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हनुमद्ध्यानम् (दिव्य स्वरूप)

हनुमद्ध्यानम् (दिव्य स्वरूप)
नमस्ते देवदेवेश नमस्ते राक्षसान्तक ।
नमस्ते वानराधीश नमस्ते वायुनन्दन ॥ १॥

नमस्त्रिमूर्तिवपुषे वेदवेद्याय ते नमः ।
रेवानदी विहाराय सहस्रभुजधारिणे ॥ २॥

सहस्रवनितालोल कपिरूपाय ते नमः ।
दशाननवधार्थाय पञ्चाननधराय च ॥ ३॥

सुवर्चलाकलत्राय तस्मै हनुमते नमः ।
कर्कटीवधवेलायां षडाननधराय च ॥ ४॥

सर्वलोकहितार्थाय वायुपुत्राय ते नमः ।
रामाङ्कमुद्राधराय ब्रह्मलोकनिवासिने ॥ ५॥

विंशद्भुजसमेताय तस्मै रुद्रात्मने नमः ।
सर्वस्वतन्त्रदेवाय नानायुधधराय च ॥ ६॥

दिव्यमङ्गलरूपाय हनुमद्ब्रह्मणे नमः ।
दुर्दण्डिबन्धमोक्षाय कालनेमिहराय च ॥ ७॥

मैरावणविनाशाय वज्रदेहाय ते नमः ।
सर्वलोकप्रपूर्णाय भक्तानां हृन्निवासिने ॥ ८॥

आर्तानां रक्षणार्थाय वेदवेद्याय ते नमः ।
सर्वमन्त्रस्वरूपाय सृष्टिस्थित्यन्तहेतवे ॥ ९॥

नानावर्णधरायास्तु पापनाशय ते नमः ।
गङ्गातीरे विप्रमुख कपिलानुग्रहेच्छया ॥ १०॥

चतुर्भुजावताराय भविष्यद्ब्रह्मणे नमः ।
कौपीनकटिसूत्राय दिव्ययज्ञोपवीतिने ॥ ११॥

पीताम्बरधरायास्तु कालरूपाय ते नमः ।
यज्ञकर्ते यज्ञभोक्रे नानाविद्याविहारिणे ॥ १२॥

त्रिमूर्तितेजोवपुषे दिव्यरूपाय ते नमः ।
कदलीफलहस्ताय हेमरम्भाविहारिणे ॥ १३॥

भक्तध्यानावसन्ताय सर्वभूतात्मने नमः ।
वल्लरीधार्ययुक्ताय सहस्राश्वरथाय च ॥ १४॥

गुण्डक्रियागीतगानचतुराय नमो नमः ।
पञ्चाशद्वर्णरूपाय सूक्ष्मरूपाय विष्णवे ॥ १५॥

नरवानरवेषाय बहुरूपाय ते नमः ।
लङ्किणीवशवेलायामष्टादशभुजात्मने ॥ १६॥

ध्वजदत्तप्रपन्नाय अग्निगर्भाय ते नमः ।
उष्ट्रारोहविराराय पार्वतीनन्दनाय च ॥ १७॥

वज्रप्रहारचिह्नाय तस्मै सर्वात्मने नमः ।
पम्पातीरविहाराय केसरीनन्दनाय च ।
तप्तकाञ्चनवर्णाय वीररूपाय ते नमः ॥ १८॥

शक्तिं पाशं च कुन्तं परशुमपि हलं तोमरं खेटकं च
शङ्ख चक्रं त्रिशूलं मुसलमपि गदां पट्टसं मुद्गरं च ।
गाण्डीवं चारुपद्म द्विनवभुजवरे खङ्गमप्याददानं
वन्देऽहं वायुसूनं सुररिपुमथनं भक्तरक्षाधुरीणम् ॥ १९॥

॥ इति श्रीहनुमद्ध्यानम् समाप्तम् ॥

इस ध्यान स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

यह हनुमद्ध्यानम् भगवान हनुमान को समर्पित एक विस्तृत और अनूठा ध्यान स्तोत्र है। सामान्य ध्यान मंत्रों से भिन्न, यह स्तोत्र भगवान हनुमान (Lord Hanuman) के कई दुर्लभ और विशिष्ट स्वरूपों का एक साथ वर्णन करता है, जिन्हें उन्होंने विभिन्न लीलाओं के दौरान धारण किया था। यह स्तोत्र हनुमान जी को मात्र एक वानर-देवता के रूप में नहीं, बल्कि एक बहुरूपी, सर्वशक्तिमान और त्रिमूर्ति स्वरूप (form of the Trinity) सत्ता के रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें उनके पञ्चानन (पांच मुख), षडानन (छह मुख), और अष्टादशभुज (अठारह भुजाओं वाले) जैसे तांत्रिक और पौराणिक महत्व वाले रूपों का आह्वान किया गया है, जो इस स्तोत्र को अत्यंत शक्तिशाली और गोपनीय बनाते हैं।

स्तोत्र के प्रमुख भाव और लाभ

हनुमान जी के इन विविध और शक्तिशाली रूपों का ध्यान करने से साधक को अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं:
  • सर्व-संकट निवारण (Removal of All Dangers): स्तोत्र में हनुमान जी के पञ्चानन स्वरूप का उल्लेख है, जो उन्होंने अहिरावण का वध करने के लिए धारण किया था। यह रूप सभी दिशाओं से आने वाले संकटों और नकारात्मक ऊर्जा (negative energy) को नष्ट कर देता है।
  • शत्रुओं पर पूर्ण विजय (Complete Victory over Enemies): "नमस्ते राक्षसान्तक" और "मैरावणविनाशाय" जैसे नाम उनके शत्रु-संहारक रूप को प्रकट करते हैं। उनके अठारह भुजाओं वाले, नाना प्रकार के आयुध धारण किये हुए स्वरूप का ध्यान करने से भक्तों को हर प्रकार के शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
  • माया और भ्रम का नाश (Destruction of Illusion): उनके षडानन स्वरूप का उल्लेख है, जो उन्होंने कर्कटी नामक राक्षसी का वध करने के लिए लिया था, जो मायावी थी। इस रूप का ध्यान करने से जीवन में आने वाले भ्रम, छल और मायावी बाधाएं दूर होती हैं।
  • परम ज्ञान और विद्या की प्राप्ति (Attainment of Supreme Knowledge): हनुमान जी को "वेदवेद्याय" (वेदों द्वारा जानने योग्य) और "नानाविद्याविहारिणे" (अनेक विद्याओं में विहार करने वाले) कहा गया है। उनके ध्यान से साधक को ज्ञान, बुद्धि (intellect) और शास्त्रों को समझने की शक्ति प्राप्त होती है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह एक ध्यान स्तोत्र है, इसलिए इसका पाठ किसी भी हनुमान मंत्र, चालीसा या स्तोत्र के जाप से पहले करना सर्वोत्तम है। यह मुख्य साधना के लिए एक शक्तिशाली आधार तैयार करता है।
  • प्रातःकाल या संध्याकाल में, पूजा स्थान पर शांत चित्त से बैठकर, आँखें बंद करके इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक के अनुसार हनुमान जी के विविध रूपों की मन में कल्पना करें।
  • मंगलवार (Tuesday) और शनिवार (Saturday) को इस ध्यान का अभ्यास करना विशेष रूप से फलदायी होता है।
  • जब आप किसी विशेष संकट या भय का सामना कर रहे हों, तो उस संकट से संबंधित हनुमान जी के रूप (जैसे शत्रु भय के लिए पंचमुख रूप) का विशेष ध्यान करें।