Sri Vishnu Shatanamavali – श्री विष्णु शतनामावली

॥ श्री विष्णु शतनामावली ॥
ॐ वासुदेवाय नमः ।
ॐ हृषीकेशाय नमः ।
ॐ वामनाय नमः ।
ॐ जलशायिने नमः ।
ॐ जनार्दनाय नमः ।
ॐ हरये नमः ।
ॐ कृष्णाय नमः ।
ॐ श्रीवक्षाय नमः ।
ॐ गरुडध्वजाय नमः ।
ॐ वराहाय नमः । १०
ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः ।
ॐ नृसिंहाय नमः ।
ॐ नरकान्तकाय नमः ।
ॐ अव्यक्ताय नमः ।
ॐ शाश्वताय नमः ।
ॐ विष्णवे नमः ।
ॐ अनन्ताय नमः ।
ॐ अजाय नमः ।
ॐ अव्ययाय नमः ।
ॐ नारायणाय नमः । २०
ॐ गदाध्यक्षाय नमः ।
ॐ गोविन्दाय नमः ।
ॐ कीर्तिभाजनाय नमः ।
ॐ गोवर्धनोद्धराय नमः ।
ॐ देवाय नमः ।
ॐ भूधराय नमः ।
ॐ भुवनेश्वराय नमः ।
ॐ वेत्त्रे नमः ।
ॐ यज्ञपुरुषाय नमः ।
ॐ यज्ञेशाय नमः । ३०
ॐ यज्ञवाहकाय नमः ।
ॐ चक्रपाणये नमः ।
ॐ गदापाणये नमः ।
ॐ शङ्खपाणये नमः ।
ॐ नरोत्तमाय नमः ।
ॐ वैकुण्ठाय नमः ।
ॐ दुष्टदमनाय नमः ।
ॐ भूगर्भाय नमः ।
ॐ पीतवाससे नमः ।
ॐ त्रिविक्रमाय नमः । ४०
ॐ त्रिकालज्ञाय नमः ।
ॐ त्रिमूर्तये नमः ।
ॐ नन्दिकेश्वराय नमः ।
ॐ रामाय नमः ।
ॐ रामाय नमः ।
ॐ हयग्रीवाय नमः ।
ॐ भीमाय नमः ।
ॐ रौद्राय नमः ।
ॐ भवोद्भवाय नमः ।
ॐ श्रीपतये नमः । ५०
ॐ श्रीधराय नमः ।
ॐ श्रीशाय नमः ।
ॐ मङ्गलाय नमः ।
ॐ मङ्गलायुधाय नमः ।
ॐ दामोदराय नमः ।
ॐ दयोपेताय नमः ।
ॐ केशवाय नमः ।
ॐ केशिसूदनाय नमः ।
ॐ वरेण्याय नमः ।
ॐ वरदाय नमः । ६०
ॐ विष्णवे नमः ।
ॐ आनन्दाय नमः ।
ॐ वसुदेवजाय नमः ।
ॐ हिरण्यरेतसे नमः ।
ॐ दीप्ताय नमः ।
ॐ पुराणाय नमः ।
ॐ पुरुषोत्तमाय नमः ।
ॐ सकलाय नमः ।
ॐ निष्कलाय नमः ।
ॐ शुद्धाय नमः । ७०
ॐ निर्गुणाय नमः ।
ॐ गुणशाश्वताय नमः ।
ॐ हिरण्यतनुसङ्काशाय नमः ।
ॐ सूर्यायुतसमप्रभाय नमः ।
ॐ मेघश्यामाय नमः ।
ॐ चतुर्बाहवे नमः ।
ॐ कुशलाय नमः ।
ॐ कमलेक्षणाय नमः ।
ॐ ज्योतीरूपाय नमः ।
ॐ अरूपाय नमः । ८०
ॐ स्वरूपाय नमः ।
ॐ रूपसंस्थिताय नमः ।
ॐ सर्वज्ञाय नमः ।
ॐ सर्वरूपस्थाय नमः ।
ॐ सर्वेशाय नमः ।
ॐ सर्वतोमुखाय नमः ।
ॐ ज्ञानाय नमः ।
ॐ कूटस्थाय नमः ।
ॐ अचलाय नमः ।
ॐ ज्ञानदाय नमः । ९०
ॐ परमाय नमः ।
ॐ प्रभवे नमः ।
ॐ योगीशाय नमः ।
ॐ योगनिष्णाताय नमः ।
ॐ योगिने नमः ।
ॐ योगरूपिणे नमः ।
ॐ ईश्वराय नमः ।
ॐ सर्वभूताय नमः ।
ॐ भूतमयाय नमः ।
ॐ प्रभवे नमः । १००
॥ इति श्री विष्णु शतनामावली संपूर्णा ॥
श्री विष्णु शतनामावली: जगत के आधार की स्तुति (Introduction - 600+ Words)
श्री विष्णु शतनामावली (Sri Vishnu Shatanamavali) सनातन धर्म के उन सबसे प्रभावशाली पाठों में से एक है, जो जगत के पालनहार भगवान विष्णु की अनंत शक्तियों का १०० दिव्य नामों में संकलन करता है। श्रीमद्भगवद्गीता और विभिन्न पुराणों के अनुसार, भगवान विष्णु 'स्थिति' के स्वामी हैं, जो सृष्टि का संतुलन बनाए रखते हैं। 'विष्णु' शब्द की व्युत्पत्ति 'विष्' धातु से हुई है, जिसका अर्थ है—'व्यापक'। अर्थात् वह शक्ति जो प्रत्येक परमाणु में व्याप्त है। यह शतनामावली इसी व्यापक सत्ता के उन स्वरूपों का वर्णन करती है जिन्होंने समय-समय पर अधर्म का नाश करने के लिए अवतार लिए।
ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, भगवान विष्णु के नामों का जप 'नाम-संकीर्तन' महिमा का आधार है। कलियुग में, जहाँ जटिल अनुष्ठान और कठिन तपस्या करना सामान्य मनुष्य के लिए कठिन है, वहाँ केवल १०० नामों का श्रद्धापूर्वक पाठ करना 'विष्णु सहस्रनाम' के समान ही शक्तिशाली माना गया है। इस नामावली की शुरुआत "ॐ वासुदेवाय नमः" से होती है, जो साक्षात श्री कृष्ण और नारायण की अभेदता को दर्शाता है। वासुदेव का अर्थ है—वे ईश्वर जो सबमें वास करते हैं और जिनमें सब वास करते हैं। इसके बाद "हृषीकेशाय" नाम आता है, जो हमें याद दिलाता है कि हमारी इंद्रियों के वास्तविक स्वामी श्री हरि ही हैं।
नामावली के मध्य में भगवान के 'दशावतार' के अंश दिखाई देते हैं—जैसे "वराहाय", "नृसिंहाय", "वामनाय" और "रामाय"। ये नाम केवल अवतारों का स्मरण नहीं कराते, बल्कि यह संदेश देते हैं कि जब भी धर्म पर संकट आएगा, परमात्मा किसी न किसी रूप में हमारी रक्षा के लिए अवश्य प्रकट होंगे। "पुण्डरीकाक्षाय" (कमल के समान नेत्रों वाले) और "पीतवाससे" (पीले वस्त्र धारण करने वाले) जैसे नाम भगवान के उस मनोहारी सगुण स्वरूप का ध्यान करने में सहायता करते हैं, जो भक्तों के हृदय में प्रेम और भक्ति का संचार करता है।
आध्यात्मिक शब्दावली में, इन १०० नामों को 'नाम-स्मरण योग' कहा गया है। जब हम "यज्ञपुरुषाय" या "भुवनेश्वराय" कहते हैं, तो हम स्वीकार करते हैं कि संपूर्ण ब्रह्मांड का स्वामी और समस्त यज्ञों का फलदाता केवल वही एक है। नामावली का अंत "प्रभवे नमः" पर होता है, जो ईश्वर की सर्वोच्च प्रभुता को स्थापित करता है। जो भक्त प्रतिदिन विष्णु शतनामावली का पाठ करता है, उसका अंतःकरण शुद्ध हो जाता है। यह पाठ मानसिक द्वंद्वों को शांत कर आत्मा को उस 'अच्युत' (जो कभी अपने पद से नहीं गिरता) सत्ता से जोड़ता है। यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि अपनी चेतना को ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ने का वैज्ञानिक मार्ग है।
विशिष्ट महत्व: १०० नामों की शक्ति और महिमा (Significance)
विष्णु शतनामावली का विशिष्ट महत्व इसकी संक्षिप्तता और प्रभावकारिता में निहित है। जहाँ सहस्रनाम का पाठ करने में अधिक समय लगता है, वहाँ शतनामावली दैनिक जीवन की व्यस्तता के बीच भी की जा सकती है। पौराणिक मान्यता है कि भगवान के नाम में स्वयं भगवान निवास करते हैं। अतः इन नामों का उच्चारण करने से साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक ऊर्जा (Aura) निर्मित होती है।
यह पाठ विशेष रूप से उन लोगों के लिए अमोघ है जो 'अशुभ ग्रहों' के प्रभाव या अज्ञात भय से पीड़ित हैं। "दुष्टदमनाय" और "मङ्गलाय" जैसे नामों का कंपन नकारात्मकता को नष्ट कर घर में शुभता का संचार करता है। यह नामावली सगुण और निर्गुण दोनों ब्रह्म की उपासना का मार्ग प्रशस्त करती है।
विष्णु शतनामावली पाठ के लाभ — फलश्रुति (Benefits)
शास्त्रों के अनुसार, भगवान विष्णु के इन १०० नामों के नित्य पाठ से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:
- मानसिक क्लेशों का नाश: तनाव, चिंता और डिप्रेशन जैसी समस्याओं में श्री हरि के नामों का जप शीतलता प्रदान करता है।
- पाप क्षय और शुद्धि: जाने-अनजाने में हुए संचित पापों का शमन होता है और बुद्धि सात्विक बनती है।
- सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह: घर में नित्य पाठ करने से वास्तु दोषों का शमन होता है और वातावरण शुद्ध रहता है।
- ऐश्वर्य और सौभाग्य: लक्ष्मीपति विष्णु की कृपा से घर में धन-धान्य की कमी नहीं रहती और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
- भय और शत्रुओं से रक्षा: "चक्रपाणये" और "गदापाणये" जैसे नामों का प्रभाव शत्रुओं और बुरी शक्तियों से रक्षा करता है।
- मोक्ष का मार्ग: अंतिम समय में भगवान का नाम स्मरण होने से जीव जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।
पाठ विधि एवं दैनिक साधना नियम (Ritual Method)
भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए पाठ को पूरी श्रद्धा और शुद्धता के साथ करना चाहिए:
- समय: सर्वोत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) है। संध्या के समय भी पाठ किया जा सकता है।
- शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र धारण करें। पीला रंग भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है।
- आसन: ऊनी या कुश के आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
- पूजन: भगवान विष्णु या लड्डू गोपाल की प्रतिमा के सम्मुख घी का दीपक जलाएं। तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) अवश्य अर्पित करें।
- एकाग्रता: प्रत्येक "ॐ ... नमः" के साथ नाम का उच्चारण स्पष्ट करें और उस नाम के अर्थ का मानसिक चिंतन करें।
- विशेष अवसर: एकादशी, गुरुवार और पूर्णिमा के दिन विष्णु शतनामावली का पाठ अनंत गुना फलदायी होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. विष्णु शतनामावली और सहस्रनाम में क्या अंतर है?
सहस्रनाम में भगवान के १००० नाम हैं, जबकि शतनामावली में १०० प्रमुख नाम हैं। शतनामावली उन लोगों के लिए श्रेष्ठ है जिनके पास समय का अभाव है, क्योंकि यह कम समय में सहस्रनाम जैसा ही फल देती है।
2. क्या इस पाठ के लिए गुरुवार का दिन अनिवार्य है?
नहीं, भगवान का नाम कभी भी लिया जा सकता है। हालाँकि, गुरुवार भगवान विष्णु का प्रिय दिन माना जाता है, इसलिए इस दिन पाठ करने से विशेष मानसिक शांति मिलती है।
3. क्या बिना मूर्ति के भी १०० नामों का जप कर सकते हैं?
हाँ, भगवान तो हृदय में निवास करते हैं। आप यात्रा के दौरान या कार्य करते समय भी मानसिक रूप से इन नामों का जप कर सकते हैं।
4. क्या स्त्रियों को यह पाठ करना चाहिए?
जी हाँ, भक्ति के मार्ग पर सभी का समान अधिकार है। स्त्रियाँ भी पूरी श्रद्धा के साथ श्री हरि की वंदना कर सकती हैं।
5. पाठ के दौरान तुलसी का क्या महत्व है?
भगवान विष्णु को 'तुलसी' अत्यंत प्रिय है। शास्त्र कहते हैं कि बिना तुलसी पत्र के श्री हरि कोई भोग स्वीकार नहीं करते। अतः पाठ के समय तुलसी पास रखना शुभ होता है।
6. क्या यह पाठ बुरी नज़र से बचाता है?
हाँ, भगवान विष्णु का 'कवच' नाम जप से निर्मित होता है, जो नकारात्मक ऊर्जा और बुरी नज़र से साधक की रक्षा करता है।
7. 'वासुदेव' नाम का क्या अर्थ है?
वासुदेव का अर्थ है जो संपूर्ण चराचर जगत में व्याप्त है और जिसमें यह सारा संसार समाया हुआ है। यह विष्णु का सबसे शक्तिशाली नाम माना जाता है।
8. पाठ के लिए कौन सी माला प्रयोग करनी चाहिए?
भगवान विष्णु की साधना में 'तुलसी की माला' (Tulsi Mala) सर्वश्रेष्ठ है। इसके अतिरिक्त चन्दन की माला का प्रयोग भी किया जा सकता है।
9. क्या इस पाठ से व्यापार में वृद्धि होती है?
हाँ, "लक्ष्मीपते" और "सौभाग्यदायकाय" जैसे भावों के कारण यह पाठ दरिद्रता मिटाकर व्यापार और जीवन में समृद्धि लाता है।
10. क्या पीरियड्स के दौरान महिलाएँ पाठ कर सकती हैं?
शुद्धि के शास्त्रीय नियमों के अनुसार, उन दिनों में मानसिक जप (बिना पुस्तक छुए) करना श्रेयस्कर माना जाता है।