Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Devi Ashtottara Shatanamavali – श्रीदेव्यष्टोत्तरशतनामावली (महिषमर्दिनि वनदुर्गा)

Sri Devi Ashtottara Shatanamavali – श्रीदेव्यष्टोत्तरशतनामावली (महिषमर्दिनि वनदुर्गा)
॥ श्रीदेव्यष्टोत्तरशतनामावली ॥ ॥ विनियोगः ॥ ॐ अस्यश्री महिषमर्दिनि वनदुर्गा महामन्त्रस्य आरण्यक ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्री महिषासुरमर्दिनी वनदुर्गा देवता ॥[ ॐ उत्तिष्ठ पुरुषि - किं स्वपिषि - भयं मे समुपस्थितं - यदि शक्यं अशक्यं वा - तन्मे भगवति - शमय स्वाहा ] एवं न्यासमाचरेत् ॥ ॥ ध्यानम् ॥ हेमप्रख्यामिन्दुखण्डात्ममौलीं शङ्खारीष्टाभीतिहस्तां त्रिनेत्राम् । हेमाब्जस्थां पीतवस्त्रां प्रसन्नां देवीं दुर्गां दिव्यरूपां नमामि ॥ ॥ अथ श्री देव्याः नामावलिः ॥ ॐ महिषमर्दिन्यै नमः । ॐ श्रीदेव्यै नमः । ॐ जगदात्मशक्त्यै नमः । ॐ देवगणशक्त्यै नमः । ॐ समूहमूर्त्यै नमः । ॐ अम्बिकायै नमः । ॐ अखिलजनपरिपालकायै नमः । ॐ महिषपूजितायै नमः । ॐ भक्तिगम्यायै नमः । ॐ विश्वायै नमः । १० ॐ प्रभासिन्यै नमः । ॐ भगवत्यै नमः । ॐ अनन्तमूर्त्यै नमः । ॐ चण्डिकायै नमः । ॐ जगत्परिपालिकायै नमः । ॐ अशुभनाशिन्यै नमः । ॐ शुभमतायै नमः । ॐ श्रियै नमः । ॐ सुकृत्यै नमः । ॐ लक्ष्म्यै नमः । २० ॐ पापनाशिन्यै नमः । ॐ बुद्धिरूपिण्यै नमः । ॐ श्रद्धारूपिण्यै नमः । ॐ कालरूपिण्यै नमः । ॐ लज्जारूपिण्यै नमः । ॐ अचिन्त्यरूपिण्यै नमः । ॐ अतिवीरायै नमः । ॐ असुरक्षयकारिण्यै नमः । ॐ भूमिरक्षिण्यै नमः । ॐ अपरिचितायै नमः । ३0 ॐ अद्भुतरूपिण्यै नमः । ॐ सर्वदेवतास्वरूपिण्यै नमः । ॐ जगदंशोद्भूतायै नमः । ॐ असत्कृतायै नमः । ॐ परमप्रकृत्यै नमः । ॐ समस्तसुमतस्वरूपायै नमः । ॐ तृप्त्यै नमः । ॐ सकलमुखस्वरूपिण्यै नमः । ॐ शब्दक्रियायै नमः । ॐ आनन्दसन्दोहायै नमः । ४० ॐ विपुलायै नमः । ॐ ऋज्यजुस्सामाथर्वरूपिण्यै नमः । ॐ उद्गीतायै नमः । ॐ रम्यायै नमः । ॐ पदस्वरूपिण्यै नमः । ॐ पाठस्वरूपिण्यै नमः । ॐ मेधादेव्यै नमः । ॐ विदितायै नमः । ॐ अखिलशास्त्रसारायै नमः । ॐ दुर्गायै नमः । ५० ॐ दुर्गाश्रयायै नमः । ॐ भवसागरनाशिन्यै नमः । ॐ कैटभहारिण्यै नमः । ॐ हृदयवासिन्यै नमः । ॐ गौर्यै नमः । ॐ शशिमौलिकृतप्रतिष्ठायै नमः । ॐ ईशत्सुहासायै नमः । ॐ अमलायै नमः । ॐ पूर्णचन्द्रमुख्यै नमः । ॐ कनकोत्तमकान्त्यै नमः । ६० ॐ कान्तायै नमः । ॐ अत्यद्भुतायै नमः । ॐ प्रणतायै नमः । ॐ अतिरौद्रायै नमः । ॐ महिषासुरनाशिन्यै नमः । ॐ दृष्टायै नमः । ॐ भ्रुकुटीकरालायै नमः । ॐ शशाङ्कधरायै नमः । ॐ महिषप्राणविमोचनायै नमः । ॐ कुपितायै नमः । ७० ॐ अन्तकस्वरूपिण्यै नमः । ॐ सद्योविनाशिकायै नमः । ॐ कोपवत्यै नमः । ॐ दारिद्र्यनाशिन्यै नमः । ॐ पापनाशिन्यै नमः । ॐ सहस्रभुजायै नमः । ॐ सहस्राक्ष्यै नमः । ॐ सहस्रपदायै नमः । ॐ श्रुत्यै नमः । ॐ रत्यै नमः । ८० ॐ रमण्यै नमः । ॐ भक्त्यै नमः । ॐ भवसागरतारिकायै नमः । ॐ पुरुषोत्तमवल्लभायै नमः । ॐ भृगुनन्दिन्यै नमः । ॐ स्थूलजङ्घायै नमः । ॐ रक्तपादायै नमः । ॐ नागकुण्डलधारिण्यै नमः । ॐ सर्वभूषणायै नमः । ॐ कामेश्वर्यै नमः । ९० ॐ कल्पवृक्षायै नमः । ॐ कस्तूरिधारिण्यै नमः । ॐ मन्दस्मितायै नमः । ॐ मदोदयायै नमः । ॐ सदानन्दस्वरूपिण्यै नमः । ॐ विरिञ्चिपूजितायै नमः । ॐ गोविन्दपूजितायै नमः । ॐ पुरन्दरपूजितायै नमः । ॐ महेश्वरपूजितायै नमः । ॐ किरीटधारिण्यै नमः । १०० ॐ मणिनूपुरशोभितायै नमः । ॐ पाशाङ्कुशधरायै नमः । ॐ कमलधारिण्यै नमः । ॐ हरिचन्दनायै नमः । ॐ कस्तूरीकुङ्कुमायै नमः । ॐ अशोकभूषणायै नमः । ॐ श‍ृङ्गारलास्यायै नमः । ॐ वनदुर्गायै नमः । १०८ ॥ इति श्री देव्याः नामावलिः सम्पूर्णम् ॥

श्रीदेव्यष्टोत्तरशतनामावली: तात्विक परिचय एवं रहस्य (Introduction & Mystical Secrets)

सनातन धर्म के शाक्त संप्रदाय में देवी की उपासना को सर्वोपरि माना गया है। श्रीदेव्यष्टोत्तरशतनामावली उसी परमब्रह्म स्वरूपिणी माता के अत्यंत उग्र और करुणामयी स्वरूप—महिषासुरमर्दिनी और वनदुर्गा—के 108 नामों का एक अत्यंत गोपनीय एवं सिद्ध संकलन है। इस स्तोत्र के आरण्यक ऋषि हैं, जो वनों (अरण्य) में तपस्या करने वाले महर्षियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसीलिए इस नामावली का सीधा संबंध 'वनदुर्गा' (प्रकृति और वनों की अधिष्ठात्री देवी) से है। यह स्तोत्र अनुष्टुप् छन्द में निबद्ध है।
न्यास मंत्र का दुर्लभ रहस्य: इस नामावली की सबसे बड़ी और असाधारण विशेषता इसका न्यास या सम्पुट मंत्र है—"ॐ उत्तिष्ठ पुरुषि - किं स्वपिषि - भयं मे समुपस्थितं - यदि शक्यं अशक्यं वा - तन्मे भगवति - शमय स्वाहा।" इसका अर्थ है: "हे परम शक्ति (पुरुषि)! उठो! आप क्यों सो रही हैं? मुझ पर भारी भय आन पड़ा है। वह कार्य चाहे संभव हो या असंभव, हे भगवती! मेरे उस भय को शांत करो, नष्ट करो, स्वाहा!" यह मंत्र एक प्रकार का 'जाग्रत आह्वान' (Awakening Call) है। जब साधक घोर संकट, अकाल मृत्यु या असाध्य शत्रु बाधा से घिर जाता है, तब वह इस आतुर प्रार्थना के साथ ब्रह्मांडीय ऊर्जा (वनदुर्गा) को जाग्रत करता है। यह मंत्र इस नामावली को एक सामान्य स्तोत्र से उठाकर एक 'अमोघ तांत्रिक अस्त्र' बना देता है।
अद्भुत ध्यान श्लोक: नामावली से पूर्व माता का ध्यान (Dhyanam) उनके भव्य रूप का वर्णन करता है। "हेमप्रख्यामिन्दुखण्डात्ममौलीं..." — जिनकी आभा शुद्ध स्वर्ण (हेम) के समान है, मस्तक पर चंद्रमा का खंड (इन्दुखण्ड) सुशोभित है, जिनके हाथों में शंख, चक्र (अरि), अभीष्ट वरदान और अभय मुद्रा है, जिनके तीन नेत्र हैं, जो पीले वस्त्र (पीतवस्त्रां) धारण कर स्वर्ण कमल (हेमाब्जस्थां) पर प्रसन्न मुद्रा में विराजमान हैं, उन दिव्यरूपा देवी दुर्गा को मैं नमन करता हूँ। यह ध्यान देवी के वैष्णवी और शाक्त दोनों स्वरूपों का पूर्ण एकीकरण है।
नामों का तात्विक विस्तार: इस नामावली का आरंभ 'ॐ महिषमर्दिन्यै नमः' से और समापन 'ॐ वनदुर्गायै नमः' से होता है। इन 108 नामों में देवी को 'जगदात्मशक्त्यै' (जगत की आत्मा की शक्ति) और 'समूहमूर्त्यै' (सभी देवों की सम्मिलित ऊर्जा) कहा गया है। वेदों की सारांश रूप 'ऋज्यजुस्सामाथर्वरूपिण्यै' और 'अखिलशास्त्रसारायै' नामों से उन्हें समस्त ज्ञान का स्रोत बताया गया है। 'विरिञ्चिपूजितायै' (ब्रह्मा द्वारा पूजित), 'गोविन्दपूजितायै' (विष्णु द्वारा पूजित) और 'महेश्वरपूजितायै' (शिव द्वारा पूजित) नाम सिद्ध करते हैं कि वे ही वह परम आद्या शक्ति हैं जिनकी उपासना त्रिदेव भी करते हैं।

वनदुर्गा और महिषासुरमर्दिनी स्वरूप का विशिष्ट महत्व (Significance of the Forms)

यह नामावली देवी के जिन दो मुख्य स्वरूपों पर केंद्रित है, उनका आध्यात्मिक और सांसारिक दोनों दृष्टियों से अत्यधिक महत्व है।
  • महिषासुरमर्दिनी (Mahishasuramardini): महिषासुर अहंकार, अज्ञान और पशु-प्रवृत्ति (तमोगुण) का प्रतीक है। देवी का यह रूप 'महिषप्राणविमोचनायै' (महिषासुर के प्राण हरने वाली) और 'असुरक्षयकारिण्यै' है। जब जीवन में आसुरी प्रवृत्तियां या बाहरी शत्रु हावी होने लगते हैं, तब यह रूप एक रक्षक ढाल (भूमिरक्षिण्यै) बनकर सामने आता है।
  • वनदुर्गा (Vana Durga): वनदुर्गा प्रकृति, वनों और एकांत स्थानों की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे तंत्र की एक अत्यंत उग्र और जाग्रत शक्ति हैं। जो साधक एकांत में, प्रकृति के बीच या कठिन परिस्थितियों में फंसा हो, वनदुर्गा उसकी रक्षा करती हैं। 'कस्तूरीकुङ्कुमायै' और 'हरिचन्दनायै' जैसे नाम उनके प्राकृतिक और वानस्पतिक श्रृंगार को दर्शाते हैं।
  • विराट् स्वरूप (The Cosmic Form): 'सहस्रभुजायै' (हजारों भुजाओं वाली), 'सहस्राक्ष्यै' (हजारों नेत्रों वाली) और 'सहस्रपदायै' (हजारों चरणों वाली) नाम पुरुष सूक्त की याद दिलाते हैं, जो दर्शाता है कि देवी का स्वरूप विराट् है; इस ब्रह्मांड का कण-कण उनकी ही अभिव्यक्ति है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले सिद्ध लाभ (Benefits of Recitation)

'उत्तिष्ठ पुरुषि' मंत्र से सम्पुटित यह 108 नामों की नामावली असाधारण ऊर्जा उत्पन्न करती है। पूर्ण श्रद्धा और विधि के साथ इसका पाठ करने पर साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • तीव्र भय का समूल नाश: न्यास मंत्र (भयं मे समुपस्थितं... शमय स्वाहा) के प्रभाव से अज्ञात भय, मृत्यु का डर, फोबिया (Phobia) और घबराहट तत्काल दूर हो जाती है। साधक निर्भय (अतिवीरायै) हो जाता है।
  • शत्रु और तंत्र बाधा से मुक्ति: 'अशुभनाशिन्यै' और 'सद्योविनाशिकायै' (बुराइयों का तुरंत नाश करने वाली) नामों के स्मरण से शत्रुओं द्वारा किया गया कोई भी तांत्रिक अभिचार (Black Magic) या षड्यंत्र उसी क्षण विफल हो जाता है।
  • दारिद्र्य और दुखों का अंत: 'दारिद्र्यनाशिन्यै' और 'कल्पवृक्षायै' (मनोकामना पूर्ण करने वाला वृक्ष) नामों के नित्य जप से घर की घोर दरिद्रता दूर होती है और साधक को अखंड धन-संपत्ति (लक्ष्म्यै) की प्राप्ति होती है।
  • बुद्धि और विद्या की प्राप्ति: विद्यार्थियों और ज्ञान पिपासुओं के लिए 'बुद्धिरूपिण्यै' और 'मेधादेव्यै' नामों का उच्चारण कुशाग्र बुद्धि, तीक्ष्ण स्मरण शक्ति और शास्त्रों का ज्ञान (अखिलशास्त्रसारायै) प्रदान करता है।
  • आत्मिक शांति और मोक्ष: 'भवसागरतारिकायै' और 'भवसागरनाशिन्यै' नामों का पाठ साधक को सांसारिक माया-मोह के चक्र से निकालकर मोक्ष (सदानन्दस्वरूपिण्यै) की ओर ले जाता है।

पाठ विधि एवं विशेष अनुष्ठान (Ritual Method & Special Occasions)

इस नामावली की साधना अत्यंत उग्र और त्वरित फलदायी है, अतः इसे पूर्ण पवित्रता और सविधि करना आवश्यक है।
जाग्रत पाठ विधि (नित्य क्रम): प्रातःकाल या गोधूलि वेला में स्नान के पश्चात् पीले या लाल वस्त्र धारण करें। ध्यान श्लोक (पीतवस्त्रां) में देवी को पीले वस्त्रों में बताया गया है, अतः पीला आसन और पीले पुष्प सर्वोत्तम हैं। सर्वप्रथम जल से आचमन और संकल्प करें। फिर न्यास मंत्र 'ॐ उत्तिष्ठ पुरुषि...' का 11 बार या कम से कम 1 बार पूर्ण आर्त भाव (पुकार) से उच्चारण करें। इसके बाद ध्यान श्लोक पढ़ें और फिर 108 नामों का पाठ करते हुए प्रत्येक नाम पर एक पीला पुष्प (जैसे गेंदा, कनेर) या कुमकुम अर्पित करें।
नैवेद्य और श्रृंगार (Offerings): नामावली के श्लोकों (102 से 106) के अनुसार देवी को हरिचंदन (पीला चंदन), कस्तूरी, कुमकुम और अशोक के पुष्प या पत्ते अत्यंत प्रिय हैं। नैवेद्य में केसर युक्त खीर या पीले मिष्ठान्न का भोग लगाना चाहिए।
विशेष मुहूर्त (Auspicious Occasions): संकट काल में इसका पाठ कभी भी किया जा सकता है। परंतु विशेष सिद्धि के लिए नवरात्रि (चैत्र एवं शारदीय), गुप्त नवरात्रि, मंगलवार, शुक्रवार, और प्रति माह की अष्टमी तथा चतुर्दशी तिथियाँ इस वनदुर्गा महामन्त्र के अनुष्ठान के लिए श्रेष्ठ मानी गई हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. इस श्रीदेव्यष्टोत्तरशतनामावली के ऋषि कौन हैं?
इस दिव्य नामावली के द्रष्टा 'आरण्यक ऋषि' हैं। वनों (अरण्य) में तपस्या करने के कारण उनका नाम आरण्यक पड़ा और इसीलिए इस स्तोत्र का मुख्य देवता 'वनदुर्गा' हैं।
2. यह नामावली देवी के किस विशिष्ट स्वरूप को समर्पित है?
यह नामावली मुख्य रूप से माता के 'महिषासुरमर्दिनी' (महिषासुर का वध करने वाली) और 'वनदुर्गा' (प्रकृति और वनों की रक्षा करने वाली) स्वरूप को समर्पित है।
3. 'उत्तिष्ठ पुरुषि...' न्यास मंत्र का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है: "हे परम शक्ति! उठो, आप क्यों सो रही हैं? मुझ पर भारी संकट (भय) आ गया है। वह काम संभव हो या असंभव, हे भगवती! उस भय को शांत करो।" यह देवी की ऊर्जा को तत्काल जाग्रत करने का अचूक मंत्र है।
4. ध्यान श्लोक में देवी का स्वरूप कैसा बताया गया है?
ध्यान में देवी को स्वर्ण के समान आभा वाली, मस्तक पर अर्धचंद्र धारण किए हुए, तीन नेत्रों वाली, पीले वस्त्र पहने हुए और स्वर्ण कमल पर प्रसन्न मुद्रा में विराजमान बताया गया है। उनके हाथों में शंख, चक्र और अभय मुद्रा है।
5. देवी को 'वनदुर्गा' क्यों कहा जाता है?
वनदुर्गा प्रकृति, वनों, जीव-जंतुओं और दुर्गम स्थानों की अधिष्ठात्री शक्ति हैं। वे घने वनों और एकांत में तपस्या करने वाले योगियों की रक्षा करती हैं और तंत्र मार्ग की जाग्रत देवी हैं।
6. क्या इस नामावली से दरिद्रता दूर होती है?
जी हाँ, इसमें 'दारिद्र्यनाशिन्यै' (गरीबी मिटाने वाली), 'लक्ष्म्यै' और 'कल्पवृक्षायै' जैसे नाम हैं। इसके नित्य पाठ से आर्थिक संकट दूर होते हैं और घर में अखंड धन-धान्य का वास होता है।
7. 'सहस्रभुजायै, सहस्राक्ष्यै, सहस्रपदायै' नामों का क्या रहस्य है?
ये नाम देवी के 'विराट् स्वरूप' का वर्णन करते हैं। इसका अर्थ है कि इस ब्रह्मांड में जो भी हजारों हाथ, आंखें और पैर हैं, वे सब उसी एक परम शक्ति के हैं। वे सर्वव्यापी हैं।
8. नामावली के अनुसार देवी की पूजा किन देवताओं ने की है?
नाम 97 से 100 के अनुसार—विरिञ्चि (ब्रह्मा), गोविन्द (विष्णु), पुरन्दर (इन्द्र) और महेश्वर (शिव) ने देवी की पूजा की है। यह सिद्ध करता है कि वे त्रिदेवों की भी आदि जननी हैं।
9. पाठ करते समय देवी को कौन से पुष्प और पदार्थ अर्पित करने चाहिए?
श्लोकों के अनुसार हरिचंदन (पीला चंदन), कस्तूरी, कुमकुम, अशोक के पुष्प या पत्ते, और पीले रंग के फूल (जैसे गेंदा, कनेर) देवी को विशेष प्रिय हैं।
10. क्या अकारण भय या डिप्रेशन में इसका पाठ लाभ देता है?
अवश्य। इसका 'उत्तिष्ठ पुरुषि' मंत्र मुख्य रूप से भयों (Phobia, Anxiety, Depression) को नष्ट करने के लिए ही है। इसका नित्य उच्चारण मन को अभूतपूर्व शक्ति और शांति (आनन्दसन्दोहायै) प्रदान करता है।