संकष्टहर चतुर्थी पूजा विधानम्
Sankata Hara Chaturthi Puja Vidhanam
संकष्टहर चतुर्थी पूजा विधानम्
संकष्टी चतुर्थी (Sankashti Chaturthi) के पावन पर्व पर, जो प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को होता है, भगवान गणेश की आराधना की विधि है।
इस दिन विधि-विधान से गणेश जी की पूजा करने, वृतांत सुनने और चन्द्रोदय के समय चन्द्रमा को अर्घ्य देने से सभी संकटों का नाश होता है। आप अन्य विधियाँ जैसे गणेश मानस पूजा भी कर सकते हैं।
संकष्टहर चतुर्थी व्रत के लाभ (Benefits)
- संकट निवारण (Sankata Hara): जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह व्रत सभी प्रकार के संकटों और बाधाओं को दूर करता है।
- मनोकामना पूर्ति: विधिवत पूजा और व्रत करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
- ग्रह शांति: चंद्रमा को अर्घ्य देने से कुंडली में चंद्र दोष और मानसिक तनाव दूर होता है।
- धन और समृद्धि: भगवान गणेश की कृपा से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
प्रश्नोत्तरी (FAQ)
संकष्टहर चतुर्थी व्रत का क्या महत्व है?
यह व्रत सभी प्रकार के कष्टों (संकटों) के निवारण के लिए किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और चन्द्रमा को अर्घ्य देने से भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं और जीवन की बाधाएं दूर करते हैं।
क्या हम व्रत में पानी पी सकते हैं?
संकष्ठी का व्रत निर्जला (बिना पानी के) या फलाहारी दोनों तरह से रखा जा सकता है। यह व्यक्ति की शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है। निर्जला व्रत चन्द्रोदय के समय अर्घ्य देने के बाद ही खोला जाता है।
अर्घ्य देते समय चन्द्रमा न दिखे तो क्या करें?
यदि बादल हों और चन्द्रमा न दिखे, तो पंचांग में दिए गए चन्द्रोदय के समय के अनुसार, आकाश की ओर मुख करके या भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान चन्द्र का ध्यान करके अर्घ्य दिया जा सकता है।
अंगारकी चतुर्थी क्या है?
जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार (Tuesday) को पड़ती है, तो उसे "अंगारकी संकष्टी चतुर्थी" कहा जाता है। यह अत्यंत शुभ और फलदायी मानी जाती है।
