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Sri Kumari Ashtottara Shatanamavali – श्रीकुमार्यष्टोत्तरशतनामावली

Sri Kumari Ashtottara Shatanamavali – श्रीकुमार्यष्टोत्तरशतनामावली
॥ श्रीकुमार्यष्टोत्तरशतनामावली ॥ ॥ विनियोगः ॥ ॐ अस्यश्री कुमारी महामन्त्रस्य ईश्वर ऋषिः बृहती छन्दः कुमारी दुर्गा देवता ॥ [ ह्रां ह्रीं इत्यादिना न्यासमाचरेत् ] ॥ ध्यानम् ॥ गिरिराजकुमारिकां भवानीं शरणागतपालनैकदक्षाम् । वरदाभयचक्रशङ्खहस्तां वरदात्रीं भजतां स्मरामि नित्यम् ॥ मन्त्रः - ॐ ह्रीं कुमार्यै नमः ॥ ॥ अथ श्री कुमार्याः नामावलिः ॥ ॐ कौमार्यै नमः । ॐ सत्यमार्गप्रबोधिन्यै नमः । ॐ कम्बुग्रीवायै नमः । ॐ वसुमत्यै नमः । ॐ छत्रच्छायायै नमः । ॐ कृतालयायै नमः । ॐ कुण्डलिन्यै नमः । ॐ जगद्धात्र्यै नमः । ॐ जगद्गर्भायै नमः । ॐ भुजङ्गायै नमः । १० ॐ कालशायिन्यै नमः । ॐ प्रोल्लसायै नमः । ॐ सप्तपद्मायै नमः । ॐ नाभिनालायै नमः । ॐ मृणालिन्यै नमः । ॐ मूलाधारायै नमः । ॐ अनिलाधारायै नमः । ॐ वह्निकुण्डलकृतालयायै नमः । ॐ वायुकुण्डलसुखासनायै नमः । ॐ निराधारायै नमः । २० ॐ निराश्रयायै नमः । ॐ बलीन्द्रसमुच्चयायै नमः । ॐ षड्रसस्वादुलोलुपायै नमः । ॐ श्वासोच्छ्वासगतायै नमः । ॐ जीवायै ग्राहिण्यै नमः । ॐ वह्निसंश्रयायै नमः । ॐ तपस्विन्यै नमः । ॐ तपस्सिद्धायै नमः । ॐ तापसायै नमः । ॐ तपोनिष्ठायै नमः । ३० ॐ तपोयुक्तायै नमः । ॐ तपस्सिद्धिदायिन्यै नमः । ॐ सप्तधातुमय्यै नमः । ॐ सुमूर्त्यै नमः । ॐ सप्तायै नमः । ॐ अनन्तरनाडिकायै नमः । ॐ देहपुष्ट्यै नमः । ॐ मनस्तुष्ट्यै नमः । ॐ रत्नतुष्ट्यै नमः । ॐ मदोद्धतायै नमः । ४० ॐ दशमध्यै नमः । ॐ वैद्यमात्रे नमः । ॐ द्रवशक्त्यै नमः । ॐ प्रभाविन्यै नमः । ॐ वैद्यविद्यायै नमः । ॐ चिकित्सायै नमः । ॐ सुपथ्यायै नमः । ॐ रोगनाशिन्यै नमः । ॐ मृगयात्रायै नमः । ॐ मृगमाम्सायै नमः । ५० ॐ मृगपद्यायै नमः । ॐ सुलोचनायै नमः । ॐ व्याघ्रचर्मणे नमः । ॐ बन्धुरूपायै नमः । ॐ बहुरूपायै नमः । ॐ मदोत्कटायै नमः । ॐ बन्धिन्यै नमः । ॐ बन्धुस्तुतिकरायै नमः । ॐ बन्धायै नमः । ॐ बन्धविमोचिन्यै नमः । ६० ॐ श्रीबलायै नमः । ॐ कलभायै नमः । ॐ विद्युल्लतायै नमः । ॐ दृढविमोचिन्यै नमः । ॐ अम्बिकायै नमः । ॐ बालिकायै नमः । ॐ अम्बरायै नमः । ॐ मुख्यायै नमः । ॐ साधुजनार्चितायै नमः । ॐ कालिन्यै नमः । ७० ॐ कुलविद्यायै नमः । ॐ सुकलायै नमः । ॐ कुलपूजितायै नमः । ॐ कुलचक्रप्रभायै नमः । ॐ भ्रान्तायै नमः । ॐ भ्रमनाशिन्यै नमः । ॐ वात्यालिन्यै नमः । ॐ सुवृष्ट्यै नमः । ॐ भिक्षुकायै नमः । ॐ सस्यवर्धिन्यै नमः । ८० ॐ अकारायै नमः । ॐ इकारायै नमः । ॐ उकारायै नमः । ॐ एकारायै नमः । ॐ हुङ्कारायै नमः । ॐ बीजरूपयै नमः । ॐ क्लींकारायै नमः । ॐ अम्बरधारिण्यै नमः । ॐ सर्वाक्षरमयाशक्त्यै नमः । ॐ राक्षसार्णवमालिन्यै नमः । ९० ॐ सिन्धूरवर्णायै नमः । ॐ अरुणवर्णायै नमः । ॐ सिन्धूरतिलकप्रियायै नमः । ॐ वश्यायै नमः । ॐ वश्यबीजायै नमः । ॐ लोकवश्यविधायिन्यै नमः । ॐ नृपवश्यायै नमः । ॐ नृपसेव्यायै नमः । ॐ नृपवश्यकरप्रियायै नमः । ॐ महिषीनृपमाम्सायै नमः । १०० ॐ नृपज्ञायै नमः । ॐ नृपनन्दिन्यै नमः । ॐ नृपधर्मविद्यायै नमः । ॐ धनधान्यविवर्धिन्यै नमः । ॐ चतुर्वर्णमयशक्त्यै नमः । ॐ चतुर्वर्णैः सुपूजितायै नमः । ॐ गिरिजायै नमः । ॐ सर्ववर्णमयायै नमः । १०८ ॥ इति श्री कुमार्याः नामावलिः सम्पूर्णम् ॥

श्रीकुमार्यष्टोत्तरशतनामावली: तांत्रिक परिचय एवं रहस्य (Introduction & Mystical Secrets)

सनातन धर्म के शाक्त संप्रदाय और श्रीविद्या (Sri Vidya) परंपरा में 'कुमारी' की उपासना का अत्यंत गूढ़ रहस्य है। कुमारी केवल आयु से छोटी कन्या नहीं हैं, बल्कि यह माता 'बाला त्रिपुरसुन्दरी' (Bala Tripurasundari) का वह शुद्ध, अव्यक्त और अनंत ऊर्जावान स्वरूप है, जिससे इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है। श्रीकुमार्यष्टोत्तरशतनामावली उसी परम शक्ति के 108 अत्यंत जाग्रत और गोपनीय नामों का संकलन है।
विनियोग और ध्यान का रहस्य: इस महामंत्र के ऋषि स्वयं ईश्वर (भगवान शिव) हैं। बृहती छन्द में निबद्ध इस नामावली की मुख्य देवता 'कुमारी दुर्गा' हैं। पाठ के आरंभ में "ह्रां ह्रीं..." बीजों से न्यास करने का विधान है, जो साधक के शरीर को देवत्व प्रदान करता है। ध्यान श्लोक (गिरिराजकुमारिकां भवानीं...) में माता को पर्वतराज हिमालय की पुत्री (भवानी) के रूप में दर्शाया गया है, जो वरद (वरदान), अभय, चक्र और शंख धारण किए हुए हैं। यह ध्यान उनके करुणा और ऐश्वर्य दोनों स्वरूपों का एकीकरण है।
मूल मंत्र का प्रभाव: इस नामावली का प्राण इसका मूल मंत्र "ॐ ह्रीं कुमार्यै नमः" है। यहाँ 'ह्रीं' (माया बीज / भुवनेश्वरी बीज) का प्रयोग किया गया है, जो परम शक्ति और अज्ञान-नाश का प्रतीक है। जब इस बीज मंत्र के साथ कुमारी के 108 नामों का उच्चारण किया जाता है, तो यह एक साधारण स्तुति न रहकर एक उच्च कोटि का तांत्रिक अनुष्ठान बन जाता है।

नामावली का आध्यात्मिक और कुण्डलिनी विज्ञान (Kundalini & Esoteric Significance)

इस नामावली की सबसे असाधारण बात यह है कि इसमें मनुष्य के सूक्ष्म शरीर (Astral Body) और कुण्डलिनी जागरण (Kundalini Awakening) का प्रत्यक्ष वर्णन है।
  • चक्र और कुण्डलिनी: नामावली में देवी को 'कुण्डलिन्यै', 'मूलाधारायै' (मूलाधार चक्र की देवी), 'सप्तपद्मायै' (सात चक्रों रूपी कमल), और 'नाभिनालायै' (मणिपूर चक्र) कहा गया है। यह स्पष्ट करता है कि कुमारी शक्ति ही हमारे मूलाधार में सोई हुई कुण्डलिनी है।
  • प्राण वायु पर नियंत्रण: 'श्वासोच्छ्वासगतायै' और 'जीवायै ग्राहिण्यै' नाम दर्शाते हैं कि माता ही हमारी श्वास-प्रश्वास और जीवन ऊर्जा (प्राण) की नियंत्रक हैं।
  • बीजाक्षरों का स्वरूप: श्लोक 81 से 87 तक देवी को साक्षात् वर्णमाला और मंत्र-बीज के रूप में पुकारा गया है — 'अकारायै', 'इकारायै', 'उकारायै', 'एकारायै', 'हुङ्कारायै', 'क्लींकारायै'। तंत्र में 'क्लीं' कामराज बीज है जो वशीकरण और इच्छा पूर्ति का प्रतीक है, और 'हुं' क्रोध और शत्रुओं के दमन का बीज है। देवी इन सभी 'सर्वाक्षरमयाशक्त्यै' (समस्त अक्षरों की शक्ति) की मूल हैं।
  • चिकित्सा और आयुर्वेद: देवी को 'वैद्यमात्रे' (सभी वैद्यों की माता), 'चिकित्सायै' और 'सप्तधातुमय्यै' (शरीर के सात धातुओं में स्थित) कहकर पुकारा गया है, जो उनके आरोग्यदायिनी स्वरूप को पुष्ट करता है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले सिद्ध लाभ (Benefits of Recitation)

ईश्वर ऋषि द्वारा दृष्ट इस कुमारी नामावली का विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ पाठ करने से साधक को लौकिक और अलौकिक दोनों प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं:
  • राज-वशीकरण और प्रशासनिक सफलता: इस नामावली में 'लोकवश्यविधायिन्यै', 'नृपवश्यायै', और 'नृपसेव्यायै' जैसे अत्यंत शक्तिशाली नाम हैं। इनके प्रभाव से साधक को समाज, उच्च अधिकारियों और राजसत्ता (सरकार) का सहयोग और सम्मान प्राप्त होता है।
  • असाध्य रोगों का समूल नाश: 'रोगनाशिन्यै', 'सुपथ्यायै' और 'देहपुष्ट्यै' नामों के जप से गंभीर और असाध्य शारीरिक व्याधियां दूर होती हैं और शरीर पुष्ट व ऊर्जावान बनता है।
  • धन, धान्य और ऐश्वर्य: 'धनधान्यविवर्धिन्यै' और 'रत्नतुष्ट्यै' नामों के स्मरण से घर की दरिद्रता सदा के लिए नष्ट हो जाती है और असीमित धन, रत्न और सुख-संपत्ति की वृद्धि होती है।
  • कुण्डलिनी जागरण में सहायक: जो साधक ध्यान और योग के मार्ग पर हैं, उन्हें 'वह्निकुण्डलकृतालयायै' और 'तपस्सिद्धिदायिन्यै' नामों के जप से ध्यान की गहराई और कुण्डलिनी जागरण में प्रत्यक्ष सहायता मिलती है।
  • भ्रम और ऊपरी बाधा से मुक्ति: 'भ्रमनाशिन्यै' और 'बन्धविमोचिन्यै' नामों के प्रभाव से मानसिक अवसाद (Depression), ऊपरी बाधा, तांत्रिक बंधन और हर प्रकार का अज्ञात भ्रम टूट जाता है।
  • सत्य मार्ग और आध्यात्मिक पूर्णता: 'सत्यमार्गप्रबोधिन्यै' नाम साधक को सांसारिक माया से निकालकर सत्य, धर्म और मोक्ष के मार्ग पर प्रशस्त करता है।

पाठ विधि एवं विशेष अनुष्ठान (Ritual Method & Guidelines)

कुमारी नामावली का पाठ अत्यंत सात्विक और पवित्र वातावरण में किया जाना चाहिए। चूँकि यह कुण्डलिनी और राज-वशीकरण से जुड़ा है, इसलिए इसकी विधि का विशेष महत्व है।
दैनिक पाठ विधि: स्नानादि से निवृत्त होकर लाल या पीले आसन पर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। माता कुमारी (बाल रूप दुर्गा या त्रिपुरसुन्दरी) का चित्र स्थापित करें। सबसे पहले विनियोग हेतु जल छोड़ें। फिर "ॐ ह्रीं कुमार्यै नमः" मंत्र का मानसिक जप करते हुए, ध्यान श्लोक पढ़ें। इसके पश्चात् 108 नामों का एकाग्रता से उच्चारण करें।
पुष्प अर्चन (अर्चन विधि): यदि संभव हो, तो प्रत्येक नाम के अंत में माता को सिंदूर (चूँकि नाम है- सिन्धूरतिलकप्रियायै), कुमकुम, लाल पुष्प (गुड़हल/गुलाब), या चमेली के फूल अर्पित करें।
नवरात्रि और कुमारी पूजन का विशेष महत्व: इस स्तोत्र का सबसे अधिक प्रभाव नवरात्रि (विशेषकर अष्टमी और नवमी तिथि) को होता है। इन दिनों में 2 से 10 वर्ष की कन्याओं (जिन्हें साक्षात् कुमारी का रूप माना जाता है) को भोजन कराकर, उनका पूजन करके यदि इस नामावली का पाठ किया जाए, तो वह 'कल्पवृक्ष' के समान फल देता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक शुक्रवार का दिन भी इस पाठ के लिए अत्यंत शुभ है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. तंत्र शास्त्र में 'कुमारी' कौन हैं?
तंत्र में 'कुमारी' का अर्थ केवल छोटी कन्या नहीं है, बल्कि यह माता 'बाला त्रिपुरसुन्दरी' का वह शुद्ध, कुँवारा और अनंत ऊर्जावान स्वरूप है, जिसमें सृजन की पूरी क्षमता छिपी है। वे ही आद्या शक्ति हैं।
2. श्रीकुमार्यष्टोत्तरशतनामावली के द्रष्टा ऋषि कौन हैं?
इस दिव्य नामावली के द्रष्टा स्वयं ईश्वर (भगवान शिव) हैं। उन्होंने ही संसार के कल्याण के लिए इन 108 नामों का रहस्य प्रकट किया था।
3. इस नामावली का मूल बीज मंत्र क्या है?
इस नामावली का मूल और जाग्रत मंत्र है — "ॐ ह्रीं कुमार्यै नमः"। इसमें 'ह्रीं' माया बीज है जो देवी की परम शक्ति का आह्वान करता है।
4. इस नामावली में 'मूलाधारायै' और 'कुण्डलिन्यै' जैसे नाम क्यों हैं?
क्योंकि माता कुमारी ही मनुष्य के शरीर में मूलाधार चक्र में सुप्त 'कुण्डलिनी' शक्ति के रूप में निवास करती हैं। इन नामों का जप उसी सोई हुई आध्यात्मिक ऊर्जा को जाग्रत करने का कार्य करता है।
5. 'नृपवश्यायै' और 'लोकवश्यविधायिन्यै' नामों का क्या अर्थ है?
इनका अर्थ है 'राजाओं (सत्ता/प्रशासन) को वश में करने वाली' और 'पूरे लोक (संसार) को वशीभूत करने वाली'। जो व्यक्ति कोर्ट-कचहरी या प्रशासनिक कार्यों में फंसा हो, उसके लिए ये नाम विजय दिलाने वाले हैं।
6. देवी को 'वैद्यमात्रे' क्यों कहा गया है?
वैद्य का अर्थ है चिकित्सक। देवी सभी उपचारों और आयुर्वेद की मूल माता (वैद्यमात्रे) हैं। वे 'रोगनाशिन्यै' हैं, इसलिए शारीरिक व्याधियों को दूर करने के लिए उनकी उपासना की जाती है।
7. नामावली में 'अकारायै', 'इकारायै', 'क्लींकारायै' का क्या रहस्य है?
ये सभी तंत्र के गुह्य 'बीजाक्षर' हैं। माता साक्षात् वर्णमाला (मातृका) और मंत्रों का स्वरूप हैं। 'क्लीं' वशीकरण और इच्छा पूर्ति का बीज है, जो देवी का ही वाङ्मय रूप है।
8. क्या कोई भी व्यक्ति इस नामावली का पाठ कर सकता है?
हाँ, पूर्ण श्रद्धा, सात्विकता और पवित्रता के साथ कोई भी व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) इसका पाठ कर सकता है। कुण्डलिनी जैसे गहरे ध्यान प्रयोग के लिए गुरु मार्गदर्शन उचित रहता है।
9. पाठ करते समय माता को क्या अर्पित करना सबसे शुभ है?
नामावली में देवी को 'सिन्धूरतिलकप्रियायै' (सिंदूर का तिलक पसंद करने वाली) कहा गया है। इसलिए सिंदूर, कुमकुम और लाल रंग के पुष्प (गुड़हल/गुलाब) चढ़ाना अत्यंत शुभ है।
10. इसका पाठ करने के लिए साल के कौन से दिन विशेष होते हैं?
चैत्र और शारदीय नवरात्रि के नौ दिन, विशेषकर अष्टमी और नवमी (जब कन्या पूजन होता है), तथा प्रत्येक शुक्रवार का दिन इस पाठ की सिद्धि के लिए सर्वोत्तम माने गए हैं।