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Shri Chinnamasta Dhyanam – छिन्नमस्ताध्यानम्

Shri Chinnamasta Dhyanam – छिन्नमस्ताध्यानम्
॥ छिन्नमस्ताध्यानम् ॥ १. प्रथमं ध्यानम् प्रत्यालीढपदां सदैव दधतीं छिन्नं शिरः कर्त्रिकां दिग्वस्त्रां स्वकबन्धशोणितसुधाधारां पिबन्तीं मुदा । नागाबद्धशिरोमणिं त्रिनयनां हृद्युत्पलालङ्कृतां रत्यासक्तमनोभवोपरि दृढां वन्दे जपासन्निभाम् ॥ १॥ २. द्वितीयं ध्यानम् दक्षे चातिसिता विमुक्तचिकुरा कर्त्रीं तथा खर्परम् । हस्ताभ्यां दधती रजोगुणभवा नाम्नापि सा वर्णिनी ॥ देव्याश्छिन्नकबन्धतः पतदसृग्धारां पिबन्ती मुदा । नागाबद्धशिरोमणिर्मनुविदा ध्येया सदा सा सुरैः ॥ २॥ प्रत्यालीढपदा कबन्धविगलद्रक्तं पिबन्ती मुदा । सैषा या प्रलये समस्तभुवनं भोक्तुं क्षमा तामसी ॥ शक्तिः सापि परात्परा भगवती नाम्ना परा डाकिनी । ध्येया ध्यानपरैः सदा सविनयं भक्तेष्टभूतिप्रदा ॥ ३॥ भास्वन्मण्डलमध्यगां निजशिरश्छिन्नं विकीर्णालकम् । स्फारास्यं प्रपिबद्गलात्स्वरुधिरं वामे करे बिभ्रतीम् ॥ याभासक्तरतिस्मरोपरिगतां सख्यौ निजे डाकिनी- वर्णिन्यौ परिदृश्य मोदकलितां श्रीछिन्नमस्तां भजे ॥ ४॥ ३. तृतीयं ध्यानम् (नाभि-पद्म ध्यान) स्वनाभौ नीरजं ध्यायाम्यर्धं विकसितं सितम् । तत्पद्मकोशमध्ये तु मण्डलं चण्डरोचिषः ॥ ५॥ जपाकुसुमसङ्काशं रक्तबन्धूकसन्निभम् । रजस्सत्वतमोरेखा योनिमण्डलमण्डितम् ॥ ६॥ तन्मध्ये तां महादेवीं सूर्यकोटिसमप्रभाम् । छिन्नमस्तां करे वामे धारयन्तीं स्वमस्तकम् ॥ ७॥ प्रसारितमुखीं देवीं लेलिहानाग्रजिह्विकाम् । पिबन्तीं रौधिरीं धारां निजकण्ठविनिर्गताम् ॥ ८॥ विकीर्णकेशपाशां च नानापुष्पसमन्विताम् । दक्षिणे च करे कर्त्रीं मुण्डमालाविभूषिताम् ॥ ९॥ दिगम्बरां महाघोरां प्रत्यालीढपदे स्थिताम् । अस्थिमालाधरां देवीं नागयज्ञेपवीतिनीम् ॥ १०॥ रतिकामोपरिष्ठां च सदा ध्यातां च मन्त्रिभिः । सदा षोडशवर्षीयां पीनोन्नतपयोधराम् ॥ ११॥ ४. चतुर्थं ध्यानम् (संपूर्ण स्वरूप) विपरीतरतासक्तौ ध्यायामि रतिमन्मथौ । शाकिनीवर्णिनीयुक्तां वामदक्षिणयोगतः ॥ १२॥ देवीगलोच्छलद्रक्तधारापानं प्रकुर्वतीम् । वर्णिनीं लोहितां सौम्यां मुक्तकेशीं दिगम्बराम् ॥ १३॥ कपालकर्त्रिकाहस्तां वामदक्षिणयोगतः । नागयज्ञेपवीताढ्यां ज्वलत्तेजोमयीमिव ॥ १४॥ प्रत्यालीढपदां विद्यां नानालङ्कारभूषिताम् । सदा द्वादशवर्षीयां अस्थिमालाविभूषिताम् ॥ १५॥ डाकिनीं वामपार्श्वे तु कल्पसूर्यानलोपमाम् । विद्युज्जटां त्रिनयनां दन्तपङ्क्तिबलाकिनीम् ॥ १६॥ दंष्ट्राकरालवदनां पीनोन्नतपयोधराम् । महादेवीं महाघोरां मुक्तकेशीं दिगम्बराम् ॥ १७॥ लेलिहानमहाजिह्वां मुण्डमालाविभूषिताम् । कपालकर्त्रिकाहस्तां वामदक्षिणयोगतः ॥ १८॥ देवीगलोच्छलद्रक्तधारापानं प्रकुर्वतीम् । करस्थितकपालेन भीषणेनातिभीषणाम् । आभ्यां निषेव्यमाणां तां कलये जगदीश्वरीम् ॥ १९॥ ॥ इति छिन्नमस्ताध्यानम् सम्पूर्णम् ॥

छिन्नमस्ताध्यानम्: तांत्रिक परिचय एवं रहस्य (Introduction & Tantric Secrets)

सनातन शाक्त तन्त्र में दशमहाविद्याओं का विशिष्ट स्थान है, जिनमें छिन्नमस्ता छठी महाविद्या हैं। इन्हें 'प्रचण्ड चण्डिका' और 'छिन्नमस्तिका' भी कहा जाता है। तन्त्र साधना का यह एक शाश्वत नियम है कि बिना 'ध्यान' के जपा गया कोई भी मंत्र फलदायी नहीं होता। छिन्नमस्ताध्यानम् वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा साधक अपने मन-मस्तिष्क में देवी के उस अलौकिक, अत्यंत उग्र और प्रतीकात्मक स्वरूप का निर्माण करता है, ताकि उसकी ऊर्जा (Frequency) देवी की ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ जुड़ सके।

स्वरूप का विस्मयकारी वर्णन: इस ध्यान स्तोत्र में दिए गए चारों ध्यानों में देवी के उस स्वरूप का वर्णन है जो सामान्य बुद्धि को झकझोर देता है। देवी दिगम्बरा (निर्वस्त्र) हैं, उनके एक हाथ में खड्ग (कर्त्री) है और दूसरे हाथ में उनका अपना ही कटा हुआ मस्तक है। उनके छिन्न धड़ (कबन्ध) से रक्त की तीन धाराएं फूट रही हैं—एक धारा स्वयं उनका कटा हुआ मस्तक पी रहा है, और बाकी दो धाराओं से उनकी सहचरियां डाकिनी और वर्णिनी रक्तपान कर रही हैं। वे नीचे कामदेव और रति (जो विपरीत रति क्रीड़ा में मग्न हैं) की पीठ पर खड़ी हैं।

अहंकार और वासना का नाश: यह वीभत्स लगने वाला दृश्य वास्तव में योग और अद्वैत दर्शन का सबसे गहरा प्रतीक है। अपना मस्तक काटना 'अहंकार' (Ego) के पूर्ण नाश का प्रतीक है। काम और रति पर पैर रखना 'कामवासना' (Desire) पर पूर्ण विजय और ऊर्जा के ऊर्ध्वगामी (Upward) होने का प्रमाण है।

ध्यान श्लोकों का गूढ़ प्रतीकात्मक अर्थ (Symbolism of the Dhyana)

इस स्तोत्र के 19 श्लोक केवल शारीरिक वर्णन नहीं हैं, बल्कि ये मनुष्य के सूक्ष्म शरीर (Astral Body) की कार्यप्रणाली का वर्णन हैं:

  • नाभि में ध्यान (स्वनाभौ नीरजं ध्यायाम्यर्धं): तृतीय ध्यान में साधक को निर्देश है कि वह अपनी नाभि में (मणिपूर चक्र) खिले हुए सफेद कमल का ध्यान करे, जिसमें 'सत्व, रज, तम' रूपी रेखाएं हों। यहीं से कुण्डलिनी शक्ति का जागरण प्रारंभ होता है। छिन्नमस्ता साक्षात् 'सुषुम्ना नाड़ी' का स्वरूप हैं।
  • रक्त की तीन धाराएं (Three Blood Streams): देवी के गले से निकलने वाली रक्त की तीन धाराएं योग की तीन प्रमुख नाड़ियों—इडा (चंद्र), पिंगला (सूर्य) और सुषुम्ना (अग्नि) का प्रतिनिधित्व करती हैं। देवी सुषुम्ना रूप में स्वयं को पोषित करती हैं, जबकि वर्णिनी (पिंगला) और डाकिनी (इडा) को भी ऊर्जा देती हैं।
  • डाकिनी और वर्णिनी: श्लोक 2, 3 और 13-16 में इन दोनों सखियों का वर्णन है। वर्णिनी दाहिनी ओर हैं जो 'रजोगुण' की प्रतीक हैं। डाकिनी बायीं ओर हैं जो प्रलयकारी 'तमोगुण' की प्रतीक हैं। देवी (सत्वगुण/गुणातीत) इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करती हैं।
  • अस्थिमाला और नागयज्ञोपवीत: देवी हड्डियों की माला (अस्थिमाला) पहनती हैं जो जीवन की नश्वरता का प्रतीक है, और सर्प (नाग) का जनेऊ पहनती हैं जो जागृत कुण्डलिनी का द्योतक है।

फलश्रुति: ध्यान से प्राप्त होने वाले तांत्रिक लाभ (Benefits of Dhyana)

तन्त्र शास्त्र और छिन्नमस्ता कल्प के अनुसार, जो साधक इस ध्यान को अपने अंतःकरण में स्थिर कर लेता है, उसे निम्नलिखित सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं:

  • काम-विजय (Conquest over Lust): रति-कामदेव पर आरूढ़ देवी का ध्यान करने से साधक के भीतर से कामवासना पूरी तरह नष्ट हो जाती है और उसकी ऊर्जा 'ओज' में बदल जाती है। ब्रह्मचर्य की सिद्धि के लिए यह अचूक है।
  • कुण्डलिनी जागरण (Kundalini Awakening): नाभि चक्र (मणिपूर) में देवी का ध्यान करने से 'सुषुम्ना' नाड़ी का मार्ग खुलता है और कुण्डलिनी शक्ति निर्विघ्न रूप से सहस्रार की ओर उठने लगती है।
  • अहंकार का शमन: छिन्न मस्तक का ध्यान करने से व्यक्ति के भीतर से 'मैं' (I) का भाव समाप्त हो जाता है और वह परब्रह्म के साथ एकरूप (अद्वैत) हो जाता है।
  • शत्रु और अकाल मृत्यु का नाश: डाकिनी और वर्णिनी के साथ देवी के इस उग्र रूप का चिंतन करने वाले साधक के आस-पास भी शत्रु, भूत-प्रेत या अकाल मृत्यु नहीं फटकते (भक्तेष्टभूतिप्रदा)।
  • वाक् सिद्धि और कवित्व: इस ध्यान के सिद्ध होने पर व्यक्ति महान कवि, भविष्यवक्ता और शास्त्रों का ज्ञाता बन जाता है।

पाठ विधि एवं अनुष्ठान के नियम (Ritual Method & Guidelines)

यह एक अत्यंत उच्च कोटि का तांत्रिक ध्यान है। इसे बिना गुरु के मार्गदर्शन के 'उग्र प्रयोग' के रूप में नहीं करना चाहिए।

दैनिक ध्यान विधि: प्रातःकाल या मध्यरात्रि (निशीथ काल) में लाल या काले आसन पर बैठें। दक्षिण दिशा की ओर मुख करें। आँखें बंद करके इन श्लोकों (या किसी एक ध्यान) का मानसिक या वाचिक पाठ करें।

मानसिक चित्रण (Visualization): जैसा श्लोकों में वर्णित है, वैसा ही दृश्य अपनी 'नाभि' या 'हृदय' में देखने का प्रयास करें। सबसे पहले प्रज्वलित सूर्य मंडल, उसमें काम-रति, उनके ऊपर देवी छिन्नमस्ता, और उनसे निकलती रक्त की तीन धाराएं।

मन्त्र जप के साथ: छिन्नमस्ता का मूल मंत्र "श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवैरोचनीये हुं हुं फट् स्वाहा" है। इस मंत्र का जप शुरू करने से पहले इस ध्यान का पाठ करना अनिवार्य है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. माता छिन्नमस्ता कौन हैं?
माता छिन्नमस्ता दशमहाविद्याओं में छठी शक्ति हैं। वे आत्म-बलिदान, विशुद्ध चेतना और कुण्डलिनी जागरण (विशेषकर सुषुम्ना नाड़ी) की अधिष्ठात्री हैं।
2. देवी ने अपना ही मस्तक क्यों काटा है?
यह कोई भौतिक कृत्य नहीं है, बल्कि एक गहरा तांत्रिक प्रतीक है। मस्तक 'अहंकार' (Ego) का स्थान है। अपना मस्तक काटना यह दर्शाता है कि देवी ने 'मैं' के भाव को पूर्णतः नष्ट कर दिया है।
3. देवी के साथ जो दो देवियां हैं, वे कौन हैं?
वे देवी की सहचरियां 'डाकिनी' (बायीं ओर) और 'वर्णिनी' (दाहिनी ओर) हैं। ये क्रमशः तमोगुण और रजोगुण की प्रतीक हैं। देवी अपना रक्त देकर सृष्टि के इन गुणों का पोषण करती हैं।
4. देवी कामदेव और रति के ऊपर क्यों खड़ी हैं?
कामदेव और रति सांसारिक वासना और कामुकता (Lust) के प्रतीक हैं। उनके ऊपर खड़े होने का अर्थ है कि देवी ने वासना पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है और जीवन ऊर्जा (वीर्य/रज) को 'ओज' में बदल दिया है।
5. 'प्रत्यालीढपदां' का क्या अर्थ है?
यह खड़े होने की एक वीर मुद्रा (Stance) है जिसमें बायां पैर आगे की ओर मुड़ा हुआ और दायां पैर पीछे सीधा होता है। यह युद्ध और आक्रामकता की मुद्रा है।
6. क्या गृहस्थ लोग छिन्नमस्ता का ध्यान कर सकते हैं?
छिन्नमस्ता की साधना मुख्यतः संन्यासियों, अघोरियों और उच्च कोटि के तांत्रिकों के लिए है। गृहस्थों को बिना किसी सिद्ध गुरु के मार्गदर्शन के इस उग्र स्वरूप की साधना नहीं करनी चाहिए।
7. 'वैरोचनी' शब्द का क्या तात्पर्य है?
'वैरोचनी' का अर्थ है सूर्य या अग्नि (विरोचन) से उत्पन्न प्रकाशमयी। तन्त्र में छिन्नमस्ता को शरीर की सुषुम्ना नाड़ी में प्रवाहित होने वाली अग्नि-तत्व की ऊर्जा माना गया है।
8. रक्त की तीन धाराओं का क्या रहस्य है?
ये तीन धाराएं योग की तीन प्रमुख नाड़ियों—इडा, पिंगला और सुषुम्ना का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह त्रिवेणी के संगम का प्रतीक है जहाँ साधक की चेतना जाग्रत होती है।
9. इस ध्यान का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
इस ध्यान का सबसे बड़ा लाभ है मन से मृत्यु और वासना के भय का पूर्ण रूप से नष्ट हो जाना और कुण्डलिनी शक्ति का त्वरित जागरण होना।
10. 'जपासन्निभाम्' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'जपा कुसुम (लाल गुड़हल के फूल) के समान आभा वाली'। देवी का वर्ण लाल है, जो अत्यधिक तेज, ऊर्जा और रजोगुण के नियंत्रण को दर्शाता है।