श्री भानुविनायक स्तोत्रम् (Sri Bhanu Vinayaka Stotram)
Sri Bhanu Vinayaka Stotram

परिचय (Introduction)
श्री भानुविनायक स्तोत्रम् (Sri Bhanu Vinayaka Stotram) मुद्गल पुराण (खण्ड ६ - विकट चरित्र) का एक परम दुर्लभ और तेजस्वी स्तोत्र है।
इसकी रचना भगवान सूर्य के सारथी "अरुण" (Aruna) ने की थी। इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें भगवान गणेश को साक्षात् "सूर्य" (भानु) के रूप में देखा गया है। यह "गणपत्य" और "सौर" (सूर्य) संप्रदायों का अद्भुत संगम है।
महत्व (Significance)
- सूर्य-गणेश अभेद: इस स्तोत्र का मूल मंत्र इसका आठवां श्लोक है - "यः सूर्यो विकटः सोऽपि न भेदो दृश्यते कदा" अर्थात "जो सूर्य हैं, वही गणेश हैं; इनमें कोई भेद नहीं है।"
- तेज और प्रकाश: इसमें गणेश जी को "तेजसां पतये" (तेज के स्वामी) और "सहस्रकिरणाय" (हजारों किरणों वाले) कहा गया है।
- सर्वदेवमय: इसमें गणेश जी को ब्रह्मा, विष्णु, और शिव के साथ-साथ सभी ग्रहों (ग्रहराजाय) का स्वामी बताया गया है।
लाभ (Benefits)
आरोग्य और स्वास्थ्य (Health): सूर्य आरोग्य के देवता हैं। भानु विनायक की स्तुति से नेत्र रोग, चर्म रोग और अन्य शारीरिक व्याधियाँ दूर होती हैं ("अनामयाय...").
तेज और यश (Radiance & Fame): इसका पाठ करने से साधक के चेहरे पर ओज (Glow) आता है और समाज में यश प्राप्त होता है।
सर्वसिद्धि (Success): फलश्रुति में कहा गया है - "सर्वसिद्धिप्रदायकम्"। यह सभी प्रकार की बाधाओं को जलाकर भस्म कर देता है।
प्रश्नोत्तरी (FAQ)