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श्रीनवग्रहस्तोत्रम् (११ श्लोकी)

Shri Navagraha Stotram (11 Verses) — The Ultimate Hymn for Planetary Harmony

श्रीनवग्रहस्तोत्रम् (११ श्लोकी)
॥ श्रीनवग्रहस्तोत्रम् ॥ १. सूर्य (Surya) ज्योतिर्मण्डलमध्यगं गदहरं लोकैक-भास्वन्मणिं मेषोच्चं प्रणतिप्रियं द्विजनुतं छायपतिं वृष्टिदम् । कर्मप्रेरकमभ्रगं शनिरिपुं प्रत्यक्षदेवं रविं ब्रह्मेशान-हरिस्वरूपमनग़्हं सिंहेश-सूर्यं भजे ॥ १॥ २. चन्द्र (Chandra) चन्द्रं शङ्कर-भूषणं मृगधरं जैवातृकं रञ्जकं पद्मासोदरमोषधीशममृतं श्रीरोहिणीनायकम् । शुभ्राश्वं क्षयवृद्धिशीलमुडुपं सद्बुद्धि-चित्तप्रदं शर्वाणीप्रियमन्दिरं बुधनुतं तं कर्कटेशं भजे ॥ २॥ ३. मङ्गल (Mangala) भौमं शक्तिधरं त्रिकोणनिलयं रक्ताङ्गमङ्गारकम् । भूदं मङ्गलवासरं ग्रहवरं श्रीवैद्यनाथार्चकम् । क्रूरं षण्मुखदैवतं मृगगृहोच्चं रक्तधात्वीश्वरं नित्यं वृश्चिकमेषराशिपतिमर्केन्दुप्रियं भावये ॥ ३॥ ४. बुध (Budha) सौम्यं सिंहरथं बुधं कुजरिपुं श्रीचन्द्र-तारासुतं कन्योच्चं मगधोद्भवं सुरनुतं पीतांबरं राज्यदम् । कन्यायुग्म-पतिं कवित्व-फलदं मुद्गप्रियं बुद्धिदं वन्दे तं गदिनं च पुस्तककरं विद्याप्रदं सर्वदा ॥ ४॥ ५. गुरु (Brihaspati) देवेन्द्र-प्रमुखार्च्यमान-चरणं पद्मासने संस्थितं सूर्यारिं गजवाहनं सुरगुरुं वाचस्पतिं वज्रिणम् । स्वर्णाङ्गं धनुमीनपं कटकगेहोच्चं तनूजप्रदं वन्दे दैत्यरिपुं च भौमसुहृदं ज्ञानस्वरूपं गुरुम् ॥ ५॥ ६. शुक्र (Shukra) शुभ्राङ्गं नयशास्त्रकर्तृजयिनं संपत्प्रदं भोगदं मीनोच्चं गरुडस्थितं वृष-तुलानाथं कलत्रप्रदम् । केन्द्रे मङ्गलकारिणं शुभगुणं लक्ष्मी-सपर्याप्रियं दैत्यार्च्यं भृगुनन्दनं कविवरं शुक्रं भजेऽहं सदा ॥ ६॥ ७. शनि (Shani) आयुर्दायकमाजिनैषधनुतं भीमं तुलोच्चं शनिं छाया-सूर्यसुतं शरासनकरं दीपप्रियं काश्यपम् । मन्दं माष-तिलान्न-भोजनरुचिं नीलांशुकं वामनं शैवप्रीति-शनैश्चरं शुभकरं गृध्राधिरूढं भजे ॥ ७॥ ८. राहु (Rahu) वन्दे रोगहरं करालवदनं शूर्पासने भासुरं स्वर्भानुं विषसर्पभीति-शमनं शूलायुधं भीषणम् । सूर्येन्दु-ग्रहणोन्मुखं बलमदं दत्याधिराजं तमं राहुं तं भृगुपुत्रशत्रुमनिशं छायाग्रहं भावये ॥ ८॥ ९. केतु (Ketu) गौरीशप्रियमच्छकाव्यरसिकं धूम्रध्वजं मोक्षदं केन्द्रे मङ्गलदं कपोतरथिनं दारिद्र्य-विध्वंसकम् । चित्राङ्गं नर-पीठगं गदहरं दान्तं कुलुत्थ-प्रियं केतुं ज्ञानकरं कुलोन्नतिकरं छायाग्रहं भावये ॥ ९॥ १०. क्षमा एवं समर्पण प्रार्थना (Prayer) सर्वोपास्य-नवग्रहाः! जडजनो जाने न युष्मद्गुणान् शक्तिं वा महिमानमप्यभिमतां पूजां च दिष्टं मम । प्रार्थ्यं किन्नु कियत् कदा बत कथं किं साधु वाऽसाधु किं जाने नैव यथोचितं दिशत मे सौख्यं यथेष्टं सदा ॥ १०॥ ११. फलश्रुति (Phalashruti) नित्यं नवग्रह-स्तुतिमिमां देवालये वा गृहे श्रद्धा-भक्ति-समन्वितः पठति चेत् प्राप्नोति नूनं जनः । दीर्घं चायुररोगतां शुभमतिं कीर्तिं च संपच्चयं सत्सन्तानमभीष्ट-सौख्यनिवहं सर्व-ग्रहानुग्रहात् ॥ ११॥ ॥ इति श्रीनवग्रहस्तोत्रं संपूर्णम् ॥

श्रीनवग्रहस्तोत्रम् (11 श्लोकी) — एक विस्तृत परिचय

सनातन वैदिक धर्म में नवग्रहों की स्तुति के लिए कई ग्रंथों और पुराणों में विभिन्न स्तोत्र दिए गए हैं। किन्तु आपके समक्ष प्रस्तुत श्रीनवग्रहस्तोत्रम् (11 श्लोकी) वैदिक ज्योतिष (Vedic Astrology) का एक अत्यंत सघन और रहस्यमयी कैप्सूल (Capsule) है। इस स्तोत्र की रचना विशुद्ध रूप से कुंडली (Horoscope) के रहस्यों और ग्रहों के स्वभाव को ध्यान में रखकर की गई है।

इसमें कुल 11 श्लोक हैं। पहले 9 श्लोक नवग्रहों (सूर्य से केतु तक) को समर्पित हैं। 10वाँ श्लोक इस स्तोत्र की आत्मा है, जिसमें साधक नवग्रहों के समक्ष अपनी अज्ञानता स्वीकार करते हुए पूर्ण समर्पण (Surrender) करता है। 11वाँ श्लोक 'फलश्रुति' है, जो इस स्तोत्र के पाठ से मिलने वाले अपार लाभों को गिनाता है।

जो व्यक्ति ज्योतिषीय उलझनों (जैसे नीच ग्रह, पाप कर्तरी दोष, मारकेश आदि) से परेशान हैं और उन्हें कोई उपाय समझ नहीं आ रहा, उनके लिए यह स्तोत्र एक मास्टर-रेमेडी (Master Remedy) का कार्य करता है, क्योंकि यह सीधे ग्रहों की 'उच्च' अवस्थाओं (Exalted States) का आह्वान करता है।

इस स्तोत्र में छिपे वैदिक ज्योतिष के रहस्य (Astrological Secrets)

यह स्तोत्र केवल भक्ति-काव्य नहीं है; यह ज्योतिष शास्त्र का एक अद्भुत सारांश है। ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इसमें प्रत्येक ग्रह की उच्च राशि (Exalted Sign) का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, जब कोई ग्रह अपनी उच्च राशि में होता है, तो वह अपना सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक शुभ फल प्रदान करता है:

  • सूर्य: 'मेषोच्चं' — सूर्य मेष राशि में उच्च का होता है।
  • मंगल: 'मृगगृहोच्चं' — मंगल मकर (मृग/हिरण वाली राशि) में उच्च का होता है।
  • बुध: 'कन्योच्चं' — बुध कन्या राशि में उच्च का होता है।
  • गुरु (बृहस्पति): 'कटकगेहोच्चं' — गुरु कर्क (कटक) राशि में उच्च का होता है।
  • शुक्र: 'मीनोच्चं' — शुक्र मीन राशि में उच्च का होता है।
  • शनि: 'तुलोच्चं' — शनि तुला राशि में उच्च का होता है।

रहस्य: जब आप इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, तो आप ब्रह्मांड में ग्रहों की नीच या पापी अवस्था का नहीं, बल्कि उनकी 'उच्च' (Exalted) और 'सबसे शक्तिशाली शुभ अवस्था' का आह्वान कर रहे होते हैं। इससे आपकी कुंडली के नीच ग्रह भी उच्च के समान शुभ फल देने लगते हैं।

इसके अतिरिक्त, इसमें ग्रहों के प्रिय अन्नों का भी वर्णन है, जो दान के लिए महत्वपूर्ण हैं—जैसे बुध के लिए 'मुद्गप्रियं' (मूंग दाल), शनि के लिए 'माष-तिलान्न' (उड़द और तिल), और केतु के लिए 'कुलुत्थ-प्रियं' (कुल्थी दाल)

10वाँ श्लोक — परम समर्पण की प्रार्थना (The Humility Verse)

इस स्तोत्र का 10वाँ श्लोक अत्यंत भावपूर्ण और मार्मिक है:

"सर्वोपास्य-नवग्रहाः! जडजनो जाने न युष्मद्गुणान्... जाने नैव यथोचितं दिशत मे सौख्यं यथेष्टं सदा ॥"

अर्थ: "हे सबकी उपासना के योग्य नवग्रहों! मुझ जैसा मूर्ख व्यक्ति (जडजनो) आपके अनन्त गुणों, शक्तियों, महिमा और पूजा-विधि को नहीं जानता। मुझे आपसे क्या मांगना चाहिए? कितना मांगना चाहिए? कब और कैसे प्रार्थना करनी चाहिए? क्या सही है और क्या गलत, मैं कुछ नहीं जानता। हे देव! आप स्वयं यह तय करें कि मेरे लिए क्या उचित है और मुझे पर्याप्त सुख प्रदान करें।"

यह श्लोक 'अहंकार शून्यता' (Ego-lessness) का प्रतीक है। नवग्रह (विशेषकर शनि, राहु और केतु) अहंकार को ही तोड़ते हैं। इस श्लोक के माध्यम से साधक अपना पूरा प्रारब्ध नवग्रहों के चरणों में सौंप देता है, जिससे बड़े-बड़े अरिष्ट स्वतः टल जाते हैं।

फलश्रुति: पाठ के अद्भुत लाभ (Benefits of Chanting)

11वें श्लोक (नित्यं नवग्रह-स्तुतिमिमां...) में इस स्तोत्र के नित्य पाठ से प्राप्त होने वाले फलों का स्पष्ट वर्णन किया गया है:

  • दीर्घायु और आरोग्य: 'दीर्घं चायुररोगतां' — असाध्य रोगों का नाश होता है (राहु को 'रोगहरं' कहा गया है) और व्यक्ति को लंबी तथा स्वस्थ आयु प्राप्त होती है।
  • बुद्धि और यश: 'शुभमतिं कीर्तिं' — मानसिक तनाव दूर होता है, सही निर्णय लेने की 'शुभ बुद्धि' मिलती है और समाज में अपार यश (कीर्ति) फैलता है।
  • धन-सम्पत्ति: 'संपच्चयं' — आर्थिक बाधाएं, कर्ज और व्यापारिक नुकसान दूर होते हैं और संपत्ति में वृद्धि होती है।
  • संतान सुख: 'सत्सन्तानम्' — जिन दंपत्तियों को संतान प्राप्ति में बाधा आ रही हो, उन्हें गुरु (तनूजप्रदं) की कृपा से योग्य संतान की प्राप्ति होती है।

पाठ विधि (Ritual Method)

  • स्थान और समय: 11वें श्लोक के अनुसार इसे 'देवालये वा गृहे' (मंदिर में या घर में) पढ़ा जा सकता है। प्रातःकाल स्नान के पश्चात का समय सबसे उत्तम है।
  • आसन और दिशा: पूर्व (East) दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठें।
  • संकल्प और पाठ: एक घी का दीपक प्रज्वलित करें। हाथ में थोड़ा जल लेकर संकल्प करें और पूर्ण 'श्रद्धा-भक्ति' के साथ सभी 11 श्लोकों का पाठ करें।
  • दान: स्तोत्र में वर्णित ग्रहों की प्रिय वस्तुओं का (जैसे शनिवार को तिल और उड़द की दाल का) दान करने से इस पाठ का प्रभाव दस गुना बढ़ जाता है।

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. यह 11 श्लोकी श्रीनवग्रहस्तोत्रम् क्या है?

यह 11 श्लोकों का एक विशेष नवग्रह स्तोत्र है। पहले 9 श्लोक नवग्रहों (सूर्य से केतु) को समर्पित हैं। 10वाँ श्लोक साधक की विनम्रता और क्षमा प्रार्थना का है तथा 11वाँ श्लोक फलश्रुति (Benefits) है।

2. ज्योतिषीय दृष्टि से यह स्तोत्र अन्य स्तोत्रों से कैसे भिन्न है?

इस स्तोत्र में ग्रहों की 'उच्च राशियों' (Exalted Signs) का स्पष्ट उल्लेख है। जैसे सूर्य के लिए 'मेषोच्चं', गुरु के लिए 'कटकगेहोच्चं' (कर्क) और शनि के लिए 'तुलोच्चं' (तुला)। यह इसे एक पूर्ण और शक्तिशाली ज्योतिषीय मंत्र बनाता है।

3. 10वें श्लोक का क्या अर्थ और महत्व है?

10वें श्लोक में साधक कहता है: 'हे नवग्रहों! मैं अज्ञानी हूँ, न आपकी महिमा जानता हूँ न विधि। मेरे लिए क्या सही है, मुझे नहीं पता। कृपया आप ही मेरे लिए जो उचित हो, वह सुख प्रदान करें।' यह श्लोक अहंकार को नष्ट कर पूर्ण समर्पण सिखाता है।

4. नवग्रह स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

इस स्तोत्र के 11वें श्लोक में स्पष्ट लिखा है कि इसे प्रतिदिन मंदिर में (देवालये) या अपने घर (गृहे) में श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ना चाहिए। सूर्योदय के समय का पाठ सर्वोत्तम है।

5. क्या इसके पाठ से बीमारियाँ ठीक होती हैं?

हाँ, फलश्रुति में स्पष्ट रूप से 'अरोगतां' (रोगमुक्ति) और 'दीर्घं चायुः' (दीर्घायु) का वरदान बताया गया है। राहु के श्लोक में भी उन्हें 'रोगहरं' कहा गया है, जिससे असाध्य रोगों में चमत्कारिक लाभ मिलता है।

6. शनि साढ़ेसाती में इस स्तोत्र का क्या प्रभाव है?

स्तोत्र के 7वें श्लोक में शनिदेव को 'शुभकरं' (शुभ करने वाले) और 'आयुर्दायकम्' (आयु देने वाले) कहा गया है। इसका नित्य पाठ साढ़ेसाती और ढैय्या के कष्टों को शांत कर जीवन में स्थिरता लाता है।

7. इस स्तोत्र में ग्रहों के प्रिय अन्नों (Food) का क्या वर्णन है?

यह इस स्तोत्र की अद्वितीय विशेषता है। इसमें शनि के लिए 'माष-तिलान्न' (उड़द और तिल), बुध के लिए 'मुद्गप्रियं' (मूंग दाल), और केतु के लिए 'कुलुत्थ-प्रियं' (कुल्थी दाल) का उल्लेख है, जो दान के लिए दिशा-निर्देश देते हैं।

8. क्या महिलाएँ और बच्चे इसका पाठ कर सकते हैं?

बिल्कुल, श्लोक 11 में 'जनः' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ है 'कोई भी मनुष्य'। सनातन धर्म में नवग्रहों की कृपा सभी के लिए आवश्यक और सुलभ है।

9. क्या इसके पाठ के लिए नवग्रह यंत्र आवश्यक है?

यंत्र की उपस्थिति अत्यंत शुभ है क्योंकि यह ऊर्जा को केंद्रित करता है, परंतु यह अनिवार्य नहीं है। 11वें श्लोक के अनुसार मुख्य आवश्यकता केवल 'श्रद्धा-भक्ति-समन्वितः' (श्रद्धा और भक्ति से युक्त) होना है।

10. इस स्तोत्र के नियमित पाठ से क्या फल मिलता है?

नियमित पाठ से जातक को दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, शुभ बुद्धि, समाज में यश, अपार धन-संपत्ति, योग्य संतान और सभी अभीष्ट सुख प्राप्त होते हैं।