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Anamaya Stotram – अनामय स्तोत्रम्: रोगों का नाश और शिव कृपा प्राप्ति का अमोघ पाठ

Anamaya Stotram – अनामय स्तोत्रम्: रोगों का नाश और शिव कृपा प्राप्ति का अमोघ पाठ
॥ अनामय स्तोत्रम् ॥ तृष्णातन्त्रे मनसि तमसा दुर्दिने बन्धुवर्ती मादृग्जन्तुः कथमधिकरोत्यैश्वरं ज्योतिरग्र्यम् । वाचः स्फीता भगवति हरेस्सन्निकृष्टात्मरूपा- स्स्तुत्यात्मानस्स्वयमिवमुखादस्य मे निष्पतन्ति ॥ १ ॥ वेधा विष्णुर्वरुणधनदौ वासवो जीवितेश- श्चन्द्रादित्यौ वसव इति या देवता भिन्नकक्ष्याः । मन्ये तासामपि न भजते भारती ते स्वरूपं स्थूले त्वंशे स्पृशति सदृशं तत्पुनर्मादृशोऽपि ॥ २ ॥ तन्नस्थाणोस्स्तुतिरतिभरा भक्तिरुच्चैर्मुखी चे- द्ग्राम्यस्तोता भवति पुरुषः कश्चिदारण्यको वा । नो चेद्भक्तिस्त्वयि च यदि वा ब्रह्मविद्यात्वधीते नानुध्येयस्तव पशुरसावात्मकर्मानभिज्ञः ॥ ३ ॥ विश्वं प्रादुर्भवति लभते त्वामधिष्ठायकं चे- न्नेह्युत्पत्तिर्ययदि जनयिता नास्ति चैतन्ययुक्तः । क्षित्यादीनां भव निजकलावत्तया जन्मवत्ता सिध्यत्येवं सति भगवतस्सर्वलोकाधिपत्यम् ॥ ४ ॥ भोग्यामाहुः प्रकृतिमृषयश्चेतनाशक्तिशून्यां भोक्ता चैनां परिणमयितुं बुद्धिवर्ती समर्थः । भोगोप्यस्मिन् भवति मिथुने पुष्कलस्तत्र हेतु- र्नीलग्रीव त्वमसि भुवनस्थापनासूत्रधारः ॥ ५ ॥ भिन्नावस्थं जगति बहुना देशकालप्रभेदा- द्द्वाभ्यां पापान्यभिगिरि हरन् योनवद्यः क्रमाभ्याम् । प्रेक्ष्यारूढस्सृजति नियमादस्य सर्वं हि यत्त- त्सर्वज्ञत्वं त्रिभुवन सृजा यत्र सूत्रं न किञ्चित् ॥ ६ ॥ चारूद्रेके रजसि जगतां जन्मसत्वे प्रकृष्टे यात्रां भूयस्तमसि बहुले बिभ्रतस्संहृतिं च । ब्रह्माद्यैतत्प्रकृतिगहनं स्तंभपर्यन्तमासी- त्क्रीडावस्तु त्रिनयन मनोवृत्तिमात्रानुगं ते ॥ ७ ॥ कृत्तिश्चित्रा निवसनपदे कल्पिता पौण्डरीकी वासागारं पितृवनभुवं वाहनं कश्चिदुक्षा । एवं प्राहुः प्रलघुहृदया यद्यपि स्वार्थपोषं त्वां प्रत्येकं ध्वनति भगवन्नीश इत्येष शब्दः ॥ ८ ॥ क्लृप्ताकल्पः किमयमशिवैरस्थिमुख्यैः पदार्थैः कस्स्यादस्य स्तनकलशयोर्भारनम्रा भवानी । पाणौ खण्डः परशुरिदमप्यक्षसूत्रं किमस्ये- त्या चक्षाणो हर कृतधियामस्तु हास्यैकवेद्यः ॥ ९ ॥ यत्कापालव्रतमपि महद्दृष्टमेकान्तघोरं मुक्तेरध्वा स पुनरमलः पावनः किं न जातः । दाक्षायण्यां प्रियतमतया वर्तते योगमाया सा स्याद्धत्ते मिथुनचरितं वृद्धिमूलं प्रजानाम् ॥ १० ॥ कश्चिन्मर्त्यः क्रतुकृशतनुर्नीलकण्ठ त्वया चे- द्दृष्टिस्निग्धस्स पुनरमरस्त्रीभुजग्राह्यकण्ठः । अप्यारूढस्सुरपरिवृतं स्थानमाखण्डलीयं त्वं चेत्क्रुद्धस्स पतति निरालंबनो ध्वान्तजाले ॥ ११ ॥ शश्वद्बाल्यं शरवणभवं षण्मुखं द्वादशाक्षं तेजो यत्ते कनकनलिनीपद्मपत्रावदातम् । विस्मार्यन्ते सुरयुवतयस्तेन सेन्द्रावरोधा दैत्येन्द्राणामसुरजयिनां बन्धनागारवासम् ॥ १२ ॥ वेगाकृष्टग्रहरविशशिव्यश्नुवानं दिगन्ता- न्न्यक्कुर्वाणं प्रलयपयसामूर्मिभङ्गावलेपम् । मुक्ताकारं हर तव जटाबद्धसंस्पर्शि सद्यो जज्ञे चूडा कुसुमसुभगं वारि भागीरथीयम् ॥ १३ ॥ कल्माषस्ते मरकतशिलाभङ्गकान्तिर्न कण्ठे न व्याचष्टे भुवनविषयां त्वत्प्रसादप्रवृत्तिम् । वारां गर्भस्सहि विषमयो मन्दरक्षोभजन्मा नैवं रुद्धो यदि न भवति स्थावरं जङ्गमं वा ॥ १४ ॥ सन्धायास्त्रं धनुषि नियमोन्माथि सम्मोहनाख्यं पार्श्वे तिष्ठन् गिरिशसदृशे पञ्चबाणो मुहूर्तम् । तस्मादूर्ध्वं दहनपरिधौ रोषदृष्टि प्रसूते रक्ताशोकस्तबकित इव प्रान्तधूमद्विरेफः ॥ १५ ॥ लङ्कानाथं लवणजलधिस्थूलवेलोर्मिदीर्घैः कैलासं ते निलयनगरीं बाहुभिः कम्पयन्तम् । आक्रोशद्भिर्वमितरुधिरैराननैराप्लुताक्षै- रापातालानयदलसाबद्धमङ्गुष्ठकर्म ॥ १६ ॥ ऐश्वर्यं तेऽप्यवृणतपतन्नेकमूर्धावशेषः पादद्वन्द्वे दशमुखशिरः पुण्डरीकोपहारः । येनैवासावधिगतफलो राक्षसश्रीविधेय- श्चक्रे देवासुरपरिषदो लोकपालैकशत्रुः ॥ १७ ॥ भक्तिर्बाणा सुरमपि भवत्पादपद्मं स्पृशन्तं स्थानं चन्द्राभरण गमयामास लोकस्य मूर्ध्नि । सह्यस्यापि भ्रुकुटिनयनादग्निदंष्ट्राकरालं द्रष्टुं कश्चिद्वदनमशकद्देवदैत्येश्वरेषु ॥ १८ ॥ पादन्यासान्नमति वसुधा पन्नगस्कन्धलग्ना बाहुक्षेपाद्ग्रहगणयुतं घूर्णते मेघबृन्दम् । उत्साद्यन्ते क्षणमिव दिशो हुङ्कृतेनातिमात्रं भिन्नावस्थं भवति भुवनं त्वय्युपक्रान्तनृत्ते ॥ १९ ॥ नोर्ध्वं गम्यं सरसिजभुवो नाप्यधश्शार्ङ्गपाणे- रासीदन्तस्तव हुतवहस्तं भमूर्त्या स्थितस्य । भूयस्ताभ्यामुपरि लघुना विस्मयेन स्तुवद्भ्यां कण्ठे कालं कपिलनयनं रूपमाविर्बभूव ॥ २० ॥ श्लाघ्यां दृष्टिं दुहितरि गिरेर्न्यस्य चापोर्ध्वकोट्यां कृत्वा बाहुं त्रिपुरविजयानन्तरं ते स्थितस्य । मन्दाराणां मधुरसुरभयो वृष्टयः पेतुरार्द्रा- स्स्वर्गोद्यानभ्रमरवनितादत्तदीर्घानुयाताः ॥ २१ ॥ उद्धृत्यैकं नयनमरुणं स्निग्धतारापरागं पूर्णेथाद्यः परमसुलभे दुष्कराणां सहस्रे । चक्रं भेजे दहनजटिलं दक्षिणं तस्य हस्तं बालस्येव द्यूतिवलयितं मण्डलं भास्करस्य ॥ २२ ॥ विष्णुश्चक्रे करतलगते विष्टपानां त्रयाणां दत्ताश्वासो दनुसुतशिरश्छेददीक्षां बबन्ध । प्रत्यासन्नं तदपि नयनं पुण्डरीकानुकारि श्लाघ्या भक्तिस्त्रिनयन भवत्यर्पिता किं न सूते ॥ २३ ॥ सव्ये शूलं त्रिशिखमपरे दोष्णि भिक्षाकपालं सोमो मुग्धश्शिरसि भुजगः कश्चिदंसोत्तरीयः । कोऽयं वेषस्त्रिनयन कुतो दृष्ट इत्यद्रिकन्या प्रायेण त्वां हसति भगवन् प्रेमनिर्यन्त्रितात्मा ॥ २४ ॥ आर्द्रं नागाजिनमवयवग्रन्थिमद्बिभ्रदंसे रूपं प्रावृड्घनरुचिमहाभैरवं दर्शयित्वा । पश्यन् गौरीं भयचल करालंबित स्कन्धहस्तां मन्ये प्रीत्या दृढ इति भवान् वज्रदेहेऽपि जातः ॥ २५ ॥ व्यालाकल्पा विषमनयना विद्रुमाताम्रभासो जायामिश्रा जटिलशिरसश्चन्द्ररेखावतंसाः । नित्यानन्दा नियतललितास्स्निग्धकल्माषकण्ठाः देवा रुद्रा धृतपरशवस्ते भविष्यन्ति भक्ताः ॥ २६ ॥ मन्त्राभ्यासो नियमविधयस्तीर्थयात्रानुरोधो ग्रामे भिक्षाचरणमुटजे बीजवृत्तिर्वने वा इत्यायासे महति रमतामप्रगल्भः फलार्थे स्मृत्वेवाहं तवचरणयोर्निर्वृतिं साधयामि ॥ २७ ॥ आस्तां तावत्स्नपनमुपरिक्षीरधाराप्रवाहै- स्स्नेहाभ्यङ्गो भवनकरणं गन्धधूपार्पणं वा । यस्ते कश्चित्किरति कुसुमान्युद्दिशन् पादपीठं भूयो नैष भ्रमति जननीगर्भकारागृहेषु ॥ २८ ॥ मुक्ताकारं मुनिभिरनिशं चेतसि ध्यायमानं मुक्तागौरं शिरसिजटिले जाह्नवीमुद्वहन्तम् । नानाकारं नम्रशशिकलाशेखरं नागहारं नारीमिश्रं धृतनरशिरोमाल्यमीशं नमामि ॥ २९ ॥ तिर्यग्योनौ त्रिदशनिलये मानुषे राक्षसे वा यक्षावासे विषधरपुरे देव विद्याधरे वा । यस्मिन् कस्मिंत्सुकृतनिलये जन्मनि श्रेयसे वा भूयाद्युष्मच्चरणकमलध्यायिनी चित्तवृत्तिः ॥ ३० ॥ वन्दे रुद्रं वरदममलं दण्डिनं मुण्डधारिं दिव्यज्ञानं त्रिपुरदहनं शङ्करं शूलपाणिम् । तेजोराशिं त्रिभुवनगुरुं तीर्थमौलिं त्रिनेत्रं कैलासस्थं धनपतिसखं पार्वतीनाथमीशम् ॥ ३१ ॥ योगी भोगी विषभुगमृतश्शस्त्रपाणिः तपस्वी शान्तः क्रूरः शमितविषयः शैलकन्यासहायः । भिक्षावृत्तिस्त्रिभुवनपतिः शुद्धिमानस्थिमाली शक्यो ज्ञातुं कथमिव शिव त्वं विरुद्धस्वभावः ॥ ३२ ॥ उपदिशती यदुच्चैर्ज्योतिराम्नायविद्यां परम परमदूरं दूरमाद्यन्तशून्याम् । त्रिपुरजयिनी तस्मिन् देवदेवे निविष्टां भगवति परिवर्तोन्मादिनी भक्तिरस्तु ॥ ३३ ॥ इति विरचितमेतच्चारुचन्द्रार्धमौले- र्ललितपदमुदारं दण्डिना पण्डितेन । स्तवनमवनकामेनात्मनोऽनामयाख्यं भवति विगतरोगो जन्तुरेतज्जपेन ॥ ३४ ॥ स्तोत्रं सम्यक्परमविदुषा दण्डिना वाच्यवृत्ता- न्मन्दाक्रान्तान् त्रिभुवनगुरोः पार्वतीवल्लभस्य । कृत्वा स्तोत्रं यदि सुभगमाप्नोति नित्यं हि पुण्यं तेन व्याधिं हर हर नृणां स्तोत्रपाठेन सत्यम् ॥ ३५ ॥ ॥ इति दण्डिविरचितं अनामयस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

अनामय स्तोत्रम् — विस्तृत परिचय एवं दार्शनिक विवेचना (Introduction)

अनामय स्तोत्रम् (Anamaya Stotram) भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत गूढ़ और दार्शनिक पाठ है, जिसकी रचना प्रसिद्ध संस्कृत महाकवि दण्डी (Dandin) ने की है। वे भारतीय साहित्य इतिहास के उन नक्षत्रों में से हैं जिनकी लेखनी में काव्य सौंदर्य और भक्ति का अनूठा संगम मिलता है। "अनामय" शब्द दो संस्कृत शब्दों के योग से बना है—'अ' (नहीं) और 'नामय' (रोग या विकार)। अतः यह स्तोत्र उस परमात्मा की स्तुति है जो समस्त व्याधियों, दुखों और सांसारिक विकारों से सर्वथा मुक्त है और जो अपने भक्तों को भी उसी आरोग्यमय अवस्था में ले जाने में सक्षम है।

रचना का सौंदर्य: यह स्तोत्र 'मंदाक्रांता' छंद में रचा गया है, जो वही छंद है जिसका उपयोग महाकवि कालिदास ने 'मेघदूतम्' में किया था। ३५ श्लोकों का यह प्रवाह साधक को शिव के निर्गुण (निराकार) और सगुण (साकार) दोनों रूपों की यात्रा कराता है। प्रथम श्लोक में कवि स्वीकार करता है कि अज्ञान के अंधकार में भटकने वाला सामान्य मनुष्य उस परम ऐश्वर्यशाली ज्योति का वर्णन कैसे कर सकता है? किंतु, महादेव की अहैतुकी कृपा से वाणी स्वयं ही मुख से प्रस्फुटित होने लगती है।

तात्विक अर्थ: स्तोत्र के मध्य में कवि शिव को "भुवनस्थापनासूत्रधारः" (सृष्टि के सूत्रधार) कहते हैं। वे समझाते हैं कि प्रकृति जड़ है और उसे गति प्रदान करने वाली चेतना केवल शिव हैं। श्लोक ७ में ब्रह्मा से लेकर एक छोटे स्तंभ (तृण) तक की समस्त सृष्टि को महादेव का 'क्रीड़ा-वस्तु' (खेल का सामान) बताया गया है, जो उनकी एक इच्छा मात्र से संचालित होती है। यह दर्शन साधक को यह बोध कराता है कि जीवन की समस्त बाधाएं भी उसी ईश्वरीय खेल का हिस्सा हैं।

अनामय का रहस्य: महाकवि दण्डी इस स्तोत्र के अंत में (श्लोक ३४-३५) स्पष्ट करते हैं कि जो भी मनुष्य "अनामय" नामक इस स्तुति का पाठ करता है, वह न केवल शारीरिक रोगों (Vigata-rogo) से मुक्त होता है, बल्कि उसे वह 'अनामय' पद प्राप्त होता है जहाँ जन्म और मृत्यु का भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है। यह स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक चिकित्सा (Spiritual Healing) है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

अनामय स्तोत्रम् का आध्यात्मिक जगत में विशेष स्थान निम्नलिखित कारणों से है:

  • विद्वतापूर्ण स्तुति: यह स्तोत्र अन्य सामान्य स्तोत्रों की तुलना में अधिक साहित्यिक और दार्शनिक है, जो उच्च कोटि के साधकों को आकर्षित करता है।
  • विरोधाभासी स्वरूप का वर्णन: श्लोक ३२ में शिव के 'योगी-भोगी', 'शांत-क्रूर' और 'भिक्षुक-त्रिभुवनपति' जैसे परस्पर विरोधी गुणों का वर्णन कर उनकी महिमा को अगाध बताया गया है।
  • आरोग्य मंत्र: परंपरा के अनुसार, लंबी बीमारी या असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए इसका पाठ किसी संजीवनी से कम नहीं माना जाता।
  • शरणगति का भाव: कवि स्पष्ट करता है कि तीर्थ यात्रा या कठिन तपस्या से भी बढ़कर शिव के चरणों का स्मरण मात्र ही मुक्ति का द्वार खोल देता है।

फलश्रुति: पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits)

दण्डी विरचित इस स्तोत्र की अंतिम फलश्रुति अत्यंत गौरवशाली है:
  • रोग मुक्ति (Healing): "भवति विगतरोगो जन्तुरेतज्जपेन"—अर्थात् इस जप से प्राणी रोगों से मुक्त हो जाता है।
  • पाप नाश: जीवन में अनजाने में किए गए पापों का क्षय होता है और चित्त शुद्ध होता है।
  • मानसिक स्थिरता: चिंता, भय और अवसाद (Depression) के समय इसका पाठ मन को अपार शांति प्रदान करता है।
  • गर्भ-वास से मुक्ति: श्लोक २८ के अनुसार, जो शिव के चरणों में पुष्प अर्पित कर इसका पाठ करता है, वह पुनः जन्म के कारागार (गर्भ) में नहीं भटकता।
  • समस्त सुखों की प्राप्ति: साधक को संसार के समस्त ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं और अंत में शिवलोक की प्राप्ति होती है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method)

यद्यपि महादेव भाव के भूखे हैं, किंतु महाकवि दण्डी के इस विशिष्ट स्तोत्र का पाठ कुछ नियमों के साथ करना अधिक प्रभावी होता है।

साधना के नियम

  • समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या संध्या समय (प्रदोष काल) सर्वश्रेष्ठ है।
  • शुद्धि: श्वेत वस्त्र धारण करें और भस्म या चंदन का तिलक लगाएं।
  • दिशा: उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें, जो महादेव के कैलाश की दिशा मानी जाती है।
  • पूजा: शिवलिंग पर जल या दुग्ध अभिषेक करते हुए स्तोत्र का पाठ करें।
  • संकल्प: यदि किसी विशेष रोग की शांति के लिए पाठ कर रहे हैं, तो हाथ में जल लेकर संकल्प अवश्य करें।

विशेष अवसर

  • महाशिवरात्रि: इस दिन रात्रि के चारों प्रहरों में इसका पाठ महापुण्यदायी है।
  • प्रदोष व्रत: त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में पाठ करने से मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं।
  • सोमवार: प्रत्येक सोमवार को इस स्तोत्र का पाठ घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. अनामय स्तोत्रम् के रचयिता कौन हैं?

इस स्तोत्र की रचना प्रसिद्ध संस्कृत महाकवि दण्डी (Pandita Dandin) ने की है, जो अपनी काव्य शैली 'दण्डिनः पदलालित्यम्' के लिए विख्यात हैं।

2. 'अनामय' का क्या अर्थ होता है?

संस्कृत में 'नामय' का अर्थ रोग या दुख है, और 'अनामय' का अर्थ है जो इन सबसे रहित हो। यह भगवान शिव का एक विशेषण है जो पूर्ण आरोग्य प्रदान करते हैं।

3. क्या यह स्तोत्र शारीरिक बीमारियों को ठीक कर सकता है?

हाँ, स्तोत्र के अंतिम श्लोकों में स्पष्ट उल्लेख है कि इसके श्रद्धापूर्वक जप से प्राणी रोगों से मुक्त हो जाता है। यह मानसिक और शारीरिक आरोग्य का अचूक मार्ग है।

4. इस स्तोत्र में किस छंद का प्रयोग हुआ है?

इसमें 'मंदाक्रांता' छंद का प्रयोग हुआ है। यह छंद अत्यंत लयबद्ध और भावपूर्ण होता है, जिसे विशेष गति से गाया जाता है।

5. क्या इसे बिना संस्कृत ज्ञान के पढ़ा जा सकता है?

यद्यपि शुद्ध उच्चारण का अपना महत्व है, किंतु यदि आप इसका अर्थ समझकर भक्ति भाव से इसे सुनते भी हैं, तो महादेव की कृपा समान रूप से प्राप्त होती है।

6. अनामय स्तोत्रम् में कुल कितने श्लोक हैं?

इस संपूर्ण स्तोत्र में ३५ (35) श्लोक हैं, जिसमें शिव की महिमा, उनके रूप और अंत में फलश्रुति दी गई है।

7. क्या इस स्तोत्र का पाठ रात्रि में किया जा सकता है?

हाँ, शिव उपासना के लिए रात्रि (विशेषकर प्रदोष काल) अत्यंत शुभ मानी जाती है। महाशिवरात्रि पर रात्रि पाठ का अनंत फल है।

8. 'योगनिद्रा' का इस स्तोत्र में क्या संदर्भ है?

श्लोक ३३ के आसपास कवि शिव की शक्ति को 'योगनिद्रा' कहते हैं, जो सृष्टि के संचालन का आधार है और चेतना की वह अवस्था है जहाँ शिव और शक्ति एक हो जाते हैं।

9. क्या यह स्तोत्र मोक्ष प्रदायक है?

जी हाँ, कवि कहते हैं कि इसका पाठ करने वाला पुन: गर्भ के कारागार (पुनर्जन्म) में नहीं आता, जो कि मोक्ष की ही अवस्था है।

10. क्या बच्चों के स्वास्थ्य के लिए इसका पाठ किया जा सकता है?

निश्चित रूप से। माता-पिता अपने बच्चों के आरोग्य और दीर्घायु के लिए महादेव के सम्मुख इसका पाठ कर सकते हैं।