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Bhagavati Padya Pushpanjali Stotram (Ayi Giri Nandini) – भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलिस्तोत्रं

Bhagavati Padya Pushpanjali Stotram (Ayi Giri Nandini) – भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलिस्तोत्रं
॥ श्री भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलिस्तोत्रं (महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम्) ॥ श्री भगवत्यै नमः ॥ भगवति भगवत्पदपङ्कजं भ्रमरभूतसुरासुरसेवितम् । सुजनमानसहंसपरिस्तुतं कमलयाऽमलया निभृतं भजे ॥ १॥ ते उभे अभिवन्देऽहं विघ्नेशकुलदैवते । नरनागाननस्त्वेको नरसिंह नमोऽस्तुते ॥ २॥ हरिगुरुपदपद्मं शुद्धपद्मेऽनुरागाद्- विगतपरमभागे सन्निधायादरेण । तदनुचरि करोमि प्रीतये भक्तिभाजां भगवति पदपद्मे पद्यपुष्पाञ्जलिं ते ॥ ३॥ केनैते रचिताः कुतो न निहिताः शुम्भादयो दुर्मदाः केनैते तव पालिता इति हि तत् प्रश्ने किमाचक्ष्महे । ब्रह्माद्या अपि शङ्किताः स्वविषये यस्याः प्रसादावधि प्रीता सा महिषासुरप्रमथिनी च्छिन्द्यादवद्यानि मे ॥ ४॥ पातु श्रीस्तु चतुर्भुजा किमु चतुर्बाहोर्महौजान्भुजान् धत्तेऽष्टादशधा हि कारणगुणाः कार्ये गुणारम्भकाः । सत्यं दिक्पतिदन्तिसङ्ख्यभुजभृच्छम्भुः स्वय्म्भूः स्वयं धामैकप्रतिपत्तये किमथवा पातुं दशाष्टौ दिशः ॥ ५॥ प्रीत्याऽष्टादशसंमितेषु युगपद्द्वीपेषु दातुं वरान् त्रातुं वा भयतो बिभर्षि भगवत्यष्टादशैतान् भुजान् । यद्वाऽष्टादशधा भुजांस्तु बिभृतः काली सरस्वत्युभे मीलित्वैकमिहानयोः प्रथयितुं सा त्वं रमे रक्ष माम् ॥ ६॥ ॥ छन्दः ॥ अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते । भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७॥ सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते । दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८॥ अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरते शिखरिशिरोमणितुङ्गहिमालयश‍ृङ्गनिजालयमध्यगते । मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९॥ अयि शतखण्डविखण्डितरुण्डवितुण्डितशुण्डगजाधिपते रिपुगजगण्डविदारणचण्डपराक्रमशुण्ड मृगाधिपते । निजभुजदण्डनिपातितखण्डविपातितमुण्डभटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १०॥ अयि रणदुर्मदशत्रुवधोदितदुर्धरनिर्जरशक्तिभृते चतुरविचारधुरीणमहाशिवदूतकृतप्रमथाधिपते । दुरितदुरीहदुराशयदुर्मतिदानवदूतकृतान्तमते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११॥ अयि शरणागतवैरिवधूवरवीरवराभयदायकरे त्रिभुवनमस्तकशूलविरोधिशिरोधिकृतामलशूलकरे । दुमिदुमितामरदुन्दुभिनादमहोमुखरीकृततिग्मकरे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२॥ अयि निजहुँकृतिमात्रनिराकृतधूम्रविलोचनधूम्रशते समरविशोषितशोणितबीजसमुद्भवशोणितबीजलते । शिवशिव शुम्भनिशुम्भमहाहवतर्पितभूतपिशाचरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३॥ धनुरनुषङ्गरणक्षणसङ्गपरिस्फुरदङ्गनटत्कटके कनकपिशङ्गपृषत्कनिषङ्गरसद्भटश‍ृङ्गहतावटुके । कृतचतुरङ्गबलक्षितिरङ्गघटद्बहुरङ्गरटद्बटुके जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४॥ सुरललनाततथेयितथेयितथाभिनयोत्तरनृत्यरते हासविलासहुलासमयि प्रणतार्तजनेऽमितप्रेमभरे । धिमिकिटधिक्कटधिकटधिमिध्वनिधीरमृदङ्गनिनादरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५॥ जय जय जप्यजये जयशब्दपरस्तुतितत्परविश्वनुते झणझणझिञ्झिमिझङ्कृतनूपुरसिञ्जितमोहितभूतपते । नटितनटार्धनटीनटनायकनाटितनाट्यसुगानरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६॥ अयि सुमनःसुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहरकान्तियुते श्रितरजनीरजनीरजनीरजनीरजनीकरवक्त्रवृते । सुनयनविभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७॥ सहितमहाहवमल्लमतल्लिकमल्लितरल्लकमल्लरते विरचितवल्लिकपल्लिकमल्लिकझिल्लिकभिल्लिकवर्गवृते । सितकृतफुल्लसमुल्लसितारुणतल्लजपल्लवसल्ललिते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८॥ अविरलगण्डगलन्मदमेदुरमत्तमतङ्गजराजपते त्रिभुवनभूषणभूतकलानिधिरूपपयोनिधिराजसुते । अयि सुदतीजनलालसमानसमोहनमन्मथराजसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९॥ कमलदलामलकोमलकान्तिकलाकलितामलभाललते सकलविलासकलानिलयक्रमकेलिचलत्कलहंसकुले । अलिकुलसङ्कुलकुवलयमण्डलमौलिमिलद्बकुलालिकुले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २०॥ करमुरलीरववीजितकूजितलज्जितकोकिलमञ्जुमते मिलितमिलिन्दमनोहरगुञ्जितरञ्जितशैलनिकुञ्जगते । निजगुणभूतमहाशबरीगणसद्गुणसम्भृतकेलितले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१॥ कटितटपीतदुकूलविचित्रमयूखतिरस्कृतचन्द्ररुचे प्रणतसुरासुरमौलिमणिस्फुरदंशुलसन्नखचन्द्ररुचे । जितकनकाचलमौलिपदोर्जितनिर्जरकुञ्जरकुम्भकुचे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २२॥ विजितसहस्रकरैकसहस्रकरैकसहस्रकरैकनुते कृतसुरतारकसङ्गरतारकसङ्गरतारकसूनुसुते । सुरथसमाधिसमानसमाधिसमाधिसमाधिसुजातरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २३॥ पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् । तव पदमेव परम्पदमेवनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २४॥ कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुसिञ्चिनुते गुण रङ्गभुवं भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् । तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणिनिवासि शिवं जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २५॥ तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते किमु पुरुहूतपुरीन्दुमुखीसुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते । मम तु मतं शिवनामधने भवतीकृपया किमुत क्रियते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २६॥ अयि मयि दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथाऽनुमितासि रते । यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २७॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ स्तुतिमितस्तिमितः सुसमाधिना नियमतोऽयमतोऽनुदिनं पठेत् । परमया रमयापि निषेव्यते परिजनोऽरिजनोऽपि च तं भजेत् ॥ २८॥ रमयति किल कर्षस्तेषु चित्तं नराणामवरजवरयस्माद्रामकृष्णः कवीनाम् । अकृत सुकृतिगम्यं रम्यपद्यैकहर्म्यं स्तवनमवनहेतुं प्रीतये विश्वमातुः ॥ २९॥ इन्दुरम्यो मुहुर्बिन्दुरम्यो मुहुर्बिन्दुरम्यो यतः साऽनवद्यं स्मृतः । श्रीपतेः सूनूना कारितो योऽधुना विश्वमातुः पदे पद्यपुष्पाञ्जलिः ॥ ३०॥ ॥ इति श्रीभगवतीपद्यपुष्पाञ्जलिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलि (अयि गिरिनन्दिनि) — काव्यात्मक एवं तांत्रिक रहस्य

श्रीभगवतीपद्यपुष्पाञ्जलिस्तोत्रं वह मूल ग्रंथ है जिसे पूरा विश्व "अयि गिरिनन्दिनि" या महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र के नाम से जानता है। 'पद्यपुष्पाञ्जलि' का अर्थ है 'कविताओं (श्लोकों) रूपी पुष्पों की अंजलि'। इसके रचयिता श्री रामकृष्ण कवि माने जाते हैं (जैसा कि अंतिम श्लोक 29 में उल्लेख है: "रामकृष्णः कवीनाम्")। यद्यपि कुछ विद्वान इसे आदि शंकराचार्य की रचना भी मानते हैं।

ध्वनि विज्ञान और ओज गुण: इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसका नाद-विज्ञान (Sound Engineering) है। इसमें 'अनुप्रास' और 'ध्वन्यात्मक शब्दों' (Onomatopoeia) का इतना अद्भुत प्रयोग हुआ है कि इसे गाते ही शरीर में ओज (Energy) और रोंगटे खड़े कर देने वाला उत्साह उत्पन्न होता है। उदाहरण के लिए श्लोक 15: "धिमिकिटधिक्कटधिकटधिमिध्वनिधीरमृदङ्गनिनादरते" — इसे पढ़ने से साक्षात रणभूमि में बजने वाले मृदंग और डमरू की ध्वनि सुनाई देने लगती है। इसी प्रकार श्लोक 16 में: "झणझणझिञ्झिमिझङ्कृतनूपुर" से देवी के नृत्य करते समय बजने वाले घुंघरुओं की झंकार का अनुभव होता है।

अठारह भुजाओं का रहस्य: स्तोत्र के श्लोक 5 और 6 में माँ दुर्गा के 18 भुजाओं वाले स्वरूप का रहस्य बताया गया है। कवि कहते हैं कि "हे माँ! आप अठारह भुजाएं इसलिए धारण करती हैं ताकि आप 18 द्वीपों (संपूर्ण ब्रह्मांड) के भक्तों की रक्षा कर सकें, या यह महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती—तीनों की सम्मिलित शक्ति का ही प्रकटीकरण है।"

स्तोत्र के सिद्ध लाभ (Miraculous Benefits)

यह स्तोत्र केवल एक काव्य नहीं, बल्कि महिषासुरमर्दिनी का 'वांग्मय स्वरूप' (Word-form) है। इसके नित्य पाठ या श्रवण से साधक को असीमित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • भय और शत्रुओं का नाश: जिस प्रकार माँ ने महिषासुर, चंड-मुंड, और रक्तबीज के अहंकार को चूर किया, उसी प्रकार यह स्तोत्र साधक के जीवन से ज्ञात-अज्ञात शत्रुओं, भय और बुरी शक्तियों का समूल नाश कर देता है।
  • अष्ट-ऐश्वर्य की प्राप्ति: श्लोक 24 में स्पष्ट लिखा है—"अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत्" (जो व्यक्ति आपके चरण-कमलों की सेवा करता है, वह कुबेर/ब्रह्मा के समान ऐश्वर्यवान कैसे नहीं होगा?)। यह घोर दरिद्रता को मिटाकर राजयोग देता है।
  • शत्रु भी मित्र बन जाएं (वशीकरण): फलश्रुति के श्लोक 28 में कहा गया है—"परिजनोऽरिजनोऽपि च तं भजेत्"। अर्थात जो एकाग्र चित्त से इसका पाठ करता है, उसके परिजन ही नहीं, बल्कि उसके शत्रु (अरिजन) भी उसका आदर और सेवा करने लगते हैं।
  • मानसिक शांति और आनंद: यह स्तोत्र हृदय के 'महिषासुर' (आलस्य, क्रोध, अहंकार) को नष्ट कर भीतर आध्यात्मिक शांति (शिवत्व) स्थापित करता है।

पाठ विधि एवं अनुष्ठान (Ritual Method)

इस ओजपूर्ण स्तोत्र को सही लय और श्रद्धा के साथ पढ़ने से ही इसके स्पंदन (Vibration) का पूर्ण लाभ मिलता है।

  • नित्य पाठ: इसे प्रतिदिन सायं काल (गोधूलि बेला) में जोर से (सस्वर) गाना चाहिए। इसकी तेज ध्वनि घर से सारी नकारात्मक ऊर्जा (Negative energy) को बाहर निकाल देती है।
  • नवरात्रि विशेष: शारदीय या वासंतिक नवरात्रि के नौ दिनों तक, माँ दुर्गा की प्रतिमा या कलश के सामने घी का दीपक जलाकर इसका पाठ करना अमोघ फलदायी है।
  • ध्यान: पाठ करते समय माँ महिषासुरमर्दिनी के उस स्वरूप का ध्यान करें, जहाँ वे अष्टदश (18) भुजाओं में शस्त्र लिए, सिंह पर सवार होकर असुरों का वध कर रही हैं, और उनका मुखमंडल क्रोध में भी अत्यंत सुंदर (रम्यकपर्दिनि) प्रतीत हो रहा है।
  • नैवेद्य: माँ को लाल पुष्प (विशेषकर गुड़हल), अनार, और लाल पेड़ा या हलवा अर्पित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलिस्तोत्रं और महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र में क्या अंतर है?

दोनों एक ही हैं। जो स्तोत्र जनमानस में 'अयि गिरिनन्दिनि' या 'महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र' के नाम से लोकप्रिय है, उसका मूल और वास्तविक नाम 'श्री भगवती पद्यपुष्पाञ्जलि स्तोत्र' है।

2. इस स्तोत्र की रचना किसने की है?

इस अद्वितीय काव्यात्मक स्तोत्र की रचना श्री रामकृष्ण कवि ने की थी (जैसा कि श्लोक 29 में वर्णित है)। यद्यपि कुछ किंवदंतियों में इसे आदि शंकराचार्य की रचना भी माना जाता है।

3. 'पद्यपुष्पाञ्जलि' का क्या अर्थ है?

'पद्य' का अर्थ है कविता (Poetry) और 'पुष्पाञ्जलि' का अर्थ है फूलों की अंजलि। इस प्रकार इसका अर्थ है—कविताओं (श्लोकों) रूपी पुष्पों की अंजलि माँ भगवती के चरणों में अर्पित करना।

4. 'जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है: 'हे महिषासुर का वध करने वाली, सुंदर जटाओं (कपर्द) को धारण करने वाली, हे पर्वतराज हिमालय की पुत्री (शैलसुते)! आपकी जय हो, जय हो।'

5. इस स्तोत्र की भाषा इतनी लयात्मक (Rhythmic) क्यों है?

कवि ने इसमें 'अनुप्रास' और ध्वन्यात्मक शब्दों (Onomatopoeia) का प्रचुर प्रयोग किया है। जैसे 'धिमिकिटधिक्कट', जो युद्ध के नगाड़ों और डमरू की ध्वनि उत्पन्न करता है, जिससे शरीर में ऊर्जा का संचार होता है।

6. क्या यह पाठ शत्रुओं के नाश के लिए प्रभावी है?

हाँ, यह स्तोत्र माँ दुर्गा के रौद्र (योद्धा) और सौम्य दोनों रूपों का गान करता है। इसका सस्वर पाठ मन से भय निकाल देता है और बाहरी व भीतरी (काम, क्रोध) शत्रुओं का समूल नाश करता है।

7. पाठ के लिए सबसे उत्तम समय कौन सा है?

नवरात्रि के नौ दिन इसका पाठ करना सर्वाधिक फलदायी है। इसके अतिरिक्त प्रतिदिन सायं काल (गोधूलि बेला) में इसका गान करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है।

8. श्लोक 24 में 'कमलानिलयः स कथं न भवेत्' का क्या तात्पर्य है?

कवि कहते हैं कि 'हे माँ! जो व्यक्ति आपके चरण कमलों की सेवा करता है, वह स्वयं कमलानिलय (कुबेर या ऐश्वर्यवान) कैसे नहीं होगा?' अर्थात उसे अपार धन-संपत्ति अवश्य मिलेगी।

9. क्या पुरुष और महिलाएँ दोनों इसका पाठ कर सकते हैं?

बिल्कुल। यह भक्ति और स्तुति प्रधान काव्य है। ज्ञान, बल, ऐश्वर्य और मोक्ष की प्राप्ति के लिए कोई भी स्त्री, पुरुष या बालक इसका पाठ कर सकता है।

10. इस पाठ के दौरान क्या भावना रखनी चाहिए?

पाठ करते समय मन में यह भाव रखें कि माँ दुर्गा अठारह भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र धारण कर, सिंह पर सवार होकर आपके सभी दुखों और बाधाओं (महिषासुर रूपी अहंकार) का वध कर रही हैं।