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Sri Veerabhadra Ashtottara Shatanamavali - श्री वीरभद्राष्टोत्तरशतनामावली

Sri Veerabhadra Ashtottara Shatanamavali - श्री वीरभद्राष्टोत्तरशतनामावली
॥ श्री वीरभद्राष्टोत्तरशतनामावली ॥ ॐ वीरभद्राय नमः । ॐ महाशूराय नमः । ॐ रौद्राय नमः । ॐ रुद्रावतारकाय नमः । ॐ श्यामाङ्गाय नमः । ॐ उग्रदंष्ट्राय नमः । ॐ भीमनेत्राय नमः । ॐ जितेन्द्रियाय नमः । ॐ ऊर्ध्वकेशाय नमः । ९ ॐ भूतनाथाय नमः । ॐ खड्गहस्ताय नमः । ॐ त्रिविक्रमाय नमः । ॐ विश्वव्यापिने नमः । ॐ विश्वनाथाय नमः । ॐ विष्णुचक्रविभञ्जनाय नमः । ॐ भद्रकालीपतये नमः । ॐ भद्राय नमः । ॐ भद्राक्षाभरणान्विताय नमः । १८ ॐ भानुदन्तभिदे नमः । ॐ उग्राय नमः । ॐ भगवते नमः । ॐ भावगोचराय नमः । ॐ चण्डमूर्तये नमः । ॐ चतुर्बाहवे नमः । ॐ चतुराय नमः । ॐ चन्द्रशेखराय नमः । ॐ सत्यप्रतिज्ञाय नमः । २७ ॐ सर्वात्मने नमः । ॐ सर्वसाक्षिणे नमः । ॐ निरामयाय नमः । ॐ नित्यनिष्ठितपापौघाय नमः । ॐ निर्विकल्पाय नमः । ॐ निरञ्जनयाय नमः । ॐ भारतीनासिकच्छादाय नमः । ॐ भवरोगमहाभिषजे नमः । ॐ भक्तैकरक्षकाय नमः । ३६ ॐ बलवते नमः । ॐ भस्मोद्धूलितविग्रहाय नमः । ॐ दक्षारये नमः । ॐ धर्ममूर्तये नमः । ॐ दैत्यसङ्घभयङ्कराय नमः । ॐ पात्रहस्ताय नमः । ॐ पावकाक्षाय नमः । ॐ पद्मजाक्षादिवन्दिताय नमः । ॐ मखान्तकाय नमः । ४५ ॐ महातेजसे नमः । ॐ महाभयनिवारणाय नमः । ॐ महावीराय नमः । ॐ गणाध्यक्षाय नमः । ॐ महाघोरनृसिंहजिते नमः । ॐ निश्वासमारुतोद्धूतकुलपर्वतसञ्चयाय नमः । ॐ दन्तनिष्पेषणारावमुखरीकृतदिक्तटाय नमः । ॐ पादसङ्घट्‍टनोद्भ्रान्तशेषशीर्षसहस्रकाय नमः । ॐ भानुकोटिप्रभाभास्वन्मणिकुण्डलमण्डिताय नमः । ५४ ॐ शेषपर्वतरूपत्वप्रकाशनपराय नमः । ॐ शेषभूषाय नमः । ॐ चर्मवाससे नमः । ॐ चारुहस्तोज्ज्वलत्तनवे नमः । ॐ उपेन्द्रेन्द्रयमादिदेवानामङ्गरक्षकाय नमः । ॐ पट्‍टिसप्रासपरशुगदाद्यायुधशोभिताय नमः । ॐ ब्रह्मादिदेवदुष्प्रेक्ष्यप्रभाशुम्भत्किरीटधृते नमः । ॐ कूष्माण्डग्रहभेतालमारीगणविभञ्जनाय नमः । ॐ क्रीडाकन्दुकिताजाण्डभाण्डकोटीविराजिताय नमः । ६३ ॐ शरणागतवैकुण्ठब्रह्मेन्द्रामररक्षकाय नमः । ॐ योगीन्द्रहृत्पयोजातमहाभास्करमण्डलाय नमः । ॐ सर्वदेवशिरोरत्नसङ्घृष्टमणिपादुकाय नमः । ॐ ग्रैवेयहारकेयूरकाञ्चीकटकभूषिताय नमः । ॐ वागतीताय नमः । ॐ दक्षहराय नमः । ॐ वह्निजिह्वानिकृन्तनाय नमः । ॐ सहस्रबाहवे नमः । ॐ सर्वज्ञाय नमः । ७२ ॐ सच्चिदानन्दविग्रहाय नमः । ॐ भयाह्वयाय नमः । ॐ भक्तलोकाराति तीक्ष्णविलोचनाय नमः । ॐ कारुण्याक्षाय नमः । ॐ गणाध्यक्षाय नमः । ॐ गर्वितासुरदर्पहृते नमः । ॐ सम्पत्कराय नमः । ॐ सदानन्दाय नमः । ॐ सर्वाभीष्टफलप्रदाय नमः । ८१ ॐ नूपुरालङ्कृतपदाय नमः । ॐ व्यालयज्ञोपवीतकाय नमः । ॐ भगनेत्रहराय नमः । ॐ दीर्घबाहवे नमः । ॐ बन्धविमोचकाय नमः । ॐ तेजोमयाय नमः । ॐ कवचाय नमः । ॐ भृगुश्मश्रुविलुम्पकाय नमः । ॐ यज्ञपूरुषशीर्षघ्नाय नमः । ९० ॐ यज्ञारण्यदवानलाय नमः । ॐ भक्तैकवत्सलाय नमः । ॐ भगवते नमः । ॐ सुलभाय नमः । ॐ शाश्वताय नमः । ॐ निधये नमः । ॐ सर्वसिद्धिकराय नमः । ॐ दान्ताय नमः । ॐ सकलागमशोभिताय नमः । ९९ ॐ भुक्तिमुक्तिप्रदाय नमः । ॐ देवाय नमः । ॐ सर्वव्याधिनिवारकाय नमः । ॐ अकालमृत्युसंहर्त्रे नमः । ॐ कालमृत्युभयङ्कराय नमः । ॐ ग्रहाकर्षणनिर्बन्धमारणोच्चाटनप्रियाय नमः । ॐ परतन्त्रविनिर्बन्धाय नमः । ॐ परमात्मने नमः । ॐ परात्पराय नमः । १०८ ॐ स्वमन्त्रयन्त्रतन्त्राघपरिपालनतत्पराय नमः । ॐ पूजकश्रेष्ठशीघ्रवरप्रदाय नमः । ॥ इति श्री वीरभद्राष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णा ॥

परिचय: भगवान श्री वीरभद्र अवतार एवं उनकी महिमा (Introduction)

सनातन धर्म के शैव आगमों में भगवान वीरभद्र (Lord Veerabhadra) का स्वरूप प्रचंड शक्ति, न्याय और महादेव के अदम्य संकल्प का प्रतीक है। श्री वीरभद्राष्टोत्तरशतनामावली भगवान के उन १०८ नामों का संकलन है जो उनके जन्म की अग्नि, उनके पराक्रम की ज्वाला और भक्तों के प्रति उनकी अगाध करुणा को प्रकट करते हैं। वीरभद्र कोई स्वतंत्र देवता नहीं, बल्कि स्वयं शिव की 'क्रोध-ऊर्जा' का साक्षात् विग्रह हैं। उनका प्राकट्य ब्रह्मांड की एक ऐसी घटना से जुड़ा है जिसने अज्ञान और अहंकार के विनाश का नया अध्याय लिखा।
ऐतिहासिक प्राकट्य कथा: शिव पुराण और स्कन्द पुराण के अनुसार, जब दक्ष प्रजापति ने अपने महान यज्ञ में महादेव का अपमान किया और अपमानित होकर माता सती ने अपनी योगनिद्रा से देह त्याग दिया, तब शिव का 'रुद्र' रूप जागृत हो उठा। घोर शोक और आवेश में महादेव ने अपनी एक जटा उखाड़कर पर्वत पर पटकी। उस जटा से साक्षात् काल के समान भयंकर वीरभद्र प्रकट हुए। उनके साथ ही शक्ति स्वरूपा भद्रकाली का भी प्राकट्य हुआ। वीरभद्र का कार्य दक्ष के अहंकार पूर्ण यज्ञ का विध्वंस करना और धर्म की पुनः स्थापना करना था। नामावली में 'रुद्रावतारकाय' और 'दक्षारये' जैसे नाम उनके इसी मूल स्वरूप का स्मरण कराते हैं।
स्वरूप का तात्विक अर्थ: भगवान वीरभद्र का स्वरूप अत्यंत विशाल और आध्यात्मिक रहस्यों से भरा है। वे 'श्यामाङ्गाय' (काले वर्ण वाले) हैं, जो यह दर्शाता है कि वे उस अनंत आकाश के स्वामी हैं जहाँ से सब उत्पन्न होता है और जहाँ सब विलीन हो जाता है। उनके 'ऊर्ध्वकेशाय' (खड़े बाल) उनकी जाग्रत कुंडलिनी शक्ति और प्रचंड ऊर्जा के प्रतीक हैं। उनके १० मुख और सहस्र भुजाएँ (सहस्रबाहवे) यह सिद्ध करती हैं कि वे दसों दिशाओं और अनंत काल के अधिपति हैं। वे केवल संहारक नहीं हैं, बल्कि 'सच्चिदानन्दविग्रहाय' हैं, जो सत्य और आनंद का ही एक उग्र रूप है।
अष्टोत्तर नामावली का तांत्रिक पक्ष: वीरभद्र की उपासना तंत्र शास्त्र में अत्यंत उच्च कोटि की मानी गई है। 'कौलमार्गप्रवर्तकाय' और 'ग्रहाकर्षणनिर्बन्धमारणोच्चाटनप्रियाय' जैसे नाम यह स्पष्ट करते हैं कि वे तंत्र के उन रहस्यों के स्वामी हैं जो साधक को ग्रहों की बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों से मुक्त करते हैं। वीरभद्र उपासना में 'भद्र' (कल्याण) शब्द जुड़ा है, जिसका अर्थ है कि उनकी शक्ति उग्र होते हुए भी अंततः कल्याणकारी ही है। वे अज्ञान रूपी अंधकार को जलाकर ज्ञान की ज्योति प्रज्ज्वलित करते हैं।
कलियुग में, जहाँ मनुष्य अकारण भय, शत्रु बाधा और मानसिक विकारों से घिरा हुआ है, वहां वीरभद्र के १०८ नामों का पाठ एक सुरक्षा कवच (Armor) का कार्य करता है। 'भयापहाय' के रूप में वे साधक के मन से मृत्यु का भय निकालते हैं। उनकी कृपा से व्यक्ति के भीतर 'वीर' भाव जाग्रत होता है, जिससे वह जीवन की चुनौतियों का सामना दृढ़ता से कर पाता है। १०८ नामों का यह दिव्य समूह साक्षात् शिव की उस ज्वाला का अनुभव कराता है जो भक्त के जीवन के समस्त अरिष्टों को भस्म कर देती है।

विशिष्ट आध्यात्मिक एवं ज्योतिषीय महत्व (Significance)

भगवान वीरभद्र की उपासना का महत्व 'न्याय' और 'विष्णु-शिव समन्वय' के दृष्टिकोण से भी अद्वितीय है। नामावली में 'विष्णुचक्रविभञ्जनाय' (श्लोक १५) जैसा नाम उनके उस पराक्रम को दर्शाता है जहाँ उन्होंने दक्ष की रक्षा कर रहे सुदर्शन चक्र को भी रोक दिया था। यह संहारक शक्ति के ऊपर सत्य की शक्ति की विजय का प्रतीक है।
ज्योतिषीय दृष्टि से, वीरभद्र को मंगल ग्रह (Planet Mars) की उग्रता को संतुलित करने वाला माना गया है। यदि किसी की कुंडली में उग्र मंगल के कारण विवाह में बाधा, अत्यधिक क्रोध या रक्त संबंधी व्याधियां हों, तो वीरभद्र अष्टोत्तर का पाठ अमृत के समान फल देता है। तांत्रिक ग्रंथों में 'कूष्माण्डग्रहभेतालमारीगणविभञ्जनाय' नाम के माध्यम से उन्हें प्रेत-बाधा और महामारी का नाश करने वाला बताया गया है।

फलश्रुति: नामावली पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits)

आगमों और शिव पुराण के विभिन्न व्याख्याकारों के अनुसार, इस नामावली के पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • शत्रु और मुकदमा विजय: 'रक्षोबलविमर्दनाय' और 'विरुद्धहन्त्रे' जैसे नामों का जप शत्रुओं के षड्यंत्रों को विफल करता है और अदालती मामलों में सत्य की विजय दिलाता है।
  • अकाल मृत्यु से सुरक्षा: 'अकालमृत्युसंहर्त्रे' नाम का जप साधक की आयु की रक्षा करता है और दुर्घटनाओं के भय को दूर करता है।
  • अपार साहस और आत्मविश्वास: 'महावीराय' के नामों का स्मरण साधक के भीतर ऐसी इच्छाशक्ति भर देता है कि वह किसी भी विषम परिस्थिति में विचलित नहीं होता।
  • नकारात्मक शक्तियों का नाश: 'परतन्त्रविनिर्बन्धाय' के रूप में वे किसी भी प्रकार के काले जादू या शत्रु जनित तांत्रिक बाधाओं को जड़ से समाप्त कर देते हैं।
  • समस्त व्याधि निवारण: 'सर्वव्याधिनिवारकाय' और 'भवरोगमहाभिषजे' के रूप में वे शारीरिक और मानसिक रोगों के परम चिकित्सक हैं।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method & Guidelines)

भगवान वीरभद्र की साधना उग्रता और पूर्ण शुचिता की मांग करती है। इसके पूर्ण फल हेतु निम्न विधि अपनाएं:

साधना के नियम

  • समय: मंगलवार (Tuesday) और शनिवार का दिन वीरभद्र पूजा के लिए विशेष है। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त या प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) पाठ करना सर्वोत्तम है।
  • वस्त्र: लाल या काले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना उग्र साधना में सहायक होता है।
  • अर्पण: भगवान को लाल पुष्प (विशेषकर गुड़हल), सुगन्धित चन्दन, सुपारी और सिन्दूर अर्पित करें।
  • दीप: सरसों के तेल या घी का चौमुखी दीपक जलाएं।
  • दिशा: पाठ के समय अपना मुख उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर रखें।

विशेष अवसर

  • वीरभद्र जयंती: इस दिन १०८ बार नामावली का पाठ और अभिषेक महासिद्धि प्रदान करता है।
  • अमावस्या: घर से नकारात्मक ऊर्जा और पितृ दोष की शांति के लिए अमावस्या की रात्रि में पाठ करना श्रेयस्कर है।
  • कालाष्टमी: प्रत्येक मास की कालाष्टमी को पाठ करने से भैरव और वीरभद्र दोनों की कृपा प्राप्त होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री वीरभद्र कौन हैं और उनका जन्म कैसे हुआ?

भगवान वीरभद्र भगवान शिव के एक अत्यंत शक्तिशाली 'उग्र अवतार' हैं। माता सती के आत्मदाह के बाद महादेव ने क्रोधवश अपनी जटा पर्वत पर पटकी थी, जिससे दक्ष यज्ञ का विनाश करने हेतु वीरभद्र का प्राकट्य हुआ।

2. क्या गृहस्थ व्यक्ति वीरभद्र नामावली का पाठ कर सकता है?

जी हाँ, गृहस्थ व्यक्ति सुरक्षा, शत्रु बाधा निवारण और साहस हेतु सात्विक भाव से पूजा कर सकते हैं। बस पूर्ण शुद्धि और श्रद्धा का ध्यान रखना अनिवार्य है।

3. क्या वीरभद्र और कालभैरव एक ही हैं?

नहीं, दोनों ही शिव के उग्र रूप हैं लेकिन उनके उद्देश्य अलग हैं। वीरभद्र दक्ष के यज्ञ विध्वंस और प्रतिशोध के लिए प्रकट हुए, जबकि कालभैरव काल के नियंत्रण और काशी की रक्षा हेतु।

4. इस नामावली के पाठ से कौन से ग्रहों की शांति होती है?

मुख्य रूप से मंगल ग्रह (Mars) की शांति और शुभ फल प्राप्ति के लिए वीरभद्र उपासना सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। शनि दोष में भी यह कवच का कार्य करती है।

5. 'मखान्तकाय' नाम का क्या अर्थ है?

'मख' का अर्थ है यज्ञ और 'अन्तक' का अर्थ है अंत करने वाला। यह नाम वीरभद्र के उस स्वरूप को दर्शाता है जिसने दक्ष के अभिमानी यज्ञ का अंत किया था।

6. क्या स्त्रियाँ इस नामावली का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, भक्ति मार्ग में कोई भेद नहीं है। स्त्रियाँ अपनी रक्षा और पारिवारिक सुख हेतु पूर्ण श्रद्धा के साथ यह पाठ कर सकती हैं।

7. 'भद्रकालीपति' नाम का क्या महत्व है?

देवी भद्रकाली भगवान वीरभद्र की शक्ति और अर्धांगिनी हैं। यह नाम शिव और शक्ति के उस सम्मिलित रौद्र रूप का प्रतीक है जो अधर्म का नाश करता है।

8. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?

भगवान शिव के किसी भी अवतार की साधना हेतु रुद्राक्ष की माला ही सर्वश्रेष्ठ और शास्त्रसम्मत मानी गई है।

9. क्या इस पाठ से अकाल मृत्यु का योग टल सकता है?

हाँ, नामावली में 'अकालमृत्युसंहर्त्रे' नाम है। शिव के इस अवतार की शरण में जाने से अकाल मृत्यु का भय और ग्रहों के मारक प्रभाव क्षीण हो जाते हैं।

10. वीरभद्र का वाहन क्या है?

वीरभद्र का वाहन वृषभ (बैल) माना गया है, जैसा कि शिव का है। हालांकि, कुछ परंपराओं में वे सिंह पर भी सवार दिखाए जाते हैं जो उनके प्रचंड पराक्रम का प्रतीक है।