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Sri Vishwaksena Laghu Shodasopachara Puja - श्री विष्वक्सेन लघु षोडशोपचार पूजा

Sri Vishwaksena Laghu Shodasopachara Puja - श्री विष्वक्सेन लघु षोडशोपचार पूजा

श्री विष्वक्सेन लघु षोडशोपचार पूजा

Sri Vishwaksena Laghu Shodasopachara Puja

श्री विष्वक्सेन लघु षोडशोपचार पूजा
यह पूजा श्रीवैष्णव सम्प्रदाय की एक प्रमुख विधि है। भगवान विष्वक्सेन (Lord Vishwaksena) बैकुण्ठ के मुख्य सेनापति हैं। किसी भी वैष्णव पूजा, यज्ञ या उत्सव के आरम्भ में, निर्विघ्न समाप्ति के लिए इनकी पूजा उसी प्रकार आवश्यक है, जैसे अन्य परम्पराओं में श्री गणेश की।

॥ श्री विष्वक्सेन लघु षोडशोपचार पूजा ॥ (अस्मिन् तण्डुलस्योपरि कूर्चे सूत्रवती समेतं श्रीविष्वक्सेनं आवाहयामि ।) प्राणप्रतिष्ठा ओं असुनीते पुनरस्मासु चक्षुः पुनः प्राणमिह नो धेहि भोगम् । ज्योक्पश्येम सूर्यमुच्चरन्त मनुमते मृडया नः स्वस्ति । अमृतं वै प्राणा अमृतमापः प्राणानेव यथास्थानमुपह्वयते ॥ ओं भूः विष्वक्सेनमावाहयामि । ओं भुवः विष्वक्सेनमावाहयामि । ओग्ं सुवः विष्वक्सेनमावाहयामि । ओं भूर्भुवस्सुवः विष्वक्सेनमावाहयामि ॥ ध्यानम् विष्वक्सेनं सकलविबुधप्रौढसैन्याधिनाथं मुद्राचक्रे करयुगधरे शङ्खदण्डौ दधानम् । मेघश्यामं सुमणिमकुटं पीतवस्त्रं शुभाङ्गं ध्यायेद्देवं विजितदनुजं सूत्रवत्यासमेतम् ॥ १ यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परः शतम् । विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥ २ विष्वक्सेनं चतुर्बाहुं शङ्खचक्रगदाधरम् । आसीनं तर्जनीहस्तं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥ ३ सपरिवाराय सूत्रवत्यासमेताय श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । ध्यायामि । ध्यानम् समर्पयामि ॥ आवाहनम् सपरिवाराय श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । आवाहयामि । आवाहनं समर्पयामि ॥ आसनम् श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । आसनं समर्पयामि ॥ पाद्यम् श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । पादयोः पाद्यं समर्पयामि ॥ अर्घ्यम् श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । हस्तेषु अर्घ्यं समर्पयामि ॥ आचमनीयम् श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । मुखे आचमनीयं समर्पयामि ॥ औपचारिकस्नानम् आपो हिष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन । महेरणाय चक्षसे । यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयते ह नः । उशतीरिव मातरः । तस्मा अरङ्गमामवो यस्य क्षयाय जिन्वथ । आपो जनयथा च नः । श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । स्नानं समर्पयामि ॥ स्नानानन्तरं शुद्धाचमनीयं समर्पयामि । वस्त्रम् श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । वस्त्र युग्मं समर्पयामि ॥ ऊर्ध्वपुण्ड्रम् श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । दिव्योर्ध्वपुण्ड्रान् धारयामि ॥ चन्दनम् श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । दिव्य श्रीचन्दनं समर्पयामि ॥ यज्ञोपवीतम् श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । यज्ञोपवीतार्थं अक्षतान् समर्पयामि ॥ पुष्पम् आयने ते परायणे दूर्वा रोहन्तु पुष्पिणीः । ह्रदाश्च पुण्डरीकाणि समुद्रस्य गृहा इमे ॥ श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । पुष्पाणि समर्पयामि ॥ अर्चन (नाम मन्त्र) ओं सूत्रवत्यासमेताय नमः । ओं सेनेशाय नमः । ओं सर्वपालकाय नमः । ओं विष्वक्सेनाय नमः । ओं चतुर्बाहवे नमः । ओं शङ्खचक्रगदाधराय नमः । ओं शोभनाङ्गाय नमः । ओं जगत्पूज्याय नमः । ओं वेत्रहस्तविराजिताय नमः । ओं पद्मासनसुसम्युक्ताय नमः । ओं किरीटिने नमः । ओं मणिकुण्डलाय नमः । ओं मेघश्यामलाय नमः । ओं तप्तकाञ्चनभूषणाय नमः । ओं करिवक्त्राय नमः । ओं महाकायाय नमः । ओं निर्विघ्नाय नमः । ओं दैत्यमर्दनाय नमः । ओं विशुद्धात्मने नमः । ओं ब्रह्मध्यानपरायणाय नमः । ओं सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञाय नमः । ओं सर्वाभीष्टफलप्रदाय नमः । ओं श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । धूपम् श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । धूपं आघ्रापयामि ॥ दीपम् उद्दीप्यस्व जातवेदोऽपघ्नन्निरृतिं मम । पशूग्ंश्च मह्यमावह जीवनं च दिशो दिश ॥ श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । प्रत्यक्ष दीपं सन्दर्शयामि ॥ धूप दीपानन्तरं शुद्धाअचमनीयं समर्पयामि । नैवेद्यम् ओं भूर्भुवस्सुवः । तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ सत्यं त्वा ऋतेन परिषिञ्चामि । अमृतमस्तु । अमृतोपस्तरणमसि । श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः __________ समर्पयामि । ओं प्राणाय स्वाहा । ओं अपानाय स्वाहा । ओं व्यानाय स्वाहा । ओं उदानाय स्वाहा । ओं समानाय स्वाहा । मध्ये मध्ये पानीयं समर्पयामि । अमृतापि धानमसि । उत्तरापोशनं समर्पयामि । हस्तौ प्रक्षालयामि । पादौ प्रक्षालयामि । शुद्धाचमनीयं समर्पयामि । श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । नैवेद्यं समर्पयामि ॥ ताम्बूलम् श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । ताम्बूलं समर्पयामि ॥ मन्त्रपुष्पम् ओं विष्वक्सेनाय विद्महे वेत्रहस्ताय धीमहि । तन्नः शान्तः प्रचोदयात् ॥ श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । सुवर्णदिव्य मन्त्रपुष्पं समर्पयामि ॥ अनया श्रीविष्वक्सेन पूजया च भगवान् सर्वात्मकः श्रीविष्वक्सेनः सुप्रीतः सुप्रसन्नः वरदो भवन्तु ॥ उत्तरे शुभकर्मण्यविघ्नमस्तु इति भवन्तो ब्रुवन्तु । उत्तरे शुभकर्मणि अविघ्नमस्तु ॥ उद्वासनम् ओं यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः । तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः सचन्ते । यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः । यथास्थानं उद्वासयामि । शोभनार्थे क्षेमाय पुनरागमनाय च ॥ ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।

भगवान विष्वक्सेन: वैष्णव परम्परा के विघ्नहर्ता

1. परिचय और महत्त्व (Introduction and Importance)

श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में भगवान विष्वक्सेन का वही स्थान है, जो शैव और स्मार्त सम्प्रदायों में श्री गणेश का है। वे भगवान मन्नारायण (विष्णु) के मुख्य सेनापति ('कमाण्डर-इन-चीफ') हैं। उन्हें 'शेषानशन' भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है - "जो भगवान के खाने के बाद शेष (बचे हुए) प्रसाद को ग्रहण करते हैं"। वे भगवान की समस्त सम्पदा और व्यवस्थाओं के रक्षक हैं।

किसी भी वैदिक अनुष्ठान या वैष्णव पूजा में सबसे पहले विष्वक्सेन की आराधना की जाती है ताकि कार्य में कोई विघ्न न आए। इसे 'विष्वक्सेन आराधना' कहा जाता है।

2. स्वरूप वर्णन (Iconography)

ध्यान श्लोकों में उनके दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया है:

  • चतुर्भुज: वे चार भुजाओं वाले हैं, जिनमें शंख, चक्र और गदा सुशोभित हैं। (बिल्कुल विष्णु भगवान जैसा स्वरूप)।
  • तर्जनी मुद्रा: उनका चौथा हाथ तर्जनी मुद्रा (Warning gesture) में उठा हुआ है, जो यह संकेत देता है कि भगवान की आज्ञा का उल्लंघन करने वालों को दण्डित किया जाएगा।
  • परिधान: वे लम्बी लटाईं (जटाएँ) और सेनापति का वेश धारण करते हैं।
  • सूत्रवती: वे अपनी शक्ति 'सूत्रवती' देवी के साथ विराजमान रहते हैं।

3. पूजा विधि की विशेषताएँ (Ritual Highlights)

  • कुर्च (Kurcha): यह पूजा अक्सर एक 'कुर्च' (दूर्वा या दर्भ घास से बनी ग्रंथि) पर की जाती है, जिसे चावल के ढेर पर रखा जाता है। इसमें विष्वक्सेन का आवाहन किया जाता है।
  • षोडशोपचार: यद्यपि यह 'लघु' (संक्षिप्त) पूजा है, फिर भी इसमें पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि 16 उपचारों (Shodasopachara) का पालन श्रद्धापूर्वक किया जाता है।
  • प्रार्थना: भक्त उनसे प्रार्थना करता है - "यस्य द्विरदवक्त्राद्याः..." अर्थात जिनके आदेश से गजानन (द्विरदवक्त्र) आदि गण भी विघ्नों का नाश करते हैं, उन विष्वक्सेन का मैं आश्रय लेता हूँ।

4. आध्यात्मिक अर्थ (Spiritual Significance)

विष्वक्सेन केवल एक पौराणिक पात्र नहीं हैं; वे 'विवेक' और 'अनुशासन' के प्रतीक हैं। आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए इन्द्रियों का संयम और भगवान के प्रति पूर्ण शरणागति (Prapatti) आवश्यक है। विष्वक्सेन जी हमें यही अनुशासन सिखाते हैं। वे भगवान और भक्त के बीच की कड़ी हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि भक्त की सेवा भगवान तक निर्बाध रूप से पहुँचे।

यह लघु पूजा हमें सिखाती है कि किसी भी महान कार्य (जैसे मुख्य विष्णु पूजा) को शुरू करने से पहले हमें अपनी रक्षा और मार्गदर्शन के लिए दैवीय शक्तियों का आह्वान करना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भगवान विष्वक्सेन कौन हैं?

भगवान विष्वक्सेन श्री महाविष्णु के मुख्य सेनापति हैं। उन्हें 'सेनाधिपति' या तमिल में 'सेनाई मुदलियार' भी कहा जाता है। वे भगवान की समस्त व्यवस्थाओं और लीलाओं का प्रबन्ध करते हैं।

2. विष्वक्सेन और गणेश जी में क्या समानता है?

जिस प्रकार स्मार्त और शैव सम्प्रदायों में किसी भी कार्य के आरम्भ में गणेश जी की पूजा होती है, उसी प्रकार श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में विघ्न निवारण के लिए 'विष्वक्सेन' की पूजा अनिवार्य है।

3. विष्वक्सेन का स्वरूप कैसा है?

ध्यान श्लोकों के अनुसार, वे मेघ के समान श्याम वर्ण वाले, चार भुजाओं वाले (शंख, चक्र, गदा और तर्जनी मुद्रा), और सूत्रवती नामक देवी के साथ विराजमान हैं।

4. इस पूजा में 'प्रसाद' का क्या विधान है?

भगवान विष्णु को अर्पित किया गया नैवेद्य (प्रसाद) सबसे पहले विष्वक्सेन जी को ही स्वीकार्य होता है। इसे 'विष्वक्सेन भाग' या 'शेष' कहा जाता है।

5. तर्जनी मुद्रा का क्या अर्थ है?

भगवान विष्वक्सेन की एक उंगली तर्जनी मुद्रा (Warning/Commanding gesture) में होती है, जो यह दर्शाती है कि वे भगवान की आज्ञाओं का पालन सुनिश्चित करवाते हैं और दुष्टों को चेतावनी देते हैं।

।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः ।।