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Sri Devi Pancharatna Stuti – देवी पञ्चरत्नस्तुति: शक्ति साधना के पांच दिव्य रत्न

Sri Devi Pancharatna Stuti – देवी पञ्चरत्नस्तुति: शक्ति साधना के पांच दिव्य रत्न
॥ देवीपञ्चरत्नस्तुतिः ॥ जंभाराति-मुखादितेय-परिषत्संभाव्यमाना सदा कुंभाकार-पयोधराद्रितनया शुम्भासुर-द्वेषिणी । रम्भाभोरुमती सुधानिभ-वचोगुम्भावहा पज्जुषां शं भामा त्रिपुरद्विषो वितनुयाद्दम्भापहा दुर्हृताम् ॥ १ ॥ जम्भरिपु-नीलरुचिदृग्जनितमारा कुम्भमदलोपकृदुरोजयुगभारा । शुम्भमुख-देवरिपु-वृन्दजयितसारा गुम्पयितु मे गिरमुमा विधृतकीरा ॥ २ ॥ शम्बरसपत्नरिपवे कलितमोदे बिम्बनिभ-दन्तपटि धूतनत-खेदे । अम्ब धिषणां वितर दैत्यकुल-भीदे शम्बधरमुख्य-सुरवृन्द-नुतपादे ॥ ३ ॥ पूरित-पदाब्ज-नतिकृन्नखिल-कामा दारित-निशाचरकुलाऽघहरनामा । ईरितगुणा श्रुतिभिरद्रिशयभामा सारिततिमर्दयतु मौलिधृत-सोमा ॥ ४ ॥ कज्जल-कनक-हिमरुचः पत्युर्वामाङ्क-हृदय-वदन-स्थाः । बल-धन-विद्या-दात्रीः दुर्गा-लक्ष्मी-सरस्वतीर्वन्दे ॥ ५ ॥ ॥ उपसंहार ॥ पञ्चरत्नाभिधा सेयं पञ्चास्य-प्रेयसी-स्तुतिः । श्रीरामशर्म-कलिता प्रीयतां पार्वती ततः ॥ ६ ॥ ॥ इति देवी पञ्चरत्नस्तुतिः सम्पूर्णा ॥

परिचय: देवी पञ्चरत्न स्तुति — त्रिशक्ति साधना का महामंत्र

देवी पञ्चरत्न स्तुति (Sri Devi Pancharatna Stuti) सनातन भक्ति साहित्य की एक अत्यंत दुर्लभ और मर्मस्पर्शी रचना है। यह स्तोत्र भगवती आदिशक्ति के उन विभिन्न आयामों को समाहित करता है, जो भक्त के जीवन के हर पक्ष को पूर्णता प्रदान करते हैं। 'पञ्चरत्न' का अर्थ है 'पांच रत्न'। जिस प्रकार पांच बहुमूल्य रत्न मिलकर एक सुंदर आभूषण का निर्माण करते हैं, उसी प्रकार इस स्तुति के पांच श्लोक साधक के चरित्र और भाग्य को चमकाने का सामर्थ्य रखते हैं। इस स्तोत्र की रचना का श्रेय श्रीरामशर्म को जाता है, जिन्होंने अपनी अटूट श्रद्धा को शब्दों के माध्यम से साक्षात् देवी के चरणों में अर्पित किया है।

इस स्तुति की विशेषता इसके तात्विक वर्गीकरण में है। यह केवल एक सामान्य प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह माँ दुर्गा (शक्ति), माँ लक्ष्मी (संपत्ति) और माँ सरस्वती (ज्ञान) का एकीकरण है। प्रथम श्लोक में भगवती को 'जंभाराति-मुखादितेय-परिषत्संभाव्यमाना' (इंद्र आदि देवताओं द्वारा पूजित) और 'शुम्भासुर-द्वेषिणी' (शुम्भासुर का संहार करने वाली) कहकर उनके रक्षक स्वरूप की वंदना की गई है। यह स्मरण दिलाता है कि देवी केवल प्रेममयी माता ही नहीं, बल्कि अधर्म का नाश करने वाली प्रचंड शक्ति भी हैं। जो साधक अपने भीतर के अहंकार और बाह्य शत्रुओं से मुक्ति चाहते हैं, उनके लिए यह स्तोत्र एक आध्यात्मिक कवच की तरह कार्य करता है।

दार्शनिक शोध की दृष्टि से, देवी पञ्चरत्न स्तुति 'त्रिदेव' और 'त्रिशक्ति' के गहरे संबंध को उजागर करती है। पांचवें श्लोक में आचार्य कहते हैं— "कज्जल-कनक-हिमरुचः पत्युर्वामाङ्क-हृदय-वदन-स्थाः"। यहाँ देवी के तीन स्वरूपों के निवास स्थान का वर्णन है: भगवान शिव के वाम अंग में माँ दुर्गा (काली), हृदय में माँ लक्ष्मी और मुख में माँ सरस्वती। यह चित्रण सिद्ध करता है कि ज्ञान, धन और शक्ति वास्तव में अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही परब्रह्म के विभिन्न पक्ष हैं। Pavitra Granth के इस प्रामाणिक संस्करण में हम उन्हीं रहस्यों को प्रस्तुत कर रहे हैं जो साधक को 'चित्' की गहराई में ले जाकर आत्म-साक्षात्कार कराते हैं।

ऐतिहासिक रूप से, इस स्तुति का उपयोग शाक्त परंपरा में विशेष रूप से किया जाता रहा है। इसकी भाषा संस्कृत के अत्यंत सुंदर 'छंद' (विशेषकर पहले श्लोक में स्रग्धरा की ध्वनि) में निबद्ध है, जो पाठ के समय एक दिव्य कंपन उत्पन्न करती है। जब साधक 'उमा विधृतकीरा' (हाथ में तोता धारण करने वाली उमा) का ध्यान करता है, तो उसके मन की जड़ता स्वतः ही समाप्त होने लगती है। यह पाठ उन लोगों के लिए विशेष फलदायी है जो जीवन में चौतरफा उन्नति चाहते हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि जब हम देवी की शरण में जाते हैं, तो वह 'दम्भापहा' (अहंकार का नाश करने वाली) बनकर हमें सत्य के प्रकाश से आलोकित कर देती हैं।

विशिष्ट महत्व: पांच रत्नों का आध्यात्मिक विश्लेषण (Significance)

देवी पञ्चरत्न स्तुति का महत्व इसके संक्षिप्तता में अनंत विस्तार को समेटने में है। इसके प्रत्येक श्लोक का अपना एक स्वतंत्र वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व है:

  • प्रथम रत्न: यह शांति और दंभ (अहंकार) के नाश का प्रतीक है। 'त्रिपुरद्विषो' (शिव की पत्नी) का आह्वान साधक के सामाजिक और पारिवारिक जीवन में शांति लाता है।
  • द्वितीय रत्न: 'मेधा' और 'वाणी' की शुद्धि के लिए है। भगवान की अर्धांगिनी उमा का ध्यान करने से बुद्धि प्रखर होती है।
  • तृतीय रत्न: दैत्यकुल का विनाश करने वाली माँ से 'धिषणा' (सूक्ष्म बुद्धि) की याचना की गई है, जो कठिन निर्णयों में सहायक होती है।
  • चतुर्थ रत्न: यह इच्छाओं की पूर्ति और पापों के नाश का मंत्र है। 'निखिल-कामा' माँ चरणों में झुकने वाले प्रत्येक भक्त की कामना सिद्ध करती हैं।
  • पंचम रत्न: यह सबसे महत्वपूर्ण है, जो दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती को एक साथ नमन कर बल-धन-विद्या की त्रिवेणी प्रवाहित करता है।

फलश्रुति: पाठ के दिव्य लाभ (Divine Benefits)

शास्त्रों और शाक्त परंपरा के अनुसार, इस पञ्चरत्न स्तुति के नित्य पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • त्रिशक्ति कृपा: एक ही पाठ से साधक को माँ दुर्गा का बल, माँ लक्ष्मी का ऐश्वर्य और माँ सरस्वती का ज्ञान प्राप्त होता है।
  • मानसिक शांति और भय मुक्ति: "धूतनत-खेदे" — यह पाठ भक्तों के संताप और मानसिक अवसाद को जड़ से मिटा देता है।
  • शत्रु और बाधा विनाश: असुरों का मर्दन करने वाली देवी की कृपा से साधक के मार्ग के सभी कंटक और गुप्त शत्रु परास्त होते हैं।
  • वाणी और कला में सिद्धि: "गुम्पयितु मे गिरमुमा" — जो लोग संगीत, साहित्य या वक्तृत्व कला में हैं, उनके लिए यह स्तोत्र वाणी की सिद्धि प्रदान करता है।
  • सुखद दांपत्य और वंश वृद्धि: माँ पार्वती के 'पञ्चास्य-प्रेयसी' (शिव की प्रिय) रूप की वंदना से पारिवारिक जीवन सुखद और मंगलमय होता है।

पाठ विधि एवं सर्वोत्तम अभ्यास (Ritual Method & Timing)

देवी पञ्चरत्न स्तुति का पाठ अत्यंत सात्विक और भावपूर्ण होना चाहिए। पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करें:

  • समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्याकाल आरती के समय पाठ करना सर्वोत्तम है। शुक्रवार और मंगलवार देवी साधना के विशेष दिन हैं।
  • शुचिता: स्नान के उपरांत स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें। देवी को लाल रंग और लाल पुष्प (विशेषकर गुड़हल या गुलाब) अत्यंत प्रिय हैं।
  • आसन: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  • पूजन सामग्री: माँ दुर्गा या पार्वती के चित्र के सम्मुख घी का शुद्ध दीपक जलाएं। देवी को सिन्दूर और अक्षत अर्पित करें।
  • जप संख्या: नित्य कम से कम ३ या ७ बार पाठ करना उत्तम माना जाता है। नवरात्रि के दौरान १०८ बार पाठ करने से विशेष सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. देवी पञ्चरत्न स्तुति के रचयिता कौन हैं?

इस दिव्य स्तुति की रचना श्रीरामशर्म (Shrirama Sharma) ने की है, जैसा कि स्तोत्र के अंतिम श्लोक में उल्लेख मिलता है।

2. 'पञ्चरत्न' नाम का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है पांच रत्नों के समान अमूल्य श्लोकों का समूह। ये पांच श्लोक भक्ति मार्ग के पांच श्रेष्ठ आयामों को दर्शाते हैं।

3. क्या इस स्तोत्र से बुद्धि तेज होती है?

जी हाँ, तीसरे और पांचवें श्लोक में माँ सरस्वती से 'धिषणा' (बुद्धि) और विद्या की याचना की गई है, जो एकाग्रता और प्रज्ञा बढ़ाने में सहायक है।

4. क्या इस पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

नहीं, यह एक स्तुति परक स्तोत्र है। कोई भी श्रद्धालु जो माँ भगवती में निष्ठा रखता है, वह श्रद्धा भाव से इसका पाठ कर सकता है।

5. 'शुम्भासुर-द्वेषिणी' शब्द का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है "शुम्भासुर का संहार करने वाली"। यह देवी की उस शक्ति को दर्शाता है जो समाज और साधक के जीवन से आसुरी वृत्तियों का नाश करती है।

6. क्या स्त्रियाँ भी इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

अवश्य। भगवती आदि-शक्ति स्वयं नारी शक्ति का सर्वोच्च रूप हैं। स्त्रियाँ अपने सौभाग्य और मानसिक शांति के लिए इसे विशेष रूप से पढ़ सकती हैं।

7. पाठ के लिए सबसे उत्तम दिन कौन सा है?

यद्यपि नित्य पाठ श्रेष्ठ है, परंतु शुक्रवार और नवरात्रि की तिथियाँ इसके लिए सर्वाधिक शुभ मानी जाती हैं।

8. 'पञ्चास्य-प्रेयसी' का अर्थ क्या है?

'पञ्चास्य' का अर्थ है पांच मुख वाले (शिव) और 'प्रेयसी' का अर्थ है उनकी अत्यंत प्रिय पत्नी। अर्थात् भगवान शिव की अर्धांगिनी पार्वती।

9. क्या केवल सुनने से भी लाभ मिलता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार देवी की महिमा का श्रवण करना भी चित्त को शुद्ध करता है और अज्ञान के अंधकार को मिटाता है।

10. पाठ के दौरान किस देवी का ध्यान करना चाहिए?

इसमें दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती तीनों का समावेश है, अतः आप माँ जगदम्बा के 'त्रिशक्ति' स्वरूप का ध्यान कर सकते हैं।