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श्री बटुकभैरव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् – श्री बटुकभैरव के 108 नाम | Apaduddharaka Stotra

श्री बटुकभैरव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् – श्री बटुकभैरव के 108 नाम | Apaduddharaka Stotra
॥ श्रीबटुकभैरवाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् (आपदुद्धारक स्तोत्र) ॥ ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः ॥ मेरुपृष्ठे सुखासीनं देवदेवं त्रिलोचनम् । शङ्करं परिपप्रच्छ पार्वती परमेश्वरम् ॥ १ ॥ श्रीपार्वत्युवाच - भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रागमादिषु । आपदुद्धारणं मन्त्रं सर्वसिद्धिकरं परम् ॥ २ ॥ सर्वेषां चैव भूतानां हितार्थं वाञ्छितं मया । विशेषमतस्तु राज्ञां वै शान्तिपुष्टिप्रसाधनम् ॥ ३ ॥ अङ्गन्यासकरन्यासदेहन्याससमन्वितम् । वक्तुमर्हसि देवेश मम हर्षविवर्द्धनम् ॥ ४ ॥ शङ्कर उवाच - श्रृणु देवि महामन्त्रमापदुद्धारहेतुकम् । सर्वदुःखप्रशमनं सर्वशत्रुविनाशनम् ॥ ५ ॥ अपस्मारादि रोगानां ज्वरादीनां विशेषतः । नाशनं स्मृतिमात्रेण मन्त्रराजमिमं प्रिये ॥ ६ ॥ ग्रहरोगत्राणनां च नाशनं सुखवर्द्धनम् । स्नेहाद्वक्ष्यामि तं मन्त्रं सर्वसारमिमं प्रिये ॥ ७ ॥ सर्वकामार्थदं पुण्यं राज्यं भोगप्रदं नृणाम् । आपदुद्धारणमिति मन्त्रं वक्ष्याम्यशेषतः ॥ ८ ॥ ॥ मन्त्रोद्धार ॥ प्रणवं पूर्वमुद्धृत्य देवी प्रणवमुद्धरेत् । बटुकायेति वै पश्चादापदुद्धारणाय च ॥ ९ ॥ कुरु द्वयं ततः पश्चाद्वटुकाय पुनः क्षिपेत् । देवीं प्रणवमुद्धृत्य मन्त्रोद्धारमिमं प्रिये ॥ १० ॥ मन्त्रोद्धारमिदं देवी त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम् । ओं ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु-कुरु बटुकाय ह्रीं । अप्रकाश्यमिमं मन्त्रं सर्वशक्तिसमन्वितम् ॥ ११ ॥ स्मरणादेव मन्त्रस्य भूतप्रेतपिशाचकाः । विद्रवन्त्यतिभीता वै कालरुद्रादिव द्विजाः ॥ १२ ॥ पठेद्वा पाठयेद्वापि पूजयेद्वापि पुस्तकम् । अग्निचौरभयं तस्य ग्रहराजभयं तथा ॥ १३ ॥ न च मारिभयं किञ्चित्सर्वत्रैव सुखी भवेत् । आयुरारोग्यमैश्वर्यं पुत्रपौत्रादि सम्पदः ॥ १४ ॥ भवन्ति सततं तस्य पुस्तकस्यापि पूजनात् । न दारिद्र्यं न दौर्भाग्यं नापदां भयमेव च ॥ १५ ॥ ॥ नामाष्टशतक (स्तोत्रम्) ॥ ओं ह्रीं भैरवो भूतनाथश्च भूतात्मा भूतभावनः । क्षेत्रज्ञः क्षेत्रपालश्च क्षेत्रज्ञः क्षत्रियो विराट् ॥ १ ॥ श्मशानवासी मांसाशी खर्पराशी स्मरान्तकः । रक्तपः पानपः सिद्धः सिद्धिदः सिद्धसेवितः ॥ २ ॥ कङ्कालः कालशमनः कलाकाष्ठातनुः कविः । त्रिनेत्रो बहुनेत्रश्च तथा पिङ्गललोचनः ॥ ३ ॥ शूलपाणिः खड्गपाणिः कङ्काली धूम्रलोचनः । अभीरुर्भैरवीनाथो भूतपो योगिनीपतिः ॥ ४ ॥ धनदोऽधनहारि च धनवान्प्रीतिवर्धनः । प्रतिभानवान् नागहारो नागकेशो व्योमकेशो कपालभृत् ॥ ५ ॥ नागपाशो कालः कपालमालि च कमनीयः कलानिधिः । त्रिलोचनो ज्वलन्नेत्रस्त्रिशिखी च त्रिलोकभृत् ॥ ६ ॥ त्रिनेत्रतनयो डिम्भः शान्तः शान्तजनप्रियः । बटुको बटुवेशश्च खट्वाङ्गवरधारकः ॥ ७ ॥ भूताध्यक्षो पशुपतिर्भिक्षुकः परिचारकः । धूर्तो दिगम्बरः शूरो हरिणः पाण्डुलोचनः ॥ ८ ॥ प्रशान्तः शान्तिदः शुद्धः शङ्करप्रियबान्धवः । अष्टमूर्तिर्निधीशश्च ज्ञानचक्षुस्तपोमयः ॥ ९ ॥ अष्टाधारः षडाधारः सर्पयुक्तः शिखीसखः । भूधरो भुधराधीशो भूपतिर्भूधरात्मजः ॥ १० ॥ कङ्कालधारी मुण्डी च आन्त्रयज्ञोपवीतवान् । जृम्भणो मोहनः स्तम्भी मारणः क्षोभणस्तथा ॥ ११ ॥ शुद्धनीलाञ्जनप्रख्यो दैत्यहा मुण्डविभूषितः । बलिभुग् बलिभुङ्नाथो बालोऽबालपराक्रमः ॥ १२ ॥ सर्वापत्तारणो दुर्गो दुष्टभूतनिषेवितः । कामी कलानिधिः कान्तः कामिनीवशकृद्वशी ॥ १३ ॥ जगद्रक्षाकरोऽनन्तो मायामन्त्रौषधीमयः । सर्वसिद्धिप्रदो वैद्यः प्रभविष्णुरितीव हि ह्रीं ओम् ॥ १४ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ अष्टोत्तरशतं नाम्नां भैरवाय महात्मनः । मया ते कथितं देवि रहस्यं सर्वकामदम् ॥ १५ ॥ य इदं पठति स्तोत्रं नामाष्टशतमुत्तमम् । न तस्य दुरितं किञ्चिन्न रोगेभ्यो भयं भवेत् ॥ १६ ॥ न च मारीभयं किञ्चिन्न च भूतभयं क्वचित् । न शत्रुभ्यो भयं किञ्चितप्राप्नुयान्मानवः क्वचित् ॥ १७ ॥ ॥ इति श्रीबटुकभैरवाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री बटुकभैरव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् — परिचय (Introduction)

श्री बटुकभैरव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Batukabhairava Ashtottarashatanama Stotram) तांत्रिक और पौराणिक साहित्य का एक अत्यंत शक्तिशाली अंग है। यह स्तोत्र भगवान शिव के "भैरव" अवतार को समर्पित है, जिन्हें 'आपदुद्धारक' (आपत्तियों से उबारने वाला) कहा जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों, विशेषकर 'मेरु तंत्र' और 'भैरव आगम' के अनुसार, बटुक भैरव भगवान शिव के पाँचवें अवतार हैं, जो बाल रूप में विद्यमान हैं। "बटुक" शब्द का अर्थ है 'बालक' या 'किशोर', जो उनकी सौम्य और भक्तों के प्रति दयालु प्रकृति को दर्शाता है, जबकि उनका उग्र स्वरूप अधर्म और शत्रुओं के नाश के लिए है।

रचना संदर्भ: इस स्तोत्र की रचना का आधार भगवान शंकर और माता पार्वती के मध्य हुआ संवाद है। मेरु पर्वत के पृष्ठ पर सुखासीन भगवान त्रिलोचन से माता पार्वती समस्त भूतों के कल्याणार्थ और राजाओं की शांति-पुष्टि के लिए एक ऐसा मंत्र पूछती हैं, जो आपत्तियों का नाश करने वाला हो। उत्तर में महादेव 'आपदुद्धारक बटुक भैरव' के इन १०८ दिव्य नामों का उपदेश देते हैं। तात्विक दृष्टि से, भैरव काल के नियंत्रक हैं, इसलिए उन्हें 'काल भैरव' भी कहा जाता है, किंतु बटुक रूप उनकी उपासना का सबसे सरल और सुरक्षित मार्ग माना गया है।

दार्शनिक स्वरूप: भगवान बटुक भैरव को अष्ट-सिद्धि का दाता माना गया है। उनके नामों में उनके विविध रूपों का वर्णन है — जैसे 'श्मशानवासी' (मृत्यु के भय को जीतने वाला), 'सिद्ध' (परम ज्ञान का प्रतीक), और 'क्षेत्रपाल' (धर्म की सीमाओं का रक्षक)। वे केवल भय ही उत्पन्न नहीं करते, बल्कि साधक को संसार के मायाजाल से निकालकर आत्मज्ञान की ओर ले जाते हैं। उनके हाथ में कपाल, शूल और पाश उनके संहारक और रक्षक गुणों को दर्शाते हैं।

आपदुद्धारक शक्ति: इस स्तोत्र को 'आपदुद्धारक' कहने का विशेष कारण है। जीवन में जब मनुष्य चारों ओर से संकटों से घिर जाता है, जब राजभय (कानूनी अड़चनें), शत्रु भय, या अज्ञात तांत्रिक बाधाएं उसे विचलित करती हैं, तब भैरव जी का यह बाल स्वरूप अपनी अमोघ शक्ति से साधक को संरक्षण प्रदान करता है। भैरव जी को 'काशी का कोतवाल' भी कहा जाता है, जो यह सिद्ध करता है कि वे ब्रह्मांडीय न्याय और अनुशासन के सर्वोच्च अधिकारी हैं।

यह पाठ केवल मंत्रों का उच्चारण नहीं है, बल्कि यह एक सुरक्षा कवच (Kavach) का निर्माण करता है। श्लोक १२ में स्पष्ट कहा गया है कि इस मंत्र के स्मरण मात्र से भूत-प्रेत-पिशाच वैसे ही भाग जाते हैं जैसे काल-रुद्र को देखकर काल घबरा जाता है। आधुनिक समय में, मानसिक शांति, एकाग्रता और नकारात्मक विचारों के दमन के लिए यह स्तोत्र एक आध्यात्मिक औषधि के समान है।

स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance)

बटुक भैरव की उपासना को 'सात्विक भैरव साधना' माना जाता है। जहाँ अन्य भैरव रूप उग्र साधना की अपेक्षा करते हैं, बटुक भैरव बाल रूप होने के कारण भक्त की छोटी सी पूजा से भी प्रसन्न हो जाते हैं।

१. ग्रह बाधा शांति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, राहु और केतु की पीड़ा को शांत करने के लिए भैरव साधना सर्वश्रेष्ठ है। यह स्तोत्र शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के कष्टों को कम करने में भी सहायक है।

२. तंत्र बाधा से रक्षा: यदि किसी पर अभिचार कर्म (Black Magic) या ईर्ष्याजन्य बाधाएं हों, तो यह १०८ नाम एक अभेद्य दुर्ग की तरह रक्षा करते हैं।

३. न्यायिक विजय: मुकदमों और कोर्ट-कचहरी के विवादों में सत्य की विजय हेतु बटुक भैरव की 'क्षेत्रपाल' रूप में स्तुति अमोघ फलदायी है।

फलश्रुति: पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits)

स्तोत्र के अंत में स्वयं महादेव ने इसके फलों का वर्णन किया है:

  • आकस्मिक संकट नाश: "सर्वापत्तारणो दुर्गो" — किसी भी प्रकार की दुर्घटना या आकस्मिक विपत्ति से रक्षा होती है।
  • रोग मुक्ति: मिर्गी (अपस्मार), ज्वर और असाध्य व्याधियों का नाश होता है।
  • धन और समृद्धि: धन की इच्छा रखने वाले को धन, और संतान की इच्छा रखने वाले को सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है।
  • शत्रु पराजय: रात्रि में तीन बार पाठ करने से शत्रुओं का दमन होता है और वे कोई हानि नहीं पहुँचा पाते।
  • कारागार मुक्ति: यदि कोई निर्दोष व्यक्ति बंधन या कारागार में हो, तो निरंतर पाठ से उसे शीघ्र मुक्ति मिलती है।

पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Method)

बटुक भैरव की साधना में स्वच्छता और मानसिक शुद्धि का अत्यधिक महत्व है। पाठ करने की सर्वोत्तम विधि इस प्रकार है:

  • समय: रविवार (Sunday) भैरव जी का दिन माना जाता है। मंगलवार भी उपयुक्त है। रात्रि काल (निशीथ काल) में पाठ अधिक प्रभावी होता है।
  • दिशा: दक्षिण (South) दिशा की ओर मुख करना शत्रुओं पर विजय के लिए श्रेष्ठ है, अन्यथा पूर्व की ओर मुख करें।
  • दीप विधान: सरसों के तेल (Mustard Oil) का दीपक जलाएं। चमेली के तेल का दीपक भी भैरव जी को प्रिय है।
  • भोग: बटुक भैरव को बेसन के लड्डू, इमरती या उड़द की दाल के बड़े प्रिय हैं। बाल रूप होने के कारण उन्हें दूध का भोग भी लगाया जाता है।
  • न्यास: स्तोत्र में वर्णित 'ऋष्यादि न्यास' और 'करन्यास' करने से शरीर की ऊर्जा मंत्रों के साथ एकाकार हो जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. क्या बटुक भैरव का पाठ घर पर करना सुरक्षित है?

हाँ, बटुक भैरव भगवान शिव का सात्विक बाल स्वरूप हैं। घर के मंदिर में इनकी पूजा और स्तोत्र का पाठ करना पूरी तरह सुरक्षित और कल्याणकारी है।

2. 'आपदुद्धारक' शब्द का क्या अर्थ है?

'आपद' का अर्थ है विपत्ति और 'उद्धारक' का अर्थ है उबारने वाला। जो सभी प्रकार की मुसीबतों से बाहर निकाले, उसे आपदुद्धारक कहते हैं।

3. क्या महिलाएँ यह पाठ कर सकती हैं?

हाँ, माँ पार्वती स्वयं इस स्तोत्र की जिज्ञासु हैं। महिलाएँ भी पूर्ण शुद्धि और श्रद्धा के साथ भैरव उपासना कर सकती हैं।

4. भैरव जी को कुत्तों (Dogs) की सेवा करना क्यों प्रिय है?

श्वान (कुत्ता) भैरव जी का वाहन माना गया है। श्वान की सेवा करने या उसे रोटी खिलाने से भैरव जी शीघ्र प्रसन्न होते हैं, इसका उल्लेख स्तोत्र में भी आता है।

5. शत्रुओं पर विजय के लिए कितनी बार पाठ करना चाहिए?

विशेष संकल्प के साथ रात्रि में ३ बार पाठ करना शत्रु दमन के लिए अत्यंत प्रभावी माना जाता है।

6. 'न्यास' करना क्यों आवश्यक है?

न्यास के माध्यम से हम मंत्र की शक्तियों को शरीर के विभिन्न अंगों में स्थापित करते हैं, जिससे पाठ के दौरान एक सुरक्षा कवच बनता है।

7. क्या भैरव पूजा में शराब चढ़ाना अनिवार्य है?

नहीं, यह साधना के मार्ग पर निर्भर करता है। सात्विक मार्ग (बटुक भैरव पूजा) में दूध, दही और मीठे का भोग ही उत्तम माना जाता है।

8. काल भैरव और बटुक भैरव में क्या अंतर है?

दोनों एक ही शिव के अंश हैं। काल भैरव न्यायप्रिय उग्र रूप हैं, जबकि बटुक भैरव रक्षक बाल स्वरूप हैं।

9. क्या शनिवार को पाठ किया जा सकता है?

हाँ, शनिवार शनि ग्रह की शांति के लिए और रविवार भैरव आराधना के लिए सर्वोत्तम दिन है।

10. 'बं' बीज मंत्र का क्या महत्व है?

स्तोत्र के विनियोग में 'बं' को बीज माना गया है। यह भैरव जी की शक्ति का संकुचित रूप है जो ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है।