ब्रह्मणा कृतं देवीस्तोत्रम्

ब्रह्मोवाच
जय देवि जगन्मातर्जय त्रिपुरसुन्दरि । जय श्रीनाथसहजे जय श्रीसर्वमङ्गले ॥ २२॥जय श्रीकरुणाराशे जय शृङ्गारनायिके । जयजयेऽधिकसिद्धेशि जय योगीन्द्रवन्दिते ॥ २३॥
जयजय जगदम्ब नित्यरूपे जयजय सन्नुतलोकसौख्यदात्रि । जयजय हिमशैलकीर्तनीये जयजय शङ्करकामवामनेत्रि ॥ २४॥
जगज्जन्मस्थितिध्वंसपिधानानुग्रहान्मुहुः । या करोति स्वसङ्कल्पात्तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ २५॥
वर्णाश्रमाणां साङ्कर्यकारिणः पापिनो जनान् । निहन्त्याद्यातितीक्ष्णास्त्रैस्तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ २६॥
नागमैश्च न वेदैश्च न शास्त्रैर्न च योगिभिः । वेद्या या च स्वसंवेद्या तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ २७॥
रहस्याम्नायवेदान्तैस्तत्त्वविद्भिर्मुनीश्वरैः । परं ब्रह्मेति या ख्याता तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ २८॥
हृदयस्थापि सर्वेषां या न केनापि दृश्यते । सूक्ष्मविज्ञानरूपायै तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ २९॥
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः । यद्ध्यानैकपरा नित्यं तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ ३०॥
यच्चरणभक्ता इन्द्राद्या यदाज्ञामेव बिभ्रति । साम्राज्यसम्पदीशायै तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ ३१॥
वेदा निःश्वसितं यस्या वीक्षितं भूतपञ्चकम् । स्मितं चराचरं विश्वं तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ ३२॥
सहस्रशीर्षा भोगीन्द्रो धरित्रीं तु यदाज्ञया । धत्ते सर्वजनाधारां तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ ३३॥
ज्वलत्यग्निस्तपत्यर्को वातो वाति यदाज्ञया । ज्ञानशक्तिस्वरूपायै तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ ३४॥
पञ्चविंशतितत्त्वानि मायाकञ्चुकपञ्चकम् । यन्मयं मुनयः प्राहुस्तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ ३५॥
शिवशक्तीश्वराश्चैव शुद्धबोधः सदाशिवः । यदुन्मेषविभेदाः स्युस्तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ ३६॥
गुरुर्मन्त्रो देवता च तथा प्राणाश्च पञ्चधा । या विराजति चिद्रूपा तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ ३७॥
सर्वात्मनामन्तरात्मा परमान्दरूपिणी । श्रीविद्येति स्मृता वा तु तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ ३८॥
दर्शनानि च सर्वाणि यदङ्गानि विदुर्बुधाः । तत्तन्नियमयूपायै तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ ३९॥
या भाति सर्वलोकेषु मणिमन्त्रौषधात्मना । तत्त्वोपदेशरूपायै तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ ४०॥
देशकालपदार्थात्मा यद्यद्वस्तु यथा तथा । तत्तद्रूपेण या भाति तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ ४१॥
हे प्रतिभटाकारा कल्याणगुणशालिनी । विश्वोत्तीर्णेति चाख्याता तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ ४२॥
इति स्तुत्वा महादेवीं धाता लोकपितामहः । भूयो भूयो नमस्कृत्य सहसा शरणं गतः ॥ ४३॥
॥ इति ब्रह्माण्डपुराणे उत्तरभागे एकोनचत्वारिंशाध्यायान्तर्गतं ब्रह्मणा कृतं देवीस्तोत्रं समाप्तम् ॥
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स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और उद्गम
ब्रह्मणा कृतं देवीस्तोत्रम् (Brahmana Kritam Devi Stotram) का वर्णन ब्रह्माण्डपुराण (Brahmanda Purana) के उत्तर भाग के 39वें अध्याय में मिलता है। यह स्तुति स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा (Lord Brahma) द्वारा माँ त्रिपुरसुन्दरी (Tripura Sundari) के प्रति की गई है। इस स्तोत्र का महत्व इसलिए भी अत्यधिक है क्योंकि इसमें ब्रह्मा जी स्वीकार करते हैं कि उनका सृजन कार्य, विष्णु का पालन और शिव का संहार—ये सब देवी की इच्छा और शक्ति (Will and Power) के बिना असंभव हैं। यह शाक्त परंपरा और श्रीविद्या (Sri Vidya) साधना का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
स्तोत्र का दार्शनिक भावार्थ (Deep Philosophical Meaning)
ब्रह्मा जी ने इस स्तोत्र में देवी के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों का वर्णन किया है। इसमें गहरे आध्यात्मिक रहस्य छिपे हैं:
- पंचकृत्य (Five Divine Acts): श्लोक 25 में कहा गया है—"जगज्जन्मस्थितिध्वंसपिधानानुग्रहान्मुहुः"। अर्थात देवी निरंतर पाँच कार्य करती हैं: 1. सृष्टि (Creation), 2. स्थिति (Preservation), 3. संहार (Destruction), 4. पिधान/तिरोभाव (Concealment/Illusion), और 5. अनुग्रह (Grace/Liberation)। यह ईश्वरीय सत्ता का पूर्ण वर्णन है।
- स्वसंवेद्या (Self-Knowable): श्लोक 27 में ब्रह्मा जी कहते हैं कि देवी न तो वेदों से, न शास्त्रों से और न ही योगियों द्वारा पूर्णतः जानी जा सकती हैं। वे 'स्वसंवेद्या' हैं, अर्थात उन्हें केवल वे स्वयं ही जानती हैं या जिसे वे जनाना चाहें (self-realization), वही उन्हें जान सकता है।
- ब्रह्मांड का संचालन (Cosmic Order): "ज्वलत्यग्निस्तपत्यर्को..." (श्लोक 34) - अग्नि का जलना, सूर्य का तपना और वायु का बहना—ये सब देवी की आज्ञा (fear/command) से ही होते हैं। यह केनोपनिषद के यक्ष उपाख्यान की याद दिलाता है।
फलश्रुति आधारित लाभ (Benefits)
ब्रह्माण्डपुराण के अनुसार, इस स्तोत्र के श्रद्धापूर्वक पाठ से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- साम्राज्य और ऐश्वर्य (Royal Power & Prosperity): देवी को 'साम्राज्यसम्पदीशायै' कहा गया है। जो व्यक्ति इसका पाठ करता है, उसे भौतिक सुख, पद-प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य (wealth) की प्राप्ति होती है।
- पाप और शत्रु नाश (Removal of Sins & Enemies): श्लोक 26 में उल्लेख है कि देवी पापियों और धर्म का उल्लंघन करने वालों का नाश करती हैं। अतः यह स्तोत्र शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा (protection) प्रदान करता है।
- श्रीविद्या की कृपा (Blessings of Sri Vidya): श्लोक 38 में देवी को 'श्रीविद्या' कहा गया है। इस स्तोत्र के पाठ से साधक को गुप्त विद्याओं और आध्यात्मिक चेतना (spiritual awakening) का आशीर्वाद मिलता है।
पाठ करने की विधि और शुभ समय
- शुक्रवार (Friday) और पूर्णिमा (Full Moon) का दिन माँ त्रिपुरसुन्दरी की उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
- स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर श्रीयंत्र (Sri Yantra) या देवी के चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं।
- देवी को कुमकुम (Kumkum) या लाल पुष्प अर्पित करें। 'श्री मात्रे नमः' मंत्र का उच्चारण करते हुए इस स्तोत्र का पाठ करें।
- यह स्तोत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो जीवन में स्थिरता और आध्यात्मिक उन्नति दोनों चाहते हैं।