पुष्टिपति स्तोत्रम् - देवर्षि कृतम् (Pushtipati Stotram)
Pushtipati Stotram (Devarshi Krutam)

परिचय (Introduction)
पुष्टिपति स्तोत्र (Pushtipati Stotram) भगवान गणेश की एक दुर्लभ और शक्तिशाली स्तुति है, जो मुद्गल पुराण (Mudgala Purana) के 'एकदन्त चरित्र' (अध्याय ६५) में वर्णित है।
इसकी रचना देवर्षियों (नारद आदि) ने की थी। इसमें गणेश जी को "पुष्टिपति" (Lord of Nourishment) संबोधित किया गया है। "पुष्टि" का व्यापक अर्थ है - उत्तम स्वास्थ्य, धन-धान्य, और आत्मिक बल। यह स्तोत्र जीवन के हर अभाव को दूर कर के पूर्णता प्रदान करता है।
महत्व (Significance)
- देवर्षि कृतम्: चूंकि इसकी रचना सिद्ध ऋषियों ने की है, इसलिए यह "वाक सिद्धि" (Speech having power to manifest) से युक्त माना जाता है।
- ढुण्ढि रूप: इसमें गणेश जी को "ढुण्ढे" कहा गया है, जो 'काशी' (Varanasi) में स्थित "ढुण्ढिराज गणेश" का भी स्मरण दिलाता है - जो भक्तों की पुकार को खोज-खोज कर सुनते हैं।
- समग्र कल्याण: यह स्तोत्र केवल विघ्न नहीं हरता, बल्कि "शांति", "योग", "बुद्धि" और "आनंद" भी प्रदान करता है।
लाभ (Benefits)
उत्तम स्वास्थ्य (Health & Vitality): जैसा कि नाम है "पुष्टिपति", यह कुपोषण, कमजोरी और बीमारियों को दूर कर शरीर को पुष्ट करता है।
मानसिक शांति (Mental Peace): "जय शान्तिप्रदायक" - यह मंत्र तनाव, चिंता और अशांति को समाप्त कर मन को स्थिर करता है।
पूर्ण मनोरथ (Fulfillment of Desires): "जय पूर्णमनोरथ" - शुद्ध भाव से की गई हर मनोकामना गणेश जी पूर्ण करते हैं।
प्रश्नोत्तरी (FAQ)