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Sri Durga Manasa Puja Stotram – श्री दुर्गा मानस पूजा

Sri Durga Manasa Puja Stotram – श्री दुर्गा मानस पूजा

श्री दुर्गा मानस पूजा स्तोत्रम्

Sri Durga Manasa Puja Stotram

श्री दुर्गा मानस पूजा
यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि 'ध्यान योग' है। 'मानस पूजा' (Mental Worship) का अर्थ है - जहाँ द्रव्य (Material) नहीं, बल्कि 'भाव' (Devotion) प्रधान हो।

इस अद्भुत स्तोत्र में साधक अपनी कल्पना शक्ति (Visualization) से ब्रह्मांड की सबसे दुर्लभ और मूल्यवान वस्तुएँ - जैसे कामधेनु का दूध, कल्पवृक्ष के फूल, और रत्नों से जड़ा सिंहासन - माँ दुर्गा को अर्पित करता है। यह विधि सिद्ध करती है कि ईश्वर केवल 'प्रेम' का भूखा है, धन का नहीं।

॥ श्री दुर्गा मानस पूजा स्तोत्रम् ॥ उद्यच्चन्दनकुङ्कुमारुणपयोधाराभिराप्लावितां नानानर्घ्यमणिप्रवालघटितां दत्तां गृहाणाम्बिके । आमृष्टां सुरसुन्दरीभिरभितो हस्ताम्बुजैर्भक्तितो मातः सुन्दरि भक्तकल्पलतिके श्रीपादुकामादरात् ॥ १ ॥ देवेन्द्रादिभिरर्चितं सुरगणैरादाय सिंहासनं चञ्चत्काञ्चनसञ्चयाभिरचितं चारुप्रभाभास्वरम् । एतच्चम्पककेतकीपरिमलं तैलं महानिर्मलं गन्धोद्वर्तनमादरेण तरुणीदत्तं गृहाणाम्बिके ॥ २ ॥ पश्चाद्देवि गृहाण शम्भुगृहिणि श्रीसुन्दरि प्रायशो गन्धद्रव्यसमूहनिर्भरतरं धात्रीफलं निर्मलम् । तत्केशान् परिशोध्य कङ्कतिकया मन्दाकिनीस्रोतसि स्नात्वा प्रोज्ज्वलगन्धकं भवतु हे श्रीसुन्दरि त्वन्मुदे ॥ ३ ॥ सुराधिपतिकामिनीकरसरोजनालीधृतां सचन्दनसकुङ्कुमागुरुभरेण विभ्राजिताम् । महापरिमलोज्ज्वलां सरसशुद्धकस्तूरिकां गृहाण वरदायिनि त्रिपुरसुन्दरि श्रीप्रदे ॥ ४ ॥ गन्धर्वामरकिन्नरप्रियतमासन्तानहस्ताम्बुज- -प्रस्तारैर्ध्रियमाणमुत्तमतरं काश्मीरजापिञ्जरम् । मातर्भास्वरभानुमण्डललसत्कान्तिप्रदानोज्ज्वलं चैतन्निर्मलमातनोतु वसनं श्रीसुन्दरि त्वन्मुदम् ॥ ५ ॥ स्वर्णाकल्पितकुण्डले श्रुतियुगे हस्ताम्बुजे मुद्रिका मध्ये सारसना नितम्बफलके मञ्जीरमङ्घ्रिद्वये । हारो वक्षसि कङ्कणौ क्वणरणत्कारौ करद्वन्द्वके विन्यस्तं मुकुटं शिरस्यनुदिनं दत्तोन्मदं स्तूयताम् ॥ ६ ॥ ग्रीवायां धृतकान्तिकान्तपटलं ग्रैवेयकं सुन्दरं सिन्दूरं विलसल्ललाटफलके सौन्दर्यमुद्राधरम् । राजत्कज्जलमुज्ज्वलोत्पलदलश्रीमोचने लोचने तद्दिव्यौषधिनिर्मितं रचयतु श्रीशाम्भवि श्रीप्रदे ॥ ७ ॥ अमन्दतरमन्दरोन्मथितदुग्धसिन्धूद्भवं निशाकरकरोपमं त्रिपुरसुन्दरि श्रीप्रदे । गृहाण मुखमीक्षतुं मुकुरबिम्बमाविद्रुमै- -र्विनिर्मितमघच्छिदे रतिकराम्बुजस्थायिनम् ॥ ८ ॥ कस्तूरीद्रवचन्दनागुरुसुधाधाराभिराप्लावितं चञ्चच्चम्पकपाटलादिसुरभिद्रव्यैः सुगन्धीकृतम् । देवस्त्रीगणमस्तकस्थितमहारत्नादिकुम्भव्रजै- -रम्भःशाम्भवि सम्भ्रमेण विमलं दत्तं गृहाणाम्बिके ॥ ९ ॥ कह्लारोत्पलनागकेसरसरोजाख्यावलीमालती- -मल्लीकैरवकेतकादिकुसुमै रक्ताश्वमारादिभिः । पुष्पैर्माल्यभरेण वै सुरभिणा नानारसस्रोतसा ताम्राम्भोजनिवासिनीं भगवतीं श्रीचण्डिकां पूजये ॥ १० ॥ मांसीगुग्गुलचन्दनागुरुरजः कर्पूरशैलेयजै- -र्माध्वीकैः सह कुङ्कुमैः सुरचितैः सर्पिर्भिरामिश्रितैः । सौरभ्यस्थितिमन्दिरे मणिमये पात्रे भवेत् प्रीतये धूपोऽयं सुरकामिनीविरचितः श्रीचण्डिके त्वन्मुदे ॥ ११ ॥ घृतद्रवपरिस्फुरद्रुचिररत्नयष्ट्यान्वितो महातिमिरनाशनः सुरनितम्बिनीनिर्मितः । सुवर्णचषकस्थितः सघनसारवर्त्यान्वित- -स्तव त्रिपुरसुन्दरि स्फुरति देवि दीपो मुदे ॥ १२ ॥ जातीसौरभनिर्भरं रुचिकरं शाल्योदनं निर्मलं युक्तं हिङ्गुमरीचजीरसुरभिर्द्रव्यान्वितैर्व्यञ्जनैः । पक्वान्नेन सपायसेन मधुना दध्याज्यसम्मिश्रितं नैवेद्यं सुरकामिनीविरचितं श्रीचण्डिके त्वन्मुदे ॥ १३ ॥ लवङ्गकलिकोज्ज्वलं बहुलनागवल्लीदलं सजातिफलकोमलं सघनसारपूगीफलम् । सुधामधुरिमाकुलं रुचिररत्नपात्रस्थितं गृहाण मुखपङ्कजे स्फुरितमम्ब ताम्बूलकम् ॥ १४ ॥ शरत्प्रभवचन्द्रमः स्फुरितचन्द्रिकासुन्दरं गलत्सुरतरङ्गिणीललितमौक्तिकाडम्बरम् । गृहाण नवकाञ्चनप्रभवदण्डखण्डोज्ज्वलं महात्रिपुरसुन्दरि प्रकटमातपत्रं महत् ॥ १५ ॥ मातस्त्वन्मुदमातनोतु सुभगस्त्रीभिः सदाऽऽन्दोलितं शुभ्रं चामरमिन्दुकुन्दसदृशं प्रस्वेददुःखापहम् । सद्योऽगस्त्यवसिष्ठनारदशुकव्यासादिवाल्मीकिभिः स्वे चित्ते क्रियमाण एव कुरुतां शर्माणि वेदध्वनिः ॥ १६ ॥ स्वर्गाङ्गणे वेणुमृदङ्गशङ्ख- -भेरीनिनादैरूपगीयमाना । कोलाहलैराकलिता तवास्तु विद्याधरीनृत्यकला सुखाय ॥ १७ ॥ देवि भक्तिरसभावितवृत्ते प्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते । तत्र लौल्यमपि सत्फलमेकं जन्मकोटिभिरपीह न लभ्यम् ॥ १८ ॥ ॥ फल श्रुति ॥ एतैः षोडशभिः पद्यैरुपचारोपकल्पितैः । यः परां देवतां स्तौति स तेषां फलमाप्नुयात् ॥ १९ ॥ इति दुर्गातन्त्रे श्री दुर्गा मानस पूजा स्तोत्रम् ॥

मानस पूजा का रहस्य (The Secret of Mental Worship)

'न द्रव्यं न च उपकरणं...' अर्थात् न धन चाहिए, न साधन। मानस पूजा तंत्र का वह गोपनीय मार्ग है जहाँ साधक अपनी 'चित्त शक्ति' (Mind Power) से ब्रह्मांड की किसी भी वस्तु का निर्माण कर सकता है।

इस पूजा में आप:

  • स्वर्ण सिंहासन: जो इंद्रदेव द्वारा सेवित है (श्लोक 2)।
  • मन्दाकिनी जल: स्वर्ग की गंगा का पवित्र जल स्नान के लिए (श्लोक 3)।
  • दिव्य आभूषण: सूर्य और चंद्रमा की कांति से बने वस्त्र (श्लोक 5)।

यह विधि दरिद्र को भी 'सम्राट' की तरह पूजा करने का अधिकार देती है।

पूजा के विशेष उपचार (Unique Offerings)

1. कल्पवृक्ष की पादुका (Verse 1)

श्लोक 1 में साधक देवी को 'पादुका' (Wooden Sandals) अर्पित करता है जो रत्नों से जड़ी हैं और जिन्हें अप्सराएँ अपने हाथों से पहना रही हैं। यह साधक की विनम्रता और देवी के प्रति सर्वोच्च सम्मान का प्रतीक है।

2. अमूर्त धूप (Verse 11)

यहाँ धूप भौतिक नहीं है। यह 'मांसी, गुग्गुल और चंदन' की दिव्य सुगंध है जो भक्त की 'सांसों' (Breath) में बसी है। जब तक श्वास है, तब तक पूजा है।

3. वेद ध्वनि (Verse 16)

अंत में, साधक कल्पना करता है कि अगस्त्य, वशिष्ठ और नारद जैसे महर्षि स्वयं आकर देवी के लिए वेद मंत्रों का पाठ कर रहे हैं। यह 'सत्संग' का मानसिक अनुभव है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. मानस पूजा (Manasa Puja) क्या है?

मानस पूजा एक उच्च स्तरीय तांत्रिक साधना है जिसमें भक्त भौतिक वस्तुओं के बजाय अपने 'मन' की शक्ति से देवी को उपचार अर्पित करता है। इसमें भावना ही प्रधान है, वस्तु नहीं।

2. क्या मानस पूजा भौतिक पूजा से श्रेष्ठ है?

शास्त्रों में कहा गया है - 'भावो हि कारणं'। यदि भाव शुद्ध है, तो मानस पूजा भौतिक पूजा से हजारों गुना अधिक फलदायी हो सकती है, क्योंकि इसमें 'एकाग्रता' (Concentration) सर्वोच्च होती है और दिखावे (Show-off) का कोई स्थान नहीं होता।

3. दुर्गा मानस पूजा में 'सुधा' (Nectar) का क्या अर्थ है?

श्लोक 14 में 'सुधा' का अर्थ केवल मीठा जल नहीं, बल्कि 'अमृत' है। साधक अपनी भक्ति के रस को ही अमृत मानकर देवी को अर्पित करता है, जिससे वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो सके।

4. इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

इसे किसी भी समय किया जा सकता है, विशेषकर जब आप यात्रा में हों, बीमार हों, या भौतिक पूजा सामग्री उपलब्ध न हो। ब्रह्ममुहूर्त में आँखें बंद करके इसका पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है।

5. क्या इसे बिना गुरु दीक्षा के किया जा सकता है?

हाँ, यह एक स्तोत्र है और भक्ति मार्ग का अंग है। इसके लिए कड़े तांत्रिक नियमों की आवश्यकता नहीं है, केवल देवी के प्रति सच्चा प्रेम चाहिए।

।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः ।।