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श्री गणेश दिव्यदुर्ग स्तोत्रम् (Ganesha Divya Durga Stotram)

Ganesha Divya Durga Stotram

श्री गणेश दिव्यदुर्ग स्तोत्रम् (Ganesha Divya Durga Stotram)
॥ श्री गणेश दिव्यदुर्ग स्तोत्रम् ॥ श्रीकृष्ण उवाच (श्रीकृष्ण बोले): वद शिव महानाथ पार्वतीरमणेश्वर । दैत्यसङ्ग्रामवेलायां स्मरणीयं किमीश्वर ॥ १ ॥ ईश्वर उवाच (भगवान शिव बोले): शृणु कृष्ण प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं महत् । गणेशदुर्गदिव्यं च शृणु वक्ष्यामि भक्तितः ॥ २ ॥ त्रिपुरवधवेलायां स्मरणीयं किमीश्वर । दिव्यदुर्गप्रसादेन त्रिपुराणां वधः कृतः ॥ ३ ॥ श्रीकृष्ण उवाच (श्रीकृष्ण बोले): हेरम्बस्य दुर्गमिदं वद त्वं भक्तवत्सल । ईश्वर उवाच (भगवान शिव बोले): शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि दुर्गे वैनायकं शुभम् ॥ ४ ॥ सङ्ग्रामे च श्मशाने च अरण्ये चोरसङ्कटे । नृपद्वारे ज्वरे घोरे येनैव मुच्यते भयात् ॥ ५ ॥ दश-दिशा रक्षा (Protection of Directions) प्राच्यां रक्षतु हेरम्बः आग्नेय्यामग्नितेजसा । याम्यां लम्बोदरो रक्षेत् नैरृत्यां पार्वतीसुतः ॥ ६ ॥ प्रतीच्यां वक्रतुण्डश्च वायव्यां वरदप्रभुः । गणेशः पातु औदीच्यां ईशान्यामीश्वरस्तथा ॥ ७ ॥ ऊर्ध्वं रक्षेद्धूम्रवर्णो ह्यधस्तात्पापनाशनः । एवं दशदिशो रक्षेत् हेरम्बो विघ्ननाशनः ॥ ८ ॥ फलश्रुतिः (Benefits) हेरम्बस्य दुर्गमिदं त्रिकालं यः पठेन्नरः । कोटिजन्मकृतं पापं एकावृत्तेन नश्यति ॥ ९ ॥ गणेशाङ्गारशेषेण दिव्यदुर्गेण मन्त्रितम् । ललाटं चर्चितं येन त्रैलोक्यवशमानयेत् ॥ १० ॥ मात्रागमसहस्राणि सुरापानशतानि च । तत् क्षणात्तानि नश्यन्ति गणेशतीर्थवन्दनात् ॥ ११ ॥ नैवेद्यं वक्ततुण्डस्य नरो भुङ्क्ते तु भक्तितः । राज्यदानसहस्राणि तेषां फलमवाप्नुयात् ॥ १२ ॥ कदाचित्पठ्यते भक्त्या हेरम्बस्य प्रसादतः । शाकिनी डाकिनी भूतप्रेत वेताल राक्षसाः ॥ १३ ॥ ब्रह्मराक्षसकूष्माण्डाः प्रणश्यन्ति च दूरतः । भूर्जे वा ताडपत्रे वा दुर्गहेरम्बमालिखेत् ॥ १४ ॥ करमूले धृतं येन करस्थाः सर्वसिद्धयः । एकमावर्तनं भक्त्या पठेन्नित्यं तु यो नरः ॥ १५ ॥ कल्पकोटिसहस्राणि शिवलोके महीयते । लिङ्गदानसहस्राणि पृथ्वीदानशतानि च ॥ १६ ॥ गजदानसहस्रं च गणेशस्तवनात् फलम् ॥ १७ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे गणेशदिव्यदुर्गस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
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प्रस्तावना (Introduction)

श्री गणेश दिव्यदुर्ग स्तोत्रम् (Ganesha Divya Durga Stotram) भगवान शिव द्वारा श्रीकृष्ण को उपदिष्ट एक अत्यंत दुर्लभ और गुप्त मंत्र है। इसका वर्णन पद्म पुराण में मिलता है।

यहाँ "दुर्ग" शब्द का अर्थ है "किला" (Fortress) या "रक्षा कवच"। भगवान शिव स्वयं स्वीकार करते हैं कि त्रिपुरासुर जैसे महा-बलशाली असुर का वध करने के लिए उन्होंने इसी "गणेश दिव्य दुर्ग" का आश्रय लिया था। यह स्तोत्र साधक के चारों ओर अभेद्य सुरक्षा घेरा बना देता है।

स्तोत्र का महत्व (Significance)

यह स्तोत्र "गुह्याद्गुह्यतरं" है (गोपनीय से भी गोपनीय)।

  • दश-दिशा सुरक्षा: इसमें हेरम्ब, वक्रतुंड, लंबोदर आदि स्वरूपों द्वारा दसों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और कोणों) को बांधने (Seal) की अद्भुत शक्ति है।

  • भय नाशक: चाहे युद्ध हो, शमशान हो, जंगल हो या राज-दरबार का भय - इसका स्मरण मात्र ही भय को समाप्त कर देता है (श्लोक 5)।

  • पाप नाशक: केवल एक पाठ (One Recitation) करने से करोड़ों जन्मों के पाप भस्म हो जाते हैं (श्लोक 9)।

पाठ के लाभ (Benefits)

  • वशीकरण (Vashikaran): श्लोक 10 में एक विशेष प्रयोग है: गणेश जी के हवन की भस्म (Angara) को इस स्तोत्र से अभिमंत्रित कर माथे पर तिलक लगाने से "त्रैलोक्य वशीकरण" (तीनों लोकों को वश में करने) की शक्ति मिलती है।

  • भूत-प्रेत मुक्ति: शाकिनी, डाकिनी, ब्रह्मराक्षस और कूष्माण्ड जैसे दुष्ट ग्रह इसके पाठ से कोसों दूर भाग जाते हैं (श्लोक 13-14)।

  • सर्व-सिद्धि: भोजपत्र पर इसे लिखकर ताबीज के रूप में भुजा पर बांधने से सभी सिद्धियाँ हाथ में आ जाती हैं (करस्थाः सर्वसिद्धयः)।

पाठ विधि (Chanting Method)

साधारण और विशेष दोनों विधियाँ हैं:

  1. नित्य पाठ: रोज सुबह स्नान के बाद 1 बार पाठ करें। यह "कोटि-जन्म-पाप-नाशक" है।
  2. त्रिकाल पाठ: विशेष संकट के समय दिन में तीन बार (सुबह, दोपहर, शाम) पाठ करें।
  3. ताबीज प्रयोग: भोजपत्र या ताड़पत्र पर अष्टगंध या लाल चंदन से इसे लिखें और धातु के कवच (तबीज) में भरकर दायीं भुजा (Right Arm) में बांधें।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

श्री गणेश दिव्यदुर्ग स्तोत्र (Ganesha Divya Durga Stotram) का मुख्य रहस्य क्या है?

इसका रहस्य इसके नाम 'दिव्य दुर्ग' (Divine Fortress) में छिपा है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि एक अभेद्य किला है। भगवान शिव ने बताया है कि त्रिपुरासुर वध के समय उन्होंने स्वयं इसी 'दुर्ग' (Shield) का आश्रय लिया था।

यह स्तोत्र किस पुराण से लिया गया है?

यह दिव्य स्तोत्र 'श्री पद्म पुराण' (Padma Purana) से लिया गया है। यह भगवान शिव और श्रीकृष्ण के बीच का संवाद है, जहाँ शिव जी ने इसे 'गुह्याद्गुह्यतरं' (गोपनीय से भी गोपनीय) बताया है.

क्या यह स्तोत्र वशीकरण (Vashikaran) में प्रभावशाली है?

जी हाँ। श्लोक 10 में 'त्रैलोक्यवशमानयेत्' कहा गया है। विधिपूर्वक सिद्ध किए गए भस्म (अंगार) का तिलक लगाकर यह स्तोत्र पढ़ने से तीनों लोकों को वश में करने की शक्ति प्राप्त होती है।

'गणेशाङ्गारशेषेण' (Verse 10) का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - 'गणेश जी के हवन/यज्ञ की बची हुई राख (अंगार/भस्म)'। इस भस्म को अभिमंत्रित करके माथे पर तिलक लगाने से अद्भुत आकर्षण शक्ति और सुरक्षा मिलती है।

शत्रु या चोर के भय (Fear of Thieves/Enemies) में इसका उपयोग कैसे करें?

श्लोक 5 के अनुसार - 'सङ्ग्रामे च श्मशाने च अरण्ये चोरसङ्कटे'। युद्ध, शमशान, जंगल या चोरों के भय के समय इसका पाठ करने से तत्क्षण भय मुक्ति मिलती है और सुरक्षा घेरा बन जाता है।

क्या यह भूत-प्रेत (Spirits) बाधा निवारण में सक्षम है?

अत्यंत सक्षम है। श्लोक 13-14 में स्पष्ट है कि शाकिनी, डाकिनी, बेताल, ब्रह्मराक्षस और कूष्माण्ड (Evil Spirits) इसके श्रवण मात्र से दूर भाग जाते हैं।

भोजपत्र (Bhojpatra) पर इसे लिखने का क्या लाभ है?

श्लोक 14-15 के अनुसार, जो व्यक्ति इस स्तोत्र को भोजपत्र या ताड़पत्र पर लिखकर (यंत्र रूप में) अपनी बांह (Arm) में धारण करता है, 'करस्थाः सर्वसिद्धयः' - समस्त सिद्धियाँ उसके हाथ में आ जाती हैं।

क्या इसके पाठ से पाप नष्ट होते हैं?

हाँ, श्लोक 9 में लिखा है - 'कोटिजन्मकृतं पापं एकावृत्तेन नश्यति'। केवल एक बार (One round) सच्चे मन से पाठ करने से करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

इसका पाठ कितनी बार करना चाहिए?

नित्य 'एकमावर्तनं' (1 बार) पाठ करना पर्याप्त है (श्लोक 15)। विशेष सिद्धि के लिए 'त्रिकाल' (सुबह, दोपहर, शाम) पाठ का विधान है।

दसों दिशाओं की रक्षा (security of 10 directions) कैसे होती है?

श्लोक 6-8 में गणेश जी के विभिन्न स्वरूप (हेरम्ब, लंबोदर, वक्रतुण्ड, धूम्रवर्ण आदि) दसों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य, ऊर्ध्व, अधः) से साधक की रक्षा करते हैं.

क्या यह स्तोत्र शिवलोक (Shiva Loka) की प्राप्ति कराता है?

हाँ। श्लोक 16 के अनुसार, इसका नित्य पाठ करने वाला अंत में 'कल्पकोटिसहस्राणि शिवलोके महीयते' - करोड़ों कल्पों तक शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है।

क्या स्त्रियां और बच्चे इसका पाठ कर सकते हैं?

यह एक सात्विक और रक्षात्मक स्तोत्र है। भय, बुरे सपनों (Nightmares) या नजर दोष से बचने के लिए स्त्रियां और बच्चे भी इसका पाठ निसंकोच कर सकते हैं।