पुरुषसूक्त विधान पूर्वक षोडशोपचार पूजा
Purusha Sukta Vidhana Purvaka Shodasopachara Puja
पुरुषसूक्त विधान पूर्वक षोडशोपचार पूजा
यह भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की सर्वोच्च वैदिक पूजा विधि है। सनातन धर्म में जब भी किसी देवता (विशेषकर भगवान विष्णु या उनके अवतारों) की प्राण-प्रतिष्ठा या विशेष पूजा की जाती है, तो श्री पुरुषसूक्तम् (Purusha Suktam) का ही प्रयोग किया जाता है।
पुरुषसूक्त क्या है?
यह ऋग्वेद (मण्डल १०, सूक्त ९०) का एक अत्यन्त पवित्र सूक्त है। इसमें सृष्टि के आदि कारण 'विराट पुरुष' (Cosmic Being) का वर्णन है। इस सूक्त के 16 मन्त्रों (Rychas) में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और यज्ञ का रहस्य छिपा है।
पूजा का विधान
सामान्य पूजा में हम साधारण श्लोकों से उपचार अर्पित करते हैं, किन्तु 'पुरुषसूक्त विधान' में पूजा के प्रत्येक चरण (आवाहन, आसन, पाद्य आदि) के लिए पुरुषसूक्त का एक विशिष्ट मन्त्र निर्धारित है। यह पूजा साक्षात् 'मानस यज्ञ' कहलाती है। यह विधि सत्यनारायण पूजा, एकादशी, अनंत चतुर्दशी और प्रतिदिन की शालिग्राम पूजा के लिए अत्यंत प्रशस्त है।
पुरुषसूक्त पूजा का रहस्य
- यज्ञ स्वरूप पूजा: पुरुषसूक्त में सृष्टि उत्पत्ति को एक यज्ञ के रूप में वर्णित किया गया है। जब हम इस सूक्त से पूजा करते हैं, तो हम प्रतीकात्मक रूप से उसी 'सृष्टि यज्ञ' को दोहराते हैं।
- विराट पुरुष: यह मन्त्र भगवान को 'विराट पुरुष' (Universal Being) के रूप में पूजते हैं, जिनके हजारों सिर और आँखें हैं (सहस्रशीर्षा...)। इस भावना के साथ की गई पूजा से साधक का अहंकार नष्ट होता है।
- पूर्णता: यह पूजा विधि 'षोडश कलाओं' (16 कलाओं) से पूर्ण मानी जाती है, इसलिए इसे 16 उपचारों के साथ किया जाता है। यह समस्त वेदों का सार है।
