निजात्माष्टक स्तोत्रम्

निजात्माष्टकस्तोत्रम्
(भुजङ्गप्रयात वृत्तम्)अनेकान्तिकं द्वन्द्वशून्यं विशुद्धं नितान्तं सुशान्तं गुणातीतमेकम् । सदा निष्प्रपञ्चं मनोवागतीतं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम् ॥ १॥ सदा स्वप्रभं दुःखहीनं ह्यमेयं निराकारमत्युज्ज्वलं भेदहीनम् । स्वसंवेद्यमानन्दमाद्यं निरीहं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम् ॥ २॥ अहं प्रत्ययत्वादनेकान्तिकत्वात् अभेदस्वरूपात्स्वतःसिद्धभावात् । अनन्याश्रयत्वात्सदा निष्प्रपञ्चं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम् ॥ ३॥ अहं ब्रह्म भासादि मत्कार्यजातं स्वलक्ष्येऽद्वये स्फूर्तिशून्ये परे च । विलाप्यप्रशान्ते सदैवैकरूपे चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम् ॥ ४॥ अहं ब्रह्मभावो ह्यविद्याकृतत्वाद् विभिन्नात्मकं भोक्तृभोग्यात्मबुध्या । जडं सम्बभूवयि पूंस्स्त्र्यात्मना यत् चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम् ॥ ५॥ अनित्यं जगच्चिद्विवर्तात्मकं यत् विशोध्य यत्स्वतःसिद्धचिन्मात्ररूपम् । विहायाखिलं यन्निजाज्ञानसिद्धं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम् ॥ ६॥ स्वभासा सदा यत्स्वरूपं स्वदीप्तं निजानन्दरूपाद्यदानन्दमात्रम् । स्वरूपानुभूत्या सदा यत्स्वमात्रं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम् ॥ ७॥ जगन्नेति वा खल्विदं ब्रह्मवृत्त्या निजात्मानमेवावशिष्याद्वयं यत् । अभिन्नं सदा निर्विकल्पं प्रशान्तं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम् ॥ ८॥ निजात्माष्टकं ये पठन्तीह भक्ताः सदाचारयुक्ताः स्वनिष्ठाः प्रशान्ताः । भवन्तीह ते ब्रह्म वेदप्रमाणात् तथैवाशिषा निश्चितं मे ॥ ९॥ ॥ इति श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य सद्गुरु भगवता श्रीधरस्वामिविरचितं निजात्माष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और रचयिता
निजात्माष्टक स्तोत्रम् (Nijatmashtaka Stotram) अद्वैत वेदांत का एक अत्यंत प्रभावशाली और दार्शनिक स्तोत्र है। इसकी रचना श्रीमद्भागवत और गीता के प्रसिद्ध टीकाकार, परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीधर स्वामी (Shridhara Swami) ने की है। श्रीधर स्वामी अपनी अनूठी शैली के लिए जाने जाते हैं, जिसमें ज्ञान (Knowledge) और भक्ति (Devotion) का अद्भुत समन्वय होता है। 'निज' का अर्थ है 'अपना' और 'आत्मा' का अर्थ है 'स्वरूप'। यह स्तोत्र हमें हमारे वास्तविक स्वरूप की याद दिलाता है, जो शरीर और मन से परे है।
स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Meaning)
आदि शंकराचार्य के 'निर्वाण षटकम्' की तरह, यह स्तोत्र भी आत्मा के शुद्ध स्वरूप का वर्णन करता है। इसकी प्रत्येक पंक्ति का अंत "चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्" (हम उस स्वरूप का भजन करते हैं जो चेतना और आनंदमय है) से होता है।
- द्वन्द्व शून्य (Beyond Duality): आत्मा सुख-दुःख, लाभ-हानि और मान-अपमान जैसे द्वंद्वों से मुक्त है। वह 'गुणातीत' है, अर्थात सत्व, रज और तम गुणों से परे है।
- स्वयंप्रभ (Self-Luminous): आत्मा को किसी अन्य प्रकाश (सूर्य, चंद्र या बुद्धि) की आवश्यकता नहीं होती। वह स्वयं प्रकाशमान है और उसी के प्रकाश से सब कुछ प्रकाशित होता है।
- भ्रम का निवारण: ५वें श्लोक में कहा गया है कि "अहं ब्रह्मभावो ह्यविद्याकृतत्वाद्" - हम अविद्या के कारण ही स्वयं को शरीर (स्त्री या पुरुष) मानते हैं और भोक्ता (enjoyer) बन जाते हैं। वास्तव में, आत्मा जेंडर और कर्मों से मुक्त है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)
श्रीधर स्वामी ने अंतिम श्लोक में इस स्तोत्र का फल बताया है:
- ब्रह्म भाव की प्राप्ति (Realization of Brahman): "भवन्तीह ते ब्रह्म वेदप्रमाणात्" - जो भक्त सदाचार से युक्त होकर इसका पाठ करते हैं, वे इसी जीवन में ब्रह्म स्वरूप हो जाते हैं। यह वेदों का प्रमाण है।
- आत्मिक शांति (Inner Peace): यह स्तोत्र मन को 'निष्प्रपञ्च' (सांसारिक प्रपंचों से मुक्त) करता है, जिससे साधक को गहरी मानसिक शांति (Prashanta) प्राप्त होती है।
- भय और दुःख का नाश: जब व्यक्ति जान लेता है कि वह नश्वर शरीर नहीं, बल्कि अविनाशी आत्मा है, तो मृत्यु और संसार का भय समाप्त हो जाता है।
पाठ करने की विधि और चिंतन
- यह स्तोत्र कर्मकांड के लिए नहीं, बल्कि मनन (Contemplation) और निदिध्यासन (Meditation) के लिए है।
- प्रातःकाल या संध्या के समय शांत स्थान पर बैठें। आँखें बंद करें और हर श्लोक के अर्थ पर विचार करें।
- स्वयं से प्रश्न पूछें: "क्या मैं यह शरीर हूँ? क्या मैं यह विचार हूँ?" और फिर "चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्" का भाव धारण करें।
- वेदांत के जिज्ञासुओं और मुमुक्षुओं (मोक्ष की इच्छा रखने वालों) के लिए यह नित्य पाठ करने योग्य अमूल्य निधि है।