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Sri Naga Devata Ashtottara Shatanamavali – श्री नागदेवता अष्टोत्तरशतनामावली

Sri Naga Devata Ashtottara Shatanamavali – श्री नागदेवता अष्टोत्तरशतनामावली
॥ श्री नागदेवता अष्टोत्तरशतनामावली ॥ ॥ नामावली ॥ १-९ ओं अनन्ताय नमः । ओं आदिशेषाय नमः । ओं अगदाय नमः । ओं अखिलोर्वेचराय नमः । ओं अमितविक्रमाय नमः । ओं अनिमिषार्चिताय नमः । ओं आदिवन्द्यानिवृत्तये नमः । ओं विनायकोदरबद्धाय नमः । ओं विष्णुप्रियाय नमः । १०-१८ ओं वेदस्तुत्याय नमः । ओं विहितधर्माय नमः । ओं विषधराय नमः । ओं शेषाय नमः । ओं शत्रुसूदनाय नमः । ओं अशेषफणामण्डलमण्डिताय नमः । ओं अप्रतिहतानुग्रहदायिने नमः । ओं अमिताचाराय नमः । ओं अखण्डैश्वर्यसम्पन्नाय नमः । १९-२७ ओं अमराहिपस्तुत्याय नमः । ओं अघोररूपाय नमः । ओं व्यालव्याय नमः । ओं वासुकये नमः । ओं वरप्रदायकाय नमः । ओं वनचराय नमः । ओं वंशवर्धनाय नमः । ओं वासुदेवशयनाय नमः । ओं वटवृक्षार्चिताय नमः । २८-३६ ओं विप्रवेषधारिणे नमः । ओं त्वरितागमनाय नमः । ओं तमोरूपाय नमः । ओं दर्पीकराय नमः । ओं धरणीधराय नमः । ओं कश्यपात्मजाय नमः । ओं कालरूपाय नमः । ओं युगाधिपाय नमः । ओं युगन्धराय नमः । ३७-४५ ओं रश्मिवन्ताय नमः । ओं रम्यगात्राय नमः । ओं केशवप्रियाय नमः । ओं विश्वम्भराय नमः । ओं शङ्कराभरणाय नमः । ओं शङ्खपालाय नमः । ओं शम्भुप्रियाय नमः । ओं षडाननाय नमः । ओं पञ्चशिरसे नमः । ४६-५४ ओं पापनाशाय नमः । ओं प्रमदाय नमः । ओं प्रचण्डाय नमः । ओं भक्तिवश्याय नमः । ओं भक्तरक्षकाय नमः । ओं बहुशिरसे नमः । ओं भाग्यवर्धनाय नमः । ओं भवभीतिहराय नमः । ओं तक्षकाय नमः । ५५-६३ ओं लोकत्रयाधीशाय नमः । ओं शिवाय नमः । ओं वेदवेद्याय नमः । ओं पूर्णाय नमः । ओं पुण्याय नमः । ओं पुण्यकीर्तये नमः । ओं पटेशाय नमः । ओं पारगाय नमः । ओं निष्कलाय नमः । ६४-७२ ओं वरप्रदाय नमः । ओं कर्कोटकाय नमः । ओं श्रेष्ठाय नमः । ओं शान्ताय नमः । ओं दान्ताय नमः । ओं आदित्यमर्दनाय नमः । ओं सर्वपूज्याय नमः । ओं सर्वाकाराय नमः । ओं निराशयाय नमः । ७३-८१ ओं निरञ्जनाय नमः । ओं ऐरावताय नमः । ओं शरण्याय नमः । ओं सर्वदायकाय नमः । ओं धनञ्जयाय नमः । ओं अव्यक्ताय नमः । ओं व्यक्तरूपाय नमः । ओं तमोहराय नमः । ओं योगीश्वराय नमः । ८२-९० ओं कल्याणाय नमः । ओं वालाय नमः । ओं ब्रह्मचारिणे नमः । ओं शङ्करानन्दकराय नमः । ओं जितक्रोधाय नमः । ओं जीवाय नमः । ओं जयदाय नमः । ओं जपप्रियाय नमः । ओं विश्वरूपाय नमः । ९१-९९ ओं विधिस्तुताय नमः । ओं विधीन्द्रशिवसंस्तुत्याय नमः । ओं श्रेयप्रदाय नमः । ओं प्राणदाय नमः । ओं विष्णुतल्पाय नमः । ओं गुप्ताय नमः । ओं गुप्ततराय नमः । ओं रक्तवस्त्राय नमः । ओं रक्तभूषाय नमः । १००-१०८ ओं भुजङ्गाय नमः । ओं भयरूपाय नमः । ओं सरीसृपाय नमः । ओं सकलरूपाय नमः । ओं कद्रुवासम्भूताय नमः । ओं आधारविधिपथिकाय नमः । ओं सुषुम्नाद्वारमध्यगाय नमः । ओं फणिरत्नविभूषणाय नमः । ओं नागेन्द्राय नमः । ॥ इति श्री नागदेवता अष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णम् ॥

श्री नागदेवता अष्टोत्तरशतनामावली: परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व (Introduction)

श्री नागदेवता अष्टोत्तरशतनामावली (Sri Naga Devata Ashtottara Shatanamavali) हिन्दू धर्म की उन प्राचीन परम्पराओं का हिस्सा है, जहाँ प्रकृति के प्रत्येक रूप में ईश्वर के दर्शन किए जाते हैं। भारत में नागों की पूजा न केवल आध्यात्मिक सुरक्षा के लिए, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए भी की जाती रही है। नागों को "पाताल लोक" का अधिपति और भूमिगत ऊर्जाओं का रक्षक माना गया है। यह १०८ नामों का संकलन वास्तव में उन दिव्य शक्तियों का स्मरण है, जो मनुष्य के जीवन में स्थिरता और सुरक्षा प्रदान करती हैं।
पौराणिक पृष्ठभूमि: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नागों की उत्पत्ति महर्षि कश्यप और कद्रू के मिलन से हुई। इस नामावली में भगवान विष्णु के शेषनाग (ओं आदिशेषाय नमः) और भगवान शिव के वासुकि (ओं वासुकये नमः) जैसे दिव्य स्वरूपों का वर्णन है। नागों को "कुण्डलिनी शक्ति" का प्रतीक भी माना जाता है, जो मानव शरीर की रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में सर्प की तरह साढ़े तीन फेरे लेकर सुप्त अवस्था में रहती है। अतः इन नामों का जाप केवल बाह्य सर्पों से रक्षा नहीं करता, बल्कि साधक की आंतरिक ऊर्जा को भी जागृत करने की क्षमता रखता है।
साधना का उद्देश्य: नागों को पाताल का रक्षक और रत्नों का स्वामी (ओं फणिरत्नविभूषणाय नमः) माना गया है। प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि जो लोग अनजाने में नागों को क्षति पहुँचाते हैं या जिनकी कुंडली में सर्प दोष होता है, उनके जीवन में संघर्ष बढ़ जाता है। महर्षि पराशर और अन्य ऋषियों ने नाग देवता की आराधना को इन दोषों की शांति का एकमात्र अमोघ मार्ग बताया है। यह नामावली उसी ज्ञान का सार है, जो श्रावण मास की नाग पंचमी पर विशेष रूप से प्रभावी हो जाती है।

विशिष्ट महत्व: कालसर्प दोष और पितृ दोष शान्ति (Significance)

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, राहु और केतु को छाया ग्रह माना गया है जिनका भौतिक अस्तित्व नहीं है, परन्तु उनका प्रभाव जीवन के हर पहलू पर पड़ता है। राहु को नाग का सिर और केतु को उसकी पूँछ माना गया है। जब कुंडली के समस्त ग्रह इन दोनों के बीच आ जाते हैं, तो "कालसर्प दोष" उत्पन्न होता है। यह दोष व्यक्ति के भाग्य को स्तम्भित कर देता है। नागदेवता अष्टोत्तरशतनामावली का पाठ इन दोनों ग्रहों की क्रूरता को शांत कर जीवन में प्रगति के द्वार खोलता है।
इसके अतिरिक्त, पितृ पक्ष में या नाग पंचमी पर इन १०८ नामों का पाठ करने से पितृ दोषों की शांति भी होती है। नागों को वंश वृद्धि का अधिपति माना जाता है। इसलिए यदि किसी परिवार में संतान प्राप्ति में बाधा आ रही हो, तो नाग देवता की इस नामावली का पाठ विशेष फलदायी सिद्ध होता है। यह पाठ साधक को मानसिक स्पष्टता और "सरीसृप" (ओं सरीसृपाय नमः) भयों से स्थायी सुरक्षा प्रदान करता है।

पाठ के लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)

प्रामाणिक स्रोतों के अनुसार, नाग देवता के इन दिव्य १०८ नामों का नित्य पाठ करने से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • सर्प एवं विष बाधा मुक्ति: जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इन नामों का स्मरण करता है, उसे हिंसक जंतुओं, सर्पों और किसी भी प्रकार के विष (मानसिक या शारीरिक) का भय नहीं रहता।
  • ग्रह दोष निवारण: कालसर्प दोष, राहु-केतु की महादशा और शनि जनित पीड़ा को शांत करने के लिए यह नामावली एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करती है।
  • वंश रक्षा और संतान सुख: 'ओं वंशवर्धनाय नमः' (नाम २५) — यह पाठ परिवार में वंश की वृद्धि करता है और आने वाली पीढ़ियों की रक्षा करता है।
  • धन एवं समृद्धि: चूंकि नागों को भूमिगत निधियों का स्वामी माना गया है, अतः इनकी आराधना से आकस्मिक धन लाभ और रुकी हुई लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
  • कुण्डलिनी जागरण में सहायक: आध्यात्मिक साधकों के लिए यह पाठ चेतना की गहराई में जाने और सुषुम्ना नाड़ी के जागरण में सहायक सिद्ध होता है।

पाठ विधि एवं पूजा विधान (Ritual Method)

नाग देवता की पूजा में सात्विकता और श्रद्धा का विशेष महत्व है। फलदायी परिणामों के लिए निम्नलिखित विधि अपनाएं:
  • सर्वोत्तम समय: नाग पंचमी का दिन इसके लिए सर्वश्रेष्ठ है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी या शनिवार को पाठ करना विशेष लाभ देता है।
  • शुद्धि और वस्त्र: स्नान के पश्चात श्वेत या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • अभिषेक: चांदी या तांबे की नाग प्रतिमा पर कच्चे दूध और गंगाजल से अभिषेक करें। हल्दी, चन्दन और कुमकुम अर्पित करें।
  • नैवेद्य: दूध, लावा (खील), चने और मखाने की खीर का भोग लगाएं। नागों को केवड़े की खुशबू प्रिय है, अतः केवड़ा इत्र या पुष्प अर्पित करें।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

१. नाग देवता की १०८ नामावली का पाठ किस दिन करना चाहिए?
श्रावण शुक्ल पंचमी (नाग पंचमी) सर्वोत्तम दिन है। यदि आप राहु-केतु के दोष से पीड़ित हैं, तो प्रत्येक शनिवार या पंचमी तिथि को इसका पाठ करें।
२. क्या महिलाएं नाग देवता की पूजा और नामावली का पाठ कर सकती हैं?
जी हाँ, महिलाएं भी पूर्ण श्रद्धा के साथ नाग देवता की पूजा और नामावली का पाठ कर सकती हैं। यह उनके परिवार की सुरक्षा के लिए शुभ है।
३. 'कालसर्प दोष' में यह नामावली कैसे मदद करती है?
नाग देवता राहु और केतु के अधिष्ठाता देव हैं। उनके नामों का उच्चारण करने से इन ग्रहों की नकारात्मक ऊर्जा संतुलित होती है और जातक को राहत मिलती है।
४. नाग पूजा में दूध चढ़ाने का क्या महत्व है?
शास्त्रों के अनुसार, दूध की शीतलता नागों के विषैले ताप को शांत करती है। यह समर्पण और शांति का प्रतीक है।
५. क्या यह पाठ घर पर किया जा सकता है?
हाँ, घर के पूजा स्थल पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके इस नामावली का पाठ किया जा सकता है। बस पवित्रता का ध्यान रखें।
६. 'आदिशेष' और 'वासुकि' में क्या अंतर है?
आदिशेष भगवान विष्णु की शैय्या हैं और पृथ्वी को धारण करते हैं, जबकि वासुकि भगवान शिव के गले का हार हैं और समुद्र मंथन के समय रस्सी का कार्य किया था।
७. क्या इस पाठ से व्यापार में भी लाभ होता है?
हाँ, चूंकि नाग भूमिगत लक्ष्मी के रक्षक हैं, अतः इनकी कृपा से रुके हुए धन और भूमि सम्बन्धी विवादों में लाभ मिलता है।
८. 'ओं विनायकोदरबद्धाय नमः' नाम का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि नाग भगवान गणेश (विनायक) के उदर (पेट) पर बंधे हुए हैं। यह नागों की देवों के प्रति सेवा भावना को दर्शाता है।
९. राहु की महादशा में यह पाठ कैसे मदद करता है?
राहु का स्वभाव नाग जैसा है। नागराज की शरण में जाने से राहु के क्रूर प्रभाव जैसे मानसिक भ्रम और आकस्मिक हानि में कमी आती है।
१०. क्या नागों को मारना महापाप है?
जी हाँ, हिन्दू धर्म में नागों की हत्या को महापाप (सर्प हत्या दोष) माना गया है। यदि ऐसा अनजाने में हुआ हो, तो प्रायश्चित के रूप में इस नामावली का पाठ करना चाहिए।