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Parashurama Kruta Durga Stotram – परशुराम कृत दुर्गा स्तोत्र | Brahma Vaivarta Purana

Parashurama Kruta Durga Stotram – परशुराम कृत दुर्गा स्तोत्र | Brahma Vaivarta Purana
॥ श्री दुर्गा स्तोत्रम् (परशुराम कृतम्) ॥ परशुराम उवाच । श्रीकृष्णस्य च गोलोके परिपूर्णतमस्य च । आविर्भूता विग्रहतः पुरा सृष्ट्युन्मुखस्य च ॥ १ ॥ सूर्यकोटिप्रभायुक्ता वस्त्रालङ्कारभूषिता । वह्निशुद्धांशुकाधाना सस्मिता सुमनोहरा ॥ २ ॥ नवयौवनसम्पन्ना सिन्दूरारुण्यशोभिता । ललितं कबरीभारं मालतीमाल्यमण्डितम् ॥ ३ ॥ अहोऽनिर्वचनीया त्वं चारुमूर्तिं च बिभ्रती । मोक्षप्रदा मुमुक्षूणां महाविष्णुर्विधिः स्वयम् ॥ ४ ॥ मुमोह क्षणमात्रेण दृष्ट्वा त्वां सर्वमोहिनीम् । बालैः सम्भूय सहसा सस्मिता धाविता पुरा ॥ ५ ॥ सद्भिः ख्याता तेन राधा मूलप्रकृतिरीश्वरी । कृष्णस्तां सहसा भीतो वीर्याधानं चकार ह ॥ ६ ॥ ततो डिम्भं महज्जज्ञे ततो जातो महाविराट् । यस्यैव लोमकूपेषु ब्रह्माण्डान्यखिलानि च ॥ ७ ॥ राधारतिक्रमेणैव तन्निःश्वासो बभूव ह । स निःश्वासो महावायुः स विराड्विश्वधारकः ॥ ८ ॥ भयधर्मजलेनैव पुप्लुवे विश्वगोलकम् । स विराड्विश्वनिलयो जलराशिर्बभूव ह ॥ ९ ॥ ततस्त्वं पञ्चधा भूय पञ्चमूर्तीश्च बिभ्रती । प्राणाधिष्ठातृमूर्तिर्या कृष्णस्य परमात्मनः ॥ १० ॥ कृष्णप्राणाधिकां राधां तां वदन्ति पुराविदः । वेदाधिष्ठातृमूर्तिर्या वेदाशास्त्रप्रसूरपि ॥ ११ ॥ तां सावित्रीं शुद्धरूपां प्रवदन्ति मनीषिणः । ऐश्वर्याधिष्ठातृमूर्तिः शान्तिस्त्वं शान्तरूपिणी ॥ १२ ॥ लक्ष्मीं वदन्ति सन्तस्तां शुद्धां सत्त्वस्वरूपिणीम् । रागाधिष्ठातृदेवी या शुक्लमूर्तिः सतां प्रसूः ॥ १३ ॥ सरस्वतीं तां शास्त्रज्ञां शास्त्रज्ञाः प्रवदन्त्यहो । बुद्धिर्विद्या सर्वशक्तेर्या मूर्तिरधिदेवता ॥ १४ ॥ सर्वमङ्गलदा सन्तो वदन्ति सर्वमङ्गलाम् । सर्वमङ्गलमङ्गल्या सर्वमङ्गलरूपिणी ॥ १५ ॥ सर्वमङ्गलबीजस्य शिवस्य निलयेऽधुना । शिवे शिवास्वरूपा त्वं लक्ष्मीर्नारायणान्तिके ॥ १६ ॥ सरस्वती च सावित्री वेदसूर्ब्रह्मणः प्रिया । राधा रासेश्वरस्यैव परिपूर्णतमस्य च ॥ १७ ॥ परमानन्दरूपस्य परमानन्दरूपिणी । त्वत्कलांशांशकलया देवानामपि योषितः ॥ १८ ॥ त्वं विद्या योषितः सर्वाः सर्वेषां बीजरूपिणी । छाया सूर्यस्य चन्द्रस्य रोहिणी सर्वमोहिनी ॥ १९ ॥ शची शक्रस्य कामस्य कामिनी रतिरीश्वरी । वरुणानी जलेशस्य वायोः स्त्री प्राणवल्लभा ॥ २० ॥ वह्नेः प्रिया हि स्वाहा च कुबेरस्य च सुन्दरी । यमस्य तु सुशीला च नैरृतस्य च कैटभी ॥ २१ ॥ ऐशानी स्याच्छशिकला शतरूपा मनोः प्रिया । देवहूतिः कर्दमस्य वसिष्ठस्याप्यरुन्धती ॥ २२ ॥ लोपामुद्राऽप्यगस्त्यस्य देवमाताऽदितिस्तथा । अहल्या गौतमस्यापि सर्वाधारा वसुन्धरा ॥ २३ ॥ गङ्गा च तुलसी चापि पृथिव्यां याः सरिद्वरा । एताः सर्वाश्च या ह्यन्या सर्वास्त्वत्कलयाम्बिके ॥ २४ ॥ गृहलक्ष्मीर्गृहे नॄणां राजलक्ष्मीश्च राजसु । तपस्विनां तपस्या त्वं गायत्री ब्राह्मणस्य च ॥ २५ ॥ सतां सत्त्वस्वरूपा त्वमसतां कलहाङ्कुरा । ज्योतिरूपा निर्गुणस्य शक्तिस्त्वं सगुणस्य च ॥ २६ ॥ सूर्ये प्रभास्वरूपा त्वं दाहिका च हुताशने । जले शैत्यस्वरूपा च शोभारूपा निशाकरे ॥ २७ ॥ त्वं भूमौ गन्धरूपा चाप्याकाशे शब्दरूपिणी । क्षुत्पिपासादयस्त्वं च जीविनां सर्वशक्तयः ॥ २८ ॥ सर्वबीजस्वरूपा त्वं संसारे साररूपिणी । स्मृतिर्मेधा च बुद्धिर्वा ज्ञानशक्तिर्विपश्चिताम् ॥ २९ ॥ कृष्णेन विद्या या दत्ता सर्वज्ञानप्रसूः शुभा । शूलिने कृपया सा त्वं यया मृत्युञ्जयः शिवः ॥ ३० ॥ सृष्टिपालनसंहारशक्तयस्त्रिविधाश्च याः । ब्रह्मविष्णुमहेशानां सा त्वमेव नमोऽस्तु ते ॥ ३१ ॥ मधुकैटभभीत्या च त्रस्तो धाता प्रकम्पितः । स्तुत्वा मुक्तश्च यां देवीं तां मूर्ध्ना प्रणमाम्यहम् ॥ ३२ ॥ मधुकैटभयोर्युद्धे त्राताऽसौ विष्णुरीश्वरीम् । बभूव शक्तिमान् स्तुत्वा तां दुर्गां प्रणमाम्यहम् ॥ ३३ ॥ त्रिपुरस्य महायुद्धे सरथे पतिते शिवे । यां तुष्टुवुः सुराः सर्वे तां दुर्गां प्रणमाम्यहम् ॥ ३४ ॥ विष्णुना वृषरूपेण स्वयं शम्भुः समुत्थितः । जघान त्रिपुरं स्तुत्वा तां दुर्गां प्रणमाम्यहम् ॥ ३५ ॥ यदाज्ञया वाति वातः सूर्यस्तपति सन्ततम् । वर्षतीन्द्रो दहत्यग्निस्तां दुर्गां प्रणमाम्यहम् ॥ ३६ ॥ यदाज्ञया हि कालश्च शश्वद्भ्रमति वेगतः । मृत्युश्चरति जन्तूनां तां दुर्गां प्रणमाम्यहम् ॥ ३७ ॥ स्रष्टा सृजति सृष्टिं च पाता पाति यदाज्ञया । संहर्ता संहरेत्काले तां दुर्गां प्रणमाम्यहम् ॥ ३८ ॥ ज्योतिःस्वरूपो भगवान् श्रीकृष्णो निर्गुणः स्वयम् । यया विना न शक्तश्च सृष्टिं कर्तुं नमामि ताम् ॥ ३९ ॥ रक्ष रक्ष जगन्मातरपराधं क्षमस्व मे । शिशूनामपराधेन कुतो माता हि कुप्यति ॥ ४० ॥ इत्युक्त्वा परशुरामश्च नत्वा तां च रुरोद ह । तुष्टा दुर्गा सम्भ्रमेण चाभयं च वरं ददौ ॥ ४१ ॥ अमरो भव हे पुत्र वत्स सुस्थिरतां व्रज । शर्वप्रसादात्सर्वत्र जयोऽस्तु तव सन्ततम् ॥ ४२ ॥ सर्वान्तरात्मा भगवांस्तुष्टः स्यात्सन्ततं हरिः । भक्तिर्भवतु ते कृष्णे शिवदे च शिवे गुरौ ॥ ४३ ॥ इष्टदेवे गुरौ यस्य भक्तिर्भवति शाश्वती । तं हन्तुं न हि शक्ता वा रुष्टा वा सर्वदेवताः ॥ ४४ ॥ श्रीकृष्णस्य च भक्तस्त्वं शिष्यो वै शङ्करस्य च । गुरुपत्नीं स्तौषि यस्मात्कस्त्वां हन्तुमिहेश्वरः ॥ ४५ ॥ अहो न कृष्णभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् । अन्यदेवेषु ये भक्ता न भक्ता वा निरङ्कुशाः ॥ ४६ ॥ चन्द्रमा बलवांस्तुष्टो येषां भाग्यवतां भृगो । तेषां तारागणा रुष्टाः किं कुर्वन्ति च दुर्बलाः ॥ ४७ ॥ यस्मै तुष्टः पालयति नरदेवो महान्सुखी । तस्य किं वा करिष्यन्ति रुष्टा भृत्याश्च दुर्बलाः ॥ ४८ ॥ इत्युक्त्वा पार्वती तुष्टा दत्त्वा रामाय चाशिषम् । जगामान्तःपुरं तूर्णं हरिशब्दो बभूव ह ॥ ४९ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ स्तोत्रं वै काण्वशाखोक्तं पूजाकाले च यः पठेत् । यात्राकाले तथाप्रातर्वाञ्छितार्थं लभेद्ध्रुवम् ॥ ५० ॥ पुत्रार्थी लभते पुत्रं कन्यार्थी कन्यकां लभेत् । विद्यार्थी लभते विद्यां प्रजार्थी चाप्नुयात्प्रजाः ॥ ५१ ॥ भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्यं नष्टवित्तो धनं लभेत् । यस्य रुष्टो गुरुर्देवो राजा वा बान्धवोऽथवा ॥ ५२ ॥ तस्य तुष्टश्च वरदः स्तोत्रराजप्रसादतः । दस्युग्रस्तः फणिग्रस्तः शत्रुग्रस्तो भयानकः ॥ ५३ ॥ व्याधिग्रस्तो भवेन्मुक्तः स्तोत्रस्मरणमात्रतः । राजद्वारे श्मशाने च कारागारे च बन्धने ॥ ५४ ॥ जलराशौ निमग्नश्च मुक्तस्तत् स्मृतिमात्रतः । स्वामिभेदे पुत्रभेदे मित्रभेदे च दारुणे ॥ ५५ ॥ स्तोत्रस्मरणमात्रेण वाञ्छितार्थं लभेद्ध्रुवम् । कृत्वा हविष्यं वर्षं च स्तोत्रराजं शृणोति या ॥ ५६ ॥ भक्त्या दुर्गां च सम्पूज्य महावन्ध्या प्रसूयते । लभते सा दिव्यपुत्रं ज्ञानिनं चिरजीविनम् ॥ ५७ ॥ असौभाग्या च सौभाग्यं षण्मासश्रवणाल्लभेत् । नवमासं काकवन्ध्या मृतवत्सा च भक्तितः ॥ ५८ ॥ स्तोत्रराजं या शृणोति सा पुत्रं लभते ध्रुवम् । कन्यामाता पुत्रहीना पञ्चमासं शृणोति या । घटे सम्पूज्य दुर्गां च सा पुत्रं लभते ध्रुवम् ॥ ५९ ॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे गणपतिखण्डे परशुरामकृतं दुर्गा स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र का पौराणिक संदर्भ

ब्रह्मवैवर्त पुराण में शक्ति की सर्वोच्चता स्थापित की गई है। भगवान परशुराम, जो स्वयं विष्णु के आवेशावतार थे, को भी अपने कार्यों की सिद्धि के लिए 'पराशक्ति' की आवश्यकता पड़ी।

यह स्तोत्र बताता है कि कृष्ण के गोलोक धाम में देवी का प्राकट्य कैसे हुआ (श्लोक 1)। देवी ही राधा हैं, वही सावित्री हैं, वही लक्ष्मी हैं, और वही दुर्गा हैं। सभी देवियाँ उन्हीं के अंश (Parts) हैं। ये स्तोत्र 'अद्वैत' (Oneness) और 'शक्तिवाद' का अद्भुत मिश्रण है।

देवी की सर्वशक्तिमानता

परशुराम जी कहते हैं कि संसार की हर वस्तु में जो 'गुण' है, वह देवी ही हैं:

  • प्रकृति के तत्व: सूर्य में प्रभा (Light), अग्नि में दाहिका शक्ति (Burning Power), जल में शीतलता (Coolness) - सब देवी का ही रूप हैं (श्लोक 27)।

  • मानवीय गुण: बुद्धि, स्मृति, क्षुधा (भूख), और प्यास भी देवी ही हैं।

  • त्रिदेवों की शक्ति: ब्रह्मा की सृष्टि करने की क्षमता, विष्णु का पालन और शिव का संहार - सब देवी की आज्ञा (Command) से ही संभव होता है (श्लोक 38)।

पाठ के चमत्कारी लाभ (फलश्रुति)

1. पूर्ण सुरक्षा (Protection)

'रक्ष रक्ष जगन्मातर...' - जो इसे पढ़ता है, माँ उसकी वैसे ही रक्षा करती हैं जैसे एक माता अपने अबोध बालक की करती है।

2. राजयोग और धन

अगर किसी का राज्य (शक्तियां/अधिकार) छीन लिया गया हो या धन नष्ट हो गया हो, तो इस स्तोत्र के प्रभाव से वह पुनः प्राप्त हो जाता है।

3. पारिवारिक कलह निवारण

'मित्रभेदे च दारुणे' - यदि मित्रों, स्वामी या पुत्र में भयंकर विवाद हो गया हो, तो इसके पाठ से सम्बन्ध सुधर जाते हैं।

4. वंश वृद्धि

यह स्तोत्र संतान गोपाल मंत्र की तरह कार्य करता है। 'काकवन्ध्या' और 'मृतवत्सा' जैसी दोषपूर्ण स्थितियों में भी यह लाभकारी बताया गया है।

5. सर्व बाधा मुक्ति

सांप (फणिग्रस्त), डाकू, बीमारी या बुरी शक्तियों का भय हो - परशुराम जी का यह वज्र कवच भक्त को हर संकट से बचाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. इस स्तोत्र की रचना किसने की?

इसकी रचना भगवान परशुराम (Lord Parashurama) ने की थी। यह 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' के गणपति खंड में नारद-नारायण संवाद के अंतर्गत आता है।

2. परशुराम जी ने दुर्गा की स्तुति क्यों की?

भगवान शिव से अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करने और अपने अभियानों में सफलता (Victory) पाने के लिए उन्होंने शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा की आराधना की। बिना शक्ति के शिव भी 'शव' समान हैं।

3. 'मूलप्रकृति' का क्या अर्थ है?

श्लोक 6 में देवी को 'राधा मूलप्रकृतिरीश्वरी' कहा गया है। वैष्णव तंत्र के अनुसार, दुर्गा और राधा एक ही मूल शक्ति (Original Nature) के दो रूप हैं। दुर्गा बाहरी शक्ति हैं और राधा आंतरिक प्रेम शक्ति।

4. क्या यह स्तोत्र शत्रुओं का नाश करता है?

जी हाँ, श्लोक 53 में स्पष्ट लिखा है 'शत्रुग्रस्तो भयानकः'। यदि कोई शत्रुओं, डाकुओं या कोर्ट केस से घिरा हो, तो यह स्तोत्र उसे अभयदान देता है।

5. संतान प्राप्ति के लिए इसका उपयोग कैसे करें?

फलश्रुति (Phala Shruti) के अनुसार, जो 'वन्ध्या' स्त्री (जिसे संतान न हो रही हो) भक्ति पूर्वक इसका पाठ करती है और दुर्गा पूजा करती है, उसे 'दिव्य पुत्र' की प्राप्ति होती है (श्लोक 57)।

6. क्या इसे यात्रा के समय पढ़ सकते हैं?

श्लोक 50 के अनुसार 'यात्राकाले' - यात्रा के समय इसका पाठ करने से यात्रा निर्विघ्न संपन्न होती है और उद्देश्य सफल होता है।

7. मधु-कैटभ प्रसंग का क्या उल्लेख है?

श्लोक 32-33 में बताया गया है कि जब मधु और कैटभ राक्षसों से ब्रह्माजी डरे हुए थे, तब उन्होंने दुर्गा की स्तुति की, और भगवान विष्णु ने भी शक्ति पाकर ही उन राक्षसों का वध किया।

8. त्रिपुर वध में देवी की क्या भूमिका थी?

जब शिवजी त्रिपुर वध (Tripura Destruction) के दौरान रथ से गिर पड़े थे, तब उन्होंने और देवताओं ने दुर्गा को याद किया। देवी की शक्ति से ही शिव 'त्रिपुरारी' बने।

9. क्या कृष्ण भक्त इसका पाठ कर सकते हैं?

अवश्य! श्लोक 1 में देवी को 'श्रीकृष्णस्य... आविर्भूता' कहा गया है। यह स्तोत्र बताता है कि कृष्ण और दुर्गा में कोई भेद नहीं है। कृष्ण भक्तों के लिए यह विशेष लाभकारी है।

10. खोया हुआ राज्य या धन वापस पाने के लिए क्या करें?

श्लोक 52 के अनुसार 'भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्यं नष्टवित्तो धनं लभेत्' - जिसका पद (Position) या धन छिन गया हो, उसे श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करना चाहिए।

11. पाठ करने का सर्वोत्तम समय क्या है?

पूजा के समय (Morning Puja) या संकट काल में कभी भी इसका पाठ किया जा सकता है। विशेष कामना के लिए 1 वर्ष तक हविष्य (शुद्ध भोजन) करते हुए पाठ का विधान है।

12. क्या जेल से मुक्ति के लिए यह उपयोगी है?

हाँ, श्लोक 54 में 'कारागारे च बन्धने' का उल्लेख है। जो जेल (Prison) या किसी बंधन में फंसा हो, वह इसके स्मरण मात्र से मुक्त हो सकता है।