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Vaishnava Puja Poorvangam - वैष्णव पूजा पूर्वांग (आरंभिक विधि)

Vaishnava Puja Poorvangam - वैष्णव पूजा पूर्वांग (आरंभिक विधि)

वैष्णव पूजा पूर्वांग (आरंभिक विधि)

Vaishnava Puja Poorvangam

वैष्णव पूजा पूर्वांग
यह वैष्णव सम्प्रदाय (Vaishnava Sampradaya) की पूजा पद्धति का प्रारंभिक चरण है। भगवान विष्णु या उनके अवतारों (राम, कृष्ण, नरसिंह आदि) की पूजा शुरू करने से पहले शरीर और मन की शुद्धि के लिए ये क्रियाएँ अनिवार्य मानी जाती हैं। इसमें आचमन, प्राणायाम, भूतशुद्धि और संकल्प प्रमुख हैं।

॥ पूजा विधानम् – पूर्वाङ्गम् (वैष्णव पद्धतिः) ॥ श्री गुरुभ्यो नमः । हरिः ओम् । शुचिः (पवित्र होने की भावना करें) अपवित्रः पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥ पुण्डरीकाक्ष पुण्डरीकाक्ष पुण्डरीकाक्ष ॥ आचम्य (तीन बार जल पियें) ओं अच्युताय नमः । ओं अनन्ताय नमः । ओं गोविन्दाय नमः ॥ (हाथ धोकर अंग स्पर्श करें) ओं केशवाय नमः । ओं नारायणाय नमः । ओं माधवाय नमः । ओं गोविन्दाय नमः । ओं विष्णवे नमः । ओं मधुसूदनाय नमः । ओं त्रिविक्रमाय नमः । ओं वामनाय नमः । ओं श्रीधराय नमः । ओं हृषीकेशाय नमः । ओं पद्मनाभाय नमः । ओं दामोदराय नमः ॥ प्रार्थना (विघ्न निवारण के लिए) शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परश्शतम् । विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥ तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव । विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेऽङ्घ्रियुगं स्मरामि ॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयोभूतिर्धृवा नीतिर्मतिर्मम ॥ स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते । पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम् ॥ सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम् । येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनो हरिः ॥ आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् । लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥ नमस्कारम् ओं नमः सदसे । नमः सदसस्पतये । नमः सखीनां पुरोगाणां चक्षुषे । नमो दिवे । नमः पृथिव्यै । सप्रथ सभां मे गोपाय । ये च सभ्याः सभासदः । तानिन्द्रियावतः कुरु । सर्वमायुरुपासताम् ॥ सर्वेभ्यः श्रीवैष्णवेभ्यो नमः ॥ पवित्र धारणम् (अनामिका उंगली में पवित्र/अंगूठी धारण करें) इदं ब्रह्म पुनीमहे । ब्रह्मा पुनातु । आसनम् (आसन शुद्धि) आसन मन्त्रस्य पृथिव्याः, मेरुपृष्ठ ऋषिः, सुतलं छन्दः, श्रीकूर्मो देवता, आसने विनियोगः ॥ अं अनन्तासनाय नमः । रं कूर्मासनाय नमः । विं विमलासनाय नमः । पं पद्मासनाय नमः । प्राणायामम् (श्वास नियन्त्रण) प्रणवस्य परब्रह्म ऋषिः, देवी गायत्री छन्दः, परमात्मा देवता, प्राणायामे विनियोगः ॥ ओं भूः । ओं भुवः । ओग्‍ं सुवः । ओं महः । ओं जनः । ओं तपः । ओग्‍ं सत्यम् । ओं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ ओमापो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवस्सुवरोम् ॥ सङ्कल्पम् (हाथ में अक्षत, पुष्प और जल लेकर) श्रीगोविन्द गोविन्द गोविन्द । श्रीमहाविष्णोराज्ञया भगवत्कैङ्कर्यरूपं शुभाभ्युदयार्थं च शुभे शोभने मङ्गले मुहूर्ते अत्र पृथिव्यां जम्बूद्वीपे भरत वर्षे भरतखण्डे मेरोर्दक्षिणदिग्भागे श्रीरङ्गस्य ___ दिक्प्रदेशे ___, ___ नद्योः मध्यदेशे मङ्गलप्रदेशे समस्तदेवता भगवद्भागवताचार्य सन्निधौ ब्रह्मणः द्वितीयपरार्थे श्रीश्वेतवराहकल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे कलियुगे प्रथमपादे अस्मिन् वर्तमान व्यावहारिक चान्द्रमानेन प्रभवादि षष्टि संवत्सराणां मध्ये श्री ___ नाम संवत्सरे ___ अयने ___ ऋतौ ___ मासे ___ पक्षे ___ तिथौ ___ वासरे ___ नक्षत्रे ___ योगे ___ करणे एवं गुण विशेषण विशिष्टायां अस्यां शुभतिथौ श्रीमान् ___ गोत्रोद्भवस्य ___ नामधेयस्य (मम धर्मपत्नी श्रीमतः ___ गोत्रस्य ___ नामधेयः समेतस्य) मम/अस्माकं सहकुटुम्बस्य क्षेम स्थैर्य धैर्य वीर्य विजय अभय आयुः आरोग्य ऐश्वर धन धान्य गृह भू पुत्रपौत्र अभिवृद्ध्यर्थं, धर्म अर्थ काम मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ फलसिद्ध्यर्थं, आध्यात्मिक आधिदैविक आधिभौतिक तापत्रय निवारणार्थं मनोवाञ्छाफलसिद्ध्यर्थं श्री _____ उद्दिश्य श्री _____ प्रीत्यर्थं सम्भवद्भिः द्रव्यैः सम्भवद्भिः उपचारैश्च सम्भवता नियमेन सम्भविता प्रकारेण यावच्छक्ति ध्यान आवाहनादि षोडशोपचार पूजां करिष्ये ॥ तदादौ निर्विघ्नेन पूजा परिसमाप्त्यर्थं श्रीविष्वक्सेन पूजां करिष्ये ।

वैष्णव पूजा पूर्वांग: एक विस्तृत मार्गदर्शिका

1. पूर्वांग का अर्थ और महत्त्व (Meaning and Importance of Poorvangam)

संस्कृत में 'पूर्व' का अर्थ है 'पहले' और 'अंग' का अर्थ है 'भाग'। 'पूर्वांग' का तात्पर्य है - "मुख्य अनुष्ठान से पहले की सम्पन्न की जाने वाली क्रियाएँ"। सनातन धर्म में पूजा केवल एक बाह्य क्रिया नहीं, बल्कि एक आंतरिक योग है। जिस प्रकार एक राजा के दरबार में जाने से पहले हम उचित वस्त्र धारण करते हैं और नियमों का पालन करते हैं, उसी प्रकार त्रिलोकीनाथ भगवान विष्णु के समक्ष जाने से पहले हमें शारीरिक और मानसिक रूप से शुद्ध होना आवश्यक है।

वैष्णव परम्परा (विशिष्टाद्वैत, द्वैत, शुद्धाद्वैत आदि) में, पूजा को 'अर्चन' या 'कैंकर्य' (सेवा) के रूप में देखा जाता है। पूर्वांग हमारे शरीर को 'देवालय' (देवता का घर) बनाने की प्रक्रिया है।

2. पूर्वांग के मुख्य चरण और उनका रहस्य

  • शुचिः (शौच): "अपवित्रः पवित्रोवा..." मन्त्र दोहराते हुए अपने ऊपर जल छिड़कना। यह केवल बाहरी शुद्धि नहीं है, बल्कि यह भावना है कि भगवान 'पुण्डरीकाक्ष' (कमल-नयन) का स्मरण मात्र ही हमें भीतर से पवित्र कर देता है।

  • आचमन (Achamana): जल का तीन बार सेवन करना। यह तीनों लोकों, तीनों वेदों और तीनों गुणों के परिशोधन का प्रतीक है।

    • स्मार्त: केशवाय स्वाहा... (24 नामों का उपयोग)
    • वैष्णव: अच्युताय नमः, अनन्ताय नमः, गोविन्दाय नमः... (मुख्य रूप से इन तीन नामों से आचमन और फिर 12 अंगों का स्पर्श)। यह शरीर के 12 अंगों में भगवान के 12 स्वरूपों का न्यास है।
  • प्राणायाम (Pranayama): "प्राणस्य आयामः" - श्वास का नियंत्रण। जब मन चंचल होता है, तो पूजा में एकाग्रता नहीं होती। प्राणायाम (पूरक, कुम्भक, रेचक) के माध्यम से मन को स्थिर किया जाता है, ताकि वह भगवान के चरणों में लग सके।

  • सङ्कल्प (Sankalpa): यह पूजा का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है। संकल्प का अर्थ है 'दृढ़ निश्चय'। इसमें हम भगवान को बताते हैं कि:

    1. कहाँ (स्थान/देश): जम्बूद्वीपे, भरतवर्षे... (GPS लोकेशन)।
    2. कब (समय/काल): अमुक संवत्सरे, मासे, तिथौ... (Time Stamp)।
    3. कौन (कर्ता): अमुक गोत्र, अमुक नाम... (User ID)।
    4. क्यों (प्रयोजन): धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति और भगवान की प्रसन्नता के लिए (Purpose)।

    विशेष: वैष्णव संकल्प में 'भगवदाज्ञया भगवत्कैङ्कर्यरूपं' (भगवान की आज्ञा से और उनकी सेवा के रूप में) शब्दों का प्रयोग अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, जो कर्तापन के अहंकार को नष्ट करता है।

3. विष्वक्सेन आराधना (Vishwaksena Worship)

विघ्न निवारण के लिए जहाँ स्मार्त परम्परा में भगवान गणेश की पूजा होती है, वहीं श्रीवैष्णव परम्परा में 'श्री विष्वक्सेन' (भगवान विष्णु के सेनापति) की पूजा की जाती है। वे भगवान के समस्त कार्यों का प्रबन्ध करते हैं और पूजा के निर्विघ्न समापन का आशीर्वाद देते हैं।

4. आसन और पवित्र धारण

  • आसन शुद्धि: जिस आसन पर बैठकर पूजा की जाती है, उसे भी मन्त्रों से पवित्र किया जाता है। माना जाता है कि 'कूर्म' (कछुआ) पृथ्वी को धारण करते हैं, इसलिए 'कूर्मासनाय नमः' से पृथ्वी की स्थिरता की प्रार्थना की जाती है।
  • पवित्र (अंगूठी): अनामिका (Ring Finger) में कुशा या स्वर्ण की अंगूठी (पवित्र) धारण करना, शरीर की ऊर्जा को संरक्षित रखने का एक वैज्ञानिक उपाय है।

निष्कर्ष इन सभी विधियों का पालन करने से साधक का शरीर और मन सात्त्विक हो जाता है। जब शुद्धि, स्थिरता (आसन) और एकाग्रता (प्राणायाम) एक साथ मिलते हैं, तभी वास्तविक पूजा प्रारम्भ होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. पूर्वांग और मुख्य पूजा में क्या अंतर है?

पूर्वांग वह तैयारी है जो हमें पूजा के लिए योग्य बनाती है (जैसे स्नान, आचमन, संकल्प)। मुख्य पूजा में देवता का आवाहन और उपचार (नैवेद्य, आरती आदि) होता है।

2. वैष्णव आचमन कैसे किया जाता है?

दाहिने हाथ की हथेली (गोकर्ण मुद्रा) में जल लेकर तीन बार 'अच्युताय नमः, अनन्ताय नमः, गोविन्दाय नमः' बोलकर पिया जाता है। यह त्रिदोश (वात, पित्त, कफ) की शान्ति का प्रतीक है।

3. पवित्र (अंगूठी) क्यों पहनी जाती है?

कुशा घास या स्वर्ण से बनी 'पवित्र' (अंगूठी) अनामिका उंगली में पहनने से शरीर की ऊर्जा सुरक्षित रहती है और पूजा का पूर्ण फल मिलता है।

4. विष्वक्सेन पूजा क्यों आवश्यक है?

वैष्णव परम्परा में भगवान विष्वक्सेन (श्री विष्णु के सेनापति) को विघ्नहर्ता माना गया है। इसलिए, किसी भी शुभ कार्य या पूजा के आरम्भ में निर्विघ्न समाप्ति के लिए उनकी पूजा अनिवार्य है।

5. संकल्प का क्या महत्त्व है?

संकल्प पूजा का वह भाग है जहाँ साधक 'देश' (स्थान), 'काल' (समय) और 'पात्र' (स्वयं) का परिचय देते हुए भगवान के समक्ष अपनी 'इच्छा' (प्रयोजन) व्यक्त करता है। बिना संकल्प के की गई पूजा का पूर्ण फल नहीं मिलता।

।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः ।।