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नवग्रह स्तोत्रम् (वादिराज यति कृत) - अर्थ, लाभ और विधि

Navagraha Stotram (Vadiraja Kritam)

नवग्रह स्तोत्रम् (वादिराज यति कृत) - अर्थ, लाभ और विधि
भास्वान्मे भासयेत्तत्त्वं चन्द्रश्चाह्लादकृद्भवेत् । मङ्गलो मङ्गलं दद्याद्बुधश्च बुधतां दिशेत् ॥ १ ॥
हिन्दी भावार्थ: भास्वान् (सूर्य देव) मुझे तत्व ज्ञान प्रकाशित करें (दिखाएं), और चन्द्रमा आह्लाद (प्रसन्नता) प्रदान करने वाले हों। मंगल देव मेरा कल्याण (मंगल) करें और बुध देव मुझे बुद्धिमत्ता (ज्ञातृत्व) प्रदान करें।
गुरुर्मे गुरुतां दद्यात्कविश्च कवितां दिशेत् । शनिश्च शं प्रापयतु केतुः केतुं जयेऽर्पयेत् ॥ २ ॥
हिन्दी भावार्थ: गुरू (बृहस्पति) मुझे गुरुता (महानता/श्रेष्ठता) दें, और कवि (शुक्र) मुझे कवित्व (काव्य शक्ति/रचनात्मकता) प्रदान करें। शनि देव मुझे 'शं' (कल्याण/शांति) प्राप्त कराएं और केतु मुझे विजय की पताका (केतु) अर्पित करें।
राहुर्मे रहयेद्रोगं ग्रहाः सन्तु करग्रहाः । नवं नवं ममैश्वर्यं दिशन्त्वेते नवग्रहाः ॥ ३ ॥
हिन्दी भावार्थ: राहु मेरे रोगों को दूर करें (त्याग दें)। सभी ग्रह मेरे लिए सहायक (हाथ पकड़ने वाले/करग्रह) बनें। ये नवग्रह मुझे नित्य नया-नया (नवं-नवं) ऐश्वर्य प्रदान करें।
शने दिनमणेः सूनो ह्यनेकगुणसन्मणे । अरिष्टं हर मेऽभीष्टं कुरु मा कुरु सङ्कटम् ॥ ४ ॥
हिन्दी भावार्थ: हे शनिदेव! हे सूर्यपुत्र (दिनमणेः सूनो)! हे अनेक सद्गुणों से युक्त मणि स्वरूप! आप मेरे अरिष्ट (कष्टों) का हरण करें, मेरी अभीष्ट (इच्छा) पूरी करें, और मुझे कोई संकट न दें।
हरेरनुग्रहार्थाय शत्रूणां निग्रहाय च । वादिराजयतिप्रोक्तं ग्रहस्तोत्रं सदा पठेत् ॥ ५ ॥
हिन्दी भावार्थ: श्री हरि (भगवान विष्णु) की कृपा प्राप्ति के लिए और शत्रुओं के दमन (निग्रह) के लिए, यति वादिराज द्वारा रचित इस ग्रह स्तोत्र का सदा पाठ करना चाहिए।
॥ इति श्रीवादिराजयति विरचितं नवग्रह स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: नवग्रह स्तोत्र (वादिराज कृत)

Navagraha Stotram (Vadiraja Krutam) एक लघु और अत्यंत चमत्कारी स्तोत्र है। इसकी रचना श्री वादिराज तीर्थ (1480–1600 CE) ने की थी, जो द्वैत वेदांत परंपरा के एक महान संत और कवि थे। व्यास कृत नवग्रह स्तोत्र की तरह यह लंबा नहीं है, बल्कि केवल 5 श्लोकों में ही सभी ग्रहों और भगवान की स्तुति को समेटे हुए है। इसकी भाषा अत्यंत सरल और गेय (गाने योग्य) है।

स्तोत्र के लाभ (Benefits)

  • समग्र विकास: इसमें सूर्य से ज्ञान, चंद्र से खुशी, मंगल से कल्याण, बुध से बुद्धि, गुरु से श्रेष्ठता, शुक्र से कला, शनि से शांति और केतु से विजय की प्रार्थना है। यह जीवन के हर क्षेत्र को कवर करता है।

  • रोग निवारण: राहु के श्लोक में विशेष रूप से रोग दूर करने की विनती की गई है।

  • शनि पीड़ा शांति: शनि देव के लिए अलग से श्लोक होने के कारण यह शनि दोष निवारण में भी बहुत प्रभावी है।

  • शत्रु विजय: फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है कि यह 'शत्रूणां निग्रहाय' (शत्रुओं के दमन) के लिए है।

पाठ विधि (Vidhi)

  • प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र पहनें।

  • भगवान विष्णु या नवग्रहों के चित्र के सामने दीपक जलाएं। वादिराज यति वैष्णव संत थे, अतः भगवान विष्णु/कृष्ण का स्मरण करके पाठ शुरू करना उत्तम है।

  • भक्ति भाव से इन 5 श्लोकों का पाठ करें।

  • अंत में आरती करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. वादिराज कृत नवग्रह स्तोत्र की क्या विशेषता है?

यह स्तोत्र बहुत ही संक्षिप्त (केवल 5 मुख्य श्लोक) और सरल है। इसमें प्रत्येक ग्रह से विशिष्ट फलों (जैसे सूर्य से तत्व-ज्ञान, चंद्र से आह्लाद/खुशी) की प्रार्थना की गई है।

2. इस स्तोत्र की रचना किसने की?

इसकी रचना 16वीं शताब्दी के महान द्वैत दार्शनिक और संत श्री वादिराज तीर्थ (Sri Vadiraja Tirtha) ने की थी।

3. नवग्रह स्तोत्र (वादिराज) का पाठ कब करना चाहिए?

इसका पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल (सुबह) करना उत्तम माना जाता है।

4. राहु से इस स्तोत्र में क्या प्रार्थना की गई है?

'राहुर्मे रहयेद्रोगं' - अर्थात राहु मेरे रोगों को दूर (रहयेत्) करें या त्याग दें। यहाँ राहु से स्वास्थ्य की रक्षा की कामना की गई है।

5. शनि देव के लिए इसमें कौन सा विशेष श्लोक है?

इसमें शनि देव के लिए एक अलग विशेष श्लोक है - "शने दिनमणेः सूनो ह्यनेकगुणसन्मणे", जिसमें उनसे अरिष्ट (कष्ट) हरने और अभीष्ट (मनोकामना) पूर्ण करने की प्रार्थना है।