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श्रीहनुमत्पञ्चाशत्

श्रीहनुमत्पञ्चाशत्
॥ श्रीहनुमत्पञ्चाशत् ॥

(स्रग्धरा छन्द)
श्रीमान् धीमान् हनुमानसमसमधिकः कीर्तिमान् भक्तिमान् श्री-
रामे श्रीराम रामेत्यनवरतरतो नामसङ्कीर्तने यः ।
सीमातीतोऽभिरामो विलसति महिमा यस्य रोमाञ्चकारी
क्षेमस्तोमं स कामं गमयतु नमतः श्री समीरात्मजो नः ॥ १॥

ओमित्युक्त्वा नमोऽतस्तदनु भगवतेऽप्याञ्जनेयाय चाथ
शब्दं चान्ते चतुर्थ्यां...

(शेष पाठ शीघ्र उपलब्ध होगा)

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

श्रीहनुमत्पञ्चाशत्, महाकवि श्री सुन्दरराज द्वारा रचित, भगवान हनुमान (Lord Hanuman) को समर्पित एक अत्यंत प्रभावशाली और काव्यात्मक स्तोत्र है। 'पञ्चाशत्' का अर्थ है पचास, और यह स्तोत्र लगभग पचास श्लोकों (वास्तव में 56) में हनुमान जी के सम्पूर्ण जीवन-चरित्र, उनके दिव्य गुणों, और उनके पराक्रम का एक महाकाव्य की तरह वर्णन करता है। इस स्तोत्र की रचना संस्कृत के एक जटिल और प्रतिष्ठित स्रग्धरा छंद (Sragdhara meter) में की गई है, जो इसकी साहित्यिक उत्कृष्टता को दर्शाता है। इसमें हनुमान जी के जन्म से लेकर, बाल लीलाएं, सूर्य को निगलना, सुग्रीव से मित्रता, सीता की खोज, लंका दहन, संजीवनी लाना और महाभारत में अर्जुन के रथ पर ध्वज के रूप में उनकी भूमिका तक का विस्तृत वर्णन है।

स्तोत्र के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति पर आधारित)

इस स्तोत्र का ५३वां श्लोक इसकी फलश्रुति है, जो इसके पाठ से प्राप्त होने वाले चमत्कारी स्वास्थ्य लाभों पर विशेष रूप से प्रकाश डालता है:
  • गंभीर और असाध्य रोगों से मुक्ति (Relief from Severe and Incurable Diseases): फलश्रुति में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह स्तोत्र कुष्ठ (leprosy), यक्ष्मा (tuberculosis), उदर रोग (abdominal diseases), हृदय रोग (heart ailments), सिर के रोग और यहाँ तक कि कर्कट (cancer) जैसे भयानक रोगों को भी नष्ट करने की शक्ति रखता है।
  • शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य (Physical and Mental Well-being): पाठक सभी रोगों को पार कर, "उल्लाघभूतः" अर्थात् हल्का और स्वस्थ महसूस करता है, और "सुखमनुभविता" अर्थात् स्थायी सुख का अनुभव करता है।
  • सदा आनंद और उल्लास (Everlasting Joy and Cheerfulness): नियमित पाठ करने वाला व्यक्ति "शश्वदुल्लासशीलः" अर्थात् सदा उल्लासपूर्ण और प्रसन्न रहता है, जो मानसिक स्वास्थ्य और सकारात्मकता का प्रतीक है।
  • रामभक्ति की प्राप्ति (Attainment of Devotion to Rama): हनुमान जी के श्रीराम के प्रति समर्पण और सेवा के चरित्र का निरंतर चिंतन करने से साधक के मन में भी श्री राम के प्रति भक्ति और सेवा भाव स्वाभाविक रूप से जाग्रत होता है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के समक्ष बैठकर दीपक जलाएं।
  • सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश, अपने गुरु और भगवान श्री राम का स्मरण करें।
  • इसके बाद, पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रता के साथ श्रीहनुमत्पञ्चाशत् का पाठ आरम्भ करें। पाठ स्पष्ट उच्चारण के साथ और प्रत्येक श्लोक के भाव को समझते हुए करें।
  • मंगलवार (Tuesday) और शनिवार (Saturday) के दिन इसका पाठ करना विशेष फलदायी है।
  • जो व्यक्ति किसी गंभीर रोग से पीड़ित हैं, उन्हें इस स्तोत्र का नित्य पाठ करना चाहिए या भक्तिपूर्वक सुनना चाहिए।