Logoपवित्र ग्रंथ

Shri Chandi Rahasyam – श्रीचण्डीरहस्यम् (नीलकण्ठ दीक्षित विरचित)

Shri Chandi Rahasyam – श्रीचण्डीरहस्यम् (नीलकण्ठ दीक्षित विरचित)
॥ श्रीचण्डीरहस्यम् ॥ यच्छक्तिलेशसकृदर्पणपात्रभाव- मात्रादपि द्रुहिणशौरिमहेश्वराणाम् । प्राप्तो यदि श्रुतिशतैः परमात्मभाव- स्तामम्ब देवि भवती किमिति स्तुवन्तु ॥ १॥ कृत्वा मुखं पशुपतिर्भवती किलैकां निर्माति पालयति हन्ति जगन्ति देवः । तज्जामिताविपरिवृत्तिकृते तमेव शम्भुं मुखं कृतवती भवतीति मन्ये ॥ २॥ विश्वं नियच्छति विश‍ृङ्खलचेष्टितो यः सोऽपि त्वया नियमनीय इति स्फुटं नः । वैवस्वतं चिकुरभावजुषं यदम्ब बध्नासि वेणिकबरीग्रथनादिभेदैः ॥ ३॥ भ्रूकिङ्कराणि भुवनानि तव भ्रुवौ च सन्ध्यात्मिके इति गृणन्ति यतोऽत एव । कर्माणि मातरितराणि करोतु मा वा सन्ध्यां पुनर्भजत एव समस्तलोकः ॥ ४॥ जाता दृशो जननि पावकतेजसैव तिस्रस्तवेत्यपि किमागमबोध्यमेतत् । पापान्यपाङ्गवलनैः परिमार्जतीनां तासां च पावकपदे विचिकित्सते कः ॥ ५॥ मूल्यं न यस्य भुवनानि चतुर्दशापि मुक्ताफलं वहति तत्तव नासिकेति । चित्रीयते किमपि चेतसि मे न मातः किं राजराजपदवीं भजतामलभ्यम् ॥ ६॥ नासाधिकारमिह गन्धवहात्मकत्वं देवि श्रुती स्वयमपाहरतां भवत्याः । सर्वाः श्रुतीरपि तु सा स्ववशे चकार किं दुर्लभं त्रिषु जगत्सु धनेश्वराणाम् ॥ ७॥ प्राञ्चो जगज्जननि ये पतयः प्रजानां ते देवि संववृतिरे दशनात्मना ते । नो चेत्तदन्तिकतले रसनाग्रभागे किं भारती वसति किङ्करतां गतेव ॥ ८॥ स्वेनात्मना मुररिपुर्दनुजैर्विगृह्य वारान् कतीह न बभार पराङ्मुखत्वम् । ओजायितुं स निरपायमुपायवेदी बाह्यात्मना परिणतो नियतं भवत्याः ॥ ९॥ वर्षन् करो महिषमर्दनि ते वसूनि प्रस्तूयतां कविजनैर्न ममाद्भुतं तत् । आसादिता वसुभिरङ्गुलिता यदीया कस्तस्य शंस वसुवर्षविधौ प्रयासः ॥ १०॥ सोमेऽमृतं कतिचिदेव पुरा लभन्ते तल्लभ्यमस्तु जगतामिति तर्कयन्त्या । नीतः पयोधरदशां स शिवे त्वया य- दस्मादृशामयमतर्कितभाग्ययोगः ॥ ११॥ ब्रह्मर्षिशापभवया त्रपया महत्या प्रागास्त यः क्वचन देवि सरस्यदृश्यः । नूनं स एष विबुधाधिपतिर्भवत्याः प्राप्तो वलग्नपदवीमधुनाप्यदृश्यः ॥ १२॥ पादौ बभूव तव पद्मभवस्ततः किं बाह्यात्मना परिणनाम हरिस्ततः किम् । सिद्धा नितम्बविधया वसुधा यदा ते सिद्धस्तदा पुरहरस्य मनोरथोऽयम् ॥ १३॥ यद्वारुणं कथितमूरुयुगं सजङ्घ- मिन्दीवरच्छदसकान्ति न वारुणं तत् । प्राचेतसं तदिह वर्णयितुं क्षमेत प्राचेतसं कविकुलप्रथमं विना कः ॥ १४॥ वक्त्रैरकृत्रिमवचांसि वहन् विषण्णो वेधाश्चिरं विपरिणम्य पदात्मना ते । सन्धार्यतेऽद्य शिरसा सकलैरमीभिः क्लिष्टश्चिरात् किमुपयातु न जातु हर्षम् ॥ १५॥ बाह्यं तमो हरति यस्तपनः कथञ्चि- त्पादौ तवाङ्गुलितयाम्ब भजन् स एव । अन्तस्तमांसि च हरत्यतिदुर्हराणि किं सेन्यसेवनविधिर्न करोति पुंसाम् ॥ १६॥ देवेषु वासवमुखेषु निजां निधाय शक्तिं यदम्ब समये पुनरग्रहीस्त्वम् । कर्पूरभाजननयादधुनापि ते ते कीर्तिं वहन्ति कियतीमपि तावतैव ॥ १७॥ तेजांसि च प्रहरणानि च यानि यानि देवेषु देवि निहितानि पुरा भवत्या । तान्येव निष्फलतराणि तदाश्रितानि त्वत्स्वीकृतानि फलवन्ति बभूवुरित्थम् ॥ १८॥ शत्त्या यया दिविचरा अतिशेरतेऽस्मान् सा च त्वमित्यवगतः सकलैश्च तन्त्रैः । किं त्वं विचारकुशलैरसि सेवनीया किं देवतास्तव ऋजीषदशां प्रपन्नाः ॥ १९॥ इन्द्रं यजन्तु तव गर्भमुपासते ते वह्निं यजन्तु नयने तव तर्पयन्ति । भानुं नमन्तु विनमन्ति पदाम्बुजं ते सर्वं जगन्ननु समर्चति सर्वथा त्वाम् ॥ २०॥ केचित् प्रतीकमितरे तु समग्ररूप- माराधयन्ति तव ये पुनरास्तिकाः स्युः । नास्तिक्यवादनिरता नरके पतन्तो- ऽप्यम्ब स्तुवन्ति चिकुरात्मकमन्तकेन ॥ २१॥ शौरिं विबोध्य समराय तमुद्यमय्य व्यामोह्य दानववरौ कृतसंविधाना । मातस्त्वमेव मधुकैटभयोर्निहन्त्री शार्ङ्गी कृते भवति शस्त्रपदाभिषिक्तः ॥ २२॥ दैत्यौ वरं वितरतो निजनाशरूपं दैत्यारये त्रिजगतां वरदो वरार्थी । इत्थं प्रचोदितधियां क्षममीश्वरत्वं वृत्तेषु किं न सचिवोऽपि नृपं नियुङ्क्ते ॥ २३॥ न्यस्तं यदा शिरसि पादतलं भवत्या लब्धं तदैव महिषेण परं पदं ते । हन्तुं पुनर्यदिदमाददिषे त्रिशूलं तत्ते जगज्जननि सङ्गरसम्भ्रमेण ॥ २४॥ कस्त्वां रणे जयतु कस्तव हन्तु दर्पं को वास्तु ते प्रतिभटो भविता पतिः कः । दैत्यं प्रतारयितुमेव कृतोऽभ्युपायो देवं न विस्मृतवती भवती महेशम् ॥ २५॥ चण्डि द्विषस्तव निपेतुरपेतकृत्या- श्चण्डाट्टहासनिनदैरिति नाद्भुतं नः । दृष्टक्रियस्त्रिषु पुरेषु तवाप्रसिद्धो मन्दस्मितार्धमहिमा न हि मादृशानाम् ॥ २६॥ कर्माणि यानि दश ते जनभीषणानि कल्याणदानि भजतामभिजानतां वा । तैरेव विश्वमखिलं परिवृत्तिभेदै- र्बध्नासि मुञ्चसि च कुञ्चिकयेव यन्त्रम् ॥ २७॥ अन्वासितं हरिहरद्रुहिणैः सदारै- र्जामातृभिस्तनुभवैर्दुहितुः सुतैश्च । अग्रोपवेशितजगज्जननीसमाज- माराधये जननि रूपमनुत्तरं ते ॥ २८॥ सर्वानुकम्पनपरं स्वकृतोपदेशैः सार्वज्ञगर्वशमनं तरुणेन्दुमौलेः । सत्त्वैकसारमकृतोक्तिपथानुसारं सारस्वतं वपुरिदं तव चिन्तयामः ॥ २९॥ नन्दात्मजेति ननु वर्षसि हेमराशिं शाकम्भरीति शमयस्युदरोपसर्गान् । योगीश्वरीति परिहृत्य भयानि भक्तान् मातेव पाययसि कामदुघौ स्तनौ ते ॥ ३०॥ इच्छात्मिका पुरहरस्य चिदात्मिका च शक्तिस्त्रिलोकविदिते न हि तत्र शङ्का । ते चार्चिते जनयतः किल यत्प्रसादं तामाश्रये भगवतः कृतिशक्तिमाम्बाम् ॥ ३१॥ त्वं चेतनासि हृदयं त्वमसि प्रजानां त्वं वृत्तयो धृतिमतिप्रमुखास्तदीयाः । कैः साधनैरभिमुखीकरणं तव स्यात् स्वेनैव देवि दयसे यदि तद्दयेथाः ॥ ३२॥ त्वत्पूजनं यदिह जानदजानदर्हं मातश्चकर्थ महती किल चातुरीयम् । जानद्भिरेव भवती यदि पूजनीया लुप्येत पूजनकथैव जगत्त्रये ते ॥ ३३॥ यावत्परत्वमखिलागमबोधितं ते तावत्ततः शतगुणं च सुखाश्रयासि । वेदास्त्वदर्चनविधानपरा हि नो चे- दम्ब स्युरब्धितरणोक्तिवदप्रमाणम् ॥ ३४॥ प्राज्ञानभिज्ञसुलभां परिपूर्णशक्ति- मव्याजभूतकरुणापरिणामरूपाम् । अम्बां मनागपि मनस्यवलम्बमाना धीरा न बिभ्यति कथञ्चिदितोऽमुतो वा ॥ ३५॥ अभ्यर्थनीयमखिलं भवदाश्रिताना- मभ्यर्थितं प्रथममेव हि देवसङ्घैः । अम्ब स्मरन्सफलयाम्यवशिष्टमायु- रङ्गानि ते भुवनमङ्गलमङ्गलानि ॥ ३६॥ ॥ इति श्रीनीलकण्ठदीक्षितविरचितं चण्डीरहस्यं सम्पूर्णम् ॥

श्रीचण्डीरहस्यम्: परिचय एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि (Introduction & Philosophical Background)

श्रीचण्डीरहस्यम् महान कवि, दार्शनिक और राजनीतिज्ञ नीलकण्ठ दीक्षित (17वीं शताब्दी) की एक अद्भुत कृति है। दीक्षित जी अप्पय दीक्षित के पौत्र थे और मदुरै के नायक राजाओं के मंत्री भी थे। यह स्तोत्र मात्र भक्ति का उदगार नहीं है, बल्कि 'शक्ति विशिष्टाद्वैत' दर्शन का एक काव्यमयी प्रतिपादन है। इसमें कुल 36 श्लोक हैं, जो देवी के उन रहस्यों (Secrets) को उजागर करते हैं जो सामान्य बुद्धि से परे हैं।

ब्रह्मा, विष्णु, महेश की स्थिति: प्रथम श्लोक में ही कवि एक क्रांतिकारी प्रश्न उठाते हैं — "हे माँ! यदि ब्रह्मा, विष्णु और महेश को 'परमात्मा' कहा जाता है, तो वह केवल इसलिए है क्योंकि उन्हें आपकी शक्ति का एक लेश मात्र (छोटा सा अंश) प्राप्त हुआ है। यदि आप अपनी शक्ति वापस ले लें, तो वे कुछ भी नहीं हैं।" यह श्लोक देवी को ही एकमात्र स्वतंत्र सत्ता (Supreme Independent Reality) घोषित करता है।

शिव और शक्ति का अद्वैत: दूसरे श्लोक में कवि कहते हैं — "भगवान शिव सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, लेकिन यह काम वे स्वयं नहीं, बल्कि आपको (शक्ति को) अपना मुख (माध्यम) बनाकर करते हैं।" यह विचार तंत्र के उस सिद्धांत को पुष्ट करता है कि "शक्ति के बिना शिव शव के समान हैं" (शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति...)।

देवी के अंगों का ब्रह्मांडीय रहस्य (Cosmic Symbolism of Devi's Form)

दीक्षित जी ने देवी के प्रत्येक अंग में देवताओं और ब्रह्मांडीय शक्तियों का दर्शन किया है। यह वर्णन अत्यंत अलौकिक और कल्पना से परे है:

  • भृकुटी और संध्या (Eyebrows & Twilight): श्लोक 4 में कवि कहते हैं — "हे माँ! आपकी भृकुटी (भौंहें) संध्या (सूर्योदय और सूर्यास्त) का स्वरूप हैं। इसीलिए सारा संसार भले ही अन्य कर्म छोड़ दे, पर संध्या वंदन अवश्य करता है, क्योंकि वह अनजाने में आपकी भौंहों की ही उपासना कर रहा है।"
  • नेत्र और अग्नि (Eyes & Fire): श्लोक 5 के अनुसार, देवी के तीन नेत्र अग्नि स्वरूप हैं। कवि तर्क देते हैं — "अग्नि का धर्म जलाना और पवित्र करना है। आपके नेत्रों की एक चितवन (कटाक्ष) से ही भक्तों के पाप जलकर भस्म हो जाते हैं, इससे सिद्ध होता है कि आपके नेत्र साक्षात् अग्नि हैं।"
  • केश और मृत्यु (Hair & Death): श्लोक 3 और 21 में कहा गया है कि यमराज (मृत्यु के देवता) देवी के केशों (बालों) में निवास करते हैं। जो नास्तिक लोग देवी को नहीं मानते, मृत्यु के समय यमराज उन्हें केश पकड़कर खींचते हैं, मानो देवी के बाल ही उन्हें दंड दे रहे हों।
  • चरण और वेद (Feet & Vedas): श्लोक 15 में वर्णन है कि वेदों के रचयिता ब्रह्मा जी ने जब देखा कि उनकी वाणी (वेद) अपर्याप्त हैं, तो वे मौन होकर देवी के चरण (पद) बन गए। इसलिए आज भी वेद देवी के चरणों में ही नतमस्तक हैं।

महिषासुर और मधु-कैटभ वध का नवीन दृष्टिकोण (New Perspective on Demon Slaying)

इस स्तोत्र में असुर-संहार की घटनाओं को एक नए और मौलिक दृष्टिकोण से देखा गया है:

  • मधु-कैटभ वध: श्लोक 22 में कवि कहते हैं — "हे माँ! भगवान विष्णु तो योगनिद्रा में सो रहे थे। आपने ही उन्हें जगाया, युद्ध के लिए तैयार किया और असुरों को मोहित किया। विष्णु तो केवल निमित्त मात्र थे, असली संहारक तो आप ही थीं।"
  • महिषासुर का सौभाग्य: श्लोक 24 में एक अद्भुत बात कही गई है — "जब आपने महिषासुर के सिर पर अपना चरण रखा, तो उसे उसी क्षण 'परम पद' (मोक्ष) मिल गया। फिर आपने त्रिशूल क्यों उठाया? शायद युद्ध की जल्दी (हड़बड़ाहट) में आप यह भूल गईं कि वह तो पहले ही आपके स्पर्श से मुक्त हो चुका है!" यह श्लोक देवी की करुणा को दर्शाता है।
  • चण्ड-मुण्ड का नाश: श्लोक 26 के अनुसार, चण्ड-मुण्ड का वध देवी के अट्टहास मात्र से हो गया। कवि कहते हैं — "यह कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि आपकी तो मंद मुस्कान (स्मित) ही तीनों लोकों को बनाने और मिटाने में समर्थ है।"

भक्ति और शरणागति का तत्व (Essence of Devotion & Surrender)

अंतिम श्लोकों (32-36) में कवि दार्शनिक तर्कों को छोड़कर पूर्ण शरणागति में आ जाते हैं।

कृपा ही एकमात्र उपाय: श्लोक 32 में कवि पूछते हैं — "हे माँ! आप ही हमारी चेतना हैं, आप ही हृदय हैं और आप ही वृत्तियां हैं। फिर मैं किस साधन से आपको प्रसन्न करूँ? (क्योंकि साधन भी आप ही हैं)। आप स्वयं ही अपनी इच्छा से मुझ पर दया करें, यही एकमात्र उपाय है।"

अज्ञानी के लिए सुलभ: श्लोक 33 और 35 में कहा गया है कि देवी विद्वानों (प्राज्ञ) के लिए जितनी सुलभ हैं, उतनी ही अज्ञानी (अनभिज्ञ) भक्तों के लिए भी हैं। यदि देवी केवल ज्ञानियों की पूजा स्वीकार करतीं, तो संसार में पूजा की प्रथा ही समाप्त हो जाती। उनकी करुणा 'अव्याज' (बिना किसी कारण के) है।

अभय और मंगल: अंतिम श्लोक (36) में कवि कहते हैं — "हे माँ! देवताओं ने आपसे जो कुछ भी माँगा था (शत्रु नाश, राज्य आदि), वह सब आपने पहले ही दे दिया है। अब मैं तो केवल आपके उन अंगों का स्मरण करके अपना शेष जीवन सफल करना चाहता हूँ जो 'भुवनमङ्गलमङ्गलानि' (संसार के समस्त मंगलों के भी मंगल) हैं।"

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'श्रीचण्डीरहस्यम्' के रचयिता कौन हैं?
इसकी रचना 17वीं शताब्दी के महान शैव दार्शनिक और कवि नीलकण्ठ दीक्षित ने की है। वे अप्पय दीक्षित के वंशज थे और अपनी भक्तिपूर्ण रचनाओं (जैसे आनन्दसागरस्तव) के लिए प्रसिद्ध हैं।
2. इस स्तोत्र का मुख्य विषय क्या है?
इसका मुख्य विषय 'देवी की सर्वोच्चता' (Supremacy of Devi) स्थापित करना है। यह सिद्ध करता है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश अपनी-अपनी शक्ति और कार्यक्षमता के लिए पूर्णतः देवी पर निर्भर हैं।
3. श्लोक 11 में 'सोम' और 'पयोधर' का क्या रूपक है?
कवि कहते हैं कि पहले चंद्रमा (सोम) में अमृत केवल देवताओं को मिलता था। देवी ने सोचा कि यह जगत के लिए भी सुलभ हो, इसलिए उन्होंने चंद्रमा को ही अपने स्तन (पयोधर) के रूप में धारण कर लिया, ताकि भक्त आसानी से दुग्ध-पान (अमृत) कर सकें।
4. क्या यह स्तोत्र दुर्गा सप्तशती के 'रहस्य त्रय' से अलग है?
जी हाँ। दुर्गा सप्तशती के अंत में प्राधानिक, वैकृतिक और मूर्ति रहस्य हैं जो मार्कण्डेय ऋषि द्वारा कथित हैं। जबकि यह 'चण्डीरहस्यम्' एक स्वतंत्र काव्य है जो नीलकण्ठ दीक्षित द्वारा रचित है।
5. 'शाकम्भरी' और 'नन्दात्मजा' नामों का क्या संदर्भ है?
श्लोक 30 में कवि कहते हैं — जब आप 'नन्दात्मजा' (योगमाया) बनती हैं तो धन (हेमराशि) बरसाती हैं, और जब 'शाकम्भरी' बनती हैं तो भूख-प्यास (उदरोपसर्ग) शांत करती हैं। आप हर रूप में माँ की तरह पालन करती हैं।
6. श्लोक 20 में 'नास्तिक' और 'आस्तिक' का क्या भेद है?
कवि कहते हैं कि आस्तिक लोग तो श्रद्धा से देवी के समग्र रूप की पूजा करते हैं, लेकिन नास्तिक लोग (जो नरक में जाते हैं) भी अंत में यमराज के रूप में देवी के 'केशों' (बालों) का ही स्पर्श पाते हैं। अंततः सब देवी के ही अधीन हैं।
7. क्या इस स्तोत्र का पाठ नवरात्रि में किया जा सकता है?
अवश्य। नवरात्रि में इसका पाठ करना अत्यंत शुभ है। यह दुर्गा सप्तशती के पाठ के साथ एक उत्तम पूरक (Complement) है जो देवी के दार्शनिक पक्ष को समझने में मदद करता है।
8. 'कर्पूरभाजन' (श्लोक 17) का क्या अर्थ है?
कवि एक सुंदर उदाहरण देते हैं — जैसे कपूर की डिब्बी (भाजन) खाली होने पर भी उसमें कपूर की सुगंध रह जाती है, वैसे ही देवताओं ने अपनी शक्ति देवी को दे दी, फिर भी उनमें जो थोड़ी-बहुत कीर्ति बची है, वह उसी 'सुगंध' मात्र के कारण है।
9. यह स्तोत्र किस भाव (Ras) में लिखा गया है?
यह मुख्य रूप से 'भक्ति रस' और 'अद्भुत रस' में लिखा गया है। इसमें देवी के विराट स्वरूप को देखकर कवि का विस्मय और पूर्ण समर्पण भाव प्रकट होता है।
10. क्या इसके पाठ के लिए किसी विशेष विधि की आवश्यकता है?
यह एक भाव-प्रधान स्तुति है, इसलिए इसके लिए किसी जटिल तांत्रिक विधि की आवश्यकता नहीं है। शुद्ध अंतःकरण और अर्थ को समझते हुए इसका पाठ करना ही पर्याप्त है।