महोग्रताराष्टक स्तोत्रम् (बौद्ध परम्परा)

॥ श्रीमहोग्रताराष्टकस्तोत्रम् ॥
मातर्नीलसरस्वति प्रणमतां सौभाग्यसम्पत्प्रदे प्रत्यालीढपदस्थिते शवहृदि स्मेराननाम्भोरुहे । फुल्लेन्दीवरलोचनत्रययुते कर्तीकपालोत्पले खङ्गं चादधती त्वमेव शरणं त्वामीश्वरीमाश्रये ॥ १॥ वाचामीश्वरि भक्तकल्पलतिके सर्वार्थसिद्धीश्वरि सद्यः प्राकृतगद्यपद्यरचनासर्वार्थसिद्धिप्रदे । नीलेन्दीवरलोचनत्रययुते कारुण्यवारान्निधे सौभाग्यामृतवर्षणेन कृपया सिञ्च त्वमस्मादृशम् ॥ २॥ खर्वे गर्वसमहपूरिततनो सर्पादिभूषोज्ज्वले व्याघ्रत्वक्परिवीतसुन्दरकटिव्याधूतघण्टाङ्किते । सद्यःकृत्तगलद्रजः परिलसन्मुण्डद्वयीमूर्धज- ग्रन्थिश्रेणिनृमुण्डदामललिते भीमे भयं नाशय ॥ ३॥ मायानङ्गविकाररूपललनाबिन्द्वर्धचन्द्रात्मिके हुम्फङ्कारमयि त्वमेव शरणं मन्त्रात्मिके मादृशः । मूर्तिस्ते जननि त्रिधामघटिता स्थूलातिसूक्ष्मा परा वेदनां नहि गोचरा कथमपि प्राप्तां नु तामाश्रये ॥ ४॥ त्वत्पादाम्बुजसेवया सुकृतिनो गच्छन्ति सायुज्यतां तस्य श्रीपरमेश्वरी त्रिनयनब्रह्मादिसौम्यात्मनः । संसाराम्बुधिमज्जने पटुतनून् देवेन्द्रमुख्यान् सुरान् मातस्त्वत्पदसेवने हि विमुखान् को मन्दधीः सेवते ॥ ५॥ मातस्त्वत्पदपङ्कजद्वयरजोमुद्राङ्ककोटीरिण- स्ते देवासुरसङ्गरे विजयिनो निःशङ्कमङ्के गताः । देवोऽहं भुवने न मे सम इति स्पर्द्धा वहन्तः परे तत्तुल्या नियतं तथा चिरममी नाशं व्रजन्ति स्वयम् ॥ ६॥ त्वन्नामस्मरणात् पलायनपरा द्रष्टुं च शक्ता न ते भूतप्रेतपिशाचराक्षसगणा यक्षाश्च नागाधिपाः । दैत्या दानवपुङ्गवाश्च खचरा व्याघ्रादिका जन्तवो डाकिन्यः कुपितान्तकाश्च मनुजा मातः क्षणं भूतले ॥ ७॥ लक्ष्मीः सिद्धगणाश्च पादुकमुखाः सिद्धास्तथा वारिणां स्तम्भश्चापि रणाङ्गणे गजघटास्तम्भस्तथा मोहनम् । मातस्त्वत्पदसेवया खलु नृणां सिध्यन्ति ते ते गुणाः कान्तिः कान्ततरा भवेच्च महती मूढोऽपि वाचस्पतिः ॥ ८॥फलश्रुतिः
ताराष्टकमिदं रम्यं भक्तिमान् यः पठेन्नरः । प्रातर्मध्याह्नकाले च सायाह्ने नियतः शुचिः ॥ ९॥ लभते कवितां दिव्यां सर्वशास्त्रार्थविद् भवेत् । लक्ष्मीमनश्वरां प्राप्य भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान् ॥ १०॥ कीर्ति कान्तिं च नैरुज्यं सर्वेषां प्रियतां व्रजेत् । विख्यातिं चैव लोकेषु प्राप्यान्ते मोक्षमाप्नुयात् ॥ ११॥ ॥ इति श्रीमहोग्रताराष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥संलिखित ग्रंथ पढ़ें
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance & Importance)
महोग्रताराष्टक स्तोत्रम् वज्रयान बौद्ध परम्परा में देवी तारा के एक अत्यंत उग्र और शक्तिशाली स्वरूप, महोग्रतारा, को समर्पित एक अष्टकम् है। उन्हें नीला सरस्वती (Nila Saraswati) या एकजाटी के नाम से भी जाना जाता है। इस स्तोत्र का महत्व इसकी तांत्रिक प्रकृति में निहित है, जहाँ देवी का स्वरूप सौम्य नहीं, बल्कि क्रोधपूर्ण है। यह क्रोध अज्ञान, अहंकार, और साधना के मार्ग में आने वाली बाधाओं को तत्काल नष्ट करने वाली करुणा का प्रतीक है। स्तोत्र की पहली पंक्ति "मातर्नीलसरस्वति" उन्हें ज्ञान और कला की देवी सरस्वती का नीला, उग्र रूप बताती है, जो साधक को तुरंत प्राकृत गद्य-पद्य रचने की क्षमता (
वाचस्पति) प्रदान करती हैं। यह स्तोत्र भौतिक समृद्धि (सौभाग्यसम्पत्प्रदे) और आध्यात्मिक मोक्ष (अन्ते मोक्षमाप्नुयात्), दोनों को प्रदान करने वाला माना जाता है।पौराणिक कथा और संदर्भ (Mythological Story and Context)
महोग्रतारा की उपासना का संबंध 'महाचीनक्रम' (तिब्बत/चीन से आई परम्परा) से जोड़ा जाता है। कथा के अनुसार, महान ऋषि वशिष्ठ ने देवी तारा को प्रसन्न करने के लिए वर्षों तक वैदिक रीति से तपस्या की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। तब उन्हें आकाशवाणी द्वारा या स्वयं भगवान विष्णु/बुद्ध द्वारा निर्देश मिला कि वे 'महाचीन' देश जाकर इस देवी की उपासना की सही 'कौल' विधि सीखें। वहाँ उन्हें पता चला कि देवी की उपासना पंचमकारों (तांत्रिक विधि) से की जाती है। इस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद जब वशिष्ठ ने उपासना की, तो देवी तुरंत प्रसन्न हो गईं। यह कथा इस स्वरूप की तांत्रिक जड़ों को दर्शाती है। स्तोत्र में वर्णित उनका स्वरूप—शव के हृदय पर खड़ी (
शवहृदि), हाथ में कर्त्री (कटार), कपाल (खोपड़ी) और खड्ग, बाघ की खाल पहने (व्याघ्रत्वक्परिवीत)—उनके इसी उग्र, श्मशान-वासी और तांत्रिक स्वरूप का प्रतीक है जो अहंकार (शव) का दमन कर ज्ञान प्रदान करता है।स्तोत्र का गूढ़ भावार्थ (Deep Devotional Meaning)
यह अष्टकम् देवी के गहन प्रतीकात्मक स्वरूप की व्याख्या करता है:
- नीला सरस्वती (Blue Saraswati): नीला रंग आकाश और शून्यता का प्रतीक है, जो परम ज्ञान को दर्शाता है। वे सरस्वती की तरह ज्ञान देती हैं, लेकिन उनका मार्ग शांत नहीं, बल्कि तीव्र और रूपांतरकारी (transformative) है।
- शव पर स्थिति (Standing on a Corpse): शव अहंकार, जड़ता और सांसारिक चेतना का प्रतीक है। देवी का उस पर खड़ा होना यह दर्शाता है कि जब तक अहंकार को कुचला नहीं जाता, तब तक सच्ची आध्यात्मिक शक्ति और ज्ञान का उदय नहीं हो सकता।
- हुम् फट् कारमयि (Embodiment of HUM PHAT Mantras): उनका स्वरूप 'हुं' और 'फट्' जैसे शक्तिशाली तांत्रिक बीज मंत्रों से बना है। ये मंत्र बाधाओं, नकारात्मक ऊर्जा (negative energy) और अज्ञान को बलपूर्वक नष्ट करने के लिए प्रयोग होते हैं।
- स्थूलातिसूक्ष्मा परा (Gross, Subtle, and Transcendent): "मूर्तिस्ते जननि त्रिधामघटिता" - हे माँ, आपकी मूर्ति स्थूल (भौतिक), सूक्ष्म (मानसिक) और पर (आध्यात्मिक), इन तीनों स्तरों पर विद्यमान है। यह उनके सर्वव्यापी और परम सत्य होने का प्रमाण है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Actual Benefits)
स्तोत्र के अंतिम श्लोकों (९-११) में इसके पाठ से प्राप्त होने वाले विशिष्ट लाभों का वर्णन है:
- वाक्-सिद्धि और ज्ञान (Eloquence and Knowledge): "लभते कवितां दिव्यां सर्वशास्त्रार्थविद् भवेत्" - भक्त दिव्य काव्य रचने की क्षमता प्राप्त करता है और सभी शास्त्रों का ज्ञाता बन जाता है। एक मूर्ख व्यक्ति भी
वाचस्पति(बृहस्पति के समान विद्वान) बन सकता है। - अक्षय लक्ष्मी और भोग (Eternal Wealth and Enjoyment): "लक्ष्मीमनश्वरां प्राप्य भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान्" - साधक को कभी नष्ट न होने वाली संपत्ति मिलती है और वह अपनी इच्छा के अनुसार भोगों का उपभोग करता है।
- सर्वत्र विजय और सुरक्षा (Victory and Protection Everywhere): उनके नाम के स्मरण मात्र से भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस, यक्ष, नाग, दैत्य और हिंसक जानवर भी भाग जाते हैं (
पलायनपरा)| युद्ध में देवता भी उनके भक्तों से पराजित हो जाते हैं। - अच्छा स्वास्थ्य, कीर्ति और मोक्ष (Health, Fame, and Liberation): पाठक को कीर्ति, शारीरिक कांति, अच्छा स्वास्थ्य (
नैरुज्यं) और सर्वप्रियता प्राप्त होती है। अंत में, वह लोक में प्रसिद्धि पाकर मोक्ष को प्राप्त करता है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय (How to Recite for Best Results)
- फलश्रुति के अनुसार, इस स्तोत्र का पाठ भक्तिपूर्वक और पवित्र (
शुचिः) होकर दिन में तीन बार—सुबह, दोपहर और शाम (प्रातर्मध्याह्नकाले च सायाह्ने)—करना चाहिए। - यह एक तांत्रिक स्तोत्र है, इसलिए इसे एकांत स्थान पर, मन को एकाग्र करके और देवी के उग्र स्वरूप का ध्यान करते हुए पढ़ना चाहिए।
- अमावस्या, पूर्णिमा, मंगलवार या शनिवार के दिन इसका पाठ विशेष रूप से प्रभावी माना जाता है।
- जो लोग रचनात्मक कार्यों, जैसे लेखन, संगीत या कला से जुड़े हैं, उनके लिए यह स्तोत्र 'नीला सरस्वती' के रूप में विशेष फलदायी है।
- गंभीर संकट, शत्रु भय या किसी भी प्रकार की नकारात्मक बाधा से मुक्ति पाने के लिए इसका पाठ एक शक्तिशाली उपाय है।