Sri Dakshinamurthy Mantrarna Ashtottara Shatanamavali – श्री दक्षिणामूर्ति मन्त्रार्णाष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्री दक्षिणामूर्ति मन्त्रार्णाष्टोत्तरशतनामावली ॥
ॐ ॐकाराचलसिंहेन्द्राय नमः ।
ॐ ॐकारोद्यानकोकिलाय नमः ।
ॐ ॐकारनीडशुकराजे नमः ।
ॐ ॐकारारण्यकुञ्जराय नमः ।
ॐ नगराजसुताजानये नमः ।
ॐ नगराजनिजालयाय नमः ।
ॐ नवमाणिक्यमालाढ्याय नमः ।
ॐ नवचन्द्रशिखामणये नमः ।
ॐ नन्दिताशेषमौनीन्द्राय नमः । ९
ॐ नन्दीशादिमदेशिकाय नमः ।
ॐ मोहानलसुधाधाराय नमः ।
ॐ मोहाम्बुजसुधाकराय नमः ।
ॐ मोहान्धकारतरणये नमः ।
ॐ मोहोत्पलनभोमणये नमः ।
ॐ भक्तज्ञानाब्धिशीतांशवे नमः ।
ॐ भक्ताज्ञानतृणानलाय नमः ।
ॐ भक्ताम्भोजसहस्रांशवे नमः ।
ॐ भक्तकेकिघनाघनाय नमः । १८
ॐ भक्तकैरवराकेन्दवे नमः ।
ॐ भक्तकोकदिवाकराय नमः ।
ॐ गजाननादिसम्पूज्याय नमः ।
ॐ गजचर्मोज्ज्वलाकृतये नमः ।
ॐ गङ्गाधवलदिव्याङ्गाय नमः ।
ॐ गङ्गाभङ्गलसज्जटाय नमः ।
ॐ गगनाम्बरसंवीताय नमः ।
ॐ गगनामुक्तमूर्धजाय नमः ।
ॐ वदनाब्जजितश्रिये नमः । २७
ॐ वदनेन्दुस्फुरद्दिशाय नमः ।
ॐ वरदानैकनिपुणाय नमः ।
ॐ वरवीणोज्ज्वलत्कराय नमः ।
ॐ वनवाससमुल्लासिने नमः ।
ॐ वनलीलैकलोलुपाय नमः ।
ॐ तेजःपुञ्जघनाकाराय नमः ।
ॐ तेजसामविभासकाय नमः ।
ॐ विधेयानां तेजःप्रदाय नमः ।
ॐ तेजोमयनिजाश्रमाय नमः । ३६
ॐ दमितानङ्गसङ्ग्रामाय नमः ।
ॐ दरहासोज्ज्वलन्मुखाय नमः ।
ॐ दयारससुधासिन्धवे नमः ।
ॐ दरिद्रधनशेवधये नमः ।
ॐ क्षीरेन्दुस्फटिकाकाराय नमः ।
ॐ क्षितीन्द्रमकुटोज्ज्वलाय नमः ।
ॐ क्षीरोपहाररसिकाय नमः ।
ॐ क्षिप्रैश्वर्यफलप्रदाय नमः ।
ॐ नानाभरणमुक्ताङ्गाय नमः । ४५
ॐ नारीसम्मोहनाकृतये नमः ।
ॐ नादब्रह्मरसास्वादिने नमः ।
ॐ नागभूषणभूषिताय नमः ।
ॐ मूर्तिनिन्दितकन्दर्पाय नमः ।
ॐ मूर्तामूर्तजगद्वपुषे नमः ।
ॐ मूकाज्ञानतमोभानवे नमः ।
ॐ मूर्तिमत्कल्पपादपाय नमः ।
ॐ तरुणादित्यसङ्काशाय नमः ।
ॐ तन्त्रीवादनतत्पराय नमः । ५४
ॐ तरुमूलैकनिलयाय नमः ।
ॐ तप्तजाम्बूनदप्रभाय नमः ।
ॐ तत्त्वपुस्तोल्लसत्पाणये नमः ।
ॐ तपनोडुपलोचनाय नमः ।
ॐ यमसन्नुतसत्कीर्तये नमः ।
ॐ ययमसम्यमसम्युताय नमः ।
ॐ यतिरूपधराय नमः ।
ॐ मौनमुनीन्द्रोपास्यविग्रहाय नमः ।
ॐ मन्दारहाररुचिराय नमः । ६३
ॐ मदनायुतसुन्दराय नमः ।
ॐ मन्दस्मितलसद्वक्त्राय नमः ।
ॐ मधुराधरपल्लवाय नमः ।
ॐ मञ्जूरमञ्जुपादाब्जाय नमः ।
ॐ मणिपट्टोलसत्कटये नमः ।
ॐ हस्ताङ्कुरितचिन्मुद्राय नमः ।
ॐ हंसयोगपटूत्तमाय नमः ।
ॐ हंसजप्याक्षमालाढ्याय नमः ।
ॐ हंसेन्द्राराध्यपादुकाय नमः । ७२
ॐ मेरुशृङ्गसमुल्लासिने नमः ।
ॐ मेघश्याममनोहराय नमः ।
ॐ मेघाङ्कुरालवालाग्र्याय नमः ।
ॐ मेधापक्वफलद्रुमाय नमः ।
ॐ धार्मिकान्तकृतावासाय नमः ।
ॐ धर्ममार्गप्रवर्तकाय नमः ।
ॐ धामत्रयनिजारामाय नमः ।
ॐ धरोत्तममहारथाय नमः ।
ॐ प्रबोधोदारदीपश्रिये नमः । ८१
ॐ प्रकाशितजगत्त्रयाय नमः ।
ॐ प्रज्ञाचन्द्रशिलाचन्द्राय नमः ।
ॐ प्रज्ञामणिलसत्कराय नमः ।
ॐ ज्ञानिहृद्भासमानात्मने नमः ।
ॐ ज्ञातॄणामविदूरगाय नमः ।
ॐ ज्ञानायादृतदिव्याङ्गाय नमः ।
ॐ ज्ञातिजातिकुलातिगाय नमः ।
ॐ प्रपन्नपारिजाताग्र्याय नमः ।
ॐ प्रणतार्त्यब्धिबाडबाय नमः । ९०
ॐ भूतानां प्रमाणभूताय नमः ।
ॐ प्रपञ्चहितकारकाय नमः ।
ॐ यमिसत्तमसंसेव्याय नमः ।
ॐ यक्षगेयात्मवैभवाय नमः ।
ॐ यज्ञाधिदेवतामूर्तये नमः ।
ॐ यजमानवपुर्धराय नमः ।
ॐ छत्राधिपदिगीशाय नमः ।
ॐ छत्रचामरसेविताय नमः ।
ॐ छन्दः शास्त्रादिनिपुणाय नमः । ९९
ॐ छलजात्यादिदूरगाय नमः ।
ॐ स्वाभाविकसुखैकात्मने नमः ।
ॐ स्वानुभूतिरसोदधये नमः ।
ॐ स्वाराज्यसम्पदध्यक्षाय नमः ।
ॐ स्वात्माराममहामतये नमः ।
ॐ हाटकाभजटाजूटाय नमः ।
ॐ हासोदस्तारिमण्डलाय नमः ।
ॐ हालाहलोज्ज्वलगलाय नमः ।
ॐ हारायितभुजङ्गमाय नमः । १०८
॥ इति श्री दक्षिणामूर्ति मन्त्रार्णाष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णा ॥
परिचय: श्री दक्षिणामूर्ति मन्त्रार्णाष्टोत्तरशतनामावली का रहस्य (600 Words)
श्री दक्षिणामूर्ति मन्त्रार्णाष्टोत्तरशतनामावली (Sri Dakshinamurthy Mantrarna Ashtottara Shatanamavali) सनातन धर्म के महान तांत्रिक और वैदिक ज्ञान का एक अद्भुत संगम है। भगवान शिव का 'दक्षिणामूर्ति' स्वरूप समस्त विद्याओं, कलाओं, योग और परम सत्य के आदि-गुरु के रूप में प्रतिष्ठित है। "मन्त्रार्ण" शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— 'मन्त्र' और 'अर्ण' (अक्षर)। यह नामावली भगवान दक्षिणामूर्ति के उन विशिष्ट मन्त्रों के अक्षरों की शक्ति पर आधारित है जो साधक के भीतर प्रज्ञा और मेधा शक्ति का उदय करते हैं। १०८ नामों का यह संकलन केवल भगवान के संबोधन मात्र नहीं हैं, बल्कि ये उच्च ध्वन्यात्मक स्पंदन (Sound Vibrations) हैं जो सूक्ष्म शरीर के चक्रों को जागृत करने की सामर्थ्य रखते हैं।
इस नामावली की पृष्ठभूमि अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों में गहराई से निहित है। दक्षिणामूर्ति का अर्थ है— 'वे जिनका मुख दक्षिण की ओर है'। दक्षिण दिशा को मृत्यु और अज्ञान की दिशा माना जाता है, और भगवान उस ओर मुख करके यह संकेत देते हैं कि वे काल (मृत्यु) और भ्रम के भक्षक हैं। जब ब्रह्मा जी के चार मानस पुत्रों—सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार—के मन में सृष्टि के रहस्यों को लेकर गहन संशय उत्पन्न हुए, तब महादेव ने एक युवा गुरु का रूप धारण किया और वटवृक्ष के नीचे 'मौन' के माध्यम से उन्हें उपदेश दिया। यह नामावली उसी मौन व्याख्यान का वाचिक विस्तार है, जो अज्ञानी जीवों को भी प्रबुद्ध बना देती है।
नामावली के प्रथम नामों में 'ॐकाराचलसिंहेन्द्राय' और 'ॐकारोद्यानकोकिलाय' जैसे शब्द भगवान को साक्षात् 'नाद-ब्रह्म' के रूप में चित्रित करते हैं। इसमें प्रयुक्त प्रत्येक नाम भगवान के एक विशिष्ट दार्शनिक गुण को प्रकट करता है। उदाहरण के लिए, 'हस्ताङ्कुरितचिन्मुद्राय' (श्लोक ७० के पास) उनके उस स्वरूप का वर्णन करता है जहाँ वे चिन्-मुद्रा धारण किए हुए हैं—जहाँ अंगूठा परमात्मा का और तर्जनी उंगली जीवात्मा का प्रतीक है, और उनका मिलन अद्वैत ज्ञान की पराकाष्ठा है। यह नामावली उन विद्यार्थियों, विद्वानों और साधकों के लिए अनिवार्य मानी गई है जो स्मृति लोप, मानसिक जड़ता और संशयों से मुक्ति चाहते हैं।
अकादमिक और आध्यात्मिक शोध के अनुसार, दक्षिणामूर्ति की उपासना में 'मेधा' (Intelligence) और 'मौन' (Silence) दो मुख्य स्तंभ हैं। यह मन्त्रार्ण नामावली इसी 'मेधा' को जाग्रत करने का वैज्ञानिक माध्यम है। इसमें भगवान को 'प्रज्ञाचन्द्रशिलाचन्द्राय' और 'ज्ञानिहृद्भासमानात्मने' कहकर उनकी उस ज्योति का वंदन किया गया है जो साधक के अंतर्मन में प्रकाशित होती है। Pavitra Granth के इस प्रामाणिक संस्करण में हम उन्हीं रहस्यों को प्रस्तुत कर रहे हैं जो सदियों से ऋषियों और मुनियों के ध्यान का केंद्र रहे हैं। इस नामावली का सस्वर पाठ करने से चित्त की चंचलता समाप्त होती है और साधक उस 'स्वात्माराम' (स्वयं में आनंदित रहने वाले) की स्थिति को प्राप्त करता है जिसका वर्णन इस पाठ के अंतिम नामों में मिलता है।
विशिष्ट महत्व: गुरु-तत्व और प्रज्ञा जागरण (Significance)
दक्षिणामूर्ति मन्त्रार्णाष्टोत्तरशतनामावली का महत्व इसकी दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक गहराई में है। इसके विशिष्ट पहलुओं को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- मन्त्र-शक्ति का संचार: यह नामावली 'अष्टादशाक्षर' मन्त्र के साथ गुंथी हुई है, जो साधक को मन्त्र-सिद्धि में सहायता प्रदान करती है।
- अज्ञान रूपी अपस्मार का दमन: दक्षिणामूर्ति स्वरूप अज्ञान रूपी असुर 'अपस्मार' पर पैर रखे हुए हैं। यह पाठ साधक के जीवन से भ्रम और अज्ञान को मिटाता है।
- बौद्धिक विकास: इसे 'मेधा दक्षिणामूर्ति' की वंदना माना जाता है, जो विद्यार्थियों के लिए एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ाने वाली है।
- मौन व्याख्यान का सार: यह नामावली शब्दों के माध्यम से उस 'मौन' तक पहुँचने की यात्रा है जहाँ वास्तविक ज्ञान का अनुभव होता है।
फलश्रुति: नामावली पाठ के दिव्य लाभ (Divine Benefits)
आगमों और गुरु परंपरा के अनुसार, इस मन्त्रार्ण नामावली के श्रद्धापूर्वक पाठ से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- मेधा और प्रज्ञा की वृद्धि: यह पाठ बुद्धि को कुशाग्र बनाता है। जो छात्र अपनी पढ़ाई में बाधा महसूस करते हैं, उनके लिए यह सर्वोत्तम उपाय है।
- मानसिक शांति और स्थिरता: "भक्तज्ञानाब्धिशीतांशवे" — यह पाठ मन को चंद्रमा के समान शीतलता प्रदान करता है और चिंताओं का नाश करता है।
- अज्ञान और भ्रम से मुक्ति: 'मोहान्धकारतरणये' होने के कारण यह पाठ जीवन के संशयों को दूर कर सत्य का साक्षात्कार कराता है।
- वाणी सिद्धि और कला में निपुणता: 'वरवीणोज्ज्वलत्कराय' प्रभु की कृपा से संगीत, साहित्य और वक्तृत्व कला में असाधारण दक्षता प्राप्त होती है।
- आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष: नित्य पाठ करने वाले को अंततः शिव-सायुज्य (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
पाठ विधि और साधना के नियम (Ritual Method & Guidelines)
श्री दक्षिणामूर्ति मन्त्रार्णाष्टोत्तरशतनामावली का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाना श्रेष्ठ है:
- समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (४:०० - ६:०० बजे) पाठ के लिए सर्वोत्तम है। गुरुवार (गुरु का दिन) और प्रदोष काल विशेष माने जाते हैं।
- शुचिता: स्नान के उपरांत स्वच्छ श्वेत (सफेद) वस्त्र धारण करें। सफेद रंग ज्ञान और शांति का प्रतीक है।
- आसन और दिशा: उत्तर या पूर्व मुख होकर बैठें। ऊनी या कुश का आसन सर्वोत्तम है।
- पूजन सामग्री: भगवान दक्षिणामूर्ति के चित्र या शिवलिंग पर भस्म (विभूति), श्वेत चंदन और पीले फूल अर्पित करें।
- ध्यान की मुद्रा: पाठ प्रारंभ करने से पहले 'चिन्-मुद्रा' धारण करके ५ मिनट भगवान के शांत स्वरूप का हृदय में ध्यान करें।
विशेष प्रयोग: यदि आप किसी विशेष परीक्षा या बौद्धिक कार्य के लिए जा रहे हैं, तो ९ बार इस नामावली का पाठ करके अभिमंत्रित जल का सेवन करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भगवान दक्षिणामूर्ति कौन हैं?
भगवान दक्षिणामूर्ति भगवान शिव का 'आदि-गुरु' स्वरूप हैं, जो वटवृक्ष के नीचे मौन रहकर ऋषियों को आत्मज्ञान और समस्त विद्याओं का उपदेश देते हैं।
2. 'मन्त्रार्ण' शब्द का क्या अर्थ है?
'मन्त्रार्ण' का अर्थ है मन्त्र के अक्षरों का समूह। यह नामावली दक्षिणामूर्ति के १८ अक्षरों वाले विशिष्ट महामन्त्र की शक्तियों पर आधारित है।
3. क्या विद्यार्थियों के लिए यह नामावली विशेष रूप से उपयोगी है?
हाँ, दक्षिणामूर्ति प्रज्ञा और मेधा के स्वामी हैं। इस नामावली का पाठ विद्यार्थियों की एकाग्रता, बुद्धि की प्रखरता और स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
4. दक्षिणामूर्ति भगवान दक्षिण की ओर मुख क्यों करते हैं?
दक्षिण दिशा मृत्यु के देवता यमराज की दिशा है। भगवान दक्षिण मुख होकर यह संदेश देते हैं कि वे काल और अज्ञान (मृत्यु के भय) को मिटाने वाले हैं।
5. क्या इस पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?
यद्यपि गुरु दीक्षा उत्तम है, परंतु श्रद्धा भाव से कोई भी श्रद्धालु शिव को ही अपना गुरु मानकर इसका पाठ कर सकता है।
6. 'चिन्-मुद्रा' का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
चिन्-मुद्रा में तर्जनी (जीव) और अंगूठा (परमात्मा) मिलते हैं, जो जीवात्मा के परमात्मा में विलीन होने का प्रतीक है।
7. पाठ के लिए सबसे उत्तम दिन कौन सा है?
सोमवार और गुरुवार (गुरु का दिन) इस नामावली के पाठ के लिए विशेष रूप से फलदायी माने जाते हैं।
8. 'अपस्मार' कौन है जिसका उल्लेख दक्षिणामूर्ति प्रसंग में आता है?
अपस्मार अज्ञान, विस्मृति और भ्रम का प्रतीक एक असुर है, जिसे भगवान दक्षिणामूर्ति अपने दाहिने पैर से दबाकर रखते हैं, जो अज्ञान के दमन का संकेत है।
9. क्या केवल नाम सुनने (श्रवण) से भी लाभ मिलता है?
जी हाँ, शास्त्रों के अनुसार प्रभु की नामावली का श्रवण करना भी चित्त को शुद्ध करता है और प्रज्ञा को जाग्रत करता है।
10. पाठ के दौरान किस रंग के वस्त्र पहनना शुभ है?
भगवान दक्षिणामूर्ति की साधना में श्वेत (सफेद) रंग सबसे श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि यह सात्विकता और ज्ञान की शुद्धता का प्रतीक है।