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Sri Krishna Ashtottara Shatanamavali – श्री कृष्ण अष्टोत्तरशतनामावलिः

Sri Krishna Ashtottara Shatanamavali – श्री कृष्ण अष्टोत्तरशतनामावलिः
॥ श्री कृष्ण अष्टोत्तरशतनामावलिः ॥ ॥ नामावलिः ॥ ॐ श्री कृष्णाय नमः । ॐ कमलानाथाय नमः । ॐ वासुदेवाय नमः । ॐ सनातनाय नमः । ॐ वसुदेवात्मजाय नमः । ॐ पुण्याय नमः । ॐ लीलामानुषविग्रहाय नमः । ॐ श्रीवत्सकौस्तुभधराय नमः । ॐ यशोदावत्सलाय नमः । ॐ हरये नमः । ॐ चतुर्भुजात्तचक्रासिगदाशङ्खाद्यायुधाय नमः । ॐ देवकीनन्दनाय नमः । ॐ श्रीशाय नमः । ॐ नन्दगोपप्रियात्मजाय नमः । ॐ यमुनावेगसंहारिणे नमः । ॐ बलभद्रप्रियानुजाय नमः । ॐ पूतनाजीवितहराय नमः । ॐ शकटासुरभञ्जनाय नमः । ॐ नन्दव्रजजनानन्दिने नमः । ॐ सच्चिदानन्दविग्रहाय नमः । ॐ नवनीतविलिप्ताङ्गाय नमः । ॐ नवनीतनटाय नमः । ॐ अनघाय नमः । ॐ नवनीतनवाहारिणे नमः । ॐ मुचुकुन्दप्रसादकाय नमः । ॐ षोडशस्त्रीसहस्रेशाय नमः । ॐ त्रिभङ्गिने नमः । ॐ मधुराकृतये नमः । ॐ शुकवागमृताब्धीन्दवे नमः । ॐ गोविन्दाय नमः । ॐ योगिनाम्पतये नमः । ॐ वत्सवाटचराय नमः । ॐ अनन्ताय नमः । ॐ धेनुकासुरभञ्जनाय नमः । ॐ तृणीकृततृणावर्ताय नमः । ॐ यमलार्जुनभञ्जनाय नमः । ॐ उत्तालतालभेत्रे नमः । ॐ गोपगोपीश्वराय नमः । ॐ योगिने नमः । ॐ कोटिसूर्यसमप्रभाय नमः । ॐ इलापतये नमः । ॐ परञ्ज्योतिषे नमः । ॐ यादवेन्द्राय नमः । ॐ यदूद्वहाय नमः । ॐ वनमालिने नमः । ॐ पीतवाससे नमः । ॐ पारिजातापहारकाय नमः । ॐ गोवर्धनाचलोद्धर्त्रे नमः । ॐ गोपालाय नमः । ॐ सर्वपालकाय नमः । ॐ अजाय नमः । ॐ निरञ्जनाय नमः । ॐ कामजनकाय नमः । ॐ कञ्जलोचनाय नमः । ॐ मधुघ्ने नमः । ॐ मथुरानाथाय नमः । ॐ द्वारकानायकाय नमः । ॐ बलिने नमः । ॐ वृन्दावनान्तसञ्चारिणे नमः । ॐ तुलसीदामभूषणाय नमः । ॐ स्यमन्तकमणेर्हर्त्रे नमः । ॐ नरनारायणात्मकाय नमः । ॐ कुब्जाकृष्णाम्बरधराय नमः । ॐ मायिने नमः । ॐ परमपुरुषाय नमः । ॐ मुष्टिकासुरचाणूरमल्लयुद्धविशारदाय नमः । ॐ संसारवैरिणे नमः । ॐ कंसारये नमः । ॐ मुरारये नमः । ॐ नरकान्तकाय नमः । ॐ अनादिब्रह्मचारिणे नमः । ॐ कृष्णाव्यसनकर्षकाय नमः । ॐ शिशुपालशिरच्छेत्रे नमः । ॐ दुर्योधनकुलान्तकाय नमः । ॐ विदुराक्रूरवरदाय नमः । ॐ विश्वरूपप्रदर्शकाय नमः । ॐ सत्यवाचे नमः । ॐ सत्यसङ्कल्पाय नमः । ॐ सत्यभामाताय नमः । ॐ जयिने नमः । ॐ सुभद्रपूर्वजाय नमः । ॐ विष्णवे नमः । ॐ भीष्ममुक्तिप्रदायकाय नमः । ॐ जगद्गुरवे नमः । ॐ जगन्नाथाय नमः । ॐ वेणुनादविशारदाय नमः । ॐ वृषभासुरविध्वंसिने नमः । ॐ बाणासुरकरान्तकाय नमः । ॐ युधिष्ठिरप्रतिष्ठात्रे नमः । ॐ बर्हिबर्हावतंसकाय नमः । ॐ पार्थसारथये नमः । ॐ अव्यक्ताय नमः । ॐ गीतामृतमहोदधये नमः । ॐ कालीयफणिमाणिक्यरञ्जितश्रीपदाम्बुजाय नमः । ॐ दामोदराय नमः । ॐ यज्ञभोक्त्रे नमः । ॐ दानवेन्द्रविनाशकाय नमः । ॐ नारायणाय नमः । ॐ परस्मै ब्रह्मणे नमः । ॐ पन्नगाशनवाहनाय नमः । ॐ जलक्रीडासमासक्तगोपीवस्त्रापहारकाय नमः । ॐ पुण्यश्लोकाय नमः । ॐ तीर्थपादाय नमः । ॐ वेदवेद्याय नमः । ॐ दयानिधये नमः । ॐ सर्वभूतात्मकाय नमः । ॐ सर्वग्रहरूपिणे नमः । ॐ परात्पराय नमः । ॥ इति श्री कृष्ण अष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णा ॥

श्री कृष्ण अष्टोत्तरशतनामावलिः — विस्तृत परिचय एवं दार्शनिक स्वरूप (Introduction)

श्री कृष्ण अष्टोत्तरशतनामावलिः (Sri Krishna Ashtottara Shatanamavali) सनातन धर्म के महान ग्रंथों और स्तोत्र साहित्य का एक अनमोल रत्न है। यह नामावली भगवान विष्णु के आठवें अवतार, लीला पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण के १०८ दिव्य नामों का एक शक्तिशाली संकलन है। 'अष्टोत्तर' का अर्थ है आठ अधिक और 'शत' का अर्थ है सौ, अर्थात् १०८। हिंदू दर्शन में १०८ की संख्या ब्रह्मांडीय पूर्णता, २७ नक्षत्रों के ४ चरणों और मानव चेतना के १०८ मुख्य ऊर्जा केंद्रों (मर्म स्थानों) का प्रतिनिधित्व करती है। भगवान कृष्ण केवल एक नायक नहीं हैं, बल्कि वे "पूर्ण पुरुषोत्तम" हैं, जिन्होंने पृथ्वी पर धर्म की पुनर्स्थापना और भक्ति के मार्ग को सुगम बनाने के लिए जन्म लिया।
इस नामावली के प्रत्येक नाम के पीछे भगवान की एक विशिष्ट लीला, उनका स्वभाव और उनकी अनंत शक्तियाँ छिपी हैं। उदाहरण के तौर पर, "वासुदेवाय नमः" उनके सर्वव्यापी स्वरूप को दर्शाता है, जबकि "कमलानाथाय नमः" उन्हें महालक्ष्मी के स्वामी के रूप में प्रतिष्ठित करता है। "लीलामानुषविग्रहाय नमः" नाम यह स्पष्ट करता है कि भगवान ने मनुष्य रूप केवल अपनी लीलाओं के माध्यम से भक्तों को आनंद प्रदान करने के लिए लिया है। इन १०८ नामों का पाठ करना वास्तव में श्रीमद्भागवत और महाभारत के सार का चिंतन करने के समान है। कृष्ण नाम की महिमा स्वयं महादेव भी गाते हैं, जो इसे समस्त पापों का नाशक मानते हैं।
भगवान कृष्ण का व्यक्तित्व विरोधाभासों का अद्भुत संगम है—वे एक ओर "माखन चोर" हैं तो दूसरी ओर "योगेश्वर"। वे एक ओर "बलिने" (अत्यधिक बलशाली) हैं तो दूसरी ओर "दयानिधये" (दया के सागर)। यही कारण है कि उनकी नामावली का पाठ मनुष्य को जीवन के हर पक्ष में संतुलन बनाना सिखाता है। कलयुग के इस अशांत और तनावपूर्ण वातावरण में, जहाँ मन निरंतर चंचल रहता है, वहाँ श्री कृष्ण के इन १०८ नामों का जप एक आध्यात्मिक एंकर (Anchor) की तरह कार्य करता है। यह पाठ साधक के भीतर "सच्चिदानंद" (सत्य, चित्त और आनंद) के बीज बोता है, जिससे मानसिक अशांति का समूल नाश होता है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, श्री कृष्ण के नाम जप से जातक के "हृदय चक्र" (Anahata Chakra) का शोधन होता है। चूँकि कृष्ण प्रेम के अवतार हैं, इसलिए इन नामों का जप करने से साधक के भीतर करुणा, क्षमा और निस्वार्थ प्रेम का उदय होता है। नामावली का पाठ करते समय प्रत्येक नाम के अंत में लगा "नमः" (न मम — मेरा नहीं, सब तेरा है) शब्द साधक के अहंकार (Ego) को विसर्जित करने का सबसे सरल माध्यम है। जैसे-जैसे अहंकार कम होता है, भक्त और भगवान के बीच की दूरी समाप्त होने लगती है। यह पाठ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह आत्मा को परमात्मा के साथ लयबद्ध करने का एक सिद्ध विज्ञान है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं नाम महिमा (Significance)

श्री कृष्ण नामावली का महत्व इसलिए सर्वोपरि है क्योंकि इसमें "ब्रह्म ज्ञान" और "भक्ति रस" दोनों समाहित हैं। पद्म पुराण में उल्लेख है कि भगवान के १००० नामों (विष्णु सहस्रनाम) का पुण्य केवल एक बार "कृष्ण" नाम लेने से प्राप्त हो जाता है। १०८ नामों के इस लघु संस्करण में उन सभी गुणों का सार दिया गया है।
विशेष रूप से उन नामों का जप जैसे "गीतामृतमहोदधये" (गीता रूपी अमृत के सागर) साधक को ज्ञान की ओर ले जाता है, जबकि "यशोदावत्सलाय" (यशोदा के प्रिय) नाम भक्त को वात्सल्य भाव से भर देता है। यह नामावली वैराग्य और गृहस्थ जीवन के बीच एक सेतु का कार्य करती है।

फलश्रुति: नामावली पाठ के अभूतपूर्व लाभ (Benefits)

शास्त्रों और संतों के वचनों के अनुसार, श्रद्धापूर्वक श्री कृष्ण अष्टोत्तरशतनामावलिः का पाठ करने से निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:
  • पाप मुक्ति और चित्त शुद्धि: "पुण्याय नमः" — भगवान के नामों का उच्चारण हमारे संचित पापों को जलाकर आत्मा को निर्मल बनाता है।
  • मानसिक शांति और भय निवारण: यह पाठ तनाव, डिप्रेशन और मृत्यु के भय को दूर कर मन को कृष्णमय शांति प्रदान करता है।
  • कार्य सिद्धि और सफलता: "सत्यसङ्कल्पाय" — भगवान की कृपा से साधक के रुके हुए कार्य पूर्ण होते हैं और उसे धर्मानुकूल विजय प्राप्त होती है।
  • गृह क्लेश की शांति: घर में इस नामावली का पाठ करने से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और सुख-शांति का वातावरण बनता है।
  • मोक्ष की पात्रता: "भीष्ममुक्तिप्रदायकाय" — नियमित पाठ से अंत समय में भगवान के चरणों में स्थान मिलता है और जन्म-मरण से मुक्ति मिलती है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method & Occasions)

भगवान श्री कृष्ण भाव के भूखे हैं, फिर भी एक व्यवस्थित विधि ऊर्जा को केंद्रित करने में सहायक होती है:

पूजा के मुख्य नियम:

  • समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय या संध्या वंदन के दौरान पाठ करना सर्वोत्तम है।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले (Yellow) वस्त्र धारण करें, क्योंकि कृष्ण को 'पीताम्बर' अति प्रिय है।
  • आसन: ऊनी या कुश के आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
  • अर्चन सामग्री: १०८ नामों के साथ तुलसी दल (Basil leaves) भगवान के श्रीचरणों में अर्पित करना महापुण्यकारी है।
  • नैवेद्य: माखन-मिश्री, दूध से बनी मिठाई या फलों का भोग लगाएँ।

विशेष अवसर:

  • जन्माष्टमी: इस दिन १०८ नामों से अभिषेक करना अत्यंत शुभ होता है।
  • एकादशी: प्रत्येक एकादशी को नामावली का पाठ करने से विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री कृष्ण अष्टोत्तरशतनामावलिः का पाठ किस समय करना चाहिए?

वैसे तो भगवान का नाम कभी भी लिया जा सकता है, परन्तु 'ब्रह्म मुहूर्त' (सूर्योदय से पूर्व) और संध्या काल पाठ के लिए सर्वाधिक ऊर्जावान समय माने जाते हैं।

2. क्या महिलाएं भी इस नामावली का पाठ कर सकती हैं?

जी हाँ, भगवान कृष्ण की भक्ति में कोई भेद नहीं है। महिलाएं पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ इन नामों का जप कर सकती हैं। मीराबाई और कर्माबाई इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

3. 'वासुदेवाय' नाम का क्या अर्थ है?

इसके दो मुख्य अर्थ हैं—पहला 'वसुदेव के पुत्र' और दूसरा 'वह सत्ता जो संपूर्ण ब्रह्मांड के कण-कण में निवास करती है' (वस् - निवास करना)।

4. क्या बिना मूर्ति के भी यह पाठ किया जा सकता है?

हाँ, आप भगवान के स्वरूप का मानसिक ध्यान (Mental Image) करके भी पाठ कर सकते हैं। कृष्ण 'हृदयवासी' हैं, वे आपके भाव देखते हैं।

5. १०८ नामों का जप करते समय किस माला का उपयोग करें?

श्री कृष्ण विष्णु के अवतार हैं, इसलिए तुलसी की माला (Tulsi Mala) सबसे श्रेष्ठ है। इसके अभाव में वैजयंती माला का भी उपयोग किया जा सकता है।

6. क्या पाठ के दौरान 'तुलसी दल' चढ़ाना अनिवार्य है?

अनिवार्य नहीं, पर अत्यंत शुभ है। कृष्ण को तुलसी "प्राणों से प्रिय" है। अर्चन के समय प्रत्येक नाम के साथ एक तुलसी पत्र अर्पित करना विशेष सिद्धिदायक है।

7. 'पूर्ण पुरुषोत्तम' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है वह ईश्वर जो संपूर्ण १६ कलाओं से युक्त है और जिसमें अनंत ब्रह्मांड समाहित हैं। कृष्ण को ही एकमात्र पूर्ण अवतार माना गया है।

8. क्या इस नामावली का पाठ बच्चों को सिखाना चाहिए?

अवश्य। इससे बच्चों में सात्विक संस्कार, एकाग्रता और सकारात्मक सोच विकसित होती है। कृष्ण के नाम उनके चरित्र निर्माण में सहायक होते हैं।

9. 'दामोदर' नाम का रहस्य क्या है?

'दाम' का अर्थ है रस्सी और 'उदर' का अर्थ है पेट। जिन्हें माता यशोदा ने प्रेम की रस्सी से पेट से बाँध दिया था, वे ही दामोदर हैं।

10. क्या इस पाठ से मन की चंचलता दूर होती है?

जी हाँ, कृष्ण का अर्थ ही है 'जो आकर्षित करे'। जब मन कृष्ण के नामों में आकर्षित होता है, तो सांसारिक विषयों से उसकी चंचलता स्वतः कम होने लगती है।