श्री रत्नमाला स्तोत्रम् (आर्यावलोकितेश्वर)

॥ रत्नमालास्तोत्रम् ॥
विमलशून्यकृपार्द्रचित्तं मार्गज्ञताप्रथितदेशनयार्थवाचम् । सर्वज्ञतादिपरिपूर्णविशुद्धदेहं ज्ञानाधिकारललितं शिरसा नमामि ॥ १॥ वैनेयभेदवशतो बहुधावभासैरेकोऽपि पात्रगजलेषु शशीव यस्मात् । संलक्षसे परहितानुगतैव तस्माद् बुद्धिस्त्वहो परमविस्मयनीयरूपा ॥ २॥ सम्पूर्णचन्द्रवदने ललितो ललाटदेशाद्विनिर्गतमहेश्वरदेवपुत्रः । वैनेयशाम्भवजनप्रतिबोधनार्थं देवाधिदेवप्रतिमानुज ईश्वरस्त्वम् ॥ ३॥ वैनेयकोमलभवप्रतिबोधनाय किं धाम सम्भृत महाशुभलक्षणं ते । निर्यात एव हि पितामहदेवपूजां लोकेश्वरेश्वरपरं शिरसा नमामि ॥ ४॥ वैनेयवैष्णवजनप्रतिबोधनाय राजीवपाणिहृदयात् प्रतिनिःसृतोऽसौ । नारायणोऽपि भुवनेश्वर एव तस्मात् पुंसां त्वमेव परमोत्तम एव नान्यः ॥ ५॥ चन्द्रार्कसादरबलाहितभक्तिभाजां सन्दर्शनार्थमिभनीलसुलोचनाभ्याम् । यन्निःसृतौ शशिरवी भुवि लोचनाभ्यां ध्वस्तान्तरालतमसं तमहं नमामि ॥ ६॥ सारस्वतीविनययोजितभक्तिभाजां बोधाय वै भगवतीह सरस्वतीयम् । दृष्टाग्रतस्तव जिनात्मजपप्रसूता प्रज्ञाभिलाषिफलदं तमहं नमामि ॥ ७॥ वैनेयवायुजनिताक्षरमार्गसिद्ध्यै यो लोकनाथ सुगतोऽथ विनिःसृतोऽसौ । देवः समीरणवरो भुवि जन्मभाजामीर्यापथार्थफलदं तमहं नमामि ॥ ८॥ वैनेयवारुणशिवायनमीप्सितानां सम्बोधनार्थमुदरात्सुगतात्मजानाम् । यन्निःसृतो वरुणदेववरोऽप्यकस्मादैश्वर्यसिद्धि फलदं तमहं नमामि ॥ ९॥ वैनेयसम्मतफलाद्यभिलाषिणो वै संसिद्धये प्रवरलक्षणपादपद्म । यन्निःसृता भगवती धरणी प्रसिद्धा त्रैलोक्यनाथमसमं सततं नमामि ॥ १०॥ संसारमुक्तमपि सुस्थितमेव तत्र कारुण्यतश्च भवचारिणि सत्त्ववर्गे । भूयात् स्थितिर्मम सदास्थिरसा भवन्तमेवं महाशयवरं परमं नमामि ॥ ११॥ एकेन पादतलकेन भवत्स्वकेन चक्रान्तसंवरमनन्तरलोकधातौ । कल्पान्तदग्धभुवने ज्वलितोग्रवह्निर्निःश्वासवायुबलतस्तव निर्वृतः स्यात् ॥ १२॥ स्वां तर्जनीं मुखधृतोऽहिततर्जनेन सञ्चालिताश्च बहुमेरुगणा नखस्य । कोषोद्धृतं जलधितोयमशेषतः स्यात् सामर्थ्यमीदृशमहो भवतः कुतोऽन्यत् ॥ १३॥ क्वेदं च शैशवपरं ननु चारुरूपं सन्दर्शनीयवरकोमलबालचन्द्रम् । दुर्वारमारमथनं च मयैकसह्यं विक्रान्तदुःसहपरं क्व च चेष्टितं ते ॥ १४॥ एषा बताञ्जननिभोरुजनावली सा कौटिल्यचारुविकटा स्वशिरोरुहाग्रे । क्लेशेन्धने ज्वलितविस्फुरितत्ववह्ने- धूमावलीव विमला ननु लक्ष्यते ते ॥ १५॥ त्वत्कान्तिलेशविमला दशदिक्प्रतानैः पक्षासितक्षयकृशा सकला सुशोभा । पर्यन्त इष्टशशिनो भवनेषु यत्ते मन्ये विराजि निखिलं तव कान्तिलेशात् ॥ १६॥ बन्धुर्हि को मार्गिकसम्मतं मतं नरो नरी सा स च सत्पथं पथम् । परार्थसम्पादितसंवरं वरं नमामि भूमीश्वरराजिनं जिनम् ॥ १७॥ अनित्यनिर्वाणपदे स्थितं स्थितं प्रभास्वराधिष्ठितसंहितं हितम् । शमीकृताशेषजनं शिवं शिवं नमामि भूमीश्वरराजिनं जिनम् ॥ १८॥ गभस्तिमालामितसङ्कुलं कुलं तत्र स्वपाणौ धृतपङ्कजं कजम् । रतानुगाशोभितसंरतं रतं नमामि भूमीश्वरराजिनं जिनम् ॥ १९॥ स्वधर्मधातुं करुणापरं परं शुभादिसम्भारसुसम्भृतं भृतम् । विकल्पहीनं ध्वनिदेशकं शकं नमामि भूमीश्वराजिनं जिनम् ॥ २०॥ तथतातथताद्वयशातशतं सदसत्परिपूरितधर्मकथम् । कथनीयविराजितसत्यपरं प्रणमे धरणीश्वरराजवरम् ॥ २१॥ वरवारिजरूपि जगत्प्रसरं सरसीरुहलोचनचारुतरम् । तरसापि रसत्वविशुद्धिपरं प्रणमे धरणीश्वराजवरम् ॥ २२॥ वरनिर्मितभोगपरार्थरतं रतशून्यनिरञ्जनधर्मधरम् । धरणीन्द्रविभूषितसिद्धिपरं प्रणमे धरणीश्वरराजवरम् ॥ २३॥ वरसत्सहजोदधिचन्द्रमुखं सुखभाषितसत्त्वविमुक्तिपदम् । पदभूषणलक्षणतानुपरं प्रणमे धरणीश्वरराजवरम् ॥ २४॥ लोकेश्वरेयं (मां) तव रत्नमालामचीकरच्छ्रीवनरत्नपादः । अवापि यत्तेन शुभप्रविष्टं तेनैव लोकोऽस्तु समन्तभद्रः ॥ २५॥ ॥ इति श्रीमदार्यावलोकितेश्वरभट्टारकस्य रत्नमालास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
रत्नमाला स्तोत्रम्, महायान बौद्ध परम्परा की एक अत्यंत गहन और काव्यात्मक स्तुति है, जो करुणा के महासागर, आर्य अवलोकितेश्वर को समर्पित है। इसका शीर्षक 'रत्नमाला' (Jewel Garland) प्रतीकात्मक है, क्योंकि यह स्तोत्र अवलोकितेश्वर के अनमोल गुणों और करुणामय कार्यों की एक माला पिरोता है। इस स्तुति की सबसे बड़ी विशेषता इसका समन्वयवादी दृष्टिकोण है, जिसमें अवलोकितेश्वर को विभिन्न प्रकार के भक्तों (
वैनेय) का कल्याण करने के लिए महेश्वर, नारायण, और अन्य देवताओं के अनुरूप रूप धारण करते हुए दिखाया गया है। यह महायान बौद्ध धर्म के 'उपाय-कौशल' (skillful means) के सिद्धांत का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ एक बोधिसत्व प्राणियों को धर्म की ओर आकर्षित करने के लिए विभिन्न रूप धारण करता है।पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)
अवलोकितेश्वर महायान बौद्ध धर्म के सबसे पूजनीय बोधिसत्त्वों में से एक हैं। उनका प्रण है कि वे तब तक निर्वाण प्राप्त नहीं करेंगे, जब तक संसार का हर एक प्राणी दुःख से मुक्त न हो जाए। यह स्तोत्र उनके इसी प्रण को क्रियान्वित करते हुए दिखाता है। स्तोत्र में वर्णन है कि शैव भक्तों का उद्धार करने के लिए वे अपने ललाट से महेश्वर का रूप प्रकट करते हैं। वैष्णव भक्तों के लिए, वे अपने हृदय-कमल से नारायण के रूप में निःसृत होते हैं। इसी प्रकार, वे विभिन्न भक्तों के कल्याण के लिए सरस्वती, वायु देव, और वरुण देव के रूप में भी प्रकट होते हैं। यह किसी पौराणिक कथा से अधिक एक गहरा दार्शनिक सिद्धांत है, जो दर्शाता है कि सभी दिव्य स्वरूप अंततः एक ही परम करुणा की अभिव्यक्ति हैं, जिसे बौद्ध परम्परा में अवलोकितेश्वर कहा जाता है। स्तोत्र के अंत में रचयिता, श्रीवनरत्नपाद, इस स्तुति से प्राप्त पुण्य को समस्त लोकों के कल्याण (
लोकोऽस्तु समन्तभद्रः) के लिए समर्पित करते हैं, जो बोधिसत्त्व मार्ग का सार है।स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
यह स्तोत्र महायान दर्शन के प्रमुख सिद्धांतों को उजागर करता है:
- शून्यता और करुणा की एकता (Union of Emptiness and Compassion): स्तोत्र की पहली पंक्ति, "विमलशून्यकृपार्द्रचित्तं", इसका सार है। उनका चित्त 'विमल शून्य' (pristine emptiness) से युक्त है, और इसी शून्यता के ज्ञान से 'कृपा' (compassion) उत्पन्न होती है। यह प्रज्ञा और करुणा का अविभाज्य युग्म है।
- सर्वज्ञता और कुशल उपाय (Omniscience and Skillful Means): उन्हें 'मार्गज्ञता' (मार्ग का ज्ञाता) कहा गया है। वे हर प्राणी के लिए मुक्ति का सही मार्ग जानते हैं और उसी के अनुरूप उपदेश देते हैं और रूप धारण करते हैं।
- अनंत शक्ति का प्रतीक (Symbol of Infinite Power): स्तोत्र में उनकी अकल्पनीय शक्ति का वर्णन है, जैसे उनके एक पद-तल से कल्पान्त की अग्नि शांत हो सकती है और उनके नख के जल से सूखे हुए महासागर पुनः भर सकते हैं। यह दर्शाता है कि करुणा की शक्ति अनंत और अजेय है।
- जिन (Jina - The Conqueror): उन्हें 'जिन' (विजेता) और 'भूमीश्वरराजिन' (पृथ्वी के राजाओं के राजा) के रूप में संबोधित किया गया है, जो दर्शाता है कि उन्होंने क्लेशों और संसार पर विजय प्राप्त कर ली है और वे आध्यात्मिक जगत के सच्चे सम्राट हैं।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
इस स्तोत्र की फलश्रुति पारंपरिक रूप से व्यक्तिगत लाभों के लिए नहीं है, बल्कि यह बोधिसत्त्व मार्ग के आदर्शों को दर्शाती है:
- सार्वभौमिक कल्याण की भावना (Universal Well-being): अंतिम श्लोक में कहा गया है, "तेनैव लोकोऽस्तु समन्तभद्रः" - इस स्तोत्र के पुण्य से सम्पूर्ण लोक 'समन्तभद्र' (सर्वत्र कल्याणकारी) हो जाए। इसका पाठ करने से साधक के मन में स्वार्थ से ऊपर उठकर परोपकार और विश्व-कल्याण की भावना विकसित होती है।
- करुणा का विकास (Development of Compassion): अवलोकितेश्वर के करुणामय गुणों का बार-बार स्मरण करने से साधक का हृदय कोमल होता है और उसमें सभी प्राणियों के प्रति करुणा का भाव जाग्रत होता है।
- आध्यात्मिक सुरक्षा और मार्गदर्शन (Spiritual Protection and Guidance): बोधिसत्त्व की स्तुति करने से साधक को उनके संरक्षण का अनुभव होता है। वे मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं और सही दिशा दिखाते हैं।
- चित्त की शुद्धि (Purification of Mind): शून्यता और करुणा पर ध्यान केंद्रित करने से मन के क्लेश, जैसे क्रोध, ईर्ष्या, और अहंकार, धीरे-धीरे शुद्ध होते हैं।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- यह एक ध्यानपरक स्तोत्र है। इसका पाठ करते समय अवलोकितेश्वर के अनंत करुणामय स्वरूप का ध्यान करना चाहिए।
- पाठ शुरू करने से पहले, अपने मन में बोधचित्त (Bodhicitta) उत्पन्न करना महत्वपूर्ण है - अर्थात्, "मैं सभी प्राणियों को दुःख से मुक्त करने और उन्हें बुद्धत्व तक पहुँचाने के लिए इस स्तोत्र का पाठ कर रहा हूँ।"
- इसका पाठ किसी भी दिन, विशेषकर पूर्णिमा के दिन, प्रातःकाल या संध्या के समय शांत स्थान पर बैठकर किया जा सकता है।
- पाठ के अंत में, स्तोत्र से उत्पन्न पुण्य को अपने तक सीमित न रखकर, सभी प्राणियों के कल्याण के लिए समर्पित (
परिणामना) करना चाहिए, जैसा कि अंतिम श्लोक में दर्शाया गया है।