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आदित्यहृदय स्तोत्रम् (पद्मपुराण)

Aditya Hridayam Stotram (Padma Purana)

आदित्यहृदय स्तोत्रम् (पद्मपुराण)
॥ अथ श्रीपद्मपुराणोक्त निरोगकारी आदित्यहृदयप्रयोगः ॥ आदित्यः प्रथमं नाम द्वितीयं तु दिवाकरः । तृतीयं भास्करः प्रोक्तं चतुर्थं च प्रभाकरः ॥ पञ्चमं च सहस्रांशु षष्ठं चैव त्रिलोचनः । सप्तमं हरिदश्वं च अष्टमं तु अहर्पतिः ॥ नवमं दिनकरः प्रोक्तं दशमं द्वादशात्मकः । एकादशं त्रिमूर्तिश्च द्वादशं सूर्य एव तु ॥ ॥ फलश्रुति ॥ द्वादशादित्यनामानि प्रातःकाले पठेन्नरः । दुःस्वप्नो नश्यते तस्य सर्वदुःखं च नश्यति ॥ दद्रुकुष्टहरं चैव दारिद्र्यं हरते ध्रुवम् । सर्वतीर्थकरं चैव सर्वकामफलप्रदम् ॥ यः पठेत् प्रातरुत्थाय भक्त्या स्तोत्रमिदं नरः । सौख्यमायुस्तथारोग्यं लभते मोक्षमेव च ॥ ॥ सूर्यस्य द्वादशनाम नमस्कारम् ॥ १. ॐ आदित्याय नमः । २. ॐ दिवाकराय नमः । ३. ॐ भास्कराय नमः । ४. ॐ प्रभाकराय नमः । ५. ॐ सहस्रांशवे नमः । ६. ॐ त्रिलोचनाय नमः । ७. ॐ हरिदश्वाय नमः । ८. ॐ विभावसवे नमः । ९. ॐ दिनकराय नमः । १०. ॐ द्वादशात्मकाय नमः । ११. ॐ त्रिमूर्तये नमः । १२. ॐ सूर्याय नमः ॥ ॥ विनियोगः ॥ ॐ अस्य श्रीआदित्यहृदयस्तोत्रमन्त्रस्य श्रीकृष्ण ऋषिः, अनुष्टुप्छन्दः, श्रीसूर्यनारायणो देवता, हरितहयरथं दिवाकरं घृणिरिति बीजं, नमो भगवते जितवैश्वानर जातवेदसे नमः इति शक्तिः, अंशुमानिति कीलकं, अग्नि कर्म इति मन्त्रः, मम सर्वरोगनिवारणाय श्रीसूर्यनारायणप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः । ॥ स्तवः ॥ अर्कं तु मूर्ध्नि विन्यस्य ललाटे तु रविं न्यसेत् । विन्यसेत् करयोः सूर्यं कर्णयोश्च दिवाकरम् ॥ नासिकायां न्यसेत् भानुं मुखे वै भास्करं न्यसेत् । पर्जन्यमोष्ठयोश्चैव तीक्ष्णं जिह्वान्तरे न्यसेत् ॥ सुवर्णरेतसं कण्ठे स्कन्धयोस्तिग्मतेजसम् । बाह्वोस्तु पूषणं चैव मित्रं वै पृष्ठतो न्यसेत् ॥ वरुणं दक्षिणे हस्ते त्वष्टारं वामतः करे । हस्तावुष्णकरः पातु हृदयं पातु भानुमान् ॥ स्तनभारं महातेजा आदित्यमुदरे न्यसेत् । पृष्ठे त्वर्घमणं विद्यादादित्यं नाभिमण्डले ॥ कट्यां तु विन्यसेद्धंसं रुद्रमूर्वो विन्यसेत् । जान्होस्तु गोपतिं न्यस्य सवितारं तु जङ्घयोः ॥ पादयोस्तु विवस्वन्तं गुल्फयोश्च प्रभाकरम् । सर्वाङ्गेषु सहस्रांशु दिग्विदिक्षु भगं न्यसेत् ॥ बाह्यतस्तु तमोघ्नंसं भगमभ्यन्तरे न्यसेत् । एष आदित्यविन्यासो देवानामपि दुर्लभः ॥ ॥ न्यासम् ॥ मूर्ध्नि अर्काय नमः । ललाटे रवये नमः । करयोः सूर्याय नमः । कर्णयोः दिवाकराय नमः । नासिकायां भानवे नमः । मुखे भास्कराय नमः । ओष्ठयोः पर्जन्याय नमः । जिह्वायां तीक्ष्णाय नमः । कण्ठे सुवर्णरेतसे नमः । स्कन्धयोः तिग्मतेजसे नमः । बाह्वोः पूषणाय नमः । पृष्ठे मित्राय नमः । दक्षहस्ते वरुणाय नमः । वामहस्ते त्वष्टारं नमः । हस्तौ उष्णकराय नमः । हृदये भानुमते नमः । स्तनयोः महातेजसे नमः । उदरे आदित्याय नमः । पृष्ठे अर्घमणाय नमः । नाभौ विद्यादादित्याय नमः । कट्यां हंसाय नमः । ऊर्वोः रुद्राय नमः । जान्होः गोपतये नमः । जङ्घयोः सवित्रे नमः । पादयोः विवस्वते नमः । गुल्फयोः प्रभाकराय नमः । सर्वाङ्गे सहस्रांशवे नमः । दिग्विदिक्षु भगाय नमः । बाह्ये तमोघ्नंसाय नमः । अभ्यन्तरे भगाय नमः । ॥ ध्यानम् ॥ भास्वद्रत्नाढ्यमौलिः स्फुरदधररुचारञ्जितश्चारुकेशो भास्वान् यो दिव्यतेजाः करकमलयुतः स्वर्णवर्णः प्रभाभिः । विश्वाकाशावकाशो ग्रहग्रहण सहितो भाति यश्चोदयाद्रौ सर्वानन्दप्रदाता हरिहरनमितः पातु मां विश्वचक्षुः ॥ ॥ अर्घ्यम् ॥ एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशिः जगत्पते । अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर ॥ ॥ मन्त्रम् ॥ ॐ घृणिः सूर्य आदित्य । ॥ सूर्यस्तुतिः ॥ अग्निमीळे नमस्तुभ्यमीषत्तूर्यस्वरूपिणे । अग्न्यायाहि वीतये त्वं नमस्ते ज्योतिषां पते ॥ शन्नो देवो नमस्तुभ्यं जगच्चक्षुर्नमोऽस्तु ते । धवलाम्भोरुहणं डाकिनीं श्यामलप्रभाम् ॥ विश्वदीप नमस्तुभ्यं नमस्ते जगदात्मने । पद्मासनः पद्मकरः पद्मगर्भसमद्युतिः ॥ सप्ताश्वरथसंयुक्तो द्विभुजो भास्करो रविः । आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने ॥ जन्मान्तरसहस्रेषु दारिद्र्यं नोपजायते । नमो धर्मविपाकाय नमः सुकृतसाक्षिणे ॥ नमः प्रत्यक्षदेवाय भास्कराय नमो नमः । उदयगिरिमुपेतं भास्करं पद्महस्तम् । सकलभुवनरत्नं रत्नरत्नाभिधेयम् ॥ तिमिरकरिमृगेन्द्रं बोधकं पद्मिनीनाम् । सुरवरमभिवन्दे सुन्दरं विश्वरूपम् ॥ अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम । तस्मात् कारुण्यभावेन रक्षस्व परमेश्वर ॥ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे श्रीकृष्णार्जुनेसंवादे आदित्यहृदयस्तोत्रम् ॥

आदित्यहृदय स्तोत्र (पद्मपुराण) का परिचय एवं महात्म्य

आदित्यहृदय स्तोत्रम् (Aditya Hridayam Stotram) का यह स्वरूप पद्मपुराण (Padma Purana) के अंतर्गत आता है। हिन्दू धर्म में 'आदित्य हृदय' नाम से मुख्य रूप से दो स्तोत्र सर्वाधिक विख्यात हैं— एक वह जो वाल्मीकि रामायण में महर्षि अगस्त्य ने भगवान राम को सुनाया था, और दूसरा यह जो साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद (कृष्णार्जुन संवाद) के रूप में पद्मपुराण में वर्णित है।

इस विशिष्ट स्तोत्र को 'निरोगकारी आदित्यहृदय प्रयोग' (Nirogakari Aditya Hridaya) कहा जाता है, जिसका अर्थ है सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करने वाला एक तांत्रिक एवं वैदिक प्रयोग। इस स्तोत्र की संरचना अत्यंत वैज्ञानिक है। इसमें मात्र स्तुति ही नहीं है, अपितु भगवान सूर्य के १२ प्रमुख नाम, १२ नाम-नमस्कार, विनियोग, अंग-न्यास (Spiritual Body-Lock), भगवान का भव्य ध्यान (Dhyanam) और अर्घ्य प्रदान करने का पूरा विधान सम्मिलित है।

प्रमुख खण्डों का अर्थ और आध्यात्मिक रहस्य

१. सूर्य के १२ नाम (Dwadasha Aditya Namani):

श्लोकों में स्पष्ट किया गया है कि सूर्य के 12 नाम ब्रह्माण्ड की 12 महत्वपूर्ण शक्तियों के द्योतक हैं— आदित्य (अदिति पुत्र), दिवाकर (दिन करने वाले), भास्कर (प्रकाश बिखेरने वाले), प्रभाकर (प्रभास उत्पन्न करने वाले), सहस्रांशु (हज़ारों किरणों वाले), त्रिलोचन, हरिदश्व (हरे घोड़ों वाले), अहर्पति (दिन के स्वामी), दिनकर, द्वादशात्मक (१२ महीनों का स्वरूप), त्रिमूर्ति (ब्रह्मा-विष्णु-महेश रूप) और सूर्य।

२. फलश्रुति (Phalashruti):

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इन 12 नामों का श्रद्धा से गान करता है, उसके बुरे स्वप्नों का प्रभाव नष्ट हो जाता है (दुःस्वप्नो नश्यते)। यह स्तोत्र कुष्ठ रोग (दद्रुकुष्टहरं) और चमड़ी के गंभीर रोगों का नाश करता है, तथा अटल दरिद्रता (Poverty) को जड़ से उखाड़ फेंकता है।

३. न्यास (Surya Nyasa Video & Meaning):

न्यास तंत्र-शास्त्र की एक गूढ़ प्रक्रिया है। इस स्तोत्र में मस्तक (मूर्ध्नि) से लेकर चरणों (पादयोः) तक भगवान सूर्य के विभिन्न स्वरूपों (जैसे— ललाट पर रवि, नेत्रों में भास्कर, हृदय में भानुमान) को अपनी उंगलियों से स्पर्श करते हुए स्थापित किया जाता है। इससे मनुष्य का साधारण शरीर एक 'दिव्य रक्षण-कवच' (Aura Shield) से जुड़ जाता है।

४. ध्यानम् एवं अर्घ्य (Dhyanam and Arghya):

ध्यान के समय साधक सूर्य देव का स्मरण करता है— "जिनके सिर पर मनमोहक रत्नों का मुकुट है, जिनके लाल होंठों से सुंदर चमक बिखर रही है, जो स्वर्ण वर्ण (Saffron/Golden) के हैं और दोनों हाथों में कमल धारण किए हुए हैं, ऐसे हरि-हर द्वारा नमस्कृत विश्वचક્ષु (संसार की आंख) सूर्यदेव मेरी रक्षा करें।" तदुपरांत ॐ घृणिः सूर्य आदित्य मंत्र से अर्घ्य दिया जाता है।

निरोगकारी आदित्य हृदय स्तोत्र के असीमित लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र में श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन को विश्वास दिलाते हैं कि इसका 'दिने-दिने' (प्रतिदिन) पाठ करने वाला भक्त कभी पराजित नहीं होता। इसके कुछ मुख्य चमत्कारिक लाभ इस प्रकार हैं:

  • गंभीर त्वचा रोगों का नाश (Cures Skin Diseases): जिस प्रकार 'साम्ब पञ्चाशिका' कुष्ठ रोग नाशक है, उसी प्रकार यह स्तोत्र भी त्वचा संबंधी असाध्य रोगों (Leprosy, Eczema) में प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाता है।
  • अखंड आरोग्य एवं दीर्घायु (Health and Longevity): हृदय रोग, नेत्र रोग एवं उदर (पेट) संबंधी व्याधियों में अंग-न्यास के साथ यह पाठ करने से अद्भुत स्वास्थ्य लाभ (Healing Energy) मिलता है।
  • दरिद्रता का अंत (Removes Poverty): "जन्मान्तरसहस्रेषु दारिद्र्यं नोपजायते"— अर्थात् जो इसका पाठ करता है, उसे हज़ारों जन्मों तक आर्थिक संकट या घोर दरिद्रता का मुख नहीं देखना पड़ता।
  • भय और दुःस्वप्न मुक्ति (Overcoming Fear): यदि किसी को डरावने सपने आते हों (Nightmares) या अज्ञात भय (Anxiety) सताता हो, तो सोने से पूर्व या उठते ही इसके 12 नामों का स्मरण एक रक्षा-कवच बना देता है।
  • नवग्रह दोष निवारण (Navagraha Shanti): सूर्य सभी नवग्रहों के राजा हैं। सूर्य के प्रसन्न होने से शनि (Shani), राहु-केतु और मंगल जैसे क्रूर ग्रहों का दुष्प्रभाव भी शांति में बदल जाता है।

पूजन एवं पाठ की प्रामाणिक विधि (How to Chant)

पद्मपुराण में उल्लिखित इस सम्पूर्ण प्रयोग को यदि विधि-विधान से किया जाए, तो इसका फल सहस्त्र गुना बढ़ जाता है:

  • ब्रह्ममुहूर्त अनुष्ठान: पाठ के लिए प्रातःकाल सूर्योदय का समय सर्वश्रेष्ठ है। लाल रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • न्यास विधान: स्तोत्र में जहाँ "अर्कं तु मूर्ध्नि विन्यस्य..." लिखा है, वहां क्रमशः अपने शरीर के अंगों (सिर, माथा, आंखें, কান, नाक, गला, कंधे, हृदय, नाभि, घुटने और पैर) को दायें हाथ की उंगलियों से स्पर्श करें।
  • अर्घ्य दान: पाठ के पश्चात तांबे के कलश में लाल चंदन (रोली), अक्षत (साबुत चावल), लाल पुष्प और शुद्ध जल भर लें। अर्घ्य मंत्र (एहि सूर्य सहस्रांशो...) पढ़कर भगवान सूर्य देव की ओर मुख करके जल अर्पित करें।
  • निरंतरता (Consistency): सर्वोत्तम लाभ के लिए इसका प्रतिदिन (Daily) पाठ करें। यदि समय कम हो, तो कम से कम सूर्योदय के समय सूर्य के 12 नामों का उच्चारण अवश्य करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न — Frequently Asked Questions (FAQ)

1. पद्मपुराण का आदित्यहृदय स्तोत्र बाल्मीकि रामायण वाले आदित्यहृदय से कैसे अलग है?

रामायण का आदित्य हृदय महर्षि अगस्त्य द्वारा भगवान श्रीराम को युद्ध से पूर्व विजय के लिए सुनाया गया था। जबकि यह पद्मपुराण का स्तोत्र भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को मुख्य रूप से 'रोग निवारण' (Nirogakari) और स्वास्थ्य प्राप्ति के लिए बताया गया है।

2. इस स्तोत्र में सूर्य देव के कौन से 12 मुख्य नामों का उल्लेख है?

इसमें आदित्य, दिवाकर, भास्कर, प्रभाकर, सहस्रांशु, त्रिलोचन, हरिदश्व, अहर्पति, दिनकर, द्वादशात्मक, त्रिमूर्ति और सूर्य— इन 12 नामों का नित्य प्रातः स्मरण करने का विधान है।

3. इस स्तोत्र को 'निरोगकारी आदित्यहृदय प्रयोग' क्यों कहा जाता है?

क्योंकि इसकी फलश्रुति में स्पष्ट वर्णित है कि इसके पाठ से 'दद्रुकुष्टहरं' अर्थात भयंकर कुष्ठ और त्वचा संबंधी रोग (Skin Diseases) नष्ट हो जाते हैं और उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती है।

4. इस स्तोत्र का नित्य पाठ करने का सबसे उत्तम समय क्या है?

इसे 'प्रातःकाले पठेन्नरः' कहा गया है। अर्थात सूर्योदय के समय या कम से कम प्रातः काल स्नान के बाद इसका पाठ करना सबसे अधिक लाभकारी है।

5. क्या इस स्तोत्र के पाठ से जन्म-कुंडली के सूर्य दोष दूर होते हैं?

हाँ, नवग्रहों के राजा सूर्य की इस प्रबल स्तुति और 12 नामों के गान से नीच का सूर्य, राहु-केतु द्वारा ग्रहण दोष और आत्मविश्वास की कमी जैसे सभी सूर्य-जनित दोष पूर्णतः शांत होते हैं।

6. न्यास (Nyasa) और विनियोग (Viniyoga) का इस स्तोत्र में क्या महत्त्व है?

विनियोग के द्वारा हम संकल्प लेते हैं कि हम यह पाठ रोग निवारण के लिए कर रहे हैं, और न्यास (अंगों को छूकर मंत्र पढ़ना) के माध्यम से सूर्य के तेज को अपने ही शरीर के विभिन्न अंगों (हृदय, ललाट, नेत्र आदि) में स्थापित करते हैं, जिससे शरीर ऊर्जामय हो जाता है।

7. ध्यान श्लोक में भगवान सूर्य का कैसा स्वरूप वर्णित है?

ध्यान में सूर्य देव को मस्तक पर मणि धारण किये, लाल अधरों वाले, दोनों हाथों में कमल लिए, स्वर्ण के समान वर्ण वाले और हरि-हर (विष्णु-शिव) द्वारा नमस्कृत 'विश्वचक्षु' (संसार की आंख) के रूप में चित्रित किया गया है।

8. इस स्तोत्र के पाठ से दरिद्रता का नाश कैसे होता है?

श्लोक कहता है 'जन्मन्तरसहस्रेषु दारिद्र्यं नोपजायते'—अर्थात जो नित्य सूर्य को नमस्कार करता है, उसे हज़ारों जन्मों तक दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ता, क्योंकि सूर्य तेज, कर्म और सफलता के कारक हैं।

9. क्या केवल रविवार को इसका पाठ करना पर्याप्त है?

रविवार सूर्य देव का विशेष दिन है, इस दिन पाठ करना अत्यंत शुभ है। परंतु गंभीर रोग निवारण और स्थायी लाभ के लिए (दिने दिने कुर्वन्ति) प्रतिदिन इसका गान करना चाहिए।

10. अर्घ्यम् मंत्र का प्रयोग कैसे करना चाहिए?

प्रातःकाल तांबे के लोटे में जल, लाल पुष्प और रोली डालकर 'एहि सूर्य सहस्रांशो...' श्लोक और 'ॐ घृणिः सूर्य आदित्य' मंत्र पढ़ते हुए भगवान भास्कर को पूर्व दिशा में मुख करके जल अर्पण करना चाहिए।