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Sri Bala Manasa Puja Stotram – श्री बाला मानसपूजा स्तोत्रम्

Sri Bala Manasa Puja Stotram – श्री बाला मानसपूजा स्तोत्रम्
॥ श्री बाला मानसपूजा स्तोत्रम् ॥ ॥ १. ध्यानम् ॥ उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमाम्बरालङ्कृतां गन्धालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम् । हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिणेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं देवीं बद्धहिमांशुरत्नमकुटां वन्देऽरविन्दस्थिताम् ॥ १ ॥ ॥ २. आसनम् ॥ एणधराश्मकृतोन्नतधिष्ण्यं हेमविनिर्मितपादमनोज्ञम् । शोणशिलाफलकं च विशालं देवि सुखासनमद्य ददामि ॥ २ ॥ ॥ ३. पाद्यम् ॥ ईशमनोहररूपविलासे शीतलचन्दनकुङ्कुममिश्रम् । हृद्यसुवर्णघटे परिपूर्णं पाद्यमिदं त्रिपुरेशि गृहाण ॥ ३ ॥ ॥ ४. अर्घ्यम् ॥ लब्धभवत्करुणोऽहमिदानीं रक्तसुमाक्षतयुक्तमनर्घम् । रुक्मविनिर्मितपात्रविशेषे- -ष्वर्घ्यमिदं त्रिपुरेशि गृहाण ॥ ४ ॥ ॥ ५. आचमनम् ॥ ह्रीमिति मन्त्रजपेन सुगम्ये हेमलतोज्ज्वलदिव्यशरीरे । योगिमनः समशीतजलेन ह्याचमनं त्रिपुरेऽद्य विधेहि ॥ ५ ॥ ॥ ६. स्नानम् ॥ हस्तलसत्कटकादि सुभूषाः आदरतोऽम्ब वरोप्य निधाय । चन्दनवासितमन्त्रिततोयैः स्नानमयि त्रिपुरेशि विधेहि ॥ ६ ॥ ॥ ७. वस्त्रम् ॥ सञ्चितमम्ब मया ह्यतिमूल्यं कुङ्कुमशोणमतीव मृदु त्वम् । शङ्करतुङ्गतराङ्कनिवासे वस्त्रयुगं त्रिपुरे परिधेहि ॥ ७ ॥ ॥ ८. आभूषणम् ॥ कन्दलदंशुकिरीटमनर्घं कङ्कणकुण्डलनूपुरहारम् । अङ्गदमङ्गुलिभूषणमम्ब स्वीकुरु देवि पुराधिनिवासे ॥ ८ ॥ ॥ ९. चन्दनम् ॥ हस्तलसद्वरभीतिहमुद्रे शस्ततरं मृगनाभिसमेतम् । सद्घनसारसुकुङ्कुममिश्रं चन्दनपङ्कमिदं च गृहाण ॥ ९ ॥ ॥ १०. पुष्पम् ॥ लब्धविकासकदम्बकजाती- -चम्पकपङ्कजकेतकयुक्तैः । पुष्यचयैर्मनसामुचितैस्त्वां अम्ब पुरेशि भवानि भजामि ॥ १० ॥ ॥ ११. धूपम् ॥ ह्रीं‍पदशोभिमहामनुरूपे धूरसि मन्त्रवरेण मनोज्ञम् । अष्टसुगन्धरजःकृतमाद्ये धूपमिमं त्रिपुरेशि ददामि ॥ ११ ॥ ॥ १२. दीपम् ॥ सन्तमसापहमुज्ज्वलपात्रे गव्यघृतैः परिवर्धितदेहम् । चम्पककुड्मलवृन्तसमानं दीपगणं त्रिपुरेऽद्य गृहाण ॥ १२ ॥ ॥ १३. नैवेद्यम् ॥ कल्पितमद्य धियाऽमृतकल्पं दुग्धसितायुतमन्नविशेषम् । माषविनिर्मितपूपसहस्रं स्वीकुरु देवि निवेदनमाद्ये ॥ १३ ॥ ॥ १४. ताम्बूलम् ॥ लङ्घितकेतकवर्णविशेषैः शोधितकोमलनागदलैश्च । मौक्तिकचूर्णयुतैः क्रमुकाद्यैः पूर्णतराम्ब पुरस्तव पात्री ॥ १४ ॥ ॥ १५. मन्त्रपुष्पाञ्जलिः ॥ ह्रीं‍त्रयपूरितमन्त्रविशेषं पञ्चदशीमपि षोडशरूपम् । सञ्चितपापहरं च जपित्वा मन्त्रसुमाञ्जलिमम्ब ददामि ॥ १५ ॥ ॥ १६. नमस्कारः ॥ श्रीं‍पदपूर्णमहामनुरूपे श्रीशिवकाममहेश्वरहृद्ये । श्रीगुहवन्दितपादपयोजे बालवपुर्धरदेवि नमस्ते ॥ १६ ॥ ॥ इति श्री बाला मानसपूजा स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री बाला मानसपूजा स्तोत्रम् का परिचय

श्री बाला मानसपूजा स्तोत्रम् (Sri Bala Manasa Puja Stotram) एक अत्यंत विशेष और व्यावहारिक स्तोत्र है। 'मानसपूजा' का अर्थ है — 'मन से की जाने वाली पूजा' — बिना किसी बाह्य सामग्री के, केवल मनोभाव से देवी की षोडशोपचार पूजा।
"कल्पितमद्य धियाऽमृतकल्पं" — श्लोक 13: 'बुद्धि से कल्पित' — यही मानसपूजा का सार है। सब कुछ मन से।
षोडशोपचार संरचना: यह स्तोत्र 16 श्लोकों में 16 उपचारों का विधान करता है: (1) ध्यान, (2) आसन, (3) पाद्य, (4) अर्घ्य, (5) आचमन, (6) स्नान, (7) वस्त्र, (8) आभूषण, (9) चन्दन, (10) पुष्प, (11) धूप, (12) दीप, (13) नैवेद्य, (14) ताम्बूल, (15) मन्त्रपुष्पाञ्जलि, (16) नमस्कार।
प्रत्येक उपचार का वर्णन: प्रत्येक श्लोक में उस उपचार की सामग्री का विस्तृत वर्णन है। जैसे पाद्य में 'शीतलचन्दनकुङ्कुममिश्रम्', अर्घ्य में 'रक्तसुमाक्षतयुक्तम्', नैवेद्य में 'दुग्धसितायुतमन्नविशेषम्'। साधक इन्हें मन में कल्पना करके अर्पित करता है।
'त्रिपुरेशि' सम्बोधन: अधिकांश श्लोकों में देवी को 'त्रिपुरेशि' या 'त्रिपुरे' कहकर सम्बोधित किया गया है — त्रिपुर की अधीश्वरी।
मन्त्र संकेत: श्लोक 5 में 'ह्रीमिति मन्त्रजपेन', श्लोक 11 में 'ह्रींपदशोभिमहामनुरूपे', श्लोक 15 में 'ह्रींत्रयपूरितमन्त्रविशेषं पञ्चदशीमपि षोडशरूपम्' — बाला मन्त्र और श्री विद्या के मन्त्रों का संकेत।

विशिष्ट महत्व — 16 उपचार

  • श्लोक 1 — ध्यान: उद्यत-सहस्र-भानु कान्ति, अरुण वस्त्र, चन्द्र-रत्न मुकुट।
  • श्लोक 2 — आसन: मणि पठार, स्वर्ण पाद, शोण शिला।
  • श्लोक 3 — पाद्य: चन्दन-कुंकुम मिश्रित, स्वर्ण घट।
  • श्लोक 4 — अर्घ्य: रक्त पुष्प + अक्षत, स्वर्ण पात्र।
  • श्लोक 5 — आचमन: 'ह्रीं' मन्त्र जप, शीतल जल।
  • श्लोक 6 — स्नान: चन्दन-मन्त्रित जल।
  • श्लोक 7 — वस्त्र: कुंकुम-शोण, अति मूल्य, मृदु।
  • श्लोक 8 — आभूषण: किरीट, कंकण, कुण्डल, नूपुर, हार, अंगद।
  • श्लोक 9 — चन्दन: मृगनाभि + घनसार + कुंकुम।
  • श्लोक 10 — पुष्प: कदम्ब, जाती, चम्पक, पंकज, केतक।
  • श्लोक 11 — धूप: अष्टगन्ध, 'ह्रीं' मन्त्र।
  • श्लोक 12 — दीप: गव्य घृत, चम्पक कली समान।
  • श्लोक 13 — नैवेद्य: दुग्ध-शर्करा, माष पूप (उड़द के पूड़े)।
  • श्लोक 14 — ताम्बूल: नागवल्लि पत्र, सुपारी, मोती चूर्ण।
  • श्लोक 15 — मन्त्रपुष्पाञ्जलि: ह्रींत्रय, पञ्चदशी, षोडशी मन्त्र।
  • श्लोक 16 — नमस्कार: श्रींपद, शिव-काम-महेश्वर, गुह वन्दित।

मानसपूजा के लाभ

  • सर्वत्र-सर्वदा: कहीं भी, कभी भी — यात्रा, रोग, असुविधा में।
  • निर्धन के लिए: सामग्री के अभाव में भी पूर्ण पूजा।
  • मनोयोग: बाह्य सामग्री से अधिक मन की एकाग्रता।
  • श्री विद्या अभ्यास: अन्तर्याग (आन्तरिक पूजा) का प्रशिक्षण।
  • षोडशोपचार पूर्णता: 16 उपचारों की पूर्ण पूजा।

पाठ विधि

  • स्थान: कहीं भी — शांत स्थान उत्तम।
  • समय: ब्राह्म मुहूर्त, संध्या, या कभी भी।
  • आसन: कोई भी स्थिर आसन।
  • भाव: प्रत्येक श्लोक पढ़ते हुए उस उपचार की कल्पना करें।
  • ध्यान: श्लोक 1 का ध्यान स्पष्ट मन में धारण करें।
  • अर्पण भाव: 'गृहाण', 'ददामि', 'विधेहि' — अर्पण करते जाएं।

FAQ

1. 'मानसपूजा' का क्या अर्थ है?

'मानस' = मन से। बिना बाह्य सामग्री के मन से की जाने वाली पूजा।

2. इस स्तोत्र में कितने उपचार हैं?

16 उपचार (षोडशोपचार): ध्यान से नमस्कार तक।

3. 'त्रिपुरेशि' का अर्थ?

त्रिपुर की ईश्वरी — बाला त्रिपुरसुन्दरी।

4. मानसपूजा कब उपयोगी है?

यात्रा में, रोग में, सामग्री के अभाव में, या कहीं भी।

5. 'ह्रींत्रय' क्या है?

श्लोक 15: 'ह्रीं' तीन बार — बाला बीज।

6. 'पञ्चदशी' और 'षोडशी' क्या हैं?

श्री विद्या के 15-अक्षर और 16-अक्षर महामन्त्र।

7. 'अष्टगन्ध' क्या है?

श्लोक 11: 8 सुगंधित द्रव्यों का मिश्रण — धूप।

8. 'गव्यघृत' का अर्थ?

श्लोक 12: गाय का घी — दीप के लिए।

9. क्या बिना दीक्षा के पाठ कर सकते हैं?

हाँ। यह स्तोत्र पाठ है। श्रद्धा से कोई भी पाठ कर सकता है।

10. क्या यह बाह्य पूजा का विकल्प है?

असुविधा में विकल्प, अन्यथा बाह्य पूजा के साथ मानसपूजा दोनों करें।

11. 'श्रीगुहवन्दित' का अर्थ?

श्लोक 16: कार्तिकेय (गुह) द्वारा वन्दित चरण।

12. मानसपूजा का मुख्य लाभ?

मन की एकाग्रता, अन्तर्याग का अभ्यास, सर्वत्र पूजा की सुविधा।