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हेरम्ब स्तोत्रम् (Heramba Stotram)

Heramba Stotram (Gauri's Prayer for Protection)

हेरम्ब स्तोत्रम् (Heramba Stotram)
॥ हेरम्ब स्तोत्रम् ॥ गौर्युवाच । गजानन ज्ञानविहारकानि- -न्न मां च जानासि परावमर्षाम् । गणेश रक्षस्व न चेच्छरीरं त्याजामि सद्यस्त्वयि भक्तियुक्ता ॥ १ ॥ विघ्नेश हेरम्ब महोदर प्रिय लम्बोदर प्रेमविवर्धनाच्युत । विघ्नस्य हर्ताऽसुरसङ्घहर्ता मां रक्ष दैत्यात्त्वयि भक्तियुक्ताम् ॥ २ ॥ किं सिद्धिबुद्धिप्रसरेण मोह- -युक्तोऽसि किं वा निशि निद्रितोऽसि । किं लक्षलाभार्थविचारयुक्तः किं मां च विस्मृत्य सुसंस्थितोऽसि ॥ ३ ॥ किं भक्तसङ्गेन च देवदेव नानोपचारैश्च सुयन्त्रितोऽसि । किं मोदकार्थे गणपाद्भृतोऽसि नानाविहारेषु च वक्रतुण्ड ॥ ४ ॥ स्वानन्दभोगेषु परिहृतोऽसि दासीं च विस्मृत्य महानुभाव । आनन्त्यलीलासु च लालसोऽसि किं भक्तरक्षार्थसुसङ्कटस्थः ॥ ५ ॥ अहो गणेशामृतपानदक्षा- -मरैस्तथा वासुरपैः स्मृतोऽसि । तदर्थनानाविधिसम्युतोऽसि विसृज्य मां दासीमनन्यभावाम् ॥ ६ ॥ रक्षस्व मां दीनतमा परेश सर्वत्र चित्तेषु च संस्थितस्त्वम् । प्रभो विलम्बेन विनायकोऽसि ब्रह्मेश किं देव नमो नमस्ते ॥ ७ ॥ भक्ताभिमानीति च नाम मुख्यं वेदे त्वभावान् नहि चेन्महात्मन् । आगत्य हत्वाऽदितिजं सुरेश मां रक्ष दासीं हृदि पादनिष्ठाम् ॥ ८ ॥ अहो न दूरं तव किञ्चिदेव कथं न बुद्धीश समागतोऽसि । सुचिन्त्यदेव प्रजहामि देहं यशः करिष्ये विपरीतमेवम् ॥ ९ ॥ रक्ष रक्ष दयासिन्धोऽपराधान्मे क्षमस्व च । क्षणे क्षणे त्वहं दासी रक्षितव्या विशेषतः ॥ १० ॥ स्तुवत्यामेव पार्वत्यां शङ्करो बोधसम्युतः । बभूव गणपानां वै श्रुत्वा हाहारवं विधेः ॥ ११ ॥ गणेशं मनसा स्मृत्वा वृषारूढः समाययौ । क्षणेन दैत्यराजं तं दृष्ट्वा डमरुणा हनत् ॥ १२ ॥ ततः सोऽपि शिवं वीक्ष्यालिङ्गितुं धावितोऽभवत् । शिवस्य शूलिकादीनि शस्त्राणि कुण्ठितानि वै ॥ १३ ॥ तं दृष्ट्वा परमाश्चर्यं भयभीतो महेश्वरः । सस्मार गणपं सोऽपि निर्विघ्नार्थं प्रजापते ॥ १४ ॥ इति मुद्गलपुराणे हेरम्ब स्तोत्रम् ।

माता और पुत्र: एक भावुक संवाद (Introduction)

हेरम्ब स्तोत्रम् (Heramba Stotram) मुद्गल पुराण का सबसे भावुक प्रसंग है। माता गौरी (पार्वती) एक असुर द्वारा घेर ली जाती हैं और जब कोई देवता उनकी रक्षा नहीं कर पाता, तो वे अपने पुत्र गणेश को पुकारती हैं।
"हेरम्ब" शब्द का अर्थ है - "दीन-हीनों का रक्षक" (हे = दीन, रम्ब = पालक)। यह स्तोत्र एक मां की अपने सर्वशक्तिमान पुत्र से गुहार है।

महत्व: उलाहना और प्रेम (Significance)

इस स्तोत्र में माता गौरी केवल प्रार्थना नहीं करतीं, बल्कि गणेश जी को उलाहना (Complaint) भी देती हैं:
  • क्या तुम सो रहे हो? (श्लोक 3: किं वा निशि निद्रितोऽसि) - "क्या तुम अपनी मां के संकट के समय सो रहे हो?"
  • क्या भक्तों में व्यस्त हो? (श्लोक 4: किं भक्तसङ्गेन) - "क्या भक्तों की पूजा और मोदक में इतने मग्न हो गए कि मां को भूल गए?"
  • प्राण त्याग की चेतावनी: (श्लोक 9) - माता कहती हैं कि वे प्राण त्याग देंगी, जिससे गणेश को अपयश मिलेगा। यह प्रेम की चरम सीमा है।

लाभ (Benefits)

  • संकट मोचन: जब चारों ओर से रास्ते बंद हो जाएं और प्राणों पर बन आए (Life-threatening danger), तब यह "रक्षा कवच" बनता है।

  • अभय दान: "मां रक्ष" (मेरी रक्षा करो) का बार-बार उच्चारण मन से हर प्रकार के भय को निकाल देता है।

  • शीघ्र फलप्रद: जैसे मां की पुकार पर बेटा दौड़ा चला आता है, वैसे ही इस स्तोत्र से गणेश जी तत्काल प्रसन्न होते हैं।

पाठ विधि (Ritual & Vidhi)

  • आर्त भाव: इस स्तोत्र में विधि से अधिक "भाव" महत्वपूर्ण है। जैसे एक बालक अपनी मां को पुकारता है (यहाँ मां अपने बालक को), वैसी ही व्याकुलता होनी चाहिए।
  • संकल्प: "हे हेरम्ब! जैसे आपने माता गौरी की रक्षा की, वैसे ही मेरे संकटों का नाश करें।" - ऐसा कहकर पाठ आरम्भ करें।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

"हेरम्ब" (Heramba) शब्द का क्या अर्थ है?

"हे" का अर्थ है 'दीन' (Helpless) और "रम्ब" का अर्थ है 'रक्षक/पालक'। अतः हेरम्ब का अर्थ है - "दीन-हीनों और असहायों का रक्षक"।

यह स्तोत्र किस पुराण से है और किसकी रचना है?

यह <strong class="text-[#800000]">मुद्गल पुराण</strong> (Mudgala Purana) से लिया गया है। इसकी रचना स्वयं माता गौरी (पार्वती) ने संकट के समय की थी।

माता गौरी अपने ही पुत्र गणेश से प्रार्थना क्यों कर रही हैं?

यह लीला दर्शाती है कि गणेश केवल उनके पुत्र नहीं, बल्कि साक्षात् "परब्रह्म" हैं। जब सभी देवता विवश हो गए, तब जगदम्बा ने भी उन्हीं की शरण ली।

इस स्तोत्र का मुख्य भाव (Mood) क्या है?

इसका भाव "आर्त" (Distress/Urgency) और "उलाहना" (Complaint) का है। माता अपने पुत्र को शीघ्र न आने के लिए प्रेमपूर्वक डांट रही हैं।

क्या गणेश जी ने अपनी माता को डांटा?

नहीं, स्तोत्र के अंत में गणेश जी तत्काल प्रकट हुए, असुर का वध किया और माता को अभय प्रदान किया। यह भक्त-वत्सलता का प्रमाण है।

श्लोक ९ में "प्रजहामि देहं" का क्या अर्थ है?

माता इतनी व्याकुल हैं कि वे कहती हैं, "यदि तुम नहीं आए, तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगी और अपयश तुम्हें मिलेगा।" यह पूर्ण समर्पण की पराकाष्ठा है।

क्या हम इसे अदालती मामलों या सुरक्षा के लिए उपयोग कर सकते हैं?

जी हाँ, यह "रक्षा मंत्र" है। जब कोई भी मानवीय सहायता काम न आए, तब इसका पाठ अचूक फल देता है।

हेरम्ब गणपति का स्वरूप कैसा है?

ध्यान शास्त्रों में हेरम्ब गणपति के ५ मुख और १० भुजाएं बताई गई हैं और वे सिंह (Lion) पर सवार हैं, जो शक्ति और अभय का प्रतीक है।

माता ने स्वयं को "दासी" क्यों कहा?

भक्ति में अहंकार का नाश आवश्यक है। जगदम्बा होकर भी उन्होंने स्वयं को परमात्मा की "दासी" कहकर शरणागति का आदर्श प्रस्तुत किया।

इसका पाठ कब करना चाहिए?

संकट काल में, भय लगने पर, या जब कोई रक्षक न दिखे। इसे कभी भी, कहीं भी आर्त भाव से पुकारा जा सकता है।