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Shambhu Krutha Sri Rama Stava – श्री राम स्तवः (शम्भु कृतम्)

Shambhu Krutha Sri Rama Stava – श्री राम स्तवः (शम्भु कृतम्)
॥ श्री राम स्तवः (शम्भु कृतम्) ॥ राघवं करुणाकरं भवनाशनं दुरितापहं माधवं खगगामिनं जलरूपिणं परमेश्वरम् । पालकं जनतारकं भवहारकं रिपुमारकं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ १ ॥ भूधवं वनमालिनं घनरूपिणं धरणीधरं श्रीहरिं त्रिगुणात्मकं तुलसीधवं मधुरस्वरम् । श्रीकरं शरणप्रदं मधुमारकं व्रजपालकं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ २ ॥ विठ्ठलं मथुरास्थितं रजकान्तकं गजमारकं सन्नुतं बकमारकं वृकघातकं तुरगार्दनम् । नन्दजं वसुदेवजं बलियज्ञगं सुरपालकं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ ३ ॥ केशवं कपिवेष्टितं कपिमारकं मृगमर्दिनं सुन्दरं द्विजपालकं दितिजार्दनं दनुजार्दनम् । बालकं खरमर्दिनं ऋषिपूजितं मुनिचिन्तितं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ ४ ॥ शङ्करं जलशायिनं कुशबालकं रथवाहनं सरयूनतं प्रियपुष्पकं प्रियभूसुरं लवबालकम् । श्रीधरं मधुसूदनं भरताग्रजं गरुडध्वजं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ ५ ॥ गोप्रियं गुरुपुत्रदं वदतां वरं करुणानिधिं भक्तपं जनतोषदं सुरपूजितं श्रुतिभिः स्तुतम् । भुक्तिदं जनमुक्तिदं जनरञ्जनं नृपनन्दनं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ ६ ॥ चिद्घनं चिरजीविनं मणिमालिनं वरदोन्मुखं श्रीधरं धृतिदायकं बलवर्धनं गतिदायकम् । शान्तिदं जनतारकं शरधारिणं गजगामिनं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ ७ ॥ शार्ङ्गिणं कमलाननं कमलादृशं पदपङ्कजं श्यामलं रविभासुरं शशिसौख्यदं करुणार्णवम् । सत्पतिं नृपबालकं नृपवन्दितं नृपतिप्रियं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ ८ ॥ निर्गुणं सगुणात्मकं नृपमण्डनं मतिवर्धनं अच्युतं पुरुषोत्तमं परमेष्ठिनं स्मितभाषिणम् । ईश्वरं हनुमन्नुतं कमलाधिपं जनसाक्षिणं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ ९ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ ईश्वरोक्तमेतदुत्तमादराच्छतनामकं यः पठेद्भुवि मानवस्तव भक्तिमांस्तपनोदये । त्वत्पदं निजबन्धुदारसुतैर्युतश्चिरमेत्य नो सोऽस्तु ते पदसेवने बहुतत्परो मम वाक्यतः ॥ १० ॥ ॥ इति श्रीशंभु कृत श्रीराम स्तवः सम्पूर्णम् ॥

श्री राम स्तवः (शम्भु कृतम्): महादेव की वाणी से प्रवाहित भक्ति धारा

श्री राम स्तवः (शम्भु कृतम्) (Sri Rama Stava by Lord Shiva) सनातन धर्म का एक ऐसा अद्भुत स्तोत्र है जो साक्षात भगवान शिव (शम्भु) के मुखारविंद से प्रकट हुआ है। हिंदू दर्शन के अनुसार, भगवान शिव और श्री राम का संबंध अत्यंत गहरा और पूरक है। जहाँ भक्तगण महादेव की पूजा करते हैं, वहीं महादेव स्वयं निरंतर 'राम' नाम का जप करते हैं। यह स्तव उसी अनन्य श्रद्धा का प्रमाण है, जिसे 'अध्यात्म रामायण' (Adhyatma Ramayana) जैसे ग्रंथों में विशेष स्थान दिया गया है। अध्यात्म रामायण में राम कथा को वेदान्तिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है, और यह स्तव उसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग है।

इस स्तोत्र की रचना का आधार वेदान्त और भक्ति का अद्भुत समन्वय है। प्रत्येक श्लोक की अंतिम पंक्ति — "त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम्" — इस सत्य को उद्घाटित करती है कि श्री राम केवल एक ऐतिहासिक राजा या मनुष्य नहीं हैं, बल्कि वे साक्षात परब्रह्म हैं जिन्होंने मानव कल्याण के लिए 'नर रूप' धारण किया है। महादेव इस स्तुति के माध्यम से संसार को यह बताते हैं कि श्री राम ही चराचर जगत के स्वामी (जगदीश्वर) हैं। यह स्तुति न केवल प्रभु के सौम्य जानकीवल्लभ रूप का गान करती है, बल्कि उनके उग्र 'रिपुमारक' और 'असुर विनाशक' स्वरूप को भी नमन करती है।

ऐतिहासिक और धार्मिक शोध के अनुसार, इस स्तव को 'कवच' की श्रेणी में रखा जाता है। इसमें प्रभु राम के विभिन्न रूपों का वर्णन है, जिसमें विष्णु के अन्य अवतारों जैसे कृष्ण, वामन और नृसिंह की झलक भी मिलती है। श्लोक ३ और ४ में प्रयुक्त विशेषण जैसे 'रजकान्तक' और 'मथुरास्थित' स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं कि शिव जी की दृष्टि में राम और कृष्ण एक ही अखंड तत्व हैं। यह स्तोत्र साम्प्रदायिक भेदों (शैव और वैष्णव) को मिटाकर 'हरि-हर' की एकता का संदेश देता है।

आज के समय में, जब मानव मन अशांति और नकारात्मक ऊर्जा से घिरा हुआ है, महादेव द्वारा रचित यह राम स्तव एक दिव्य औषधि की तरह कार्य करता है। इसका पाठ करने से साधक के भीतर सात्विक ऊर्जा का संचार होता है और वह समस्त सांसारिक भयों से मुक्त होकर आत्मिक शांति प्राप्त करता है। यह पाठ उन भक्तों के लिए अनिवार्य है जो भगवान शिव और श्री राम दोनों की संयुक्त कृपा प्राप्त करना चाहते हैं।

विशिष्ट आध्यात्मिक एवं दार्शनिक महत्व (Significance)

श्री राम स्तव का दार्शनिक पक्ष अत्यंत सूक्ष्म और प्रभावशाली है। इसमें प्रभु को 'निर्गुणं सगुणात्मकं' कहा गया है, जो वेदान्त का सार है। इसका अर्थ है कि परमात्मा मूल रूप से निराकार (निर्गुण) है, लेकिन भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए वह साकार (सगुण) रूप में अवतरित होता है। महादेव इस स्तव के माध्यम से 'माया' और 'ब्रह्म' के खेल को समझाते हैं।

शिव-राम ऐक्य (The Oneness of Shiva and Rama)

पद्म पुराण और रामचरितमानस में भगवान शिव कहते हैं कि जो राम का द्रोही होकर मेरी भक्ति करता है, उसे मेरी कृपा कभी प्राप्त नहीं होती। इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक को यह बोध होता है कि राम और शिव के बीच कोई भेद नहीं है। प्रभु राम को 'शङ्करं जलशायिनं' (श्लोक ५) कहना इसी अभेद का प्रतीक है। तांत्रिक दृष्टि से, यह स्तोत्र कुंडलिनी जाग्रति में भी सहायक माना जाता है क्योंकि यह चित्त को 'चिद्घन' स्वरूप की ओर प्रेरित करता है।

पाप और भव-बाधा का नाश

इस स्तुति को 'भवनाशनं' और 'दुरितापहं' कहा गया है। संसार के जन्म-मरण के चक्र (भव) से मुक्ति और संचित पापों का क्षय इस पाठ का मुख्य उद्देश्य है। जब साक्षात काल के स्वामी (शिव) रक्षक राम की स्तुति करते हैं, तो वह पाठ ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली सुरक्षा कवच बन जाता है। यह मानसिक विकारों, जैसे क्रोध, लोभ और अहंकार को जड़ से मिटाने की क्षमता रखता है।

फलश्रुति: श्री राम स्तव पाठ के दिव्य लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र की १०वीं श्लोक में वर्णित फलश्रुति के अनुसार, श्रद्धापूर्वक पाठ करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • शत्रु और बाधा विजय: प्रभु के 'रिपुमारक' और 'खरमर्दी' स्वरूप का स्मरण करने से जीवन के सभी ज्ञात-अज्ञात शत्रु और बाधाएं शांत हो जाती हैं।
  • मानसिक शांति और स्थिरता: 'शान्तिदं' होने के कारण यह स्तोत्र अवसाद (Depression) और चिंता को दूर कर मन में सात्विक आनंद भर देता है।
  • पारिवारिक कल्याण: फलश्रुति के अनुसार, पाठकर्ता अपने बंधु, स्त्री और पुत्रों के साथ सुखी और दीर्घायु जीवन व्यतीत करता है।
  • पाप मुक्ति: 'दुरितापहं' (पाप नाशक) होने से यह जन्म-जन्मांतर के संचित पापों को भस्म कर देता है, जिससे अंतःकरण शुद्ध होता है।
  • मोक्ष की प्राप्ति: सूर्योदय के समय इस स्तोत्र का पाठ करने वाला अंततः प्रभु के परम पद को प्राप्त करता है।
  • आरोग्य और शक्ति: यह पाठ शारीरिक व्याधियों को दूर कर ओज और तेज में वृद्धि करता है।

पाठ विधि एवं विशेष अनुष्ठान (Ritual Method)

महादेव द्वारा रचित होने के कारण इस स्तव का पाठ विशेष अनुशासन के साथ करने पर त्वरित फल मिलता है:

  • समय: श्लोक १० में स्पष्ट है — 'तपनोदये' (सूर्योदय के समय)। प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के समय पाठ करना सर्वोत्तम है।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। राम दरबार या शिवलिंग के सम्मुख घी का दीपक जलाएं।
  • आसन: ऊनी या कुश के आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
  • माला: पाठ के पश्चात तुलसी या रुद्राक्ष की माला से १०८ बार 'राम' नाम का जप करना विशेष फलदायी है।
  • अर्पण: प्रभु को तुलसी का पत्ता और ऋतु फल या मिश्री का भोग लगाएं।

विशेष: राम नवमी, हनुमान जयंती, या सावन के सोमवार को इस स्तोत्र का ११ या २१ बार पाठ करना किसी भी असाध्य कार्य की सिद्धि के लिए अमोघ माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री राम स्तव (शम्भु कृतम्) का मुख्य स्रोत क्या है?

यह स्तोत्र मुख्य रूप से 'अध्यात्म रामायण' और कुछ विशिष्ट आगम ग्रंथों से लिया गया है, जहाँ भगवान शिव ने इसे स्वयं उच्चारित किया है।

2. 'शम्भु कृतम्' का क्या तात्पर्य है?

'शम्भु' भगवान शिव का एक नाम है। इस स्तोत्र की रचना स्वयं महादेव ने की है, इसलिए इसे 'शम्भु कृतम्' कहा जाता है।

3. क्या इस पाठ से शत्रुओं पर विजय मिलती है?

हाँ, प्रभु राम को 'रिपुमारक' (शत्रु नाशक) कहा गया है। यह पाठ शत्रुओं के कुचक्रों को विफल करने और आत्मरक्षा के लिए सिद्ध माना गया है।

4. क्या इस स्तोत्र में कृष्ण और वामन अवतार का भी उल्लेख है?

जी हाँ, श्लोक ३ और ४ में मथुरा निवास, बक वध और बलियज्ञ (वामन अवतार) के संदर्भ आते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि प्रभु राम ही सभी अवतारों के मूल हैं।

5. पाठ के लिए सबसे अच्छा समय कौन सा है?

फलश्रुति के अनुसार, प्रातःकाल सूर्योदय (तपनोदये) के समय इसका पाठ करना सबसे अधिक प्रभावशाली और पुण्यदायी होता है।

6. क्या स्त्रियाँ भी इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

निश्चित रूप से। महादेव की यह दिव्य वाणी सबके कल्याण के लिए है। स्त्रियाँ अपनी सुख-शांति और परिवार की सुरक्षा के लिए इसे पढ़ सकती हैं।

7. क्या इस पाठ से मानसिक तनाव दूर होता है?

हाँ, 'शान्तिदं' होने के कारण यह चंचल मन को स्थिर करता है और गहरे मानसिक तनाव व चिंता से मुक्ति दिलाता है।

8. 'चिद्घनं' शब्द का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

'चिद्घन' का अर्थ है — वह परम चेतना जो घनीभूत है। यह परमात्मा के उस शुद्ध ज्ञान स्वरूप को दर्शाता है जो सर्वव्यापी है।

9. क्या इस स्तोत्र को बिना संस्कृत जाने पढ़ सकते हैं?

हाँ, आप हिंदी अर्थ का मनन करते हुए इसे पढ़ सकते हैं। प्रभु भाव के भूखे हैं, शुद्ध हृदय से की गई स्तुति वे स्वीकार करते हैं।

10. इसे कितनी बार पढ़ना चाहिए?

नित्य एक बार पाठ करना पर्याप्त है, लेकिन विशेष कामनाओं के लिए ३, ७ या ११ बार पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है।