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श्री भानुविनायक स्तोत्रम् (Sri Bhanu Vinayaka Stotram)

Sri Bhanu Vinayaka Stotram

श्री भानुविनायक स्तोत्रम् (Sri Bhanu Vinayaka Stotram)
॥ श्री भानुविनायक स्तोत्रम् ॥ अरुण उवाच । नमस्ते गणनाथाय तेजसां पतये नमः । अनामयाय देवेश आत्मने ते नमो नमः ॥ १ ॥ ब्रह्मणां पतये तुभ्यं जीवानां पतये नमः । आखुवाहनगायैव सप्ताश्वाय नमो नमः ॥ २ ॥ स्वानन्दवासिने तुभ्यं सौरलोकनिवासिने । चतुर्भुजधरायैव सहस्रकिरणाय च ॥ ३ ॥ सिद्धिबुद्धिपते तुभ्यं सञ्ज्ञानाथाय ते नमः । विघ्नहन्त्रे तमोहन्त्रे हेरम्बाय नमो नमः ॥ ४ ॥ अनन्तविभवायैव नामरूपप्रधारिणे । मायाचालक सर्वेश सर्वपूज्याय ते नमः ॥ ५ ॥ ग्रहराजाय दीप्तीनां दीप्तिदाय यशस्विने । गणेशाय परेशाय विघ्नेशाय नमो नमः ॥ ६ ॥ विवस्वते भानवे ते रवये ज्योतिषां पते । लम्बोदरैकदन्ताय महोत्कटाय ते नमः ॥ ७ ॥ यः सूर्यो विकटः सोऽपि न भेदो दृश्यते कदा । भक्तिं देहि गजास्य त्वं त्वदीयां मे नमो नमः ॥ ८ ॥ किं स्तौमि त्वां गणाधीश योगाकारस्वरूपिणम् । चतुर्धा भज्य स्वात्मानं खेलसि त्वं न संशयः ॥ ९ ॥ एवं स्वस्य स्तुतिं श्रुत्वा विकटो रूपमादधे । वामाङ्गे सञ्ज्ञया युक्तं गजवक्त्रादिचिह्नितम् ॥ १० ॥ तं दृष्ट्वा प्रणनामाथानूरुर्हर्षसमन्वितः । तं जगाद गणाधीशो वरं वृणु हृदीप्सितम् ॥ ११ ॥ त्वया कृतमिदं स्तोत्रं सर्वसिद्धिप्रदायकम् । भविष्यति न सन्देहश्चिन्तितं स लभेत् परम् ॥ १२ ॥ शृणुयाद्वा जपेद्वाऽपि तस्य किञ्चिन्न दुर्लभम् । भविष्यति महापक्षिन् मम सन्तोषकारकम् ॥ १३ ॥ इति श्रीमन्मुद्गले महापुराणे षष्ठे खण्डे अरुण कृत श्री भानुविनायक स्तोत्रम् ॥

परिचय (Introduction)

श्री भानुविनायक स्तोत्रम् (Sri Bhanu Vinayaka Stotram) मुद्गल पुराण (खण्ड ६ - विकट चरित्र) का एक परम दुर्लभ और तेजस्वी स्तोत्र है।

इसकी रचना भगवान सूर्य के सारथी "अरुण" (Aruna) ने की थी। इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें भगवान गणेश को साक्षात् "सूर्य" (भानु) के रूप में देखा गया है। यह "गणपत्य" और "सौर" (सूर्य) संप्रदायों का अद्भुत संगम है।

महत्व (Significance)

  • सूर्य-गणेश अभेद: इस स्तोत्र का मूल मंत्र इसका आठवां श्लोक है - "यः सूर्यो विकटः सोऽपि न भेदो दृश्यते कदा" अर्थात "जो सूर्य हैं, वही गणेश हैं; इनमें कोई भेद नहीं है।"
  • तेज और प्रकाश: इसमें गणेश जी को "तेजसां पतये" (तेज के स्वामी) और "सहस्रकिरणाय" (हजारों किरणों वाले) कहा गया है।
  • सर्वदेवमय: इसमें गणेश जी को ब्रह्मा, विष्णु, और शिव के साथ-साथ सभी ग्रहों (ग्रहराजाय) का स्वामी बताया गया है।

लाभ (Benefits)

  • आरोग्य और स्वास्थ्य (Health): सूर्य आरोग्य के देवता हैं। भानु विनायक की स्तुति से नेत्र रोग, चर्म रोग और अन्य शारीरिक व्याधियाँ दूर होती हैं ("अनामयाय...").

  • तेज और यश (Radiance & Fame): इसका पाठ करने से साधक के चेहरे पर ओज (Glow) आता है और समाज में यश प्राप्त होता है।

  • सर्वसिद्धि (Success): फलश्रुति में कहा गया है - "सर्वसिद्धिप्रदायकम्"। यह सभी प्रकार की बाधाओं को जलाकर भस्म कर देता है।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

श्री भानुविनायक स्तोत्रम् की रचना किसने की?

इसकी रचना "अरुण" (Aruna) ने की थी, जो भगवान सूर्य के सारथी (Charioteer) हैं।

"भानु विनायक" का क्या अर्थ है?

"भानु" का अर्थ है सूर्य और "विनायक" गणेश जी हैं। यह स्वरूप दर्शाता है कि गणेश और सूर्य एक ही हैं (अभेद)।

यह स्तोत्र किस पुराण से लिया गया है?

यह स्तोत्र "मुद्गल पुराण" (Mudgala Purana) के छठे खण्ड (विकट चरित्र) से लिया गया है।

इस स्तोत्र के पाठ का मुख्य लाभ क्या है?

इसके पाठ से "अनामय" (Health/Disease-free life), "तेज" (Radiance) और "यश" (Fame) की प्राप्ति होती है।

क्या इसे रविवार को पढ़ना चाहिए?

जी हाँ, चूँकि यह सूर्य और गणेश दोनों को समर्पित है, इसलिए रविवार (Sunday) और चतुर्थी तिथि को इसका पाठ विशेष फलदायी है।

श्लोक ८ का क्या महत्त्व है?

श्लोक ८ ("यः सूर्यो विकटः सोऽपि...") का अर्थ है - "जो सूर्य हैं, वही विकट (गणेश) हैं; इनमें कभी कोई भेद नहीं दिखता।" यह अद्वैत भाव को दर्शाता है।

अरुण ने गणेश जी की स्तुति क्यों की?

अरुण ने गणेश जी के "विकट" (Vikata) अवतार के दर्शन करके हर्षित होकर उनकी स्तुति की और वरदान प्राप्त किया।

क्या यह स्तोत्र कुष्ठ आदि रोगों में लाभकारी है?

सूर्य उपासना रोगों को दूर करती है। चूंकि यह "भानु विनायक" स्तुति है, इसलिए यह चर्म रोगों और शारीरिक कष्टों को दूर करने में सहायक माना जाता है।

"सप्ताश्व" (Saptashva) का क्या अर्थ है?

"सप्ताश्व" का अर्थ है "सात घोड़ों वाला" - जो सूर्य देव का प्रतीक है। यहाँ गणेश जी को ही उस रूप में नमन किया गया है।

गणेश जी के किस अवतार से यह संबंधित है?

यह मुख्य रूप से "विकट" (Vikata) अवतार से संबंधित है, जिसका वर्णन मुद्गल पुराण के छठे खण्ड में है।