Sri Lalita Ashtottara Shatanamavali 2 – श्रीललिताष्टोत्तरशतनामावलिः २

॥ श्रीललिताष्टोत्तरशतनामावलिः २ ॥
॥ ध्यानम् ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्-
तारानायकशेखरां स्मितममुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामतिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम् ॥
अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं धृतपाशाङ्कुशपुष्पबाणचापाम् ।
अणिमादिभिरावृतां मयूखैरहमित्येव विभावये भवानीम् ॥
ध्यायेत् पद्मासनस्थां विकसितवदनां पद्मपत्रायताक्षीम्
हेमाभां पीतवस्त्रां करकलितलसद्धेमपद्मां वराङ्गीम् ।
सर्वालङ्कार-युक्तां सततमभयदां भक्तनम्रां भवानीम्
श्रीविद्यां शान्तमूर्तिं सकलसुरनुतां सर्वसम्पत्प्रदात्रीम् ॥
॥ नामावलिः ॥
ॐ भूरूपसकलाधारायै नमः ।
ॐ बीजौषध्यन्नरूपिण्यै नमः ।
ॐ जरायुजाण्डजोद्भिज्ज-स्वेदजादिशरीरिण्यै नमः ।
ॐ क्षेत्ररूपायै नमः ।
ॐ तीर्थरूपायै नमः ।
ॐ गिरिकाननरूपिण्यै नमः ।
ॐ जलरूपाखिलाप्यायायै नमः ।
ॐ तेजःपुञ्जस्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ जगत्प्रकाशिकायै नमः ।
ॐ अज्ञानतमोहृद्भानुरूपिण्यै नमः । १०
ॐ वायुरूपायै नमः ।
ॐ अखिलव्याप्तायै नमः ।
ॐ उत्पत्यादिविधायिन्यै नमः ।
ॐ नभोरूपायै नमः ।
ॐ इन्दुसूर्यादि-ज्योतिर्भूतावकाशदायै नमः ।
ॐ घ्राणरूपायै नमः ।
ॐ गन्धरूपायै नमः ।
ॐ गन्धग्रहणकारिण्यै नमः ।
ॐ रसनायै नमः ।
ॐ रसरूपायै नमः । २०
ॐ रसग्रहणकारिण्यै नमः ।
ॐ चक्षुरूपायै नमः ।
ॐ रूपरूपायै नमः ।
ॐ रूपग्रहणकारिण्यै नमः ।
ॐ त्वग्रूपायै नमः ।
ॐ स्पर्शरूपायै नमः ।
ॐ स्पर्शग्रहणकारिण्यै नमः ।
ॐ श्रोत्ररूपायै नमः ।
ॐ शब्दरूपायै नमः ।
ॐ शब्दग्रहणकारिण्यै नमः । ३०
ॐ वागिन्द्रियस्वरूपायै नमः ।
ॐ वाचावृत्तिप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ पाणीन्द्रियस्वरूपायै नमः ।
ॐ क्रियावृत्तिप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ पादेन्द्रियस्वरूपायै नमः ।
ॐ गतिवृत्तिप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ पाय्विन्द्रियस्वरूपायै नमः ।
ॐ विसर्गार्थैककारिण्यै नमः ।
ॐ रहस्येन्द्रियरूपायै नमः ।
ॐ विषयानन्ददायिन्यै नमः । ४०
ॐ मनोरूपायै नमः ।
ॐ सङ्कल्पविकल्पादि-स्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ सर्वोपलब्धिहेतवे नमः ।
ॐ बुद्धिनिश्चयरूपिण्यै नमः ।
ॐ अहङ्कारस्वरूपायै नमः ।
ॐ अहङ्कर्तव्यवृत्तिदायै नमः ।
ॐ चेतनाचित्तरूपायै नमः ।
ॐ सर्वचैतन्यदायिन्यै नमः ।
ॐ गुणवैषम्यरूपाढ्य-महत्तत्त्वाभिमानिन्यै नमः ।
ॐ गुणसाम्याव्यक्तमायामूल-प्रकृतिसञ्चिकायै नमः । ५०
ॐ पञ्चीकृतमहाभूत-सूक्ष्मभूतस्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ विद्याऽविद्यात्मिकायै नमः ।
ॐ मायाबन्धमोचनकारिण्यै नमः ।
ॐ ईश्वरेच्छारागरूपायै नमः ।
ॐ प्रकृतिक्षोभकारिण्यै नमः ।
ॐ कालशक्त्यै नमः ।
ॐ कालरूपायै नमः ।
ॐ नियत्यादिनियामिकायै नमः ।
ॐ धूम्रादिपञ्चव्योमाख्यायै नमः ।
ॐ यन्त्रमन्त्रकलात्मिकायै नमः । ६०
ॐ ब्रह्मरूपायै नमः ।
ॐ विष्णुरूपायै नमः ।
ॐ रुद्ररूपायै नमः ।
ॐ महेश्वर्यै नमः ।
ॐ सदाशिवस्वरूपायै नमः ।
ॐ सर्वजीवमय्यै नमः ।
ॐ शिवायै नमः ।
ॐ श्रीवाणीलक्ष्म्युमारूपायै नमः ।
ॐ सदाख्यायै नमः ।
ॐ चित्कलात्मिकायै नमः । ७०
ॐ प्राज्ञतैजसविश्वाख्य-विराट्सूत्रेश्वरात्मिकायै नमः ।
ॐ स्थूलदेहस्वरूपायै नमः ।
ॐ सूक्ष्मदेहस्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ वाच्यवाचकरूपायै नमः ।
ॐ ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ कार्यकारणरूपायै नमः ।
ॐ तत्तत्तत्वाधिदेवतायै नमः ।
ॐ दशनादस्वरूपायै नमः ।
ॐ नाडीरूपाढ्यकुण्डल्यै नमः ।
ॐ अकारादिक्षकारान्तवैखरी-वाक्स्वरूपिण्यै नमः । ८०
ॐ वेदवेदाङ्गरूपायै नमः ।
ॐ सूत्रशास्त्रादिरूपिण्यै नमः ।
ॐ पुराणरूपायै नमः ।
ॐ सद्धर्मशात्ररूपायै नमः ।
ॐ परात्परस्यै नमः ।
ॐ आयुर्वेदस्वरूपायै नमः ।
ॐ धनुर्वेदस्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ गान्धर्वविद्यारूपायै नमः ।
ॐ अर्थशास्त्रादिरूपिण्यै नमः ।
ॐ चतुष्षष्टिकलारूपायै नमः । ९०
ॐ निगमागमरूपिण्यै नमः ।
ॐ काव्येतिहासरूपायै नमः ।
ॐ गानविद्यादिरूपिण्यै नमः ।
ॐ पदवाक्यस्वरूपायै नमः ।
ॐ सर्वभाषास्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ पदवाक्यस्फोटरूपायै नमः ।
ॐ ज्ञानज्ञेयक्रियात्मिकायै नमः ।
ॐ सर्वतन्त्रमय्यै नमः ।
ॐ सर्वयन्त्रतन्त्रादिरूपिण्यै नमः ।
ॐ वेदमात्रे नमः । १००
ॐ ललितायै नमः ।
ॐ महाव्याहृतिरूपिण्यै नमः ।
ॐ अव्याकृतपदानाद्यचिन्त्य-शक्त्यै नमः ।
ॐ तमोमय्यै नमः ।
ॐ परस्मै ज्योतिषे नमः ।
ॐ परब्रह्मसाक्षात्कार-स्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ परब्रह्ममय्यै नमः ।
ॐ सत्यासत्यज्ञानसुधात्मिकायै नमः । १०८
॥ इति श्रीललिताष्टोत्तरशतनामावलिः २ समाप्ता ॥
संलिखित ग्रंथ
परिचय: ब्रह्माण्डीय चेतना का दर्शन (Introduction)
श्रीललिताष्टोत्तरशतनामावलिः २ (Sri Lalita Ashtottara Shatanamavali 2), श्रीविद्या साधना में प्रयुक्त होने वाली माँ ललिता की एक अत्यंत विशिष्ट और दार्शनिक नामावली है। इसे सामान्य 'ललिता अष्टोत्तर शतनामावली' (जो ब्रह्माण्ड पुराण पर आधारित है) से अलग रखा गया है क्योंकि इसका दृष्टिकोण पूरी तरह से वेदान्तिक और ब्रह्माण्डीय (Cosmological) है। यह नामावली इस सत्य को स्थापित करती है कि देवी ललिता कोई अलग स्वर्ग में बैठी इकाई नहीं हैं, बल्कि वे ही यह दृश्यमान जगत, पंचमहाभूत, मानव शरीर, इंद्रियाँ, वेद और विज्ञान हैं।
नामावली की शुरुआत तीन अत्यंत प्रभावशाली ध्यान श्लोकों से होती है। पहला श्लोक (सिन्दूरारुणविग्रहां...) देवी के उदीयमान सूर्य के समान लाल रंग, उनके तीन नेत्रों, मुस्कान और हाथों में पाश, अंकुश, गन्ने का धनुष और पुष्प बाण का वर्णन करता है। दूसरा श्लोक (अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं...) साधक को यह निर्देश देता है कि वह देवी भवानी को "अहमित्येव" (वह मैं ही हूँ) के भाव से ध्याये। तीसरा श्लोक देवी को सर्वसम्पत्ति देने वाली 'श्रीविद्या' के रूप में स्थापित करता है।
इन 108 नामों की यात्रा पृथ्वी तत्त्व से शुरू होती है (ॐ भूरूपसकलाधारायै नमः) और अंततः अद्वैत परब्रह्म तत्त्व (ॐ परब्रह्ममय्यै नमः) पर जाकर पूर्ण होती है। यह नामावली साधक को स्थूल (Macrocosm) से सूक्ष्म (Microcosm) और फिर सूक्ष्म से परमतत्त्व (Absolute Reality) तक की यात्रा कराती है।
विशिष्ट महत्व: स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा (Significance)
इस नामावली के नामों का वर्गीकरण हिंदू दर्शन (विशेषकर सांख्य और वेदांत) के सिद्धांतों पर आधारित है। इसे निम्नलिखित चरणों में समझा जा सकता है:
- पञ्चमहाभूत और सृष्टि: नाम 1 से 15 तक देवी को पंचतत्वों - पृथ्वी (भूरूप), जल (जलरूपा), अग्नि (तेजःपुञ्ज), वायु (वायुरूपायै), और आकाश (नभोरूपायै) के रूप में दर्शाया गया है। वे सभी जीवों (अण्डज, स्वेदज, जरायुज, उद्भिज्ज) का शरीर हैं।
- ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ: नाम 16 से 40 तक देवी को शरीर की इंद्रियों और उनके विषयों के रूप में पूजा गया है। वे ही घ्राण (सूँघने की शक्ति) हैं, वे ही गंध हैं। वे ही चक्षु (नेत्र) हैं, वे ही रूप हैं। वे ही वाक्, पाणि, पाद आदि कर्मेन्द्रियाँ हैं।
- अन्तःकरण चतुष्टय: नाम 41 से 48 तक देवी को मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार (अहङ्कारस्वरूपायै) कहा गया है। मनुष्य का संपूर्ण आंतरिक मनस्तत्व देवी की ही अभिव्यक्ति है।
- त्रिदेव और विद्या: नाम 61 से 69 तक स्पष्ट किया गया है कि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, महेश्वर और सदाशिव भी उन्हीं के रूप हैं। वे ही वाणी, लक्ष्मी और उमा का सम्मिलित स्वरूप हैं।
- शास्त्र और विज्ञान: नाम 81 से 96 तक देवी को सभी प्रकार के ज्ञान का स्रोत बताया गया है। वे ही वेद, वेदांग, सूत्र, पुराण, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्व विद्या (संगीत), अर्थशास्त्र, 64 कलाएं, आगम और निगम हैं।
अंत में, वे 'परब्रह्मसाक्षात्कारस्वरूपिण्यै' (परब्रह्म के साक्षात्कार का स्वरूप) और 'सत्यासत्यज्ञानसुधात्मिकायै' (सत्य और असत्य के ज्ञान रूपी अमृत की आत्मा) बनकर साधक को पूर्ण मोक्ष प्रदान करती हैं।
नामावली पाठ के लाभ (Benefits)
यद्यपि इसमें पारंपरिक 'फलश्रुति' के श्लोक नहीं हैं, परंतु इसके ध्यान श्लोक ("सर्वसम्पत्प्रदात्रीम्") और नामों के गहरे अर्थों से यह स्पष्ट है कि इसके पाठ से अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं:
- ज्ञान और बुद्धि का विकास: चूँकि देवी को आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्व विद्या और 64 कलाओं का स्वरूप बताया गया है, विद्यार्थियों, कलाकारों और ज्ञान पिपासुओं के लिए यह नामावली अत्यंत फलदायी है। यह बुद्धि (बुद्धिनिश्चयरूपिण्यै) को प्रखर करती है।
- अज्ञान और अंधकार का नाश: नाम 10 (अज्ञानतमोहृद्भानुरूपिण्यै नमः) के अनुसार, देवी अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट करने वाले सूर्य के समान हैं। यह पाठ मानसिक भ्रम और अवसाद को दूर करता है।
- माया के बंधन से मुक्ति: नाम 53 (मायाबन्धमोचनकारिण्यै नमः) स्पष्ट रूप से बताता है कि इसका नियमित पाठ साधक को सांसारिक मोह-माया के जालों से मुक्त कर वैराग्य और शांति प्रदान करता है।
- शारीरिक और मानसिक आरोग्य: देवी को सभी इंद्रियों, प्राण और आयुर्वेद का स्वरूप मानने से, इनका ध्यान करते हुए अर्चन करने पर साधक को उत्तम स्वास्थ्य और रोगों से मुक्ति मिलती है।
- अद्वैत की अनुभूति: यह नामावली साधक के भीतर यह भाव जगाती है कि "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ही ब्रह्म हूँ)। जब साधक अपने शरीर, मन और बाहरी जगत हर जगह देवी को देखने लगता है, तो उसे परमानंद की प्राप्ति होती है।
पाठ विधि और अर्चना विधान (Ritual Method)
इस नामावली का उपयोग देवी ललिता की मूर्ति, चित्र या श्री यंत्र (श्री चक्र) पर अर्चना (पुष्प या कुमकुम अर्पण) करने के लिए किया जाता है। इसकी विधि इस प्रकार है:
- पवित्रता और आसन: प्रातःकाल स्नान के पश्चात् स्वच्छ लाल या हल्के रंग के वस्त्र पहनें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
- दीपक प्रज्ज्वलन: देवी के समक्ष गाय के घी या तिल के तेल का एक दीपक प्रज्वलित करें।
- ध्यान (अत्यंत महत्वपूर्ण): इस नामावली के आरंभ में दिए गए तीनों ध्यान श्लोकों (सिन्दूरारुणविग्रहां...) का सस्वर और भावपूर्ण पाठ करें। आँखें बंद करके देवी के उस चतुर्भुज, लाल आभा वाले स्वरूप का अपने आज्ञा चक्र (भौहों के बीच) या हृदय में ध्यान करें।
- अर्चना: 108 नामों का एक-एक करके उच्चारण करें। प्रत्येक नाम के अंत में 'नमः' बोलते समय चुटकी भर कुमकुम, अक्षत (हल्दी मिले चावल) या लाल पुष्प (जैसे गुड़हल या गुलाब) श्री यंत्र के बिंदु पर या देवी के चरणों में अर्पित करें।
- भाव: पाठ करते समय यह भाव रखें कि "जो जल मैं पी रहा हूँ, जो वायु मैं साँस ले रहा हूँ, जो ज्ञान मैं ग्रहण कर रहा हूँ, वह सब माँ ललिता ही हैं।"
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. यह नामावली सामान्य ललिता अष्टोत्तर शतनामावली से कैसे भिन्न है?
ब्रह्माण्ड पुराण की सामान्य नामावली (रजरजोपचार... आदि) देवी के राजसी ऐश्वर्य और लीलाओं का वर्णन करती है। जबकि यह दूसरा संस्करण (नामावलिः २) पूरी तरह से वेदान्तिक है। यह देवी को पंचभूतों, इंद्रियों, वेदों, शास्त्रों और परब्रह्म के साक्षात रूप में पूजता है।
2. ध्यान श्लोकों का क्या महत्व है?
ध्यान श्लोक साधक के मन में देवी का एक स्पष्ट मानसिक चित्र (Visual Image) बनाते हैं। इस नामावली के ध्यान श्लोक देवी को सिंदूर के समान लाल, पाश-अंकुश धारण किए हुए और सभी संपत्तियों को देने वाली बताते हैं। यह एकाग्रता के लिए आवश्यक है।
3. 'जरायुजाण्डजोद्भिज्जस्वेदजादिशरीरिण्यै' का क्या अर्थ है?
यह नाम बताता है कि सृष्टि के चार प्रकार के जीव - जरायुज (गर्भ से जन्म लेने वाले जैसे मनुष्य/पशु), अंडज (अंडे से निकलने वाले जैसे पक्षी), उद्भिज्ज (पृथ्वी फोड़कर निकलने वाले जैसे पेड़-पौधे) और स्वेदज (पसीने/नमी से पैदा होने वाले कीट) - इन सभी का शरीर साक्षात देवी का ही रूप है।
4. इस नामावली में वेदों और शास्त्रों का उल्लेख क्यों है?
नाम 81 से 96 तक आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्व विद्या, 64 कलाएं आदि का उल्लेख है। यह सिद्ध करता है कि देवी केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं हैं, बल्कि मानव जाति के पास जो भी बौद्धिक, वैज्ञानिक या कलात्मक ज्ञान है, वह सब देवी की ही अभिव्यक्ति है।
5. 'महाव्याहृतिरूपिण्यै' का क्या तात्पर्य है?
'व्याहृति' उन पवित्र मंत्रों को कहते हैं जिनका उच्चारण गायत्री मंत्र से पहले होता है - भूर्भुवः स्वः। महाव्याहृतियाँ 7 हैं (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्)। देवी इन सातों लोकों की नियंत्रक और स्वरूप हैं।
6. क्या इस नामावली के पाठ के लिए दीक्षा आवश्यक है?
नहीं। इस वेदान्तिक नामावली का पाठ करने के लिए किसी तांत्रिक दीक्षा की आवश्यकता नहीं है। इसे ज्ञान-प्राप्ति और आत्म-शुद्धि के उद्देश्य से कोई भी व्यक्ति पढ़ सकता है।
7. इस नामावली के अनुसार पंचभूतों से देवी का क्या संबंध है?
शुरुआती 15 नामों के अनुसार, देवी पंचभूतों से अलग नहीं हैं। वे ही पृथ्वी का आधार हैं, जल के रूप में जीवन का पोषण करती हैं, अग्नि (तेज) का पुंज हैं, वायु रूप में व्याप्त हैं और आकाश (नभ) रूप में सभी को अवकाश (स्थान) देती हैं।
8. 'मायाबन्धमोचनकारिण्यै' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है "माया (अज्ञान और मोह) के बंधनों से मुक्त करने वाली।" यद्यपि देवी स्वयं महामाया हैं, लेकिन जब भक्त उनकी शरण में जाता है, तो वे ही उसे सांसारिक मोह से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करती हैं।
9. इस पाठ को करने का सबसे अच्छा समय क्या है?
इसे प्रातःकाल ध्यान और योग के समय करना बहुत शुभ माना जाता है, क्योंकि इसके नाम मानसिक चेतना और ज्ञान से जुड़े हैं। शुक्रवार और पूर्णिमा भी विशेष शुभ दिन हैं।
10. क्या मैं इस नामावली से श्रीचक्र (श्री यंत्र) पर अर्चना कर सकता हूँ?
जी हाँ, बिल्कुल। यह नामावली श्री चक्र नव-आवरण पूजा या किसी भी नियमित श्रीविद्या पूजा के दौरान कुमकुम या पुष्प अर्पित करने के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली और ज्ञानवर्धक माध्यम है।