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नवदुर्गा स्तोत्रम्

नवदुर्गा स्तोत्रम्

नवदुर्गास्तोत्रम्

सच्चित्कला भगवती प्रथमं सुसूक्ष्मा विद्योतते सुकृतिनां हृदये पराख्या । भर्गाख्यया सवितृमण्डलमध्यसस्था सा बुद्धिचोदनपरा भवतु वरेण्या ॥ १॥
ध्यायन्ति यां सहृदया हृदये प्रभाते गायन्ति यां सुकवयो ललितैर्वचोभिः । यां योगिनः सुहृदये परिशीलयन्ति तां मोक्षदां भगवतीं शरणं प्रपद्ये ॥ २॥
शैलात्मजा कमलभूषितहंसयाना दुर्गा च दुर्गतिहरा भवनौ सुतारा । नारायणेन सुकृतैः स्मृतनामधेया विघ्नान्निवारयतु द्वादशषड् भुजाढ्या ॥ ३॥
हे वासुदेवसहजे प्रतार्तिहर्त्रि । हे नन्दगोपजयदे वसुदेवनीते । हे कंसराजदलिनि श्रितव्योममार्गे देवैस्तुते भगवति वरदे नमोऽस्तु ॥ ४॥
श्रीनीलकण्ठस्य हृतार्धकाया पद्मे सहस्रे धृतपद्मपादा । योगीन्द्रवर्यैर्विहितप्रणामा शैलात्मजा विन्ध्यनिवासिनी सा ॥ ५॥
पूर्णेन्दुवक्त्रा शरदिन्दुशुभ्रा भोगेन्द्रहारा नवद्विभुजाढ्या । सिंहाधिरूढा सुविशालनेत्रा सा शैलपुत्री भवतु प्रसन्ना ॥ ६॥
या षट्सरोजे च कृताधिवासा तारं जपन्ती प्रणवं प्रमोदात् । सार्धत्रिवृत्या च समुल्लसन्ती सा वेदमाता भवतु प्रसन्ना ॥ ७॥
या चन्द्रभाला कमलासने स्वे विन्यस्य पादौ धृतकोणहस्ता । कुक्षौ दधाना च सुशुभ्रवीणा सा शारदा नो वरदा सदास्तु ॥ ८॥
कुमारमाता द्विरदाननार्चिता शब्दात्मिका गद्यपदैरुदीरिता । उद्गीथबीजा प्रणवस्वरूपिणी सा पद्महस्ता भवतु प्रसन्ना ॥ ९॥
(१) गायत्री (२) मोक्षदा (३) दुर्गा (४) वरदा (५) विन्ध्यवासिनी (६) शैलजा (७) वेदमाता (८) शारदा (९) पद्मधारिणी ॥ १०॥
नवद्वारमये हर्म्ये गीयतेऽहर्निशं बुधैः । हंसीवहंस सहगा खेचरी खगगामिनी ॥ ११॥
मूलाधाराद्विधेरन्ध्रं प्राप्य सहस्रदले स्थिताः । नवभिर्गीयते पद्यैर्नवदुर्गा भयापहा ॥ १२॥
॥ इति श्रीजगन्नाथ रविशास्त्रीविरचितं नवदुर्गास्तोत्रं समाप्तम् ॥

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और रचयिता

नवदुर्गा स्तोत्रम् (Navadurga Stotram) की रचना विद्वान श्री जगन्नाथ रविशास्त्री (Shri Jagannatha Ravi Shastri) द्वारा की गई है। यह स्तोत्र दुर्गा सप्तशती में वर्णित नवदुर्गा (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी आदि) की सूची से थोड़ा भिन्न और विशिष्ट है। इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह देवी को न केवल शक्ति के रूप में, बल्कि ज्ञान (वेदमाता), मोक्ष (मोक्षदा) और कला (शारदा) के संगम के रूप में प्रस्तुत करता है। यह स्तोत्र साधक के भीतर दबी हुई चेतना (Consciousness) को जागृत करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।

स्तोत्र में वर्णित देवी के ९ विशिष्ट रूप

कवि ने १०वें श्लोक में स्पष्ट रूप से उन ९ नामों का उल्लेख किया है, जिनकी स्तुति इस स्तोत्र में की गई है:
  • १. गायत्री (Gayatri): बुद्धि और वेद की अधिष्ठात्री।
  • २. मोक्षदा (Mokshada): मोक्ष प्रदान करने वाली।
  • ३. दुर्गा (Durga): दुर्गति और संकटों का नाश करने वाली।
  • ४. वरदा (Varada): मनोवांछित वर देने वाली।
  • ५. विन्ध्यवासिनी (Vindhyavasini): विन्ध्य पर्वत पर निवास करने वाली शक्ति।
  • ६. शैलजा (Shailaja): पर्वतराज हिमालय की पुत्री (पार्वती)।
  • ७. वेदमाता (Vedamata): ज्ञान और वेदों की जननी।
  • ८. शारदा (Sharada): विद्या और कला की देवी (सरस्वती)।
  • ९. पद्मधारिणी (Padmadharini): कमल धारण करने वाली (लक्ष्मी स्वरूप)।

आध्यात्मिक और कुण्डलिनी विज्ञान

इस स्तोत्र का अंतिम भाग (श्लोक ११-१२) कुण्डलिनी योग (Kundalini Yoga) से गहरा संबंध रखता है। इसमें कहा गया है कि देवी "मूलाधाराद्विधेरन्ध्रं" (मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र तक) व्याप्त हैं।
  • हंसीवहंस सहगा: देवी को प्राण शक्ति (Hamsa) के रूप में वर्णित किया गया है जो हमारे श्वास-प्रश्वास में स्थित है।
  • खेचरी (Khechari): वे आकाश में विचरण करने वाली शक्ति हैं, जो सहस्रार चक्र (Sahasrara Chakra) में शिव से मिलन करती हैं।
  • बुद्धिचोदनपरा: प्रथम श्लोक में उन्हें गायत्री मंत्र के "धियो यो नः प्रचोदयात्" की तरह बुद्धि को प्रेरित करने वाली (Stimulator of Intellect) कहा गया है।

फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र के नियमित पाठ से साधक को बहुमुखी लाभ प्राप्त होते हैं:
  • भय और विघ्न नाश (Removal of Fear & Obstacles): अंतिम श्लोक में देवी को "भयापहा" (भय को दूर करने वाली) कहा गया है। यह अज्ञात भय और जीवन की बाधाओं को नष्ट करता है।
  • मोक्ष और मुक्ति (Liberation): दूसरे श्लोक में "तां मोक्षदां भगवतीं" कहकर यह बताया गया है कि यह स्तोत्र जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाने में सक्षम है।
  • कृष्ण भक्ति और सुरक्षा: चौथे श्लोक में देवी को "वासुदेवसहजे" (कृष्ण की बहन) और "कंसराजदलिनि" (कंस का नाश करने वाली) कहा गया है, जो भक्तों को शत्रुओं से सुरक्षा प्रदान करती हैं।

पाठ करने की विधि और शुभ समय

  • नवरात्रि (Navratri): आश्विन और चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों में इस स्तोत्र का पाठ सर्वश्रेष्ठ फलदायी है।
  • नित्य पाठ: प्रतिदिन प्रातःकाल "संध्या वंदन" के समय या पूजा के बाद इसका पाठ किया जा सकता है।
  • देवी की मूर्ति या यंत्र के सामने घी का दीपक जलाकर, पूर्ण पवित्रता के साथ इसका उच्चारण करें।