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Sri Venkateshwara Ashtottara Shatanamavali 3 – श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली ३

Sri Venkateshwara Ashtottara Shatanamavali 3 – श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली ३
॥ श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली ३ ॥ १-९ ओं श्रीवेङ्कटेश्वराय नमः । ओं अव्यक्ताय नमः । ओं श्रीश्रीनिवासाय नमः । ओं कटिहस्ताय नमः । ओं लक्ष्मीपतये नमः । ओं वरप्रदाय नमः । ओं अनामयाय नमः । ओं अनेकात्मने नमः । ओं अमृताम्शाय नमः । १०-१८ ओं दीनबन्धवे नमः । ओं जगद्वन्द्याय नमः । ओं आर्तलोकाभयप्रदाय नमः । ओं गोविन्दाय नमः । ओं आकाशराजवरदाय नमः । ओं शाश्वताय नमः । ओं योगिहृत्पद्ममन्दिराय नमः । ओं परवे नमः । ओं दामोदराय नमः । १९-२७ ओं शेषाद्रिनिलयाय नमः । ओं जगत्पालाय नमः । ओं देवाय नमः । ओं पापघ्नाय नमः । ओं केशवाय नमः । ओं भक्तवत्सलाय नमः । ओं मधुसूदनाय नमः । ओं त्रिविक्रमाय नमः । ओं अमृताय नमः । २८-३६ ओं शिम्शुमाराय नमः । ओं माधवाय नमः । ओं जटामकुटशोभिताय नमः । ओं कृष्णाय नमः । ओं शङ्खमध्योल्लसन्मञ्जुकिङ्किण्याढ्यकन्धराय नमः । ओं श्रीहरये नमः । ओं नीलमेघश्यामतनवे नमः । ओं ज्ञानपञ्जराय नमः । ओं बिल्वपत्रार्चनप्रियाय नमः । ३७-४५ ओं श्रीवत्सवक्षसे नमः । ओं जगद्व्यापिने नमः । ओं सर्वेशाय नमः । ओं जगत्कर्त्रे नमः । ओं गोपालाय नमः । ओं जगत्साक्षिणे नमः । ओं पुरुषोत्तमाय नमः । ओं जगत्पतये नमः । ओं गोपीश्वराय नमः । ४६-५४ ओं चिन्तितार्थप्रदायकाय नमः । ओं परञ्ज्योतिषे नमः । ओं जिष्णवे नमः । ओं वैकुण्ठपतये नमः । ओं दाशार्हाय नमः । ओं अव्ययाय नमः । ओं दशरूपवते नमः । ओं सुधातनवे नमः । ओं देवकीनन्दनाय नमः । ५५-६३ ओं यादवेन्द्राय नमः । ओं शौरये नमः । ओं नित्ययौवनरूपवते नमः । ओं हयग्रीवाय नमः । ओं चतुर्वेदात्मकाय नमः । ओं जनार्दनाय नमः । ओं विष्णवे नमः । ओं कन्याश्रवणतारेड्याय नमः । ओं अच्युताय नमः । ६४-७२ ओं पीताम्बरधराय नमः । ओं पद्मिनीप्रियाय नमः । ओं अनघाय नमः । ओं धरापतये नमः । ओं वनमालिने नमः । ओं सुरपतये नमः । ओं पद्मनाभाय नमः । ओं निर्मलाय नमः । ओं मृगयासक्तमानसाय नमः । ७३-८१ ओं देवपूजिताय नमः । ओं अश्वारूढाय नमः । ओं चतुर्भुजाय नमः । ओं खड्गधारिणे नमः । ओं चक्रधराय नमः । ओं धनार्जनसमुत्सुकाय नमः । ओं त्रिधाम्ने नमः । ओं घनसारलसन्मध्यकस्तूरीतिलकोज्ज्वलाय नमः । ओं त्रिगुणाश्रयाय नमः । ८२-९० ओं सच्चिदानन्दरूपाय नमः । ओं निर्विकल्पाय नमः । ओं जगन्मङ्गलदायकाय नमः । ओं निष्कलङ्काय नमः । ओं यज्ञरूपाय नमः । ओं निरातङ्काय नमः । ओं यज्ञभोक्त्रे नमः । ओं निरञ्जनाय नमः । ओं चिन्मयाय नमः । ९१-९९ ओं निराभासाय नमः । ओं परमेश्वराय नमः । ओं नित्यतृप्ताय नमः । ओं परमार्थप्रदाय नमः । ओं निरूपद्रवाय नमः । ओं शान्ताय नमः । ओं निर्गुणाय नमः । ओं श्रीमते नमः । ओं गदाधराय नमः । १००-१०८ ओं दोर्दण्डविक्रमाय नमः । ओं शार्ङ्गपाणये नमः । ओं परात्पराय नमः । ओं नन्दकिने नमः । ओं परब्रह्मणे नमः । ओं शङ्खधारकाय नमः । ओं श्रीविभवे नमः । ओं अनेकमूर्तये नमः । ओं जगदीश्वराय नमः । ॥ इति श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णा ॥

श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली: एक दिव्य एवं तात्विक परिचय (Introduction)

श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली (Sri Venkateshwara Ashtottara Shatanamavali) कलियुग के साक्षात् अधिपति भगवान वेंकटेश्वर की कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल और प्रभावशाली माध्यम है। हिन्दू धर्म दर्शन के अनुसार, "नाम-जप" को इस युग की सर्वश्रेष्ठ साधना माना गया है। १०८ नामों का यह संग्रह वास्तव में भगवान के उन गुणों, लीलाओं और स्वरूपों का वर्णन है जो साधक के अंतर्मन को भगवान श्रीनिवास के साथ जोड़ते हैं। तिरुमाला की पहाड़ियों पर विराजमान भगवान वेंकटेश्वर को "वरद" (वरदान देने वाले) देवता के रूप में पूजा जाता है, और यह नामावली उन्हीं वरदानों की प्राप्ति का द्वार है।
नाम का तात्विक अर्थ: "वेंकटेश्वर" शब्द स्वयं में एक महामन्त्र है। "वेम्" का अर्थ है 'पाप' और "कट" का अर्थ है 'जलाना' या 'नष्ट करना'। अर्थात्, वह स्वामी जो अपने भक्तों के पापों को क्षण मात्र में जलाकर भस्म कर देता है, वही वेंकटेश्वर है। इस नामावली में भगवान को "अव्यक्ताय" (जो इंद्रियों से परे है) से लेकर "जगदीश्वराय" (संपूर्ण विश्व के स्वामी) तक के नामों से सम्बोधित किया गया है। प्रत्येक नाम भगवान की एक विशिष्ट शक्ति को जाग्रत करता है। जैसे "कटिहस्ताय" नाम यह बोध कराता है कि संसार का भवसागर केवल घुटनों तक ही गहरा है यदि साधक प्रभु की शरण में आ जाए।
पौराणिक पृष्ठभूमि: भगवान श्रीनिवास का अवतार वैकुण्ठ से भू-लोक पर भक्तों के उद्धार के लिए हुआ था। ब्रह्माण्ड पुराण और स्कन्द पुराण के अनुसार, वेङ्कटाचल पर्वत साक्षात् शेषनाग का अवतार है, जिस पर भगवान का वास है (शेषाद्रिनिलयाय)। नामावली में भगवान के उन स्वरूपों का वर्णन है जो उन्होंने विभिन्न अवतारों में धारण किए—जैसे "त्रिविक्रमाय", "मधुसूदनाय" और "दशरूपवते"। यह सिद्ध करता है कि जो नारायण त्रेता में राम और द्वापर में कृष्ण थे, वही आज तिरुमाला में वेंकटेश्वर के रूप में भक्तों का कष्ट हर रहे हैं।
आध्यात्मिक और शैक्षणिक शोध यह स्पष्ट करते हैं कि इन १०८ नामों का सस्वर उच्चारण मस्तिष्क की उन तरंगों को सक्रिय करता है जो 'शान्ति' और 'संतोष' के लिए उत्तरदायी हैं। जब हम कहते हैं "सच्चिदानन्दरूपाय", तो हम वास्तव में उस अविनाशी सत्य और आनन्द का आह्वान कर रहे होते हैं जो हमारी आत्मा का मूल स्वभाव है। तिरुपति के भव्य मंदिर में होने वाली अर्चना सेवा में इसी नामावली का उपयोग किया जाता है। जो साधक अपने घर में भी इस नामावली का पाठ करता है, उसे वही पुण्य प्राप्त होता है जो साक्षात् तिरुमाला के गर्भगृह में दर्शन करने से मिलता है।

विशिष्ट महत्व: कलिदोष नाशक एवं समृद्धि प्रदायक (Significance)

श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली का विशिष्ट महत्व इसके "शरणागति" भाव में निहित है। कलियुग में मनुष्य अनेक प्रकार के मानसिक द्वंद्वों, आर्थिक असुरक्षा और ग्रह दोषों से घिरा है। भगवान वेंकटेश्वर को "आपद्बान्धव" (मुसीबत में साथ देने वाला भाई) माना गया है। नामावली में प्रयुक्त "दीनबन्धवे" और "आर्तलोकाभयप्रदाय" जैसे नाम साधक को यह विश्वास दिलाते हैं कि घोर संकट के समय भी ईश्वर उसके साथ हैं।
इस पाठ का एक और महत्वपूर्ण ज्योतिषीय पहलू है। भगवान वेंकटेश्वर राहु और केतु जैसे छाया ग्रहों के अशुभ प्रभाव को शांत करने वाले अधिष्ठाता माने जाते हैं। चूंकि वे शेषाद्रि (नाग पर्वत) पर विराजमान हैं, अतः सर्प दोष और कालसर्प योग की शांति के लिए इस नामावली का पाठ अचूक औषधि है। इसके अतिरिक्त, जो लोग "ऋण मुक्ति" (Debt relief) की कामना रखते हैं, उनके लिए "लक्ष्मीपतये" और "श्रीनिवासाय" नामों का जप कुबेर के खजाने के द्वार खोलने जैसा है। यह पाठ साधक को "निर्मल" बनाकर उसे भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के शिखर पर ले जाता है।

नामावली पाठ के दिव्य लाभ: फलश्रुति (Benefits)

शास्त्रों और भक्तों के व्यक्तिगत अनुभवों के अनुसार, श्री वेङ्कटेश्वर के १०८ दिव्य नामों के पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • आर्थिक कष्टों का निवारण: "धनार्जनसमुत्सुकाय" (नाम ७८) — भगवान अपने भक्तों को धन-धान्य से परिपूर्ण करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। व्यापार में लाभ और रुके हुए धन की प्राप्ति के लिए यह अमोघ है।
  • समस्त पापों का नाश: "पापघ्नाय" — नित्य पाठ करने से वाचिक, मानसिक और शारीरिक पापों का शमन होता है और साधक का मन सात्विक गुणों से भर जाता है।
  • भय और शत्रुओं पर विजय: भगवान को "जिष्णवे" (सदा विजयी) और "दोर्दण्डविक्रमाय" (महाशक्तिशाली भुजाओं वाले) कहा गया है। यह पाठ शत्रुओं के कुचक्रों को विफल कर विजय दिलाता है।
  • संतान और वंश वृद्धि: जो दम्पति संतान सुख से वंचित हैं, उन्हें "आकाशराजवरदाय" की कृपा से गुणवान संतान की प्राप्ति होती है।
  • मानसिक शान्ति और एकाग्रता: "शान्ताय" और "निराभासाय" नामों के प्रभाव से डिप्रेशन, तनाव और अनिद्रा जैसी मानसिक व्याधियाँ दूर होती हैं।
  • मोक्ष और वैकुण्ठ प्राप्ति: यह पाठ "परमार्थप्रदाय" है, जो अंततः जीवात्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर सालोक्य मुक्ति प्रदान करता है।

पाठ विधि एवं साधना विधान (Ritual Method)

भगवान वेंकटेश्वर की आराधना के लिए "शुद्धि" और "स्थिरता" अनिवार्य है। श्रेष्ठ परिणामों के लिए निम्नलिखित विधि अपनाएं:
  • शुभ समय: शनिवार भगवान वेंकटेश्वर का प्रिय दिन है। शनिवार, एकादशी और 'श्रवण' नक्षत्र के दिन पाठ करना महाफलदायी है। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त या सायं सूर्यास्त के समय पाठ करना सर्वोत्तम है।
  • शुद्धि: पाठ के समय स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। भगवान श्रीनिवास को "पीताम्बर" (पीला वस्त्र) अत्यंत प्रिय है।
  • पूजन सामग्री: भगवान वेंकटेश्वर के चित्र के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। उन्हें तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) अवश्य अर्पित करें, क्योंकि बिना तुलसी के उनकी पूजा अपूर्ण मानी जाती है।
  • नैवेद्य: भगवान को गुड़, मिश्री, या लड्डू का भोग लगाएं। यदि संभव हो, तो उन्हें दही-चावल का भोग भी लगा सकते हैं।
  • आसन: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठकर पाठ करें।
  • अर्चना विधि: प्रत्येक नाम के आगे "ॐ" और अंत में "नमः" लगाकर पुष्प या अक्षत भगवान के चरणों में अर्पित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

१. श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली का मुख्य लाभ क्या है?
इसका मुख्य लाभ आर्थिक समृद्धि, मानसिक शान्ति, ग्रह दोषों से मुक्ति और भगवान वेंकटेश्वर की असीम करुणा प्राप्त करना है। यह कलियुग के समस्त कष्टों का निवारण करने वाली नामावली है।
२. क्या यह पाठ कर्ज से मुक्ति दिला सकता है?
हाँ, भगवान वेंकटेश्वर को ऐश्वर्य का देवता माना जाता है। "लक्ष्मीपतये" और "श्रीनिवासाय" नामों का निरंतर जप आर्थिक बाधाओं को दूर करने और ऋण से मुक्ति दिलाने में अत्यंत सहायक है।
३. पाठ के लिए शनिवार का ही दिन क्यों श्रेष्ठ माना जाता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शनिवार भगवान विष्णु (वेंकटेश्वर रूप) का प्रिय दिन है और इस दिन की गई सेवा का फल अनन्त गुना मिलता है, साथ ही शनि देव की प्रतिकूलता भी शांत होती है।
४. "वेङ्कट" शब्द का क्या अर्थ है?
'वें' का अर्थ है पाप और 'कट' का अर्थ है जलाना। अर्थात् वह स्वामी जो अपने भक्तों के पापों को जला देता है, वह वेङ्कटेश है।
५. क्या महिलाएं इस नामावली का पाठ कर सकती हैं?
निश्चित रूप से। भगवान श्रीनिवास की भक्ति में कोई भेद नहीं है। शुद्धता और श्रद्धा के साथ महिलाएं अपने परिवार के मंगल और सौभाग्य के लिए यह पाठ कर सकती हैं।
६. "कन्याश्रवणतारेड्याय" नाम का क्या महत्व है?
यह नाम भगवान के जन्म नक्षत्र 'श्रवण' की ओर संकेत करता है। इस नाम के उच्चारण से जातक के जन्म नक्षत्र के दोष दूर होते हैं और शुभ फलों की प्राप्ति होती है।
७. क्या इस पाठ से व्यापार में उन्नति हो सकती है?
जी हाँ, चूँकि वे "सम्पदा" के अधिष्ठाता हैं, उनके नामों का गान व्यापारिक बाधाओं को दूर करता है और रुके हुए धन की प्राप्ति कराता है।
८. "बिल्वपत्रार्चनप्रियाय" का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि भगवान वेंकटेश्वर को बिल्व पत्र से पूजा जाना अत्यंत प्रिय है। यह शिव और विष्णु के अभेद स्वरूप को दर्शाता है। तिरुपति में शुक्रवार को बिल्व पत्र से अर्चना की जाती है।
९. क्या इस पाठ से कुंडली के दोष शांत होते हैं?
हाँ, विशेष रूप से राहु-केतु, शनि और पितृ दोषों की शांति के लिए यह नामावली सिद्ध मानी जाती है।
१०. इस नामावली को सिद्ध करने की क्या विधि है?
किसी भी शुभ मुहूर्त से आरम्भ कर ४१ दिनों तक निरंतर ११ बार पाठ करने से यह नामावली साधक के लिए सिद्ध हो जाती है और चमत्कारी अनुभव देती है।