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Heramba Upanishad - The Secret Revelation

Heramba Upanishad

Heramba Upanishad - The Secret Revelation
॥ हेरंबोपनिषत् ॥ ओं सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ अथातो हेरंबोपनिषदं व्याख्यास्यामः । गौरी सा सर्वमङ्गला सर्वज्ञं परिसमेत्योवाच । अधीहि भगवन्नात्मविद्यां प्रशस्तां यया जन्तुर्मुच्यते मायया च । यतो दुःखाद्विमुक्तो याति लोकं परं शुभ्रं केवलं सात्त्विकं च ॥ १ ॥ तां वै स होवाच महानुकम्पासिन्धुर्बन्धुभुवनस्य गोप्ता । श्रद्धस्वैतद्गौरी सर्वात्मना त्वं मा ते भूयः संशयोऽस्मिन् कदाचित् ॥ २ ॥ हेरंबतत्त्वे परमात्मसारे नो वै योगान्नैव तपोबलेन । नैवायुधप्रभावतो महेशि दग्धं पुरा त्रिपुरं दैवयोगात् ॥ ३ ॥ तस्यापि हेरंबगुरोः प्रसादाद्यथा विरिञ्चिर्गरुडो मुकुन्दः । देवस्य यस्यैव बलेन भूयः स्वं स्वं हितं प्राप्य सुखेन सर्वम् ॥ ४ ॥ मोदन्ते स्वे स्वे पदे पुण्यलब्धे सवैर्देवैः पूजनीयो गणेशः । प्रभुः प्रभूणामपि विघ्नराजः सिन्दूरवर्णः पुरुषः पुराणः ॥ ५ ॥ लक्ष्मीसहायोऽद्वयकुञ्जराकृतिश्चतुर्भुजश्चन्द्रकलाकलापः । मायाशरीरो मधुरस्वभावस्तस्य ध्यानात् पूजनात्तत्स्वभावाः ॥ ६ ॥ संसारपारं मुनयोऽपि यान्ति स वा ब्रह्मा स प्रजेशो हरिः सः । इन्द्रः स चन्द्रः परमः परात्मा स एव सर्वो भुवनस्य साक्षी ॥ ७ ॥ स सर्वलोकस्य शुभाशुभस्य तं वै ज्ञात्वा मृत्युमत्येति जन्तुः । नान्यः पन्था दुःखविमुक्तिहेतुः सर्वेषु भूतेषु गणेशमेकम् ॥ ८ ॥ विज्ञाय तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते स एवमास्थाय शरीरमेकम् । मायामयं मोहयतीव सर्वं स प्रत्यहं कुरुते कर्मकाले ॥ ९ ॥ स एव कर्माणि करोति देवो ह्येको गणेशो बहुधा निविष्टः । स पूजितः सन् सुमुखोऽभिभूत्वा दन्तीमुखोऽभीष्टमनन्तशक्तिः ॥ १० ॥ स वै बलं बलिनामग्रगण्यः पुण्यः शरण्यः सकलस्य जन्तोः । तमेकदन्तं गजवक्त्रमीशं विज्ञाय दुःखान्तमुपैति सद्यः ॥ ११ ॥ लंबोदरोऽहं पुरुषोत्तमोऽहं विघ्नान्तकोऽहं विजयात्मकोऽहम् । नागाननोऽहं नमतां सुसिद्धः स्कन्दाग्रगण्यो निखिलोऽहमस्मि ॥ १२ ॥ न मेऽन्तरायो न च कर्मलोपो न पुण्यपापे मम तन्मयस्य । एवं विदित्वा गणनाथतत्त्वं निरन्तरायं निजबोधबीजम् ॥ १३ ॥ क्षेमङ्करं सन्ततसौख्यहेतुं प्रयान्ति शुद्धं गणनाथतत्त्वम् । विद्यामिमां प्राप्य गौरी महेशादभीष्टसिद्धिं समवाप सद्यः । पूज्या परा सा च जजाप मन्त्रं शंभुं पतिं प्राप्य मुदं ह्यवाप ॥ १४ ॥ य इमां हेरंबोपनिषदमधीते स सर्वान् कामान् लभते । स सर्वपापैर्मुक्तो भवति । स सर्वैर्वेदैर्ज्ञातो भवति । स सर्वैर्देवैः पूजितो भवति । स सर्ववेदपारायणफलं लभते । स गणेशसायुज्यमवाप्नोति य एवं वेद । इत्युपनिषत् । ओं सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ॥ इत्युपनिषत् ॥

शिव-गौरी संवाद: एक परिचय (Introduction)

हेरंबोपनिषत् (Heramba Upanishad) अथर्ववेदीय परंपरा का एक दुर्लभ और रहस्यमयी ग्रंथ है। यह उपनिषद एक संवाद के रूप में है जहाँ माता गौरी (पार्वती) भगवान शिव से उस "आत्मविद्या" की जिज्ञासा करती हैं जिससे जीव माया और दुःख से मुक्त हो सके।
उत्तर में, करुणामय शिव उन्हें "हेरंब तत्त्व" का उपदेश देते हैं। "हेरंब" शब्द का अर्थ अत्यंत गहरा है: 'हे' (दीन/असहाय) + 'रंब' (पालक/रक्षक)। अर्थात, वह जो दीनों और असहायों के एकमात्र रक्षक हैं, वही हेरंब (गणेश) हैं।

त्रिपुर दहन और गणेश कृपा (Significance)

इस उपनिषद का सबसे क्रांतिकारी पहलू स्वयं भगवान शिव का एक स्वीकारोक्ति है। शिव स्पष्ट रूप से कहते हैं कि उन्होंने अभेद्य त्रिपुर (तीन असुर नगरों) का नाश अपने योग बल या अस्त्रों से नहीं, बल्कि हेरंब की कृपा (Daiva Yoga by Heramba) से किया था।
"नैवायुधप्रभावतो महेशि दग्धं पुरा त्रिपुरं दैवयोगात्"
- हेरंबोपनिषत् (श्लोक ३)
यह स्थापित करता है कि ब्रह्मा (सृजन), विष्णु (पालन), और शिव (संहार) - त्रिदेवों की शक्ति का मूल स्रोत स्वयं गणेश (हेरंब) ही हैं।

साधना और फलश्रुति (Benefits)

उपनिषद के अंत में इस विद्या के पाठ और "हेरंब तत्त्व" को जानने के फल बताए गए हैं:
  • सर्व कामना सिद्धि: साधक की सभी भौतिक और आध्यात्मिक इच्छाएं पूर्ण होती हैं (Abhishta Siddhi)।
  • पाप नाश: यह अग्नि की तरह समस्त संचित पापों को जला देता है।
  • गणेश सायुज्य (Moksha): अंत में, साधक जन्म-मृत्यु के चक्र से छूटकर गणेश जी के धाम में एकीभाव (Sayujya) प्राप्त करता है।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

हेरंबोपनिषत् (Heramba Upanishad) का मुख्य विषय क्या है?

यह अथर्ववेद से जुड़ा उपनिषद है जिसमें शिव और गौरी का संवाद है। इसमें शिव बताते हैं कि गणेश (हेरंब) ही परब्रह्म हैं और उन्हीं की शक्ति से त्रिदेव अपना कार्य करते हैं।

"हेरंब" (Heramba) शब्द का अर्थ क्या है?

'हे' का अर्थ है 'दीन/असहाय' और 'रंब' का अर्थ है 'रक्षक'। अतः हेरंब का अर्थ है "दीनों का रक्षक" (Protector of the Weak)। यह गणेश जी का करुणा अवतार है।

त्रिपुर दहन (Tripura Dahana) का इस ग्रंथ में क्या संदर्भ है?

श्लोक 3 में भगवान शिव स्वीकार करते हैं कि उन्होंने त्रिपुर (असुरों के तीन नगर) को अपने बल से नहीं, बल्कि हेरंब (गणेश) की कृपा से ही भस्म किया था। यह गणेश जी की सर्वोच्चता दर्शाता है।

क्या यह उपनिषद अद्वैत (Advaita) दर्शन का है?

हाँ, यह पूर्णतः अद्वैतवादी है। यह सिखाता है कि "मैं ही वह हेरंब हूँ" (So'ham)। जो इस अभेद तत्त्व को जानता है, वह आत्मज्ञानी होकर मुक्त हो जाता है।

इस पाठ से कौन से लाभ (Benefits) मिलते हैं?

इसके पाठ से साधक पाप मुक्त होता है, उसे अभीष्ट सिद्धि (मनोवांछित फल) मिलती है, और अंत में वह गणेश सायुज्य (मोक्ष) प्राप्त करता है।

हेरंब गणेश का स्वरूप कैसा वर्णित है?

उन्हें चतुर्भुज, चंद्रकला धारी (सिर पर चंद्रमा), और सिंदूर वर्ण (लाल रंग) वाला बताया गया है। वे लक्ष्मी सहाय (लक्ष्मी के साथ) और पुरुषोत्तम हैं।

इस उपनिषद के ऋषि या गुरु कौन हैं?

स्वयं भगवान शिव (सदाशिव) इसके गुरु हैं जो जगन्माता गौरी को यह परम रहस्य प्रदान कर रहे हैं।

जीव मृत्यु (Death) को कैसे जीत सकता है?

श्लोक 8-9 के अनुसार, जो यह जान लेता है कि गणेश ही समस्त भूतों "के साक्षी और आत्मा" हैं, वह मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है।

क्या इसमें कोई विशेष मंत्र है?

हाँ, अंत में उल्लेख है कि माता गौरी ने इस विद्या को प्राप्त कर जिस मंत्र का जप किया, उससे उन्होंने "शंभु" (शिव) को पति रूप में प्राप्त किया।

किसे "विघ्नराज" (Vighnaraja) कहा गया है?

गणेश जी को विघ्नराज कहा गया है क्योंकि वे देवताओं के कार्यों में भी विघ्न डाल सकते हैं और हटा भी सकते हैं। उनकी कृपा के बिना कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता।