Sri Damodara Ashtottara Shatanamavali – श्री दामोदर अष्टोत्तरशतनामावलिः

॥ श्री दामोदर अष्टोत्तरशतनामावलिः ॥
॥ नामावलिः ॥
ॐ विष्णवे नमः ।
ॐ लक्ष्मीपतये नमः ।
ॐ कृष्णाय नमः ।
ॐ वैकुण्ठाय नमः ।
ॐ गरुडध्वजाय नमः ।
ॐ परब्रह्मणे नमः ।
ॐ जगन्नाथाय नमः ।
ॐ वासुदेवाय नमः ।
ॐ त्रिविक्रमाय नमः ।
ॐ हंसाय नमः ॥ १० ॥
ॐ शुभप्रदाय नमः ।
ॐ माधवाय नमः ।
ॐ पद्मनाभाय नमः ।
ॐ हृषीकेशाय नमः ।
ॐ सनातनाय नमः ।
ॐ नारायणाय नमः ।
ॐ मधुरापतये नमः ।
ॐ तार्क्ष्यवाहनाय नमः ।
ॐ दैत्यान्तकाय नमः ।
ॐ शिम्शुमाराय नमः ॥ २० ॥
ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः ।
ॐ स्थितिकर्त्रे नमः ।
ॐ परात्पराय नमः ।
ॐ वनमालिने नमः ।
ॐ यज्ञरूपाय नमः ।
ॐ चक्ररूपाय नमः ।
ॐ गदाधाराय नमः ।
ॐ केशवाय नमः ।
ॐ माधवाय नमः ।
ॐ भूतवासाय नमः ॥ ३० ॥
ॐ समुद्रमथनाय नमः ।
ॐ हरये नमः ।
ॐ गोविन्दाय नमः ।
ॐ ब्रह्मजनकाय नमः ।
ॐ कैटभासुरमर्दनाय नमः ।
ॐ श्रीकराय नमः ।
ॐ कामजनकाय नमः ।
ॐ शेषशायिने नमः ।
ॐ चतुर्भुजाय नमः ।
ॐ पाञ्चजन्यधराय नमः ॥ ४० ॥
ॐ श्रीमते नमः ।
ॐ शार्ङ्गपाणये नमः ।
ॐ जनार्दनाय नमः ।
ॐ पीताम्बरधराय नमः ।
ॐ देवाय नमः ।
ॐ सूर्यचन्द्रलोचनाय नमः ।
ॐ मत्स्यरूपाय नमः ।
ॐ कूर्मतनवे नमः ।
ॐ क्रोडरूपाय नमः ।
ॐ हृषीकेशाय नमः ॥ ५० ॥
ॐ वामनाय नमः ।
ॐ भार्गवाय नमः ।
ॐ रामाय नमः ।
ॐ हलिने नमः ।
ॐ कल्किने नमः ।
ॐ हयाननाय नमः ।
ॐ विश्वंभराय नमः ।
ॐ आदिदेवाय नमः ।
ॐ श्रीधराय नमः ।
ॐ कपिलाय नमः ॥ ६० ॥
ॐ धृवाय नमः ।
ॐ दत्तात्रेयाय नमः ।
ॐ अच्युताय नमः ।
ॐ अनन्ताय नमः ।
ॐ मुकुन्दाय नमः ।
ॐ रथवाहनाय नमः ।
ॐ धन्वन्तरये नमः ।
ॐ श्रीनिवासाय नमः ।
ॐ प्रद्युम्नाय नमः ।
ॐ पुरुषोत्तमाय नमः ॥ ७० ॥
ॐ श्रीवत्सकौस्तुभधराय नमः ।
ॐ मुरारातये नमः ।
ॐ अधोक्षजाय नमः ।
ॐ ऋषभाय नमः ।
ॐ मोहिनीरूपधराय नमः ।
ॐ सङ्कर्षणाय नमः ।
ॐ पृधवे नमः ।
ॐ क्षीराब्दिशायिने नमः ।
ॐ भूतात्मने नमः ।
ॐ अनिरुद्धाय नमः ॥ ८० ॥
ॐ भक्तवत्सलाय नमः ।
ॐ नारायणाय नमः ।
ॐ गजेन्द्रवरदाय नमः ।
ॐ त्रिधाम्ने नमः ।
ॐ प्रह्लाद परिपालनाय नमः ।
ॐ श्वेतद्वीपवासिने नमः ।
ॐ अव्ययाय नमः ।
ॐ सूर्यमण्डलमध्यगाय नमः ।
ॐ आदिमध्यान्तरहिताय नमः ।
ॐ भगवते नमः ॥ ९० ॥
ॐ शङ्करप्रियाय नमः ।
ॐ नीलतनवे नमः ।
ॐ धराकान्ताय नमः ।
ॐ वेदात्मने नमः ।
ॐ बादरायणाय नमः ।
ॐ भागीरथीजन्मभूपादपद्माय नमः ।
ॐ सताम्प्रभवे नमः ।
ॐ प्राशंवे नमः ।
ॐ विभवे नमः ।
ॐ घनश्यामाय नमः ॥ १०० ॥
ॐ जगत्कारणाय नमः ।
ॐ प्रियाय नमः ।
ॐ दशावताराय नमः ।
ॐ शान्तात्मने नमः ।
ॐ लीलामानुषविग्रहाय नमः ।
ॐ दामोदराय नमः ।
ॐ विराड्रूपाय नमः ।
ॐ भूतभव्यभवत्प्रभवे नमः ॥ १०८ ॥
॥ इति श्री दामोदर अष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णा ॥
श्री दामोदर अष्टोत्तरशतनामावलिः: प्रेम और पाश का दिव्य रहस्य (Introduction - 600+ Words)
श्री दामोदर अष्टोत्तरशतनामावलिः (Sri Damodara Ashtottara Shatanamavali) भगवान श्री कृष्ण के उन पावन १०८ नामों का संकलन है, जो उनकी बाल-लीलाओं और 'भक्त-वत्सलता' के सर्वोच्च शिखर को परिभाषित करते हैं। 'दामोदर' शब्द स्वयं में एक गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ समेटे हुए है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार, 'दाम' का अर्थ है 'रस्सी' और 'उदर' का अर्थ है 'पेट'। यह नाम उस अद्भुत लीला का जीवंत स्मारक है, जब माता यशोदा ने नटखट बाल-कृष्ण को ओखली से बांधने का प्रयास किया था। यह नामावली उस परमात्मा की स्तुति है जो असीम और अनंत होकर भी अपने भक्त के प्रेम की छोटी सी रस्सी से बंधने को सहर्ष स्वीकार कर लेता है।
सनातन धर्म के महान ग्रंथों, विशेष रूप से श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के ९वें अध्याय में दामोदर लीला का विस्तार से वर्णन मिलता है। यह लीला केवल एक बालक की शरारत नहीं, बल्कि ज्ञान और भक्ति के बीच के संवाद का प्रतीक है। जब माता यशोदा कृष्ण को बांधने के लिए रस्सी लाती थीं, तो वह हमेशा 'दो अंगुल' छोटी पड़ जाती थी। यह दो अंगुल का फासला वास्तव में जीव का 'प्रयास' और ईश्वर की 'कृपा' का प्रतिनिधित्व करता है। जब तक जीव केवल अपने अहंकार से ईश्वर को पाना चाहता है, वह अधूरा रहता है, लेकिन जैसे ही वह पूर्ण समर्पण करता है, भगवान 'दामोदर' बनकर उसके हृदय के पाश में बंध जाते हैं। १०८ नामों का यह पाठ साधक को इसी सत्य का बोध कराता है।
ऐतिहासिक और सांप्रदायिक दृष्टि से, गौड़ीय वैष्णव परंपरा में 'दामोदर मास' (कार्तिक) के दौरान इस नामावली का महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। इस मास को भगवान कृष्ण का सबसे प्रिय महीना माना गया है। इस नामावली में भगवान के केवल बाल-स्वरूप का ही वर्णन नहीं है, बल्कि इसमें उनके दशावतारों—जैसे मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन—का भी समावेश है। यह हमें सिखाता है कि जो नन्हा बालक ओखली से बंधा है, वही संपूर्ण सृष्टि का सृजनहार, पालनहार और संहारक भी है। "ओं विराड्रूपाय नमः" और "ओं जगत्कारणाय नमः" जैसे नाम भगवान की उसी विराट सत्ता को प्रमाणित करते हैं।
इस नामावली के प्रत्येक नाम के साथ 'ॐ' का सम्पुट और 'नमः' का समर्पण भक्त की श्रद्धा को भगवान के चरणों में अर्पित करता है। यह नामावली अज्ञान के उस अंधकार को मिटाती है जो जीव को भगवान से दूर रखता है। 'दामोदर' के नाम का जप करना वास्तव में अपने अंतःकरण की अशुद्धियों को 'प्रेम' की अग्नि में भस्म करना है। आधुनिक युग के तनावपूर्ण वातावरण में, जहाँ शांति एक दुर्लभ वस्तु बन गई है, श्री दामोदर के इन १०८ नामों का गुंजन मस्तिष्क की तरंगों को शांत कर उसे दिव्यता की ओर मोड़ देता है। यह पाठ न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि आत्मा का परमात्मा से मिलन का एक सुगम और मधुर मार्ग है। जो भक्त पूर्ण श्रद्धा के साथ इन नामों का पाठ करता है, वह श्री कृष्ण की उस अनन्य भक्ति को प्राप्त करता है जिसे बड़े-बड़े योगी भी प्राप्त करने के लिए तरसते हैं।
विशिष्ट महत्व: दामोदर स्वरूप और कार्तिक मास (Significance)
भगवान श्री कृष्ण के दामोदर स्वरूप की उपासना का विशिष्ट महत्व 'भक्ति योग' की स्थापना में है। यह स्वरूप सिद्ध करता है कि ईश्वर 'ज्ञान' से नहीं, अपितु 'प्रेम' से जीते जाते हैं।
कार्तिक मास (दामोदर मास): शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक मास में किया गया कोई भी पुण्य कार्य अक्षय फल प्रदान करता है। इस महीने में श्री दामोदर अष्टोत्तरशतनामावलिः का पाठ "दीप-दान" के साथ करने से पितरों को गति मिलती है और साधक को वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है। यह पाठ उन दो यमलार्जुन वृक्षों (नलाकूबर और मणिग्रीव) की मुक्ति का भी स्मरण कराता है, जिन्हें भगवान ने दामोदर रूप में ही शापमुक्त किया था।
नामावली पाठ के दिव्य लाभ — फलश्रुति (Benefits)
पद्म पुराण और वैष्णव आचार्यों के अनुसार, श्री दामोदर के १०८ नामों के नित्य पाठ से निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- पाप क्षय: अनजाने में हुए कायिक, वाचिक और मानसिक पापों का यह नामावली तत्काल शमन करती है।
- मानसिक स्थिरता: 'कृष्ण' और 'दामोदर' नामों का कंपन मन की चंचलता को दूर कर शांति प्रदान करता है।
- शत्रु और बाधा शांति: "ओं मुरारातये नमः" और "ओं दैत्यान्तकाय नमः" जैसे नामों का प्रभाव नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है।
- भगवद-प्रेम की प्राप्ति: यह पाठ साधक के हृदय में भगवान के प्रति अनन्य प्रेम और अनुराग उत्पन्न करता है।
- आर्थिक और पारिवारिक सुख: लक्ष्मीपति विष्णु के नाम होने के कारण घर में समृद्धि और कलह-मुक्ति होती है।
- अक्षय पुण्य: विशेष रूप से कार्तिक मास में पाठ करने से कोटि-यज्ञों के समान फल मिलता है।
पाठ विधि एवं कार्तिक मास के विशेष नियम (Ritual Method)
भगवान दामोदर की उपासना अत्यंत सरल और भावपूर्ण है। श्रेष्ठ फल प्राप्ति हेतु निम्नलिखित विधि अपनाएं:
- समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या संध्या के समय (सूर्यास्त के समय) पाठ करना सर्वोत्तम है।
- दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- दीप-दान: भगवान श्री कृष्ण के चित्र के सम्मुख गाय के घी का एक दीपक अवश्य प्रज्वलित करें।
- पूजन सामग्री: यदि संभव हो, तो प्रत्येक 'नमः' के साथ भगवान को तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) अर्पित करें।
- आहार: पाठ के दिनों में सात्विक आहार (बिना लहसुन-प्याज का भोजन) ग्रहण करें।
- एकाग्रता: प्रत्येक नाम का उच्चारण करते समय भगवान की ओखली से बंधी उस मनोहारी छवि का ध्यान करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'दामोदर' नाम का शाब्दिक अर्थ क्या है?
'दाम' का अर्थ है रस्सी और 'उदर' का अर्थ है पेट। जिसका पेट रस्सी से बांधा गया हो, वह दामोदर है। यह श्री कृष्ण के बाल स्वरूप का एक प्रमुख नाम है।
2. इस नामावली का पाठ किस महीने में विशेष फलदायी है?
वैसे तो इसका पाठ कभी भी किया जा सकता है, लेकिन कार्तिक मास (अक्टूबर-नवंबर) में इसका महत्व अनंत गुना बढ़ जाता है, क्योंकि इस मास के अधिपति स्वयं भगवान दामोदर हैं।
3. क्या इस पाठ के लिए किसी विशेष माला की आवश्यकता है?
भगवान विष्णु और कृष्ण के नामों के जप के लिए तुलसी की माला सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। यदि माला उपलब्ध न हो, तो केवल भावपूर्वक पाठ भी पर्याप्त है।
4. क्या स्त्रियाँ और बच्चे भी दामोदर नामावली का पाठ कर सकते हैं?
जी हाँ, भगवान की भक्ति में लिंग या आयु का कोई बंधन नहीं है। शुद्ध मन से कोई भी भक्त इस नामावली का आश्रय ले सकता है।
5. दामोदर लीला में 'दो अंगुल' रस्सी कम पड़ने का क्या संदेश है?
यह संकेत देता है कि भक्त का कितना भी पुरुषार्थ (प्रयास) क्यों न हो, वह तब तक सफल नहीं होता जब तक उसमें ईश्वर की 'कृपा' और 'भक्ति' का समावेश न हो।
6. क्या इस पाठ से व्यापार या नौकरी में सफलता मिलती है?
हाँ, "ओं लक्ष्मीपतये नमः" और "ओं श्रीकराय नमः" जैसे नामों के प्रभाव से साधक के जीवन में ऐश्वर्य और स्थिरता आती है।
7. पाठ के दौरान किस फल का भोग लगाना चाहिए?
भगवान दामोदर को मक्खन, मिश्री, खीर और ऋतुफल प्रिय हैं। आप अपनी श्रद्धा के अनुसार सात्विक भोग लगा सकते हैं।
8. क्या इस नामावली में दशावतार के नाम भी हैं?
हाँ, श्लोक ४७ से ५६ के बीच मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, और कल्कि अवतारों के नामों का स्पष्ट उल्लेख है।
9. क्या बिना संस्कृत जाने केवल हिंदी अर्थ पढ़ना लाभदायक है?
निश्चित रूप से। भगवान भावग्राही हैं। यदि आप नामों का अर्थ समझकर हिंदी में भी उनका स्मरण करते हैं, तो भी आपको पूर्ण आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होगा।
10. 'शिम्शुमार' नाम का आध्यात्मिक रहस्य क्या है?
'शिम्शुमार' भगवान के उस ज्योतिषीय स्वरूप को कहते हैं जिसमें समस्त ब्रह्मांड, नक्षत्र और ग्रह स्थित हैं। यह नाम भगवान की सर्वव्यापकता को दर्शाता है।