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Asitha Krutha Shiva Stotram – श्री शिव स्तोत्रम् (असित कृतम्): अर्थ एवं महात्म्य

Asitha Krutha Shiva Stotram – श्री शिव स्तोत्रम् (असित कृतम्): अर्थ एवं महात्म्य
॥ असितकृत शिवस्तोत्रम् ॥ असित उवाच – जगद्गुरो नमस्तुभ्यं शिवाय शिवदाय च । योगीन्द्राणां च योगीन्द्र गुरूणां गुरवे नमः ॥ १ ॥ मृत्योर्मृत्युस्वरूपेण मृत्युसंसारखण्डन । मृत्योरीश मृत्युबीज मृत्युञ्जय नमोऽस्तु ते ॥ २ ॥ कालरूपः कलयतां कालकालेश कारण । कालादतीत कालस्थ कालकाल नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥ गुणातीत गुणाधार गुणबीज गुणात्मक । गुणीश गुणिनां बीज गुणिनां गुरवे नमः ॥ ४ ॥ ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मज्ञ ब्रह्मभावनतत्परः । ब्रह्मबीजस्वरूपेण ब्रह्मबीज नमोऽस्तु ते ॥ ५ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इति स्तुत्वा शिवं नत्वा पुरस्तस्थौ मुनीश्वरः । दीनवत्साऽश्रुनेत्रश्च पुलकाञ्चितविग्रहः ॥ ६ ॥ असितेन कृतं स्तोत्रम् भक्तियुक्तश्च यः पठेत् । वर्षमेकं हविष्याशी शङ्करस्य महात्मनः ॥ ७ ॥ स लभेद्वैष्णवं पुत्रं ज्ञानिनं चिरजीविनम् । भवेद्धनाढ्योऽदुःखी च मूको भवति पण्डितः ॥ ८ ॥ अभार्यो लभते भार्यां सुशीलां च पतिव्रताम् । इह लोके सुखं भुक्त्वा यात्यन्ते शिवसन्निधिम् ॥ ९ ॥ इदं स्तोत्रं पुरा दत्तं ब्रह्मणा च प्रचेतसे । प्रचेतसा स्वपुत्रायासिताय दत्तमुत्तमम् ॥ १० ॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे असितकृत शिवस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

असित कृत शिव स्तोत्रम् — विस्तृत परिचय एवं महिमा (Detailed Introduction)

असित कृत शिव स्तोत्रम् (Asitha Krutha Shiva Stotram) सनातन धर्म के अठारह महापुराणों में से एक, ब्रह्मवैवर्त पुराण के 'श्रीकृष्ण जन्मखंड' से उद्धृत है। यह स्तोत्र महर्षि असित द्वारा भगवान शिव की स्तुति में रचा गया था। महर्षि असित, जो प्रचेतस के पुत्र थे, भारतीय ऋषि परंपरा के एक अत्यंत तेजस्वी ऋषि माने जाते हैं। इस स्तोत्र की रचना उस क्षण में हुई थी जब ऋषि ने महादेव के परम दार्शनिक और कालजयी स्वरूप का साक्षात्कार किया था।

ऐतिहासिक एवं पौराणिक संदर्भ: ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, यह स्तोत्र सर्वप्रथम सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने 'प्रचेतस' को दिया था। प्रचेतस ने इसे अपने पुत्र महर्षि असित को प्रदान किया। असित मुनि ने जब इस स्तोत्र के माध्यम से भगवान शिव की तपस्या की, तब महादेव ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए। यह स्तोत्र इस दृष्टि से विशिष्ट है कि यह केवल भगवान के गुणों का गान नहीं करता, बल्कि उन्हें 'तत्व' के रूप में परिभाषित करता है। यहाँ शिव को 'जगद्गुरु' और 'योगियों के भी योगी' (योगीन्द्राणां च योगीन्द्र) के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

दार्शनिक गहराई: स्तोत्र के प्रथम ५ श्लोक अद्वैत वेदांत और सांख्य दर्शन के अद्भुत समन्वय हैं। श्लोक २ में शिव को "मृत्योर्मृत्युस्वरूपेण" कहा गया है, जिसका अर्थ है—मृत्यु की भी मृत्यु। यह जीव के भीतर से मृत्यु के भय को समूल नष्ट करने का मंत्र है। श्लोक ३ और ४ में उन्हें 'कालरूप' और 'गुणातीत' कहा गया है। महादेव केवल काल (समय) का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे काल के भी निर्माता और उससे परे (कालादतीत) हैं। वे प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस्, तमस्) के आधार हैं, किंतु स्वयं निर्गुण और निराकार ब्रह्म के स्वरूप हैं।

भक्ति का पराकाष्ठा: श्लोक ६ में महर्षि असित की स्थिति का वर्णन है—स्तोत्र पाठ के उपरांत ऋषि की आँखों में प्रेमाश्रु थे और उनका शरीर रोमांचित (पुलकाञ्चित) था। यह इस बात का संकेत है कि सच्चा स्तोत्र पाठ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि हृदय का द्रवीभूत होना है। यह पाठ साधक को मानसिक द्वंद्वों से मुक्ति दिलाकर साक्षात् शिव-सान्निध्य की अनुभूति कराता है। आधुनिक जीवन के तनाव और अनिश्चितता के युग में, 'कालकाल' शिव की यह स्तुति हमें यह सिखाती है कि सब कुछ अंततः उन्हीं ब्रह्म-बीज में विलीन होना है, अतः चिंता का कोई स्थान नहीं है।

विशिष्ट महत्व एवं तात्विक विवेचना (Significance)

असित कृत शिव स्तोत्र का महत्व अन्य स्तुतियों से भिन्न इसलिए है क्योंकि यह 'ब्रह्म-ज्ञान' पर आधारित है:

  • ब्रह्म-बीज का रहस्य: श्लोक ५ में शिव को 'ब्रह्मबीज' कहा गया है, जो यह सिद्ध करता है कि वे ही समस्त ब्रह्मांड के मूल कारण हैं।
  • गुरु तत्व की महिमा: उन्हें 'गुरूणां गुरवे' (गुरुओं के भी गुरु) कहकर संबोधित किया गया है, जो ज्ञान प्राप्ति के लिए अनिवार्य है।
  • मृत्युंजय शक्ति: यह स्तोत्र मृत्यु के भय को मिटाकर जीवन में अभय (Fearlessness) प्रदान करता है।
  • वंश परंपरा: इस स्तोत्र का ब्रह्मा जी से ऋषि असित तक पहुँचने का क्रम इसकी प्रामाणिकता और प्राचीनता को दर्शाता है।

फलश्रुति: पाठ के अद्वितीय लाभ (Benefits from Phala Shruti)

श्लोक ७ से ९ में स्वयं ऋषि ने इस पाठ के फल का वर्णन किया है:
  • वैष्णव पुत्र की प्राप्ति: जो व्यक्ति एक वर्ष तक नियमपूर्वक पाठ करता है, उसे ज्ञानवान, दीर्घजीवी और 'वैष्णव' (धर्मात्मा) पुत्र की प्राप्ति होती है।
  • दरिद्रता का नाश: "भवेद्धनाढ्योऽदुःखी च" — साधक धनवान होता है और उसके जीवन से दुखों का अंत होता है।
  • वाक् सिद्धि: इस स्तोत्र के प्रभाव से गूंगा (मूक) व्यक्ति भी महान पंडित और वक्ता बन सकता है।
  • सुयोग्य जीवनसाथी: अविवाहितों को सुसंस्कारित और पतिव्रता पत्नी/योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।
  • परम पद (मोक्ष): इस लोक में सुख भोगकर अंत में वह शिव के सामीप्य (शिवसन्निधि) को प्राप्त होता है।

पाठ विधि एवं साधना विधान (Ritual Method)

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, इस स्तोत्र की पूर्ण सिद्धि के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन करना लाभकारी है:

पूजा की तैयारी

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4-6 बजे) पाठ के लिए सर्वोत्तम है।
  • आहार नियम: फलश्रुति के अनुसार 'हविष्याशी' (सात्विक आहार) रहकर पाठ करने से एक वर्ष में मनोकामना पूर्ण होती है।
  • शुद्धि: स्नान के उपरांत श्वेत वस्त्र धारण करें और शिवलिंग का पूजन करें।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • जप: स्तोत्र पाठ से पहले 'ॐ नमः शिवाय' का १०८ बार जप करना एकाग्रता बढ़ाता है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. असित कृत शिव स्तोत्रम् किस पुराण से लिया गया है?

यह स्तोत्र ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्मखंड के अंतर्गत आता है।

2. 'मृत्योर्मृत्युस्वरूपेण' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "मृत्यु की भी मृत्यु"। यह महादेव के उस स्वरूप की व्याख्या करता है जो काल और मृत्यु के नियंत्रण से सर्वथा मुक्त है।

3. क्या यह स्तोत्र पुत्र प्राप्ति के लिए प्रभावी है?

जी हाँ, फलश्रुति (श्लोक ८) के अनुसार, जो श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करता है, उसे ज्ञानवान और वैष्णव पुत्र की प्राप्ति होती है।

4. इस स्तोत्र के मुख्य रचयिता कौन हैं?

इसके मुख्य रचयिता महर्षि असित हैं, जिन्होंने ब्रह्मा जी द्वारा दी गई विद्या को शिव स्तुति के रूप में प्रकट किया।

5. 'मूक भवति पण्डितः' का क्या संदर्भ है?

इसका अर्थ है कि इस स्तोत्र के प्रभाव से कम बुद्धि वाला या बोलने में असमर्थ व्यक्ति भी महादेव की कृपा से विद्वान और ज्ञानी बन जाता है।

6. पाठ के लिए सबसे अच्छा दिन कौन सा है?

सोमवार, मासिक शिवरात्रि और प्रदोष का दिन इस पाठ के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

7. क्या इसे बिना गुरु दीक्षा के पढ़ सकते हैं?

हाँ, यह एक पौराणिक स्तुति है। कोई भी शिव भक्त इसे शुद्ध मन और पवित्रता के साथ पढ़ सकता है।

8. 'हविष्याशी' होने का क्या अर्थ है?

हविष्य का अर्थ है सात्विक भोजन (जैसे बिना प्याज-लहसुन का भोजन)। अनुष्ठान के दौरान ऐसा आहार लेने से चित्त की शुद्धि बनी रहती है।

9. क्या यह स्तोत्र धन प्राप्ति में सहायक है?

हाँ, स्तोत्र में स्पष्ट कहा गया है कि इसका पाठ करने वाला 'धनाढ्य' और 'अदुःखी' (दुख रहित) होता है।

10. क्या महिलाएं इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

निश्चित रूप से। भक्ति में कोई भेदभाव नहीं है। महिलाएं सुख-समृद्धि और पारिवारिक शांति के लिए इसका पाठ कर सकती हैं।