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Sri Dakshinamurthy Ashtottara Shatanamavali – श्री दक्षिणामूर्त्यष्टोत्तरशतनामावली

Sri Dakshinamurthy Ashtottara Shatanamavali – श्री दक्षिणामूर्त्यष्टोत्तरशतनामावली
॥ श्री दक्षिणामूर्त्यष्टोत्तरशतनामावली ॥ ओं विद्यारूपिणे नमः । ओं महायोगिने नमः । ओं शुद्धज्ञानिने नमः । ओं पिनाकधृते नमः । ओं रत्नालङ्कृतसर्वाङ्गाय नमः । ओं रत्नमालिने नमः । ओं जटाधराय नमः । ओं गङ्गाधारिणे नमः । ओं अचलावासिने नमः । ९ ओं सर्वज्ञानिने नमः । ओं समाधिधृते नमः । ओं अप्रमेयाय नमः । ओं योगनिधये नमः । ओं तारकाय नमः । ओं भक्तवत्सलाय नमः । ओं ब्रह्मरूपिणे नमः । ओं जगद्व्यापिने नमः । ओं विष्णुमूर्तये नमः । १८ ओं पुरान्तकाय नमः । ओं उक्षवाहाय नमः । ओं चर्मवाससे नमः । ओं पीताम्बरविभूषणाय नमः । ओं मोक्षसिद्धये नमः । ओं मोक्षदायिने नमः । ओं दानवारये नमः । ओं जगत्पतये नमः । ओं विद्याधारिणे नमः । २७ ओं शुक्लतनवे नमः । ओं विद्यादायिने नमः । ओं गणाधिपाय नमः । ओं पापापस्मृतिसंहर्त्रे नमः । ओं शशिमौलये नमः । ओं महास्वनाय नमः । ओं सामप्रियाय नमः । ओं स्वयं साधवे नमः । ओं सर्वदेवैर्नमस्कृताय नमः । ३६ ओं हस्तवह्निधराय नमः । ओं श्रीमते नमः । ओं मृगधारिणे नमः । ओं शङ्कराय नमः । ओं यज्ञनाथाय नमः । ओं क्रतुध्वंसिने नमः । ओं यज्ञभोक्त्रे नमः । ओं यमान्तकाय नमः । ओं भक्तानुग्रहमूर्तये नमः । ४५ ओं भक्तसेव्याय नमः । ओं वृषध्वजाय नमः । ओं भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गाय नमः । ओं अक्षमालाधराय नमः । ओं महते नमः । ओं त्रयीमूर्तये नमः । ओं परस्मै ब्रह्मणे नमः । ओं नागराजैरलङ्कृताय नमः । ओं शान्तरूपाय नमः । ५४ ओं महाज्ञानिने नमः । ओं सर्वलोकविभूषणाय नमः । ओं अर्धनारीश्वराय नमः । ओं देवाय नमः । ओं मुनिसेव्याय नमः । ओं सुरोत्तमाय नमः । ओं व्याख्यानदेवाय नमः । ओं भगवते नमः । ओं अग्निचन्द्रार्कलोचनाय नमः । ६३ ओं जगत्स्रष्ट्रे नमः । ओं जगद्गोप्त्रे नमः । ओं जगद्ध्वंसिने नमः । ओं त्रिलोचनाय नमः । ओं जगद्गुरवे नमः । ओं महादेवाय नमः । ओं महानन्दपरायणाय नमः । ओं जटाधारिणे नमः । ओं महावीराय नमः । ७२ ओं ज्ञानदेवैरलङ्कृताय नमः । ओं व्योमगङ्गाजलस्नाताय नमः । ओं सिद्धसङ्घसमर्चिताय नमः । ओं तत्त्वमूर्तये नमः । ओं महायोगिने नमः । ओं महासारस्वतप्रदाय नमः । ओं व्योममूर्तये नमः । ओं भक्तानामिष्टकामफलप्रदाय नमः । ओं वीरमूर्तये नमः । ८१ ओं विरूपिणे नमः । ओं तेजोमूर्तये नमः । ओं अनामयाय नमः । ओं वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञाय नमः । ओं चतुष्षष्टिकलानिधये नमः । ओं भवरोगभयध्वंसिने नमः । ओं भक्तानामभयप्रदाय नमः । ओं नीलग्रीवाय नमः । ओं ललाटाक्षाय नमः । ९० ओं गजचर्मणे नमः । ओं ज्ञानदाय नमः । ओं अरोगिणे नमः । ओं कामदहनाय नमः । ओं तपस्विने नमः । ओं विष्णुवल्लभाय नमः । ओं ब्रह्मचारिणे नमः । ओं संन्यासिने नमः । ओं गृहस्थाश्रमकारणाय नमः । ९९ ओं दान्तशमवतां श्रेष्ठाय नमः । ओं सत्त्वरूपदयानिधये नमः । ओं योगपट्टाभिरामाय नमः । ओं वीणाधारिणे नमः । ओं विचेतनाय नमः । ओं मन्त्रप्रज्ञानुगाचाराय नमः । ओं मुद्रापुस्तकधारकाय नमः । ओं रागहिक्कादिरोगाणां विनिहन्त्रे नमः । ओं सुरेश्वराय नमः । १०८ ॥ इति श्री दक्षिणामूर्त्यष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णा ॥

परिचय: भगवान दक्षिणामूर्ति और १०८ नामों का रहस्य (Introduction)

श्री दक्षिणामूर्त्यष्टोत्तरशतनामावली (Sri Dakshinamurthy Ashtottara Shatanamavali) भगवान शिव के उस परम तेजस्वी स्वरूप को समर्पित है जो ज्ञान, योग और संगीत के अधिष्ठाता हैं। हिंदू धर्म में शिव का 'दक्षिणामूर्ति' स्वरूप 'आदि-गुरु' (The Primordial Teacher) के रूप में प्रतिष्ठित है। यह नाम १०८ दिव्य विशेषणों का वह माला है जो साधक को आत्मज्ञान के मार्ग पर ले जाती है। दक्षिणामूर्ति का शाब्दिक अर्थ है— "वे जिनका मुख दक्षिण (Dakshina) की ओर है"। दक्षिण दिशा को पारंपरिक रूप से मृत्यु (यमराज) की दिशा माना जाता है, और भगवान उस ओर मुख करके यह संदेश देते हैं कि वे काल और मृत्यु के भय को मिटाने वाले परम गुरु हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब ब्रह्मा जी के चार मानस पुत्रों—सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार—के मन में सृष्टि के गूढ़ रहस्यों को लेकर संशय उत्पन्न हुए, तब महादेव ने एक युवा गुरु का रूप धारण किया और वटवृक्ष के नीचे 'मौन व्याख्यान' द्वारा उनके समस्त प्रश्नों का समाधान किया। यह १०८ नामों का पाठ उसी 'मौन' की शक्ति को वाणी देता है। इस नामावली में प्रयुक्त नाम जैसे 'शुद्धज्ञानिने', 'समाधिधृते' और 'ब्रह्मरूपिणे' भगवान शिव के दार्शनिक और ज्ञानात्मक पक्ष को उजागर करते हैं। यह पाठ न केवल धार्मिक श्रद्धा का विषय है, बल्कि यह प्रज्ञा (Higher Intelligence) को जाग्रत करने का एक वैज्ञानिक आध्यात्मिक मार्ग भी है।
दार्शनिक शोध की दृष्टि से, दक्षिणामूर्ति स्वरूप 'अद्वैत वेदांत' का साक्षात् विग्रह है। उनके हाथों में स्थित 'चिन्-मुद्रा' (index finger touching the thumb) जीवात्मा और परमात्मा की एकता का प्रतीक है। इस नामावली का पाठ करने से साधक के भीतर सोई हुई मेधा शक्ति जाग्रत होती है। Pavitra Granth के इस विशेष संकलन में हम भगवान के उन १०८ स्वरूपों का संकीर्तन कर रहे हैं जो न केवल वेदों के ज्ञाता हैं, बल्कि स्वयं 'विद्या' के आदि-आधार हैं। जो भक्त पूर्ण विश्वास के साथ इस नामावली का पाठ करता है, उसे सांसारिक भ्रमों से मुक्ति और शाश्वत शांति प्राप्त होती है।

विशिष्ट महत्व: दक्षिणामूर्ति स्वरूप की दार्शनिक गहराई (Significance)

दक्षिणामूर्त्यष्टोत्तरशतनामावली का महत्व इसकी दार्शनिक व्यापकता में निहित है। जहाँ शिव के अन्य रूप संहारक या नर्तक (नटराज) के रूप में पूजे जाते हैं, वहीं दक्षिणामूर्ति स्वरूप उनकी 'उपदेशात्मक' शक्ति का प्रतीक है। इसके प्रमुख पक्ष निम्नलिखित हैं:
  • ज्ञान का प्रकाश: 'अज्ञानध्वान्तभास्कराय' (अज्ञान रूपी अंधेरे को मिटाने वाला सूर्य) होने के कारण यह पाठ बुद्धि की जड़ता को समाप्त करता है।
  • मौन व्याख्यान: भगवान दक्षिणामूर्ति शब्दों के बिना केवल अपनी उपस्थिति से शिष्यों के संशय दूर करते हैं। यह पाठ उसी 'मौन' का मंत्रमय स्वरूप है।
  • अपस्मार का दमन: भगवान के चरणों के नीचे जो असुर (अपस्मार) दबा हुआ है, वह 'विस्मृति' और 'भ्रम' का प्रतीक है। यह नामावली उसी विस्मृति को दूर कर मेधा बढ़ाती है।
  • गुरु-तत्व: बिना गुरु की कृपा के मोक्ष संभव नहीं है। दक्षिणामूर्ति साक्षात् शिव हैं जो गुरु बनकर संसार सागर से तारते हैं।

फलश्रुति: नामावली पाठ के दिव्य लाभ (Divine Benefits)

शास्त्रों और आगम ग्रंथों के अनुसार, श्री दक्षिणामूर्ति के १०८ नामों के पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • प्रज्ञा और मेधा की वृद्धि: विद्यार्थियों के लिए यह नामावली वरदान है। यह एकाग्रता बढ़ाती है और कठिन विषयों को समझने की शक्ति प्रदान करती है।
  • मानसिक शांति: तनाव और अशांति के समय 'शान्तरूपाय' प्रभु का स्मरण मन को असीम संतोष और स्थिरता प्रदान करता है।
  • भय और व्याधि से मुक्ति: 'भवरोगभयध्वंसिने' होने के कारण यह पाठ शारीरिक रोगों और मृत्यु के भय को जड़ से समाप्त कर देता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: यह पाठ साधक को सांसारिक मोह से मुक्त कर 'योग' और 'समाधि' की ओर अग्रसर करता है।
  • अज्ञान का नाश: "छिन्नाज्ञानतमस्ततये" — यह पाठ भ्रम के बादलों को हटाकर सत्य का साक्षात्कार कराता है।

पाठ विधि एवं साधना के नियम (Ritual Method & Guidelines)

श्री दक्षिणामूर्त्यष्टोत्तरशतनामावली एक अत्यंत पवित्र पाठ है। इसका पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाना श्रेष्ठ है:
  • समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (४:०० - ६:०० बजे) पाठ के लिए सर्वोत्तम है। इसके अतिरिक्त प्रदोष काल और सोमवार का दिन विशेष माना जाता है।
  • शुचिता: स्नान के उपरांत स्वच्छ श्वेत (सफेद) वस्त्र धारण करें। सफेद रंग ज्ञान और सात्विकता का प्रतीक है।
  • आसन और दिशा: उत्तर या पूर्व मुख होकर बैठें। ऊनी या कुश का आसन सर्वोत्तम है।
  • पूजन सामग्री: भगवान दक्षिणामूर्ति के चित्र या शिवलिंग पर भस्म (विभूति), श्वेत चंदन और बिल्वपत्र अर्पित करें।
  • मौन ध्यान: पाठ के समापन के बाद कम से कम ५-१० मिनट मौन बैठकर भगवान के 'चिन्-मुद्रा' स्वरूप का हृदय में ध्यान करें।
विशेष अवसर: गुरु पूर्णिमा, महाशिवरात्रि और मौनी अमावस्या के दिन इस नामावली का पाठ अनंत गुना फल प्रदान करने वाला होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भगवान दक्षिणामूर्ति कौन हैं?

भगवान दक्षिणामूर्ति महादेव शिव का वह स्वरूप हैं जो समस्त विद्याओं के 'आदि-गुरु' माने जाते हैं। वे वटवृक्ष के नीचे बैठकर मौन रहकर ऋषियों को आत्मज्ञान देते हैं।

2. दक्षिणामूर्ति भगवान दक्षिण की ओर मुख क्यों करते हैं?

दक्षिण दिशा मृत्यु के देवता यमराज की दिशा मानी जाती है। भगवान दक्षिण मुख होकर यह संदेश देते हैं कि वे काल और मृत्यु के भय को मिटाने वाले परम गुरु हैं।

3. क्या विद्यार्थियों के लिए यह नामावली उपयोगी है?

जी हाँ, भगवान दक्षिणामूर्ति प्रज्ञा और मेधा के स्वामी हैं। इस नामावली के पाठ से एकाग्रता, बुद्धि की प्रखरता और स्मरण शक्ति में अपार वृद्धि होती है।

4. 'चिन्-मुद्रा' का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

चिन्-मुद्रा में तर्जनी उंगली अंगूठे से मिली होती है, जो जीवात्मा (Self) और परमात्मा (Brahman) की एकता का प्रतीक है। शेष तीन उंगलियां अहंकार, कर्म और भ्रम को दर्शाती हैं जो अलग रहती हैं।

5. क्या इस पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

यद्यपि गुरु दीक्षा उत्तम है, परंतु श्रद्धा भाव से कोई भी जिज्ञासु भगवान शिव को ही अपना आदि-गुरु मानकर इस नामावली का पाठ कर सकता है।

6. क्या इसे घर में नित्य पढ़ा जा सकता है?

हाँ, घर के शांत कोने में बैठकर इसे पढ़ना अत्यंत शुभ है। इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और ज्ञान का प्रकाश फैलता है।

7. पाठ के लिए सबसे उत्तम दिन कौन सा है?

यद्यपि नित्य पाठ उत्तम है, परंतु सोमवार और गुरुवार (गुरु का दिन) विशेष फलदायी माना जाता है।

8. 'अपस्मार' कौन है जिसका उल्लेख दक्षिणामूर्ति प्रसंग में आता है?

अपस्मार अज्ञान, विस्मृति और भ्रम का प्रतीक एक असुर है, जिसे भगवान दक्षिणामूर्ति अपने पैर से दबाकर रखते हैं, जो अज्ञान के दमन का संकेत है।

9. क्या केवल नाम सुनने (श्रवण) से भी लाभ मिलता है?

जी हाँ, शास्त्रों के अनुसार प्रभु की नामावली का श्रवण करना भी चित्त को शुद्ध करता है और प्रज्ञा को जाग्रत करता है।

10. पाठ के दौरान किस रंग के वस्त्र पहनना शुभ है?

भगवान दक्षिणामूर्ति की साधना में श्वेत (सफेद) रंग सबसे श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि यह सात्विकता और ज्ञान की शुद्धता का प्रतीक है।