रदान करता है।

जय घोष स्तोत्र के लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)

श्लोक ४५ और ४६ में स्वयं सदाशिव ब्रह्मेन्द्र ने इस पाठ के अमोघ लाभों का वर्णन किया है:

  • सर्व सौभाग्यवर्धनम्: यह स्तोत्र पुत्र, पौत्र, लम्बी आयु, आरोग्य और समस्त प्रकार के सौभाग्य (Fortune) को बढ़ाने वाला है।
  • सर्वविद्याप्रदम्: विद्यार्थियों और ज्ञान के जिज्ञासुओं के लिए यह पाठ सरस्वती की कृपा के समान है। यह बुद्धि को प्रखर और एकाग्र बनाता है।
  • अज्ञान और रोग से मुक्ति: श्लोक १३ के अनुसार, यह 'भवरोग' और 'दोष-विष' (मानसिक दोष) के लिए 'मृतसंजीवनी औषधि' के समान है।
  • पाप एवं ताप का शमन: "संसार-सावित्र ताप-तापित" साधकों के लिए यह छाया प्रदान करने वाले वृक्ष के समान शीतल शांति देता है।
  • मोक्ष प्राप्ति (Liberation): श्लोक ४६ के अनुसार, जो व्यक्ति एकाग्र होकर इसका पाठ करता है, उसे अपवर्ग (मोक्ष) की प्राप्ति निश्चित रूप से होती है।

पाठ विधि एवं साधना (Ritual Method)

भगवान शिव के गुरु स्वरूप की उपासना के लिए पूर्ण शुचिता और श्रद्धा अनिवार्य है। शास्त्रीय विधि निम्न है:

साधना के नियम

  • समय: सर्वोत्तम फल के लिए ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४:०० से ६:०० बजे) में पाठ करें। शाम के समय प्रदोष काल में पाठ करना भी अत्यंत शुभ है।
  • आसन एवं दिशा: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें। ज्ञान प्राप्ति हेतु उत्तर दिशा श्रेष्ठ है।
  • पूजन: पाठ से पूर्व भगवान दक्षिणामूर्ति के चित्र या शिवलिंग के सम्मुख घी का दीपक जलाएं। सफ़ेद पुष्प, चन्दन और भस्म (Vibhuti) अर्पित करें।
  • ध्यान: श्लोक १ और २ में वर्णित भगवान के स्वरूप का ध्यान करें—वटवृक्ष के नीचे बैठे, मन्दस्मित मुख, जटाओं में चन्द्रमा धारण किए हुए महादेव।

विशेष अवसर

  • गुरु पूर्णिमा: गुरु के प्रति कृतज्ञता और ज्ञान प्राप्ति के लिए यह वर्ष का सबसे बड़ा दिन है।
  • सोमवार और प्रदोष: भगवान शिव के प्रिय दिनों में पाठ करने से मानसिक कष्टों का अंत होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'जय घोष' स्तोत्र की रचना किसने की है?

इस दिव्य स्तोत्र की रचना १८वीं शताब्दी के महान अवधूत और अद्वैत विद्वान श्री सदाशिव ब्रह्मेन्द्र सरस्वती ने की थी।

2. 'जय घोष' का शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

'जय घोष' का अर्थ है विजय की घोषणा। आध्यात्मिक रूप से यह अज्ञान पर ज्ञान की और संसार के बंधनों पर शिवत्व की विजय का प्रतीक है।

3. क्या इस स्तोत्र का पाठ विद्यार्थी कर सकते हैं?

जी हाँ, श्लोक ४६ के अनुसार यह 'सर्वविद्याप्रदम्' है। विद्यार्थियों के लिए एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए यह सर्वोत्तम पाठ है।

4. दक्षिणामूर्ति शिव को 'वटतटीनिलयं' क्यों कहा गया है?

वटवृक्ष (Banyan Tree) ज्ञान की स्थिरता और अखंडता का प्रतीक है। भगवान इसके नीचे बैठकर मौन व्याख्यान देते हैं, इसलिए उन्हें वटतटीनिलयं कहा जाता है।

5. 'मौन व्याख्यान' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है कि गुरु बिना शब्द बोले, केवल अपनी शांत उपस्थिति और चेतना द्वारा शिष्यों के गहनतम संशयों का समाधान कर देते हैं।

6. क्या इस स्तोत्र से आरोग्य (Health) प्राप्त होता है?

हाँ, फलश्रुति के श्लोक ४५ में स्पष्ट रूप से 'आरोग्य' और 'आयु' की वृद्धि का उल्लेख है।

7. 'चिन्मुद्रा' का क्या महत्व है?

चिन्मुद्रा में तर्जनी उंगली का अंगूठे से मिलन जीवात्मा और परमात्मा की एकता का प्रतीक है, जो इस स्तोत्र का मुख्य दार्शनिक आधार है।

8. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?

भगवान शिव की उपासना के लिए रुद्राक्ष की माला ही सर्वश्रेष्ठ और शास्त्रसम्मत मानी गई है।

9. क्या इस पाठ को घर में कर सकते हैं?

हाँ, घर के मंदिर में भगवान शिव के गुरु स्वरूप का ध्यान करते हुए इस स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत शुभ और शांतिदायक होता है।

10. 'भवरोगिणाम् भिषजे' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है—संसार रूपी बीमारी (जन्म-मृत्यु और अज्ञान) को दूर करने वाले महान वैद्य (शिव)।