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श्री उच्छिष्टगणनाथ अष्टोत्तरशतनामावलिः

108 Names of Uchchishta Gananatha

श्री उच्छिष्टगणनाथ अष्टोत्तरशतनामावलिः
॥ श्री उच्छिष्टगणनाथस्य अष्टोत्तरशतनामावलिः ॥ ॐ वन्दारुजनमन्दारपादपाय नमो नमः ॐ । १ ॐ चन्द्रार्धशेखरप्राणतनयाय नमो नमः ॐ । ॐ शैलराजसुतोत्सङ्गमण्डनाय नमो नमः ॐ । ॐ वल्लीशवलयक्रीडाकुतुकाय नमो नमः ॐ । ॐ श्रीनीलवाणीललितारसिकाय नमो नमः ॐ । ॐ स्वानन्दभवनानन्दनिलयाय नमो नमः ॐ । ॐ चन्द्रमण्डलसन्दृष्यस्वरूपाय नमो नमः ॐ । ॐ क्षीराब्धिमध्यकल्पद्रुमूलस्थाय नमो नमः ॐ । ॐ सुरापगासिताम्भोजसंस्थिताय नमो नमः ॐ । ॐ सदनीकृतमार्ताण्डमण्डलाय नमो नमः ॐ । १० ॐ इक्षुसागरमध्यस्थमन्दिराय नमो नमः ॐ । ॐ चिन्तामणिपुराधीशसत्तमाय नमो नमः ॐ । ॐ जगत्सृष्टितिरोधानकारणाय नमो नमः ॐ । ॐ क्रीडार्थसृष्टभुवनत्रितयाय नमो नमः ॐ । ॐ शुण्डोद्धूतजलोद्भूतभुवनाय नमो नमः ॐ । ॐ चेतनाचेतनीभूतशरीराय नमो नमः ॐ । ॐ अणुमात्रशरीरान्तर्लसिताय नमो नमः ॐ । ॐ सर्ववश्यकरानन्तमन्त्रार्णाय नमो नमः ॐ । ॐ कुष्ठाद्यामयसन्दोहशमनाय नमो नमः ॐ । ॐ प्रतिवादिमुखस्तम्भकारकाय नमो नमः ॐ । २० ॐ पराभिचारदुष्कर्मनाशकाय नमो नमः ॐ । ॐ सकृन्मन्त्रजपध्यानमुक्तिदाय नमो नमः ॐ । ॐ निजभक्तविपद्रक्षादीक्षिताय नमो नमः ॐ । ॐ ध्यानामृतरसास्वाददायकाय नमो नमः ॐ । ॐ गुह्यपूजारताभीष्टफलदाय नमो नमः ॐ । ॐ रूपौदार्यगुणाकृष्टत्रिलोकाय नमो नमः ॐ । ॐ अष्टद्रव्यहविःप्रीतमानसाय नमो नमः ॐ । ॐ अवताराष्टकद्वन्द्वप्रदानाय नमो नमः ॐ । ॐ भारतालेखनोद्भिन्नरदनाय नमो नमः ॐ । ॐ नारदोद्गीतरुचिरचरिताय नमो नमः ॐ । ३० ॐ निखिलाम्नायसङ्गुष्ठवैभवाय नमो नमः ॐ । ॐ बाणरावणचण्डीशपूजिताय नमो नमः ॐ । ॐ इन्द्रादिदेवतावृन्दरक्षकाय नमो नमः ॐ । ॐ सप्तर्षिमानसालाननिश्चेष्टाय नमो नमः ॐ । ॐ आदित्यादिग्रहस्तोमदीपकाय नमो नमः ॐ । ॐ मदनागमसत्तन्त्रपारगाय नमो नमः ॐ । ॐ उज्जीवितेशसन्दग्धमदनाय नमो नमः ॐ । ॐ शमीमहीरुहप्रीतमानसाय नमो नमः ॐ । ॐ जलतर्पणसम्प्रीतहृदयाय नमो नमः ॐ । ॐ कन्दुकीकृतकैलासशिखराय नमो नमः ॐ । ४० ॐ अथर्वशीर्षकारण्यमयूराय नमो नमः ॐ । ॐ कल्याणाचलश‍ृङ्गाग्रविहाराय नमो नमः ॐ । ॐ आतुनैन्द्रादिसामसंस्तुताय नमो नमः ॐ । ॐ ब्राह्म्यादिमातृनिवःपरीताय नमो नमः ॐ । ॐ चतुर्थावरणारक्षिदिगीशाय नमो नमः ॐ । ॐ द्वाराविष्टनिधिद्वन्द्वशोभिताय नमो नमः ॐ । ॐ अनन्तपृथिवीकूर्मपीठाङ्गाय नमो नमः ॐ । ॐ तीव्रादियोगिनीवृन्दपीठस्थाय नमो नमः ॐ । ॐ जयादिनवपीठश्रीमण्डिताय नमो नमः ॐ । ॐ पञ्चावरणमध्यस्थसदनाय नमो नमः ॐ । ५० ॐ क्षेत्रपालगणेशादिद्वारपाय नमो नमः ॐ । ॐ महीरतीरमागौरीपार्श्वकाय नमो नमः ॐ । ॐ मद्यप्रियादिविनयिविधेयाय नमो नमः ॐ । ॐ वाणीदुर्गांशभूतार्हकलत्राय नमो नमः ॐ । ॐ वरहस्तिपिशाचीहृन्नन्दनाय नमो नमः ॐ । ॐ योगिनीशचतुष्षष्टिसंयुताय नमो नमः ॐ । ॐ नवदुर्गाष्टवसुभिस्सेविताय नमो नमः ॐ । ॐ द्वात्रिंशद्भैरवव्यूहनायकाय नमो नमः ॐ । ॐ ऐरावतादिदिग्दन्तिसंवृताय नमो नमः ॐ । ॐ कण्ठीरवमयूराखुवाहनाय नमो नमः ॐ । ६० ॐ मूषकाङ्कमहारक्तकेतनाय नमो नमः ॐ । ॐ कुम्भोदरकरन्यस्तपादाब्जाय नमो नमः ॐ । ॐ कान्ताकान्ततराङ्गस्थकराग्राय नमो नमः ॐ । ॐ अन्तस्थभुवनस्फीतजठराय नमो नमः ॐ । ॐ कर्पूरवीटिकासाररक्तोष्ठाय नमो नमः ॐ । ॐ श्वेतार्कमालासन्दीप्तकन्धराय नमो नमः ॐ । ॐ सोमसूर्यबृहद्भानुलोचनाय नमो नमः ॐ । ॐ सर्वसम्पत्प्रदामन्दकटाक्षाय नमो नमः ॐ । ॐ अतिवेलमदारक्तनयनाय नमो नमः ॐ । ॐ शशाङ्कार्धसमादीप्तमस्तकाय नमो नमः ॐ । ७० ॐ सर्पोपवीतहारादिभूषिताय नमो नमः ॐ । ॐ सिन्दूरितमहाकुम्भसुवेषाय नमो नमः ॐ । ॐ आशावसनतादृष्यसौन्दर्याय नमो नमः ॐ । ॐ कान्तालिङ्गनसञ्जातपुलकाय नमो नमः ॐ । ॐ पाशाङ्कुशधनुर्बाणमण्डिताय नमो नमः ॐ । ॐ दिगन्तव्याप्तदानाम्बुसौरभाय नमो नमः ॐ । ॐ सायन्तनसहस्रांशुरक्ताङ्गाय नमो नमः ॐ । ॐ सम्पूर्णप्रणवाकारसुन्दराय नमो नमः ॐ । ॐ ब्रह्मादिकृतयज्ञाग्निसम्भूताय नमो नमः ॐ । ॐ सर्वामरप्रार्थनात्तविग्रहाय नमो नमः ॐ । ८० ॐ जनिमात्रसुरत्रासनाशकाय नमो नमः ॐ । ॐ कलत्रीकृतमातङ्गकन्यकाय नमो नमः ॐ । ॐ विद्यावदसुरप्राणनाशकाय नमो नमः ॐ । ॐ सर्वमन्त्रसमाराध्यस्वरूपाय नमो नमः ॐ । ॐ षट्कोणयन्त्रपीठान्तर्लसिताय नमो नमः ॐ । ॐ चतुर्नवतिमन्त्रात्मविग्रहाय नमो नमः ॐ । ॐ हुङ्गङ्क्लाङ्ग्लाम्मुखानेकबीजार्णाय नमो नमः ॐ । ॐ बीजाक्षरत्रयान्तस्थशरीराय नमो नमः ॐ । ॐ हृल्लेखागुह्यमन्त्रान्तर्भाविताय नमो नमः ॐ । ॐ स्वाहान्तमातृकामालारूपाध्याय नमो नमः ॐ । ९० ॐ द्वात्रिंशदक्षरमयप्रतीकाय नमो नमः ॐ । ॐ शोधनानर्थसन्मन्त्रविशेषाय नमो नमः ॐ । ॐ अष्टाङ्गयोगिनिर्वाणदायकाय नमो नमः ॐ । ॐ प्राणेन्द्रियमनोबुद्धिप्रेरकाय नमो नमः ॐ । ॐ मूलाधारवरक्षेत्रनायकाय नमो नमः ॐ । ॐ चतुर्दलमहापद्मसंविष्टाय नमो नमः ॐ । ॐ मूलत्रिकोणसंशोभिपावकाय नमो नमः ॐ । ॐ सुषुम्नारन्ध्रसञ्चारदेशिकाय नमो नमः ॐ । ॐ षट्ग्रन्थिनिम्नतटिनीतारकाय नमो नमः ॐ । ॐ दहराकाशसंशोभिशशाङ्काय नमो नमः ॐ । १०० ॐ हिरण्मयपुराम्भोजनिलयाय नमो नमः ॐ । ॐ भ्रूमध्यकोमलारामकोकिलाय नमो नमः ॐ । ॐ षण्णवद्वादशान्तस्थमार्ताण्डाय नमो नमः ॐ । ॐ मनोन्मणीसुखावासनिर्वृताय नमो नमः ॐ । ॐ षोडशान्तमहापद्ममधुपाय नमो नमः ॐ । ॐ सहस्रारसुधासारसेचिताय नमो नमः ॐ । ॐ नादबिन्दुद्वयातीतस्वरूपाय नमो नमः ॐ । ॐ उच्छिष्टगणनाथाय महेशाय नमो नमः ॐ । १०८ ॥ इति श्री रामानन्देन्द्र सरस्वती स्वामि विरचिता श्री उच्छिष्टगणनाथस्य अष्टोत्तरशतनामावलिः समाप्ता ॥
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नामावली परिचय (Introduction)

श्री उच्छिष्टगणनाथ अष्टोत्तरशतनामावलिः भगवान गणेश के एक अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली तांत्रिक स्वरूप की स्तुति है। यह नामावली महान संत श्री रामानन्देन्द्र सरस्वती स्वामी द्वारा रचित है, जो तञ्जावूर के शान्ताश्रम से संबंधित थे। इस नामावली में भगवान उच्छिष्टगणनाथ के 108 दिव्य नामों का संकलन है, जो उनके विभिन्न गुणों, शक्तियों और स्वरूपों का वर्णन करते हैं।
भारतीय तंत्र शास्त्र में भगवान गणेश के 32 विभिन्न स्वरूपों का वर्णन मिलता है, जिनमें 'उच्छिष्ट गणपति' एक विशेष और उग्र स्वरूप माना जाता है। 'उच्छिष्ट' शब्द का शाब्दिक अर्थ 'अवशिष्ट' या 'शेष' है, परंतु तांत्रिक दृष्टि से यह उस परब्रह्म स्थिति को दर्शाता है जो शुद्ध-अशुद्ध के सामान्य द्वंद्व से परे है। यह स्वरूप उन साधकों के लिए है जो सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर ईश्वरीय शक्ति का अनुभव करना चाहते हैं।

इस नामावली का विशिष्ट महत्व (Significance)

उच्छिष्टगणनाथ की यह 108 नामों की माला तंत्र साधना में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। प्रत्येक नाम में गहन आध्यात्मिक अर्थ और मंत्र शक्ति निहित है। यह नामावली केवल स्तुति नहीं, बल्कि एक सिद्ध मंत्र माला के समान कार्य करती है।

नामों की विशेषताएं

इस नामावली में उच्छिष्टगणनाथ के विभिन्न पक्षों का वर्णन है:
  • चन्द्रार्धशेखरप्राणतनय: भगवान शिव (चंद्रशेखर) के प्राणप्रिय पुत्र
  • चिन्तामणिपुराधीश: चिंतामणि नगर के स्वामी - सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले
  • सर्ववश्यकरानन्तमन्त्रार्ण: अनंत वशीकरण मंत्रों के स्वामी
  • पराभिचारदुष्कर्मनाशक: अभिचार (तांत्रिक प्रयोग) और दुष्कर्मों का नाश करने वाले
  • मूलाधारवरक्षेत्रनायक: मूलाधार चक्र के अधिपति - कुंडलिनी शक्ति के जागरण में सहायक

तांत्रिक परंपरा में स्थान

तंत्र विज्ञान में उच्छिष्टगणनाथ को 'क्षिप्र प्रसादन' (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) देवता माना जाता है। इनकी शक्ति (consort) को नील सरस्वती या मातंगी के रूप में पूजा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि यक्षराज कुबेर ने भगवान शंकर के परामर्श पर इनकी आराधना करके नव निधियाँ प्राप्त की थीं। इसी प्रकार, विभीषण ने भी इनकी उपासना से लंका का राज्य प्राप्त किया।

नामावली के प्रमुख लाभ (Benefits)

शास्त्रों और तंत्र ग्रंथों के अनुसार, इस 108 नामों की नामावली के विधिवत पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • दरिद्रता का समूल नाश
    उच्छिष्टगणनाथ धन और समृद्धि के देवता माने जाते हैं। इस नामावली का नियमित पाठ आर्थिक कठिनाइयों को दूर करता है। 'सर्वसम्पत्प्रदामन्दकटाक्ष' नाम स्वयं इस बात का प्रमाण है कि भगवान की एक कटाक्ष (दृष्टि) मात्र से सभी संपत्तियाँ प्राप्त होती हैं।
  • शत्रु बाधा और तंत्र दोष निवारण
    'पराभिचारदुष्कर्मनाशकाय' और 'प्रतिवादिमुखस्तम्भकारकाय' - ये नाम स्पष्ट करते हैं कि यह नामावली शत्रुओं द्वारा किए गए तांत्रिक प्रयोगों, काला जादू और नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा करती है। विरोधियों का मुख स्तंभित (बंद) हो जाता है।
  • रोग निवारण
    'कुष्ठाद्यामयसन्दोहशमनाय' नाम बताता है कि भगवान उच्छिष्टगणनाथ कुष्ठ जैसे कठिन रोगों सहित सभी प्रकार की व्याधियों का शमन करने में सक्षम हैं।
  • आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष
    'सकृन्मन्त्रजपध्यानमुक्तिदाय' - एक बार के मंत्र जप और ध्यान से भी मुक्ति प्रदान करने वाले। 'अष्टाङ्गयोगिनिर्वाणदायकाय' - अष्टांग योग द्वारा निर्वाण (मोक्ष) देने वाले। यह नामावली आध्यात्मिक साधकों के लिए परम लाभकारी है।
  • वाक् सिद्धि और ज्ञान प्राप्ति
    'श्रीनीलवाणीललितारसिकाय' - नील सरस्वती (मातंगी) के प्रिय होने के कारण, इनकी उपासना से वाक् सिद्धि प्राप्त होती है। साधक की वाणी में प्रभाव और सत्यता आती है। विद्या और ज्ञान के क्षेत्र में उन्नति होती है।
  • विवाह और दांपत्य सुख
    विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने और मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त करने के लिए भी इस नामावली का प्रयोग किया जाता है। दांपत्य जीवन में प्रेम और सद्भाव बढ़ता है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर (Method of Recitation)

इस नामावली का पाठ सामान्य भक्त भी श्रद्धाभाव से कर सकते हैं। विशेष फल प्राप्ति के लिए निम्न विधि अपनाएं:

1. शुभ समय

दिन: गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी, मंगलवार और बुधवार विशेष शुभ हैं।
समय: प्रातःकाल (ब्राह्म मुहूर्त) या सायंकाल/रात्रि का समय उत्तम है।
विशेष: ग्रहण काल और अमावस्या को किया गया पाठ अत्यंत शीघ्र फलदायी होता है।

2. पूर्व तैयारी

स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। लाल या पीले रंग के आसन का प्रयोग करें। सामने गणेश जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। धूप-दीप जलाएं।

3. संकल्प और पाठ

पाठ से पहले संकल्प लें कि किस कामना के लिए यह पाठ कर रहे हैं। फिर "ॐ गं गणपतये नमः" का 11 या 21 बार जप करें। इसके बाद नामावली का पाठ आरंभ करें। प्रत्येक नाम के साथ "नमो नमः" कहते समय भगवान का ध्यान करें।

4. नैवेद्य (भोग)

उच्छिष्टगणनाथ को मोदक, लड्डू, गुड़, तिल, केला और नारियल अत्यंत प्रिय हैं। पाठ के बाद इनका भोग लगाएं और प्रसाद ग्रहण करें।

5. पाठ की अवधि

सामान्य लाभ के लिए नित्य एक बार पाठ करें। विशेष कामना पूर्ति के लिए 21, 41 या 108 दिनों का संकल्प लेकर अनुष्ठान करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. उच्छिष्टगणनाथ कौन हैं और ये सामान्य गणेश से कैसे भिन्न हैं?

उच्छिष्टगणनाथ भगवान गणेश के 32 स्वरूपों में से एक विशेष तांत्रिक स्वरूप हैं। जहाँ सामान्य गणेश उपासना सात्विक पद्धति से होती है, वहीं उच्छिष्टगणनाथ की साधना तंत्र शास्त्र के अनुसार होती है। ये शीघ्र प्रसन्न होने वाले और तुरंत फल देने वाले माने जाते हैं। इनकी शक्ति नील सरस्वती (मातंगी) हैं।

Q2. 'उच्छिष्ट' शब्द का क्या अर्थ है? क्या यह जूठा है?

'उच्छिष्ट' का शाब्दिक अर्थ है 'अवशिष्ट' या 'शेष'। तांत्रिक दृष्टि से यह उस परम सत्य को दर्शाता है जो शुद्ध-अशुद्ध के भेद से परे है। यह शब्द साधक के अहंकार को तोड़ने और द्वैत भाव से मुक्त होने का प्रतीक है। सामान्य भक्त इस गहन अर्थ को समझकर पवित्र भाव से पूजा कर सकते हैं।

Q3. क्या बिना गुरु दीक्षा के इस नामावली का पाठ किया जा सकता है?

जी हाँ, नामावली का सामान्य पाठ भक्तिभाव से कोई भी कर सकता है - इसके लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है। परंतु यदि आप विशेष तांत्रिक मंत्रों का जप या गहन साधना करना चाहते हैं, तो किसी योग्य गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है।

Q4. इस नामावली का पाठ कब और कितनी बार करना चाहिए?

गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी, मंगलवार और बुधवार विशेष शुभ हैं। प्रातःकाल या रात्रि का समय सर्वश्रेष्ठ है। सामान्य लाभ के लिए दिन में एक बार पाठ पर्याप्त है। विशेष कामना पूर्ति के लिए 21, 41 या 108 दिनों तक नियमित पाठ करें।

Q5. क्या स्त्रियां इस नामावली का पाठ कर सकती हैं?

जी हाँ, स्त्रियां भी इस नामावली का पाठ कर सकती हैं। उच्छिष्टगणनाथ की उपासना में स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं है। तंत्र शास्त्र में शक्ति (स्त्री तत्व) का विशेष सम्मान है। मासिक धर्म के दौरान मानसिक जप किया जा सकता है।

Q6. इस नामावली के पाठ से क्या-क्या लाभ मिलते हैं?

प्रमुख लाभ हैं: दरिद्रता नाश और धन प्राप्ति, शत्रु बाधा निवारण, तंत्र-मंत्र दोष से मुक्ति, रोग निवारण, विवाह बाधा दूर होना, वाक् सिद्धि, ज्ञान प्राप्ति और आध्यात्मिक उन्नति। नामावली में प्रत्येक नाम एक विशेष लाभ से जुड़ा है।

Q7. कर्ज और आर्थिक समस्याओं के लिए यह नामावली कैसे सहायक है?

उच्छिष्टगणनाथ धन और समृद्धि के प्रदाता माने जाते हैं। कुबेर ने इन्हीं की साधना से नव निधियाँ प्राप्त की थीं। नामावली में 'सर्वसम्पत्प्रदामन्दकटाक्ष' और 'इक्षुसागरमध्यस्थमन्दिर' जैसे नाम धन प्राप्ति से सीधे जुड़े हैं। कर्ज मुक्ति के लिए संकष्टी चतुर्थी को 108 दिन तक नियमित पाठ करें।

Q8. शत्रु बाधा और काला जादू से रक्षा के लिए यह नामावली कैसे कार्य करती है?

'पराभिचारदुष्कर्मनाशकाय' का अर्थ है - अभिचार (काला जादू) और दुष्कर्मों का नाश करने वाले। 'प्रतिवादिमुखस्तम्भकारकाय' का अर्थ है - विरोधियों का मुख बंद करने वाले। इन दैवीय नामों के उच्चारण से साधक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच बनता है जो नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर रखता है।

Q9. क्या घर में उच्छिष्टगणनाथ की मूर्ति स्थापित कर सकते हैं?

उच्छिष्टगणनाथ की प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति घर में रखने के लिए विशेष नियमों का पालन आवश्यक है। सामान्य गृहस्थों के लिए उनका चित्र या यंत्र रखकर पूजा करना अधिक उपयुक्त है। आप सामान्य गणेश मूर्ति में ही उच्छिष्टगणनाथ का आवाहन करके पूजा कर सकते हैं।

Q10. इस नामावली और उच्छिष्ट गणपति स्तोत्र में क्या अंतर है?

नामावली में भगवान के 108 नामों का संकलन है जो उनके विभिन्न गुणों का वर्णन करते हैं। स्तोत्र एक कथात्मक स्तुति है जो रुद्रयामल तंत्र से ली गई है। दोनों का पाठ लाभकारी है। नामावली का पाठ सरल और शीघ्र होता है, जबकि स्तोत्र में विस्तृत ध्यान और भाव की आवश्यकता होती है। दोनों का एक साथ पाठ अत्यंत फलदायी है।
अस्वीकरण: यहाँ दी गई जानकारी प्राचीन धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं पर आधारित है। उच्छिष्टगणनाथ एक तांत्रिक देवता माने जाते हैं, अतः किसी भी विशेष तंत्र साधना से पहले योग्य गुरु का मार्गदर्शन अवश्य लें। पवित्र ग्रंथ इसके किसी भी परिणाम के लिए उत्तरदायी नहीं है।