शत्रुसंहारक एकदन्त स्तोत्रम् (Shatru Samharaka Ekadanta Stotram)
Shatru Samharaka Ekadanta Stotram (Enemy Destroyer)

॥ शत्रुसंहारक एकदन्त स्तोत्रम् ॥
देवर्षय ऊचुः ।
नमस्ते गजवक्त्राय गणेशाय नमो नमः ।
अनन्तानन्दभोक्त्रे वै ब्रह्मणे ब्रह्मरूपिणे ॥ १ ॥
आदिमध्यान्तहीनाय चराचरमयाय ते ।
अनन्तोदरसंस्थाय नाभिशेषाय ते नमः ॥ २ ॥
कर्त्रे पात्रे च संहर्त्रे त्रिगुणानामधीश्वर ।
सर्वसत्ताधरायैव निर्गुणाय नमो नमः ॥ ३ ॥
सिद्धिबुद्धिपते तुभ्यं सिद्धिबुद्धिप्रदाय च ।
ब्रह्मभूताय देवेश सगुणाय नमो नमः ॥ ४ ॥
परशुं दधते तुभ्यं कमलेन प्रशोभिने ।
पाशाभयधरायैव महोदर नमो नमः ॥ ५ ॥
मूषकारूढदेवाय मूषकध्वजिने नमः ।
आदिपूज्याय सर्वाय सर्वपूज्याय ते नमः ॥ ६ ॥
गुणसम्युक्तकायाय निर्गुणात्मकमस्तक ।
तयोरभेदरूपेण चैकदन्ताय ते नमः ॥ ७ ॥
वेदान्तगोचरायैव वेदान्तालभ्यकाय ते ।
योगाधीशाय वै तुभ्यं ब्रह्माधीशाय ते नमः ॥ ८ ॥
अपारगुणधारायानन्तमायाप्रचालक ।
नानावतारभेदाय शान्तिदाय नमो नमः ॥ ९ ॥
वयं धन्या वयं धन्या यैर्दृष्टो गणनायकः ।
ब्रह्मभूयमयः साक्षात् प्रत्यक्षं पुरतः स्थितः ॥ १० ॥
एवं स्तुत्वा प्रहर्षेण ननृतुर्भक्तिसम्युताः ।
साश्रुनेत्रान् सरोमाञ्चान् दृष्ट्वा तान् ढुण्ढिरब्रवीत् ॥ ११ ॥
एकदन्त उवाच ।
वरं वृणुत देवेशा मुनयश्च यथेप्सितम् ।
दास्यामि तं न सन्देहो भवेद्यद्यपि दुर्लभः ॥ १२ ॥
भवत्कृतं मदीयं यत् स्तोत्रं सर्वार्थदं भवेत् ।
पठते श्रुण्वते देवा नानासिद्धिप्रदं द्विजाः ॥ १३ ॥
शत्रुनाशकरं चैवान्ते स्वानन्दप्रदायकम् ।
पुत्रपौत्रादिकं सर्वं लभते पाठतो नरः ॥ १४ ॥
इति श्रीमन्मुद्गलपुराणे द्वितीयेखण्डे एकदन्तचरिते द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याये एकदन्तस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
देवर्षि कृत एकदन्त स्तुति: परिचय (Introduction)
शत्रुसंहारक एकदन्त स्तोत्रम् (Shatru Samharaka Ekadanta Stotram) मुद्गल पुराण (Mudgala Purana) के 'एकदन्त खण्ड' (अध्याय 52) से लिया गया है।
जब भगवान एकदन्त ने मदासुर (अहंकार का असुर) को पराजित किया, तब देवर्षियों (नारद आदि) ने उनकी स्तुति की। यह स्तोत्र अहंकार और बाहरी शत्रुओं दोनों का नाश करने वाला "ब्रह्मात्र" है।
महत्व: सगुण देह, निर्गुण मस्तक (Significance)
इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसका दार्शनिक चिंतन है (श्लोक 7):
"गुणसंयुक्त कायाय निर्गुणात्मकमस्तक"
अर्थात्, गणेश जी का शरीर "सगुण" (माया/प्रकृति से युक्त) है, लेकिन उनका मस्तक "निर्गुण" (ब्रह्म/परमात्मा) है। एकदन्त अवतार अद्वैत (Non-duality) का प्रतीक है जो 'माया' (एक) का नाश (दन्त) करता है।
लाभ (Benefits)
शत्रु और अहंकार का नाश: "शत्रुनाशकरं" - यह स्तोत्र बाहरी शत्रुओं के साथ-साथ सबसे बड़े आंतरिक शत्रु "मद" (घमंड) को नष्ट करता है।
स्वानन्द (Ultimate Bliss): यह सांसारिक सुखों के साथ-साथ अंत में "पूर्ण मोक्ष" (स्वानन्द लोक की प्राप्ति) प्रदान करता है।
वंश और धन वृद्धि: "पुत्रपौत्रादिकं सर्वं" - इसके पाठ से कुल और संपत्ति की निरंतर वृद्धि होती है।
पाठ विधि (Ritual & Vidhi)
- विवाद निवारण: यदि आप किसी विवाद या कोर्ट केस में फंसे हैं, तो 21 दिनों तक नित्य 11 बार इस स्तोत्र का पाठ करें।
- नैवेद्य: एकदन्त भगवान को गन्ना (Sugarcane) या गन्ने का रस अत्यंत प्रिय है। पाठ के बाद इसका भोग लगाएं।
प्रश्नोत्तरी (FAQ)
शत्रुसंहारक एकदन्त स्तोत्र (Shatru Samharaka Ekadanta Stotram) क्या है?
यह मुद्गल पुराण (Mudgala Purana) के "एकदन्त खण्ड" से लिया गया एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। इसकी स्तुति देवर्षियों ने मदासुर (अहंकार के असुर) के वध के बाद की थी।
इसे "शत्रुसंहारक" क्यों कहा जाता है?
क्योंकि इसके पाठ से न केवल बाहरी शत्रुओं (Enemies) का नाश होता है, बल्कि आंतरिक शत्रु "मद" (Arrogance/Ego) भी समाप्त हो जाता है।
श्लोक ७ में गणेश के स्वरूप का क्या विशेष वर्णन है?
श्लोक ७ में कहा गया है कि उनका शरीर "गुणसंयुक्त" (सगुण) है, लेकिन मस्तक "निर्गुणात्मक" (निर्गुण/निराकार) है। यह अद्वैत और द्वैत के संगम को दर्शाता है।
"एकदन्त" नाम का यहाँ क्या रहस्य है?
"एक" का अर्थ है माया (भ्रांति) और "दन्त" का अर्थ है उसका नाश करने वाला। अतः एकदन्त वह है जो अज्ञान और माया के द्वैत को समाप्त करते हैं।
इस स्तोत्र के पाठ का क्या फल है?
फलश्रुति के अनुसार, यह "शत्रुनाशकर" है और अंत में "स्वानन्द" (Self-Bliss/Moksha) प्रदान करता है। साथ ही पुत्र-पौत्र आदि की वृद्धि करता है।
क्या यह कोर्ट-कचहरी और विवादों में सहायक है?
हाँ, "शत्रुनाशकरं" होने के कारण यह मुकदमों, विवादों और विरोधियों पर विजय प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावी माना जाता है।
मदासुर (Madasura) कौन था?
मदासुर "मद" (Ego/Pride) का असुर रूप था, जिसने देवताओं को पराजित कर दिया था। भगवान एकदन्त ने उसका अहंकार नष्ट कर उसे अपना भक्त बना लिया।
क्या इसे प्रतिदिन पढ़ना चाहिए?
जी हाँ, नित्य पाठ करने से जीवन में आने वाली बाधाएं और गुप्त शत्रु स्वतः ही शांत हो जाते हैं।
पूजा में क्या विशेष अर्पण करना चाहिए?
भगवान एकदन्त को "इक्षु" (Sugarcane) अत्यंत प्रिय है। मदासुर के प्रसंग में गन्नों का विशेष महत्व है।
"स्वानन्द" का क्या अर्थ है?
"स्वानन्द" (Svananda) गणेश जी का वह लोक या अवस्था है जहाँ भक्त अपनी ही आत्मा के आनंद में लीन रहता है। यह मोक्ष की ही एक अवस्था है।