Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Dakshinamurthy Nakshatramala Stotram – श्री दक्षिणास्य नक्षत्रमाला स्तोत्रम्

Sri Dakshinamurthy Nakshatramala Stotram – श्री दक्षिणास्य नक्षत्रमाला स्तोत्रम्
॥ श्री दक्षिणास्य नक्षत्रमाला स्तोत्रम् ॥ श्रीकण्ठमिन्द्वर्भकभासिचूडं श्रीज्ञानदानव्रतबद्धदीक्षम् । श्रीशाम्बुजन्मप्रभवादिपूज्यं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ १ ॥ हरन्तमानम्रजनानुतापं हयेभवक्त्रेडितपादपद्मम् । हृदा मुनीन्द्रैः परिचिन्त्यमानं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ २ ॥ हस्ताब्जराजद्वरपुस्तमुद्रा- -मुक्ताक्षमालामृतपूर्णकुम्भम् । हरिद्धवाकाङ्क्षितपादसेवं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ ३ ॥ हंसाग्निचन्द्रेक्षणमन्धकारि- -माकारनिर्धूतमनोजगर्वम् । हृतादिमाज्ञानमगोद्भवेशं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ ४ ॥ हत्वा पुरा कालमखर्वगर्वं मृकण्डुसूनोः परिरक्षणं यः । चकार कारुण्यवशात्तमेनं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ ५ ॥ हृत्वा तमः सत्वरमेव हार्दं दत्वा च बोधं परमार्थसंस्थम् । मोक्षं ददात्याशु नताय यस्तं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ ६ ॥ हसन्मुखाम्भोरुहमिन्दुकुन्द- -नीकाशदन्तावलिशोभमानम् । रदाम्बराधःकृतपक्वबिम्बं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ ७ ॥ हेलालवान्निर्मितविश्वबृन्दं बालारुणाभाङ्घ्रियुगं दयालुम् । पश्यन्तमुत्सङ्गगतं षडास्यं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ ८ ॥ ह्रीमानभवेद्देवगुरुर्यदीय- -पादाब्जसंसेवकलोकवाचा । तं दिव्यवाग्दानधुरीणमाशु श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ ९ ॥ हारायिताहीशमनङ्गगर्व- -भङ्गप्रगल्भान्प्रणतानशेषान् । कुर्वन्तमिष्टप्रदमष्टमूर्तिं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ १० ॥ हरिर्जहाराचलकन्यका च यद्वर्ष्मणोऽर्धं तपसा हि पूर्वम् । अतोऽशरीरं तमशेषसंस्थं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ ११ ॥ हन्यादशेषं कलुषं यदङ्घ्रि- -पूजा प्रदद्यादपि सर्वमिष्टम् । तं पार्वतीमानसराजहंसं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ १२ ॥ हठादियोगान् प्रविधाय चित्त- -स्थैर्यं प्रपद्याङ्घ्रियुगं यदीयम् । ध्यायन्ति योगिप्रवरा मुदा तं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ १३ ॥ हितोपदेष्टा दयया नतानां निसर्गया यो यमिनां जवाद्धि । न्यग्रोधमूलैकनिकेतनं तं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ १४ ॥ हतारिषट्कैरनुभूयमानं नितान्तमानन्दघनस्वरूपम् । नतापराधान्सहमानमीशं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ १५ ॥ हित्वा धनापत्यकलत्रबन्धून् दत्त्वाभयं भूतततेर्द्विजाग्र्याः । यं यान्ति लोके शरणं सदा तं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ १६ ॥ हृदम्बुजाते विनिवेश्य चित्तं निरुध्य चक्षुःप्रमुखाक्षवर्गम् । ध्यायन्ति यं शैलसुतायुतं तं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ १७ ॥ हासप्रभानिर्जितभाभिमानं प्रासार्थजुष्टां कवितां दिशन्तम् । नतोत्तमाङ्गेषु करं दधानं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ १८ ॥ हैय्यङ्गवीनं हृदयम्रदिम्ना स्वरेण हंसं चरणेन पद्मम् । हसन्तमंसाग्रलसज्जटालं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ १९ ॥ हरेर्विधेश्चैव विवादशान्त्यै लिङ्गात्मना यः प्रबभूव पूर्वम् । तमादिमध्यान्तविहीनरूपं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ २० ॥ हुताशनादित्यमहीप्रमुख्या यस्याष्टमूर्तीर्निजगाद वेदः । तं सर्वलोकावनसक्तचित्तं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ २१ ॥ हस्त्यन्तलक्ष्मीमपि दीनवर्यः प्राप्नोति यत्पादसरोजनत्या । तं कल्पवल्लीमदभङ्गदक्षं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ २२ ॥ हयाग्र्यमारुह्य गजोत्तमं वा समेत्य यत्पादयुगार्चकाय । यच्छन्ति राज्यं धरणीधवास्तं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ २३ ॥ हवींषि सञ्जुह्वति भूसुराग्र्याः कालेषु वह्नौ यदनुग्रहार्थम् । कर्मानुगुण्येन फलप्रदं तं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ २४ ॥ हेत्या ललाटस्थशुचेर्महाघ- -वनं दहन्तं तरसैव मोदात् । कुर्वन्तमारान्नतचित्तशुद्धिं श्रीदक्षिणास्यं हदि भावयेऽहम् ॥ २५ ॥ हेमाश्मनोः साम्यमतिं करोति यत्पादपाथोरुहसक्तचित्तः । वैराग्यदानैकधुरन्धरं तं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ २६ ॥ हालास्यगोकर्णमुखेषु दिव्य- -क्षेत्रेषु वासं कृपया करोति । यः पादनम्रोद्धतये सदा तं श्रीदक्षिणास्यं हृदि भावयेऽहम् ॥ २७ ॥ हंसेन केनापि परादिनेमां कृतां प्रयत्नादतिमोदतश्च । नक्षत्रमालां दधतां नराणां कण्ठे भविष्यत्यचिरात्पराप्तिः ॥ २८ ॥ ॥ इति श्रीजगद्गुरु श्रीसच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामिभिः विरचितं श्री दक्षिणास्य नक्षत्रमाला स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री दक्षिणास्य नक्षत्रमाला स्तोत्रम् और आदि-गुरु शिव (Detailed Introduction)

श्री दक्षिणास्य नक्षत्रमाला स्तोत्रम् (Sri Dakshinamurthy Nakshatramala Stotram) भारतीय आध्यात्मिक साहित्य का एक दिव्य हीरा है। इसकी रचना शृङ्गेरी शारदा पीठ के ३३वें पीठाधिपति, जगद्गुरु श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती महास्वामी जी ने की थी। नृसिंह भारती जी को आदि शंकराचार्य का साक्षात् अवतार माना जाता है और उनकी रचनाएँ अपनी दार्शनिक गहराई और भक्ति के रस के लिए विश्व विख्यात हैं। "नक्षत्रमाला" का अर्थ है—२७ नक्षत्रों के समान दिव्य श्लोकों की एक माला (इसमें उपसंहार सहित २८ श्लोक हैं)। यह स्तोत्र भगवान शिव के 'दक्षिणामूर्ति' स्वरूप को समर्पित है, जिन्हें ब्रह्मांड का 'आदि-गुरु' माना जाता है।

दक्षिणामूर्ति का अर्थ है— "वे जिनका मुख दक्षिण (Dakshina) की ओर है"। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, दक्षिण दिशा 'मृत्यु' (यमराज की दिशा) और 'अज्ञान' का प्रतीक है। भगवान उस ओर मुख करके यह संदेश देते हैं कि वे अज्ञान के अंधकार को मिटाने वाले और काल (समय) के भय से मुक्त करने वाले एकमात्र गुरु हैं। इस नक्षत्रमाला के प्रत्येक श्लोक में भगवान दक्षिणामूर्ति के एक विशिष्ट गुण, उनकी दया और उनके द्वारा प्रदान किए जाने वाले आत्मज्ञान का सूक्ष्म वर्णन मिलता है। श्लोक संख्या १ में ही उन्हें 'श्रीज्ञानदानव्रतबद्धदीक्षम्' (ज्ञान दान के व्रत में दीक्षित) कहा गया है, जो उनके परोपकारी स्वरूप को प्रकट करता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब सनकादि ऋषियों के मन में सृष्टि के गूढ़ रहस्यों को लेकर संशय उत्पन्न हुए, तब महादेव ने एक युवा गुरु का रूप धारण किया और वटवृक्ष (न्यग्रोध) के नीचे 'मौन व्याख्यान' द्वारा उनके समस्त प्रश्नों का समाधान कर दिया। यह नक्षत्रमाला उसी 'मौन' की शक्ति को वाणी देती है। जगद्गुरु नृसिंह भारती जी ने इसमें भगवान के 'नख-शिख' सौंदर्य के साथ-साथ उनके द्वारा मार्कण्डेय ऋषि की रक्षा (श्लोक ५) और उनके 'अर्धनारीश्वर' स्वरूप (श्लोक ११) का भी अत्यंत भक्तिपूर्ण उल्लेख किया है। यह स्तोत्र अज्ञान के अंधकार (तमः) को हरने के लिए 'हार्द-बोध' (हृदय का ज्ञान) प्रदान करता है।

दार्शनिक शोध की दृष्टि से, यह नक्षत्रमाला 'अद्वैत वेदांत' का सार है। इसमें भगवान को 'आदिमध्यान्तविहीनरूपं' (शुरुआत, मध्य और अंत से रहित) बताया गया है, जो उनके निर्गुण सत्य की ओर संकेत करता है। Pavitra Granth के इस प्रामाणिक संस्करण में हम इस नक्षत्रमाला के उन्हीं रहस्यों को प्रस्तुत कर रहे हैं जो साधक को बौद्धिक जड़ता से निकालकर 'चिन्मय' आनंद की ओर ले जाते हैं। जो भक्त इस नक्षत्रमाला को अपने कंठ में धारण करता है (अर्थात् इसका पाठ करता है), उसे 'पराप्ति' (परम लक्ष्य की प्राप्ति) सहज ही सुलभ हो जाती है।

विशिष्ट महत्व: नक्षत्रमाला की तात्विक गहराई (Significance)

दक्षिणास्य नक्षत्रमाला स्तोत्र का महत्व इसकी 'प्रज्ञा-वर्धक' (Enhancing Wisdom) प्रकृति में निहित है। इसके कुछ विशिष्ट पहलू निम्नलिखित हैं:

  • ब्रह्म विद्या प्रदाता: भगवान दक्षिणामूर्ति साक्षात् वेदों के ज्ञाता और 'वाक्' के स्वामी हैं। श्लोक ९ में उन्हें 'दिव्यवाग्दानधुरीण' कहा गया है।
  • अष्टमूर्ति स्वरूप: श्लोक १० और २१ में भगवान को 'अष्टमूर्ति' (आठ स्वरूपों वाला—क्षिति, जल, पावक, समीर, व्योम, अर्क, इंदु, यजमान) बताया गया है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड में उनकी व्यापकता को सिद्ध करता है।
  • मृकण्डुसूनु रक्षा: श्लोक ५ में मार्कण्डेय ऋषि की काल से रक्षा करने वाले शिव की वंदना है, जो मृत्यु के भय को दूर करने का अमोघ मंत्र है।
  • मौन व्याख्यान का सार: यह स्तोत्र मौन गुरु के उपदेशों को शब्दबद्ध कर साधक के संशयों का निवारण करता है।

फलश्रुति लाभ: नक्षत्रमाला पाठ के दिव्य फल (Divine Benefits)

स्तोत्र के अंतिम श्लोक (श्लोक २८) और परंपरा के अनुसार, इस नक्षत्रमाला के पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • प्रज्ञा और मेधा की वृद्धि: विद्यार्थियों के लिए यह स्तोत्र वरदान है। यह विस्मृति को दूर कर याददाश्त और एकाग्रता को कई गुना बढ़ा देता है।
  • समस्त पापों और कष्टों का नाश: श्लोक ६ के अनुसार— "हृत्वा तमः सत्वरमेव हार्दं"। यह मन के भीतर के अज्ञान और संचित पापों को तत्काल नष्ट कर देता है।
  • भय और व्याधि से मुक्ति: मार्कण्डेय रक्षा के प्रसंग के कारण यह अकाल मृत्यु के भय को मिटाता है और 'भवामय' (संसार रूपी रोग) के लिए औषधि का कार्य करता है।
  • वाणी सिद्धि और ऐश्वर्य: "दिव्यवाग्दानधुरीणम्" — इसके पाठ से वाणी प्रभावशाली होती है और साधक को 'हस्त्यन्तलक्ष्मी' (समस्त संपदा) की प्राप्ति होती है।
  • मोक्ष और परम गति: "कण्ठे भविष्यत्यचिरात्पराप्तिः" — जो इस नक्षत्रमाला को कंठस्थ करता है या पाठ करता है, उसे शीघ्र ही मोक्ष (पराप्ति) प्राप्त होता है।

पाठ विधि एवं सर्वोत्तम अभ्यास (Ritual Method & Guidelines)

श्री दक्षिणास्य नक्षत्रमाला स्तोत्रम् एक अत्यंत ऊर्जामय पाठ है। इसका पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाना श्रेष्ठ है:

  • समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (४:०० - ६:०० बजे) पाठ के लिए सर्वोत्तम है। सोमवार (Shomvar) और गुरुवार (गुरु का दिन) विशेष फलदायी होते हैं।
  • शुचिता: स्नान के उपरांत स्वच्छ श्वेत (सफेद) वस्त्र धारण करें। सफेद रंग ज्ञान और शांति का प्रतीक है।
  • आसन और दिशा: उत्तर या पूर्व मुख होकर बैठें। ऊनी या कुश का आसन सर्वोत्तम है।
  • पूजन सामग्री: भगवान दक्षिणामूर्ति के चित्र या शिवलिंग पर भस्म (विभूति), श्वेत चंदन और बिल्वपत्र अर्पित करें।
  • नियम: नित्य कम से कम १ बार पाठ करें। यदि संभव हो तो २७ नक्षत्रों के प्रतीक स्वरूप २७ बार पाठ करने से विशेष मानसिक शांति मिलती है।
  • मौन ध्यान: पाठ के समापन के बाद कम से कम ५-१० मिनट मौन बैठकर भगवान के 'चिन्-मुद्रा' स्वरूप का हृदय में ध्यान करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री दक्षिणास्य नक्षत्रमाला स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

इसके रचयिता शृङ्गेरी शारदा पीठ के ३३वें जगद्गुरु श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती महास्वामी जी हैं। वे एक महान सिद्ध पुरुष और विद्वान थे।

2. इसे 'नक्षत्रमाला' क्यों कहा जाता है?

जैसे आकाश में २७ नक्षत्रों की एक माला होती है, वैसे ही इस स्तोत्र में २७/२८ दिव्य श्लोकों के माध्यम से भगवान की वंदना की गई है, जो साधक के जीवन में प्रकाश फैलाते हैं।

3. दक्षिणामूर्ति भगवान दक्षिण की ओर मुख क्यों करते हैं?

दक्षिण दिशा मृत्यु के देवता यमराज की दिशा है। भगवान दक्षिण मुख होकर यह संदेश देते हैं कि वे काल और अज्ञान (मृत्यु के भय) को मिटाने वाले परम गुरु हैं।

4. क्या विद्यार्थियों के लिए यह स्तोत्र उपयोगी है?

जी हाँ, यह विद्यार्थियों के लिए सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि भगवान दक्षिणामूर्ति प्रज्ञा और मेधा के अधिष्ठाता हैं। इसके पाठ से एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है।

5. क्या इस पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

यद्यपि गुरु दीक्षा श्रेष्ठ है, परंतु यह एक स्तुति परक स्तोत्र है जिसे कोई भी जिज्ञासु श्रद्धा भाव से भगवान शिव को ही अपना आदि-गुरु मानकर पढ़ सकता है।

6. 'चिन्-मुद्रा' का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

चिन्-मुद्रा में तर्जनी उंगली (जीवात्मा) अंगूठे (परमात्मा) से मिलती है, जो इस सत्य का प्रतीक है कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं।

7. 'मृकण्डुसूनु' कौन हैं जिनका उल्लेख स्तोत्र में है?

मृकण्डुसूनु ऋषि मार्कण्डेय हैं। भगवान शिव ने उनकी अकाल मृत्यु से रक्षा की थी। इस स्तोत्र के ५वें श्लोक में इसी घटना का स्मरण किया गया है।

8. क्या केवल सुनने (श्रवण) से भी लाभ मिलता है?

जी हाँ, शास्त्रों के अनुसार प्रभु की महिमा का श्रवण करना भी चित्त को शुद्ध करता है और अज्ञान के अंधकार को मिटाता है।

9. 'अष्टमूर्ति' का क्या अर्थ है?

अष्टमूर्ति का अर्थ है—वे भगवान शिव जिनके ८ स्वरूप (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्रमा और आत्मा) संपूर्ण जगत को धारण किए हुए हैं।

10. पाठ के दौरान किस रंग के वस्त्र पहनना शुभ है?

भगवान दक्षिणामूर्ति की साधना में श्वेत (सफेद) रंग सबसे श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि यह सात्विकता और ज्ञान की शुद्धता का प्रतीक है।