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Sri Dattatreya Ashtottara Shatanamavali 4 – श्री दत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावली ४

Sri Dattatreya Ashtottara Shatanamavali 4 – श्री दत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावली ४
॥ श्री दत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावली ४ ॥ (धन्यवादः – डा ॥ सत्यवती मूर्ति) ॥ नामावली ॥ ओं दत्तात्रेयाय नमः । ओं दत्तदेवाय नमः । ओं दत्तमूर्तये नमः । ओं दक्षिणामूर्तये नमः । ओं दीनबन्धुवे नमः । ओं दुष्टशिक्षकाय नमः । ओं दण्डधारिणे नमः । ओं धर्मचरिताय नमः । ओं दिगम्बराय नमः । ९ ओं दीनरक्षकाय नमः । ओं धर्ममूर्तये नमः । ओं ब्रह्मरूपाय नमः । ओं त्रिमूर्तिरूपाय नमः । ओं त्रिगुणात्मकाय नमः । ओं अत्रिपुत्राय नमः । ओं अश्वत्थरूपाय नमः । ओं अप्रतिमाय नमः । ओं अनाथरक्षकाय नमः । १८ ओं अनसूया तनयाय नमः । ओं आदिमूर्तये नमः । ओं आदिमूलाय नमः । ओं आदिरूपाय नमः । ओं भक्तकल्याणदाय नमः । ओं बहुरूपाय नमः । ओं भक्तवरदाय नमः । ओं भक्तिप्रियाय नमः । ओं भक्तपराधीनाय नमः । २७ ओं भक्तरक्षकाय नमः । ओं भवभयदूरकृते नमः । ओं भक्तवत्सलाय नमः । ओं भक्तवन्दिताय नमः । ओं भवबन्धनमोचकाय नमः । ओं सिद्धाय नमः । ओं शिवरूपाय नमः । ओं शान्तरूपाय नमः । ओं सुगुणरूपाय नमः । ३६ ओं श्रीपादयतये नमः । ओं श्रीवल्लभाय नमः । ओं शिष्टरक्षणाय नमः । ओं शङ्कराय नमः । ओं कल्लेश्वराय नमः । ओं कविप्रियाय नमः । ओं कल्पितवरदाय नमः । ओं करुणासागराय नमः । ओं कल्पद्रुमाय नमः । ४५ ओं कीर्तनप्रियाय नमः । ओं कोटिसूर्यप्रकाशाय नमः । ओं जगद्वन्द्याय नमः । ओं जगद्रूपाय नमः । ओं जगदीशाय नमः । ओं जगद्गुरवे नमः । ओं जगत्पतये नमः । ओं जगदात्मने नमः । ओं गानलोलुपाय नमः । ५४ ओं गानप्रियाय नमः । ओं गुणरूपाय नमः । ओं गन्धर्वपुरवासाय नमः । ओं गुरुनाथाय नमः । ओं पावनरूपाय नमः । ओं परमाय नमः । ओं पतितोद्धाराय नमः । ओं परमात्मने नमः । ओं विद्यानिधये नमः । ६३ ओं वरप्रदाय नमः । ओं वटुरूपाय नमः । ओं विश्वरूपाय नमः । ओं विश्वसाक्षिणे नमः । ओं विश्वमूर्तये नमः । ओं वेदमूर्तये नमः । ओं वेदात्मने नमः । ओं विष्णवे नमः । ओं मोहवर्जिताय नमः । ७२ ओं शरणागतरक्षकाय नमः । ओं यतिवर्याय नमः । ओं यतिवन्दिताय नमः । ओं निरुपमाय नमः । ओं नारायणाय नमः । ओं नरसिंह सरस्वतये नमः । ओं नरकेसरिणे नमः । ओं रुद्ररूपाय नमः । ओं मङ्गलात्मने नमः । ८१ ओं मङ्गलकराय नमः । ओं मङ्गलाय नमः । ओं परब्रह्मणे नमः । ओं परमेश्वराय नमः । ओं ओङ्कार रूपाय नमः । ओं इष्टार्थदायकाय नमः । ओं इष्टकृते नमः । ओं भीमातीरनिवासिने नमः । ओं शिष्यप्रियाय नमः । ९० ओं दत्ताय नमः । ओं दत्तनाथाय नमः । ओं औदुम्बरप्रियाय नमः । ओं यतिराजाय नमः । ओं सकलदोषनिवारकाय नमः । ओं सकलकलावल्लभाय नमः । ओं सर्वेश्वराय नमः । ओं बन्धविमोचकाय नमः । ओं पशुपतये नमः । ९९ ओं आदिमध्यान्तरूपाय नमः । ओं सृष्टिस्थितिलयकारिणे नमः । ओं दत्तगुरवे नमः । ओं भक्तजनमनोवल्लभाय नमः । ओं मुक्तिप्रदाय नमः । ओं जिष्णवे नमः । ओं ईश्वराय नमः । ओं जनार्दनाय नमः । ओं सद्गुरुमूर्तये नमः । १०८ ॥ इति श्रीदत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावलीः ४ सम्पूर्णा ॥

परिचय: श्री दत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावली ४ की महिमा एवं पृष्ठभूमि

श्री दत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावली ४ (Sri Dattatreya Ashtottara Shatanamavali 4) गुरु तत्व के परम अनुग्रह का एक दिव्य संग्रह है। भगवान दत्तात्रेय, जिन्हें "त्रिदेव" (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का एकीकृत अवतार माना जाता है, अत्रि मुनि और माता अनसूया के पुत्र के रूप में प्रकट हुए। इस नामावली की विशिष्टता यह है कि यह साधक को भगवान दत्त के उन विभिन्न रूपों से परिचित कराती है जो समय-समय पर पृथ्वी पर धर्म की रक्षा और भक्तों के कल्याण के लिए अवतरित हुए। यह विशेष पाठ विद्वान डा. सत्यवती मूर्ति के योगदान से संग्रहित किया गया है, जो इसकी प्रामाणिकता और भक्ति रस को और भी प्रगाढ़ बनाता है।
दत्तात्रेय सम्प्रदाय में नामावली का अर्थ केवल नाम जपना नहीं, बल्कि उन दिव्य गुणों को अपने भीतर समाहित करना है। १०८ की संख्या हिंदू धर्म में पूर्णता और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक है। जब हम "ओं दत्तात्रेयाय नमः" से प्रारंभ कर "ओं सद्गुरुमूर्तये नमः" तक पहुँचते हैं, तो हम अनजाने में ही अपनी कुंडलिनी ऊर्जा को मूलाधार से सहस्रार तक ले जाने का एक सूक्ष्म मानसिक प्रयास करते हैं। भगवान दत्तात्रेय 'आदि गुरु' हैं, जिन्होंने प्रकृति के २४ गुरुओं से शिक्षा प्राप्त कर संसार को यह संदेश दिया कि सीखने की दृष्टि हो तो सारा संसार एक पाठशाला है।
इस नामावली में भगवान के ऐतिहासिक अवतारों जैसे श्रीपाद श्रीवल्लभ (पीठापुर) और श्री नृसिंह सरस्वती (गाणगापुर) का भी उल्लेख मिलता है। ये अवतार कलियुग के मनुष्यों के लिए जाग्रत देव माने जाते हैं। इस पाठ के माध्यम से साधक न केवल आध्यात्मिक शांति प्राप्त करता है, बल्कि संसार के त्रिविध तापों (दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट) से भी मुक्ति पाता है।

विशिष्ट महत्व: गुरु तत्व और अद्वैत बोध

दत्तात्रेय नामावली का पाठ अन्य देवताओं की तुलना में अधिक प्रभावशाली इसलिए माना जाता है क्योंकि दत्तात्रेय साक्षात 'स्मर्तृगामी' हैं। स्मर्तृगामी का अर्थ है— मात्र स्मरण करने से ही जो पास आ जाए। इस नामावली के चतुर्थ संस्करण में ऐसे नामों का समावेश है जो प्रभु के 'करुणासागर' और 'भक्तवत्सल' स्वरूप को उजागर करते हैं।
  • ब्रह्मरूप एवं त्रिमूर्ति: यह नाम साधक को यह बोध कराते हैं कि सृष्टि का सृजन, पालन और लय एक ही परम सत्ता के हाथ में है।
  • दिगम्बर: इसका अर्थ है— आकाश ही जिनका वस्त्र है। यह उनकी पूर्ण निर्लिप्तता और सर्वव्यापकता का प्रतीक है।
  • भीमातीरनिवासिनी एवं गन्धर्वपुरवासा: ये नाम उन सिद्ध क्षेत्रों की ओर संकेत करते हैं (जैसे गाणगापुर), जहाँ आज भी दत्त गुरु अदृश्य रूप में वास करते हैं।
  • विद्यानिधि: वे समस्त विद्याओं के सागर हैं। छात्रों और ज्ञानार्थियों के लिए यह नाम विशेष फलदायी है।
आध्यात्मिक दृष्टि से, यह नामावली साधक के 'अहंकार' को मिटाकर उसे 'योग' की ओर ले जाती है। भगवान को 'योगीश्वर' और 'सिद्धराज' कहा गया है, जो यह सिद्ध करता है कि वे ही योग मार्ग के अंतिम गंतव्य हैं।

अष्टोत्तरशतनामावली पाठ के फलश्रुति लाभ (Benefits)

दत्त सम्प्रदाय की प्राचीन परंपरा के अनुसार, इन १०८ दिव्य नामों के नित्य पाठ से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • मानसिक शांति और अज्ञान नाश: "ओं मोहवर्जिताय नमः" — यह पाठ अविद्या के परदे को हटाकर चित्त को शांत और बुद्धि को प्रखर बनाता है।
  • पितृ दोष शांति: भगवान दत्तात्रेय पितरों के अधिपति हैं, अतः इन नामों के जाप से पूर्वजों को सद्गति मिलती है और परिवार पर उनकी कृपा बरसती है।
  • सर्व बाधा मुक्ति: भगवान दत्त "भवभयदूरकृते" हैं। इस नामावली का पाठ अज्ञात भय, तनाव और नकारात्मक ऊर्जाओं को जड़ से मिटा देता है।
  • आरोग्य और ऐश्वर्य: "ओं अष्टैश्वर्यप्रदाय नमः" — यह पाठ न केवल आत्मिक सुख देता है, बल्कि भौतिक अभावों को दूर कर जीवन में समृद्धि लाता है।
  • सद्गुरु की प्राप्ति: जो साधक मार्गभ्रष्ट हैं, उन्हें इस पाठ से शीघ्र ही एक सच्चे गुरु का मार्गदर्शन और सानिध्य प्राप्त होता है।
  • पाप क्षय: भगवान के पवित्र नामों का उच्चारण संचित कर्मों के बोझ को कम करता है और अंतःकरण को निर्मल बनाता है।

पाठ विधि एवं विशेष साधना निर्देश (Ritual Method)

दत्तात्रेय साधना में सात्विकता और शुद्धता का सर्वोच्च स्थान है। १०८ नामों की इस नामावली का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाना श्रेष्ठ है।

साधना के नियम

  • शुभ समय: गुरुवार (Thursday) गुरु का प्रिय दिन है। इसके अतिरिक्त मार्गशीर्ष पूर्णिमा (दत्त जयंती), पूर्णिमा और एकादशी पर पाठ करना अनंत फलदायी है।
  • ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः ४:०० से ६:०० के बीच पाठ करना सर्वोत्तम है। सायंकाल संध्या के समय भी पाठ किया जा सकता है।
  • आसन और दिशा: कुशा या ऊनी आसन का प्रयोग करें। मुख उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर होना चाहिए।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। भस्म (विभूति) का तिलक लगाना दत्त साधना में अनिवार्य माना जाता है।
  • दीप और नैवेद्य: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। भगवान दत्त को गुड़, चने की दाल या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं।

विशेष अनुष्ठान (Sadhana)

यदि आप किसी विशेष संकट के निवारण या पितृ दोष की शांति के लिए पाठ कर रहे हैं, तो संकल्प लेकर लगातार २१ गुरुवार तक इस नामावली का पाठ करें। पाठ के अंत में 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' महामंत्र का १०८ बार जाप अवश्य करें। इससे नामावली की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10+ Questions)

1. श्री दत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावली ४ का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इसका मुख्य उद्देश्य भगवान दत्तात्रेय के दिव्य स्वरूप का स्मरण कर मानसिक शांति, गुरु कृपा की प्राप्ति और जीवन की बाधाओं का निवारण करना है।

2. भगवान दत्तात्रेय को 'त्रिमूर्ति' क्यों कहा जाता है?

क्योंकि उनमें ब्रह्मा (सृजन), विष्णु (पालन) और महेश (लय) तीनों की शक्तियाँ एकाकार हैं। वे स्वयं परमात्मा का एकीकृत स्वरूप हैं।

3. क्या इस नामावली के पाठ से पितृ दोष सच में दूर होता है?

जी हाँ। दत्त संप्रदाय में ऐसी प्रबल मान्यता है कि भगवान दत्तात्रेय पितरों के अधिपति हैं। १०८ नामों का नित्य पाठ पूर्वजों को शांति प्रदान करता है और परिवार पर उनकी कृपा लाता है।

4. 'अवधूत' शब्द का अर्थ क्या है?

अवधूत का अर्थ है वह जो संसार की धूल को 'धो' चुका है। जो सुख-दुख, मान-अपमान और देह-बोध से ऊपर उठकर परमानंद में स्थित है।

5. क्या स्त्रियाँ इस नामावली का पाठ कर सकती हैं?

अवश्य। भगवान दत्तात्रेय की भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। माता अनसूया के पुत्र होने के कारण, प्रभु स्त्रियों पर विशेष वात्सल्य रखते हैं। शुद्ध चित्त से कोई भी श्रद्धालु इसका पाठ कर सकता है।

6. पाठ के लिए सबसे उत्तम माला कौन सी है?

दत्तात्रेय साधना के लिए रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम मानी गई है। यदि माला न हो, तो भी श्रद्धापूर्वक पाठ स्वीकार्य है।

7. 'स्मर्तृगामी' का क्या तात्पर्य है?

'स्मर्तृगामी' का अर्थ है— "स्मरण करते ही पहुँचने वाले"। यह भगवान दत्त की वह कृपा है जिसमें वे किसी कठिन योग के बिना मात्र याद करने से ही भक्त की सहायता करते हैं।

8. भगवान दत्त के साथ चार कुत्ते क्या दर्शाते हैं?

वे चार कुत्ते ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के प्रतीक हैं, जो यह बताते हैं कि संपूर्ण ज्ञान प्रभु के चरणों में सुरक्षित है।

9. क्या इस पाठ से नौकरी या व्यापार में लाभ मिलता है?

जी हाँ, क्योंकि यह नामावली 'इष्टार्थदायकाय' (इच्छित अर्थ देने वाली) है। गुरु की प्रसन्नता से जातक के बुद्धि दोष दूर होते हैं और निर्णय क्षमता बढ़ती है।

10. पाठ के दौरान किस खाद्य पदार्थ का दान करना शुभ है?

पाठ के पश्चात गाय को भोजन कराना या कुत्तों को रोटी देना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि ये दत्तात्रेय भगवान के साथ सदैव उपस्थित रहते हैं।