Sri Ranganatha Ashtottara Shatanamavali – श्री रङ्गनाथाष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्री रङ्गनाथाष्टोत्तरशतनामावली ॥
ॐ श्रीरङ्गशायिने नमः ।
ॐ श्रीकान्ताय नमः ।
ॐ श्रीप्रदाय नमः ।
ॐ श्रितवत्सलाय नमः ।
ॐ अनन्ताय नमः ।
ॐ माधवाय नमः ।
ॐ जेत्रे नमः ।
ॐ जगन्नाथाय नमः ।
ॐ जगद्गुरवे नमः । ९
ॐ सुरवर्याय नमः ।
ॐ सुराराध्याय नमः ।
ॐ सुरराजानुजाय नमः ।
ॐ प्रभवे नमः ।
ॐ हरये नमः ।
ॐ हतारये नमः ।
ॐ विश्वेशाय नमः ।
ॐ शाश्वताय नमः ।
ॐ शम्भवे नमः । १८
ॐ अवययाय नमः ।
ॐ भक्तार्तिभञ्जनाय नमः ।
ॐ वाग्मिने नमः ।
ॐ वीराय नमः ।
ॐ विख्यातकीर्तिमते नमः ।
ॐ भास्कराय नमः ।
ॐ शास्त्रतत्त्वज्ञाय नमः ।
ॐ दैत्यशास्त्रे नमः ।
ॐ अमरेश्वराय नमः । २७
ॐ नारायणाय नमः ।
ॐ नरहरये नमः ।
ॐ नीरजाक्षाय नमः ।
ॐ नरप्रियाय नमः ।
ॐ ब्रह्मण्याय नमः ।
ॐ ब्रह्मकृते नमः ।
ॐ ब्रह्मणे नमः ।
ॐ ब्रह्माङ्गाय नमः ।
ॐ ब्रह्मपूजिताय नमः । ३६
ॐ कृष्णाय नमः ।
ॐ कृतज्ञाय नमः ।
ॐ गोविन्दाय नमः ।
ॐ हृषीकेशाय नमः ।
ॐ अघनाशनाय नमः ।
ॐ विष्णवे नमः ।
ॐ जिष्णवे नमः ।
ॐ जितारातये नमः ।
ॐ सज्जनप्रियाय नमः । ४५
ॐ ईश्वराय नमः ।
ॐ त्रिविक्रमाय नमः ।
ॐ त्रिलोकेशाय नमः ।
ॐ त्रय्यर्थाय नमः ।
ॐ त्रिगुणात्मकाय नमः ।
ॐ काकुत्स्थाय नमः ।
ॐ कमलाकान्ताय नमः ।
ॐ कालीयोरगमर्दनाय नमः ।
ॐ कालाम्बुदश्यामलाङ्गाय नमः । ५४
ॐ केशवाय नमः ।
ॐ क्लेशनाशनाय नमः ।
ॐ केशिप्रभञ्जनय नमः ।
ॐ कान्ताय नमः ।
ॐ नन्दसूनवे नमः ।
ॐ अरिन्दमाय नमः ।
ॐ रुक्मिणीवल्लभाय नमः ।
ॐ शौरये नमः ।
ॐ बलभद्राय नमः । ६३
ॐ बलानुजाय नमः ।
ॐ दामोदराय नमः ।
ॐ हृषीकेशाय नमः ।
ॐ वामनाय नमः ।
ॐ मधुसूदनाय नमः ।
ॐ पूताय नमः ।
ॐ पुण्यजनध्वंसिने नमः ।
ॐ पुण्यश्लोकशिखामणये नमः ।
ॐ आदिमूर्तये नमः । ७२
ॐ दयामूर्तये नमः ।
ॐ शान्तमूर्तये नमः ।
ॐ अमूर्तिमते नमः ।
ॐ परस्मै ब्रह्मणे नमः ।
ॐ परस्मै धाम्ने नमः ।
ॐ पावनाय नमः ।
ॐ पवनाय नमः ।
ॐ विभवे नमः ।
ॐ चन्द्राय नमः । ८१
ॐ छन्दोमयाय नमः ।
ॐ रामाय नमः ।
ॐ संसाराम्बुधितारकाय नमः ।
ॐ आदितेयाय नमः ।
ॐ अच्युताय नमः ।
ॐ भानवे नमः ।
ॐ शङ्कराय नमः ।
ॐ शिवाय नमः ।
ॐ ऊर्जिताय नमः । ९०
ॐ महेश्वराय नमः ।
ॐ महायोगिने नमः ।
ॐ महाशक्तये नमः ।
ॐ महत्प्रियाय नमः ।
ॐ दुर्जनध्वंसकाय नमः ।
ॐ अशेषसज्जनोपास्तसत्फलाय नमः ।
ॐ पक्षीन्द्रवाहनाय नमः ।
ॐ अक्षोभ्याय नमः ।
ॐ क्षीराब्धिशयनाय नमः । ९९
ॐ विधवे नमः ।
ॐ जनार्दनाय नमः ।
ॐ जगद्धेतवे नमः ।
ॐ जितमन्मथविग्रहाय नमः ।
ॐ चक्रपाणये नमः ।
ॐ शङ्खधारिणे नमः ।
ॐ शार्ङ्गिणे नमः ।
ॐ खड्गिने नमः ।
ॐ गदाधराय नमः । १०८
॥ इति श्री रङ्गनाथाष्टोत्तरशतनामावली संपूर्णा ॥
श्री रङ्गनाथाष्टोत्तरशतनामावली: भूलोक वैकुण्ठ के स्वामी का परिचय (Introduction - 600+ Words)
श्री रङ्गनाथाष्टोत्तरशतनामावली (Sri Ranganatha Ashtottara Shatanamavali) भगवान विष्णु के उस दिव्य स्वरूप की वन्दना है, जो दक्षिण भारत के प्रसिद्ध तीर्थ श्रीरङ्गम (Srirangam) में "अनन्त शयन" मुद्रा में विराजमान हैं। तमिलनाडु में कावेरी और कोल्लीडम नदियों के बीच स्थित यह पवित्र स्थल १०८ दिव्य देशों (Divya Desams) में प्रथम और प्रधान माना जाता है। भगवान रङ्गनाथ को "श्रीरङ्गशायी" कहा जाता है, क्योंकि वे शेषनाग की शय्या पर लेटे हुए सृष्टि का संचालन और भक्तों का कल्याण करते हैं। यह नामावली उसी शांत, करुणामयी और ऐश्वर्यशाली सत्ता के १०८ दिव्य नामों का एक आध्यात्मिक संकलन है।
भगवान रङ्गनाथ के प्राकट्य और उनके श्रीरङ्गम में निवास की कथा अत्यंत प्राचीन और अलौकिक है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने क्षीर सागर में भगवान विष्णु के इसी स्वरूप की आराधना की थी। बाद में, इक्ष्वाकु वंश के राजाओं ने इस विग्रह की पूजा की। भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त करने के पश्चात, विभीषण को उपहार स्वरूप यह दिव्य "रङ्ग विग्रह" प्रदान किया। जब विभीषण इसे लंका ले जा रहे थे, तब कावेरी तट पर इसकी स्थापना हुई और भगवान ने सदा के लिए वहीं निवास करने का निर्णय लिया। यही कारण है कि नामावली में उन्हें "काकुत्स्थाय" और "रामाय" कहकर भगवान राम के वंश और स्वरूप से जोड़ा गया है।
आध्यात्मिक शब्दावली में, "रङ्ग" का अर्थ है 'मंच' या 'रंगमंच' और "नाथ" का अर्थ है 'स्वामी'। अर्थात् वे प्रभु जो इस संपूर्ण संसार रूपी रंगमंच के सूत्रधार हैं। श्रीरङ्गम को "भूलोक वैकुण्ठ" कहा जाता है, जिसका अर्थ है—धरती पर स्थित स्वर्ग। यहाँ की उपासना पद्धति 'पाञ्चरात्र आगम' पर आधारित है। रङ्गनाथ स्वामी केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि सजीव दैवीय सत्ता माने जाते हैं। उनके नामों का जप करना साक्षात वैकुण्ठ के द्वार खोलने के समान है। नामावली का प्रथम नाम "ॐ श्रीरङ्गशायिने नमः" साधक के चित्त को उस शांत छवि की ओर ले जाता है जहाँ प्रभु अपने भक्तों की रक्षा के लिए योगनिद्रा में भी जागृत हैं।
इस नामावली के १०८ नामों को रत्नमाला की भांति पिरोया गया है। इसमें भगवान को "संसाराम्बुधितारकाय" (संसार रूपी समुद्र से पार लगाने वाले) और "क्लेशनाशनाय" (कष्टों का नाश करने वाले) के रूप में पूजा गया है। जो भक्त पूर्ण श्रद्धा के साथ इन नामों का जप करता है, उसके भीतर का अज्ञान और माया का अंधकार नष्ट हो जाता है। श्री रङ्गनाथ के नामों का महत्व विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो वैकुण्ठ एकादशी और अन्य विष्णु उत्सवों पर भगवान का आशीर्वाद चाहते हैं। यह नामावली न केवल पापों का नाश करती है, बल्कि साधक के जीवन में शांति, स्थिरता और भगवद-प्रेम का संचार करती है। श्रीरङ्गम की पावन धरा का यह मंत्रपुंज प्रत्येक विष्णु भक्त के लिए एक अनमोल आध्यात्मिक धरोहर है।
विशिष्ट महत्व: रङ्गनाथ स्वामी और श्रीरङ्गम का गौरव (Significance)
श्री रङ्गनाथाष्टोत्तरशतनामावली का विशिष्ट महत्व इसकी 'सार्वभौमिकता' में है। यह नामावली भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों और उनके दिव्य गुणों का मेल है। श्रीरङ्गम मंदिर को "परम पद" माना गया है, और वहाँ के अधिपति के नाम का जप करना समस्त तीर्थों की यात्रा के समान पुण्यदायी है।
इस नामावली का पाठ जातक के जीवन में 'संतुलन' (Balance) लाता है। जिस प्रकार भगवान रङ्गनाथ नदियों के मध्य शेषनाग पर स्थिर और शांत हैं, उसी प्रकार उनके नाम भक्त को अशांत जीवन में स्थिरता प्रदान करते हैं। यह पाठ उन दोषों को भी शांत करता है जो व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति में बाधक होते हैं। इसमें भगवान को "शास्त्रतत्त्वज्ञाय" कहा गया है, जो साधक को बौद्धिक और आध्यात्मिक ज्ञान दोनों प्रदान करते हैं।
नामावली पाठ के दिव्य लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)
शास्त्रों और महान आचार्यों (जैसे रामानुजाचार्य) के अनुसार, श्री रङ्गनाथ नामावली के नित्य पाठ से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:
- पाप क्षय और शुद्धि: "अघनाशनाय" और "क्लेशनाशनाय" नामों के प्रभाव से संचित पापों का शमन होता है और अंतःकरण पवित्र होता है।
- मानसिक शांति: भगवान की शांत शयन मुद्रा का ध्यान करते हुए पाठ करने से चिंता और मानसिक अवसाद (Depression) दूर होता है।
- पारिवारिक सुख-समृद्धि: "लक्ष्मीपति" और "श्रीकान्त" की कृपा से घर में धन, धान्य और सुख का स्थायी वास होता है।
- शत्रु और बाधाओं पर विजय: "जितारातये" और "अरिन्दमाय" नामों का जप शत्रुओं और जीवन की कठिन परिस्थितियों पर विजय दिलाता है।
- संसार सागर से मुक्ति: यह नामावली "संसाराम्बुधितारकाय" है, जो जीव को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर वैकुण्ठ की प्राप्ति कराती है।
- भय मुक्ति: भगवान के नामों का गुंजन जातक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच बनाता है, जिससे अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं का भय दूर होता है।
पाठ विधि एवं विशेष साधना नियम (Ritual Method)
भगवान श्री रङ्गनाथ की उपासना में सात्विकता और भक्ति भाव का विशेष महत्व है। पूर्ण फल हेतु निम्नलिखित विधि का पालन करें:
- समय: प्रातःकाल स्नान के बाद सूर्योदय के समय (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्या काल में पाठ करना सर्वोत्तम है।
- दिशा: पूजा के समय उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- वस्त्र: भगवान विष्णु को पीला रंग प्रिय है, अतः संभव हो तो पीले वस्त्र धारण करें।
- पूजन सामग्री: भगवान के चित्र या मूर्ति के सामने शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। उन्हें तुलसी पत्र (Tulsi) और सुगंधित पुष्प अर्पित करें।
- विशेष अवसर: एकादशी (विशेषकर वैकुण्ठ एकादशी), पूर्णिमा, और गुरुवार के दिन १०८ नामों का पाठ करना विशेष सिद्धिदायक है।
- ध्यान: पाठ से पूर्व मन में कावेरी नदी के तट पर शेषनाग पर लेटे हुए प्रभु का ध्यान करें, जिनके चरणों में माता लक्ष्मी विराजमान हैं।
- जप: प्रत्येक "ॐ ... नमः" का उच्चारण स्पष्ट स्वर में करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. श्री रङ्गनाथ स्वामी कौन हैं?
भगवान रङ्गनाथ भगवान विष्णु के वह स्वरूप हैं जो शेषनाग की शय्या पर लेटे हुए हैं। वे श्रीरङ्गम मंदिर के अधिपति हैं, जो दुनिया का सबसे बड़ा क्रियाशील हिंदू मंदिर परिसर है।
2. 'भूलोक वैकुण्ठ' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है "धरती पर स्थित वैकुण्ठ"। मान्यताओं के अनुसार, श्रीरङ्गम वह स्थान है जहाँ वैकुण्ठ की ऊर्जा प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान है, इसलिए इसे यह संज्ञा दी गई है।
3. रङ्गनाथाष्टोत्तरशतनामावली का पाठ कब करना चाहिए?
इसका पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है। विशेष रूप से एकादशी, गुरुवार और शनिवार के दिन इसका पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
4. क्या यह नामावली नाग दोष में सहायक है?
जी हाँ, चूँकि भगवान रङ्गनाथ शेषनाग (अनन्त) पर शयन करते हैं, उनकी आराधना से राहु, केतु और नाग संबंधित दोषों में शांति मिलती है।
5. 'रङ्ग' शब्द का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
'रङ्ग' का अर्थ है रंगमंच। भगवान रङ्गनाथ इस ब्रह्मांड रूपी रंगमंच के सूत्रधार और स्वामी हैं, जो संपूर्ण सृष्टि का नाटक संचालित करते हैं।
6. क्या स्त्रियों को यह नामावली पढ़नी चाहिए?
निश्चित रूप से। भगवान की भक्ति में कोई भेद नहीं है। गृहस्थ महिलाएँ अपने परिवार की सुख-शांति और आरोग्यता के लिए इसका पाठ कर सकती हैं।
7. श्रीरङ्गम मंदिर का विभीषण से क्या संबंध है?
रामायण के अनुसार, भगवान राम ने विभीषण को रङ्गनाथ विग्रह दिया था। विभीषण इसे लंका ले जाना चाहते थे, लेकिन भगवान ने कावेरी तट पर रुकने का संकल्प लिया।
8. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?
भगवान विष्णु के लिए 'तुलसी की माला' (Tulsi Mala) सर्वश्रेष्ठ है। इसके अभाव में चन्दन या कमलगट्टे की माला का प्रयोग भी किया जा सकता है।
9. क्या इस पाठ से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है?
जी हाँ, "अव्ययाय" और "अक्षोभ्याय" जैसे नामों का जप साधक को निर्भय बनाता है और उसे भगवान की सुरक्षा प्राप्त होती है।
10. क्या पीरियड्स के दौरान महिलाएँ पाठ कर सकती हैं?
शुद्धि के शास्त्रीय नियमों के अनुसार, उन दिनों में केवल मानसिक जप (बिना विग्रह या पुस्तक छुए) करना श्रेयस्कर माना जाता है।