Sri Harihara Ashtottara Shatanamavali – श्री हरिहर अष्टोत्तर शतनामावली

॥ श्री हरिहर अष्टोत्तर शतनामावली ॥
(स्कन्दपुराणान्तर्गत काशीखण्डे यमप्रोक्ता)
ॐ गोविन्दाय नमः ।
ॐ माधवाय नमः ।
ॐ मुकुन्दाय नमः ।
ॐ हरये नमः ।
ॐ मुरारये नमः ।
ॐ शम्भवे नमः ।
ॐ शिवाय नमः ।
ॐ ईशाय नमः ।
ॐ शशिशेखराय नमः । ९
ॐ शूलपाणये नमः ।
ॐ दामोदराय नमः ।
ॐ अच्युताय नमः ।
ॐ जनार्दनाय नमः ।
ॐ वासुदेवाय नमः ।
ॐ गङ्गाधराय नमः ।
ॐ अन्धकरिपवे नमः ।
ॐ हराय नमः ।
ॐ नीलकण्ठाय नमः । १८
ॐ वैकुण्ठाय नमः ।
ॐ कैटभरिपवे नमः ।
ॐ कमठाय नमः ।
ॐ अब्जपाणये नमः ।
ॐ भूतेशाय नमः ।
ॐ खण्डपरशवे नमः ।
ॐ मृडाय नमः ।
ॐ चण्डिकेशाय नमः ।
ॐ विष्णवे नमः । २७
ॐ नृसिंहाय नमः ।
ॐ मधुसूदनाय नमः ।
ॐ चक्रपाणये नमः ।
ॐ गौरीपतये नमः ।
ॐ गिरिशाय नमः ।
ॐ शङ्कराय नमः ।
ॐ चन्द्रचूडाय नमः ।
ॐ नारायणाय नमः ।
ॐ असुरनिबर्हणाय नमः । ३६
ॐ शार्ङ्गपाणये नमः ।
ॐ मृत्युञ्जयाय नमः ।
ॐ उग्राय नमः ।
ॐ विषमेक्षणाय नमः ।
ॐ कामशत्रवे नमः ।
ॐ श्रीकान्ताय नमः ।
ॐ पीतवसनाय नमः ।
ॐ अम्बुदनीलाय नमः ।
ॐ शौरये नमः । ४५
ॐ ईशानाय नमः ।
ॐ कृत्तिवसनाय नमः ।
ॐ त्रिदशैकनाथाय नमः ।
ॐ लक्ष्मीपतये नमः ।
ॐ मधुरिपवे नमः ।
ॐ पुरुषोत्तमाय नमः ।
ॐ आद्याय नमः ।
ॐ श्रीकण्ठाय नमः ।
ॐ दिग्वसनाय नमः । ५४
ॐ शान्ताय नमः ।
ॐ पिनाकपाणये नमः ।
ॐ आनन्दकन्दाय नमः ।
ॐ धरणीधराय नमः ।
ॐ पद्मनाभाय नमः ।
ॐ सर्वेश्वराय नमः ।
ॐ त्रिपुरसूदनाय नमः ।
ॐ देवदेवाय नमः ।
ॐ ब्रह्मण्यदेवाय नमः । ६३
ॐ गरुडध्वजाय नमः ।
ॐ शङ्खपाणये नमः ।
ॐ त्र्यक्षाय नमः ।
ॐ उरगाभरणाय नमः ।
ॐ बालमृगाङ्कमौलिने नमः ।
ॐ श्रीरामाय नमः ।
ॐ राघवाय नमः ।
ॐ रमेश्वराय नमः ।
ॐ रावणारये नमः । ७२
ॐ भूतेशाय नमः ।
ॐ मन्मथरिपवे नमः ।
ॐ प्रमथाधिनाथाय नमः ।
ॐ चाणूर मर्दनाय नमः ।
ॐ हृषीकपतये नमः ।
ॐ मुरारये नमः ।
ॐ शूलिने नमः ।
ॐ गिरीशाय नमः ।
ॐ रजनीशकलावतंसाय नमः । ८१
ॐ कंसप्रणाशनाय नमः ।
ॐ सनातनाय नमः ।
ॐ केशिनाशाय नमः ।
ॐ भर्गाय नमः ।
ॐ त्रिनेत्राय नमः ।
ॐ भवाय नमः ।
ॐ भूतपतये नमः ।
ॐ पुरारये नमः ।
ॐ गोपीपतये नमः । ९०
ॐ यदुपतये नमः ।
ॐ वसुदेवसूनवे नमः ।
ॐ कर्पूरगौराय नमः ।
ॐ वृषभध्वजाय नमः ।
ॐ फालनेत्राय नमः ।
ॐ गोवर्धनोद्धरणाय नमः ।
ॐ धर्मधुरीणाय नमः ।
ॐ गोपाय नमः ।
ॐ स्थाणवे नमः । ९९
ॐ त्रिलोचनाय नमः ।
ॐ पिनाकधराय नमः ।
ॐ स्मरारये नमः ।
ॐ कृष्णाय नमः ।
ॐ अनिरुद्धाय नमः ।
ॐ कमलाकराय नमः ।
ॐ कल्मषारये नमः ।
ॐ विश्वेश्वराय नमः ।
ॐ त्रिपथगार्द्रजटाकलापायै नमः । १०८
॥ इति श्री हरिहर अष्टोत्तर शतनामावली संपूर्णा ॥
श्री हरिहर अष्टोत्तर शतनामावली: अद्वैत भक्ति का सार (Introduction - 600+ Words)
श्री हरिहर अष्टोत्तर शतनामावली (Sri Harihara Ashtottara Shatanamavali) सनातन धर्म के उस परम सत्य को उजागर करती है जहाँ सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु (हरि) और संहारक भगवान शिव (हर) एकाकार हो जाते हैं। यह दिव्य नामावली स्कन्द पुराण के सुप्रसिद्ध 'काशी खण्ड' से उद्धृत है। इस पाठ की सबसे बड़ी महत्ता यह है कि यह स्वयं यमराज (धर्मराज) के मुखारविंद से प्रकट हुई है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब यमराज अपने दूतों को उपदेश देते हैं कि उन्हें पृथ्वी पर किन मनुष्यों को स्पर्श नहीं करना चाहिए, तब वे इस हरिहर नामावली का उल्लेख करते हैं। यमराज स्पष्ट कहते हैं कि जो मनुष्य शिव और विष्णु में भेद नहीं करते और इन १०८ नामों का नित्य स्मरण करते हैं, उन पर यम का कोई अधिकार नहीं रहता।
ऐतिहासिक और दार्शनिक रूप से, 'हरिहर' का स्वरूप भारतीय अध्यात्म में शैव और वैष्णव संप्रदायों के बीच की कृत्रिम दूरी को मिटाने के लिए उभरा। 'हरि' का अर्थ है जो पापों और दुखों को हर ले, और 'हर' का अर्थ है जो अज्ञान और अंधकार का संहार कर दे। जब ये दोनों शक्तियां संयुक्त होती हैं, तो साधक को उस 'पूर्ण' का बोध होता है जो द्वैत से परे है। नामावली में १०८ नामों को इस प्रकार पिरोया गया है कि 'गोविन्द' और 'माधव' जैसे विष्णु नामों के साथ 'शम्भु' और 'ईश' जैसे शिव नाम मिलकर एक अभूतपूर्व आध्यात्मिक ऊर्जा प्रवाहित करते हैं। यह नामावली दर्शाती है कि जहाँ विष्णु का चक्र है, वहीं शिव का त्रिशूल भी धर्म की रक्षा के लिए तत्पर है।
पुराणों में वर्णित शिव शर्मा नामक ब्राह्मण की कथा इस नामावली के प्रभाव का साक्षात प्रमाण है। यमराज अपने दूतों को कड़ा निर्देश देते हैं— "हे यमदूतों! जो व्यक्ति अपने कंठ में हरि और हर के नामों की रत्नमाला धारण करते हैं, उन्हें तुम दूर से ही त्याग देना (त्याज्या भटा य इति सन्ततमामनन्ति)।" यह नामावली वास्तव में एक 'तारक मंत्र' की भांति कार्य करती है, जो साधक को न केवल इस लोक के कष्टों से बचाती है, बल्कि अंततः जन्म-मृत्यु के चक्र (संसार सागर) से भी पार लगा देती है।
आध्यात्मिक साधकों के लिए यह पाठ 'अद्वैत' चेतना का द्वार है। भगवान शिव को 'कर्पूरगौर' (कर्पूर के समान श्वेत) और भगवान विष्णु को 'नीलमेघश्याम' (नीले बादल के समान श्याम) कहा गया है। इन दोनों का संगम श्वेत और श्याम, ज्ञान और कर्म, वैराग्य और आनंद का समागम है। जो भक्त पूर्ण श्रद्धा के साथ इन नामों का जप करता है, उसके भीतर की संकीर्णता समाप्त हो जाती है। ऋषि अगस्त्य ने इस नामावली को 'सकल कल्मष बीजहन्त्री' कहा है, जिसका अर्थ है कि यह पापों के बीज तक को भस्म कर देती है। काशी की पावन धरा पर यमराज द्वारा प्रोक्त यह नामावली आज भी लाखों भक्तों के लिए आध्यात्मिक सुरक्षा और मोक्ष का आधार बनी हुई है।
विशिष्ट महत्व: यम-प्रोक्त दिव्य नामावली (Significance)
हरिहर अष्टोत्तर शतनामावली का विशिष्ट महत्व इसके रचयिता और संदर्भ में निहित है। सामान्यतः स्तोत्र ऋषियों द्वारा रचित होते हैं, लेकिन यह नामावली साक्षात मृत्यु के देवता यमराज द्वारा रचित है। यमराज का अपने दूतों को यह सिखाना कि हरिहर के भक्तों को स्पर्श न करें, यह प्रमाणित करता है कि हरिहर की भक्ति काल के प्रभाव को भी क्षीण कर देती है।
यह पाठ अद्वैत तत्व का प्रतिपादन करता है। इसमें शिव के 'पिनाक' धनुष और विष्णु के 'शार्ङ्ग' धनुष की एक साथ स्तुति है। यह हमें सिखाता है कि जिस प्रकार एक ही शरीर के दो हाथ अलग-अलग कार्य करते हुए भी एक ही चेतना से जुड़े होते हैं, वैसे ही हरि और हर एक ही ब्रह्म के दो रूप हैं। जो व्यक्ति इस एकता को जान लेता है, वह निर्भय हो जाता है।
नामावली पाठ के लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)
स्कन्द पुराण के अनुसार, श्री हरिहर नामावली के नित्य पाठ से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:
- यमलोक के भय से मुक्ति: इस पाठ को करने वाले साधक को यमदूत कभी स्पर्श नहीं करते और उसे यमलोक की यातना नहीं भोगनी पड़ती।
- पुनर्जन्म का अंत (मोक्ष): ऋषि अगस्त्य के अनुसार, जो इस नामावली का नित्य जप करता है, उसे पुनः माता का स्तनपान नहीं करना पड़ता (जन्म-मरण से मुक्ति)।
- सर्व पाप निवारण: यह नामावली संचित पापों के बीजों को नष्ट कर हृदय को शुद्ध और पवित्र बनाती है।
- मानसिक शांति और संतुलन: शिव और विष्णु की संयुक्त कृपा से मन के द्वंद्व, क्रोध और ईर्ष्या का नाश होता है।
- सकारात्मक ऊर्जा का संचार: घर में इस नामावली का गुंजन नकारात्मक शक्तियों और दरिद्रता को दूर रखता है।
- आरोग्य और सुरक्षा: यह पाठ असाध्य रोगों के भय से मुक्ति दिलाता है और साधक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच बनाता है।
पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method)
भगवान हरिहर की कृपा प्राप्त करने के लिए पाठ की एक सात्विक विधि अपनाना अत्यंत लाभकारी होता है:
- समय: प्रातःकाल स्नान के बाद ब्रह्म मुहूर्त (४-६ बजे) या संध्या के समय पाठ करना सर्वोत्तम है।
- आसन: ऊनी या कुश के आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
- पूजन: भगवान शिव के लिए 'बिल्व पत्र' और भगवान विष्णु के लिए 'तुलसी दल' दोनों को एक साथ हरिहर के चरणों में अर्पित करें।
- दीपक: घी का दीपक प्रज्वलित करें और चंदन की सुगंध का उपयोग करें।
- विशेष अवसर: सोमवार (शिव प्रिय), गुरुवार (विष्णु प्रिय), एकादशी, प्रदोष और महाशिवरात्रि पर इस नामावली का ११ या २१ बार पाठ विशेष सिद्धिदायक है।
- मानसिक ध्यान: पाठ करते समय अर्धनारीश्वर की भांति 'हरिहर' स्वरूप का ध्यान करें—जहाँ आधा शरीर गौर वर्ण (शिव) और आधा शरीर श्याम वर्ण (विष्णु) हो।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'हरिहर' का अर्थ क्या है?
'हरि' भगवान विष्णु हैं और 'हर' भगवान शिव। इन दोनों शक्तियों के एकात्मक स्वरूप को 'हरिहर' कहा जाता है, जो अद्वैत का प्रतीक है।
2. यह नामावली किस ग्रंथ से ली गई है?
यह नामावली स्कन्द पुराण के 'काशी खण्ड' से ली गई है, जहाँ यमराज अपने दूतों को इसका महत्व बताते हैं।
3. क्या यमराज ने वास्तव में इसकी रचना की है?
जी हाँ, इसे 'यमप्रोक्त' कहा गया है, जिसका अर्थ है साक्षात धर्मराज यमराज द्वारा कही गई नामावली।
4. क्या स्त्रियों को यह पाठ करना चाहिए?
निश्चित रूप से। भगवद भक्ति में कोई भेद नहीं है। स्त्रियाँ भी शुद्धता और श्रद्धा के साथ इसका पाठ कर सकती हैं।
5. 'त्याज्या भटा य...' पंक्ति का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है— "हे यम के सेवकों (भटों), उन लोगों को छोड़ दो जो हरिहर के इन दिव्य नामों का जप करते हैं।"
6. क्या इसके पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?
भक्ति और कल्याण के लिए किए जाने वाले इन नामों के जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है, हालांकि गुरु के मार्गदर्शन में किया गया पाठ अधिक फलदायी होता है।
7. क्या इसे प्रतिदिन पढ़ना चाहिए?
हाँ, प्रतिदिन पाठ करने से मानसिक अशांति दूर होती है और साधक के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बना रहता है।
8. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?
हरिहर की संयुक्त उपासना के लिए 'हरिहर माला' (आधी रुद्राक्ष और आधी तुलसी) का प्रयोग श्रेष्ठ माना गया है।
9. 'सकल कल्मष बीजहन्त्री' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि यह नामावली मनुष्य के समस्त पापों (कल्मष) के बीज का नाश करने वाली है, जिससे दोबारा पाप करने की वृत्ति समाप्त होती है।
10. क्या इसके पाठ से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है?
जी हाँ, यमराज द्वारा रचित होने के कारण यह अकाल मृत्यु के भय को मिटाकर जातक को निर्भय बनाती है।